बुधवार, 20 मार्च 2013

होली का माहौल बनाने के लिये आइये आज सुनते हैं एक हजल जो है डॉ संजय दानी की हजल, साथ में श्री निर्मल सिद्धू तथा श्री अरुन शर्मा की ग़ज़लें ।

होली आ ही गई है । और ब्‍लाग का माहौल भी होलीमय हो गया है । ऐसा कुछ दिनों पूर्व से इसलिये किया गया है क्‍योंकि दो दिन तक कवि सम्‍मेलनों के चक्‍कर के बाहर रहना है । सो दो दिन पूर्व से ही माहौल बना दिया गया । आज एक साथ तीन तीन शायर आ रहे हैं होली के माहौल को बनाने के लिये डॉ संजय दानी जी, श्री निर्मल सिद्धू जी और श्री अरुन शर्मा। आज का अंक अंतिम होना था किन्‍तु तकनीकी कारणों से अब अगला अंक इस तरही का अंतिम अंक होगा और उसके बाद होली का होला प्रारंभ हो जाएगा । गेस कीजिये  कि तरही के अंतिम अंक में शो स्‍टॉपर के रूप में कौन सा शायर अपनी एकल प्रस्‍तुति लेकर आने वाला है । दिमाग पर ज़ोर डालिये ।

होली के मिसरे पर कुछ ग़ज़लें प्राप्‍त हो चुकी हैं इतनी कि उनसे हमारा मुशायरा तो हो जाएगा लेकिन यदि सभी शिरकत करेंगे तो और आनंद आयेगा क्‍योंकि असली मज़ा सब के साथ आता है । तो केशरिया लाल पीला नीला हरा गुलाबी पर अपनी रचना ज़रूर भेजें । 24 के पूर्व भेज दें तो ठीक है, वैसे 24 और 25 को भी भेज सकते हैं । 26 को होली के एक दिन पूर्व हम होली के तरही का समापन करेंगे, सो 26 को या उसके बाद यदि आप रचना भेजते हैं तो वो एक अप्रैल के बाद ही बासी होली में स्‍थान पायेगी । क्‍योंकि हमारे यहां होली का पांच दिन का अवकाश होता है ।

ये क़ैदे बामशक्‍कत जो तूने की अता है

sanjay dani

डॉ. संजय दानी जी

बिजली का रेट जब से इस प्रान्त में बढा है,
ये प्रान्त चोरों का गढ सा बनते जा रहा है।

क्यूं मुझको कैटरीना से दूर जाने कहते,
ये कैदे -बामशक्कत तो तूने की अता है।

रुकता न काम मेरा    दफ़्तर में कोई  भी अब ,
साड़ी पहन, वहां जाने का ये फ़ायदा है।

मैं सायकिल चलाता हूं बैठ डंडी में अब,
आगे का चक्का इस विधि से तेज़ भागता है।

महंगी है "माल" की सब चीज़ें तो फिर हुआ क्या,
वो मुफ़्त में मुहब्बत का ठौर खोलता है।

रामू ने पा लिया है होटल चलाने का गुर,
हर डिश में अब वो थोड़ी सी भांग घोलता है।

कुछ लोग पीते भी हैं, बीबी से डरते भी हैं,,
सारे दुखों से ये दुख इस दुनिया में बड़ा है।

मेरा पड़ोसी पोलिस का गुप्तचर है दानी,
पर उसका शह्र के चोरों से भी राब्ता है।

महंगी हैं मॉल की सब चीजें तो, में बहुत उम्‍दा तरीके से मॉल की तुलना मुहब्‍बत से की है । सच में मॉल संस्‍कृति को यदि कोई शै मात दे सकती है तो वो मुहब्‍बत ही है  । बस और बस मुहब्‍बत । साथ में ये भी निवेदन है कि रामू के होटल का पता अवश्‍य दे दीजिये ताकि उस होटल में हम कुछ भी खाने पीने से बच सकें । कुछ लोग पीते भी हैं बीबी से डरते भी हैं, ये शेर दुनिया के सारे मर्दों को समर्पित है । क्‍योंकि पीते भले ही सब न हों लेकिन डरते तो सब हैं ये एक ग्‍लाबल सचाई है । बहुत बहुत सुंदर ग़जल़ वाह वाह वाह होली का मूड बना दिया । 

nirmal sidhu

श्री निर्मल सिद्धू जी

ये क़ैदे बामुशक्क़त जो तूने की अता है
लगती कभी दवा तो लगती कभी सज़ा है,

तुझसे करें गिला कब तुझको कहाँ तलाशें
किस देश में नगर में, आखिर कहाँ छुपा है,

ये जग बदल-बदल के हर पल बदल रहा है
अपने ही घर में बैठा इन्सान लुट रहा है,

कलियुग की धार इतनी पैनी हुई है अब तो
हर कोई काटता है हर कोई कट रहा है,

तस्वीर इस जहां की यूं कर हुई है धुंधली
हर दिल धुआँ-धुआँ है हर दिल बुझा-बुझा है,

जो साथ चल रहा है वो भी नहीं हमारा
परखा उसे तो जाना उसमें कहाँ वफ़ा है,

संभलेंगे कब ये बिगड़े हालात इस जहां के
तू ही हमें बता दे तुझको तो सब पता है,

ऐसे में रुख़ हवा का जब तेरे दर से आता
मिलता तभी सुकूं है आता तभी मज़ा है,

तुझसे करें गिला कब तुझको कहां तलाशें, में बहुत सुंदर तरीके से उस बात को कहा गया है जिसे कई कई बार शायरों ने कई तरीके से कहा है । उसी को नये तरीके से कहा गया । कलियुग वाला शेर भी अपने मिसरा सानी के कारण प्रभावी हो गया है । सचमुच आज यही तो हाल है कि हर कोई काटता है हर कोई कट रहा है । सभलेंगे कब ये बिगड़े हालात इस जहां के में एक बार फिर से उस मालिक से प्रश्‍न है और एक यूनविर्सल प्रश्‍न है । ऐसे में रुख हवा का शेर भी अलग बन पड़ा है । बहुत बहुत सुंदर ग़ज़ल वाह वाह वाह ।

arun sharma

श्री अरुन शर्मा

काटों भरी डगर है जीवन का पथ खुदा है,
गंभीर ये समस्या हल आज लापता है,

अंधा समाज बैरी इंसान खुद खुदी का,
अनपढ़ से भी है पिछड़ा, वो जो पढ़ा लिखा  है,

धोखाधड़ी में अक्सर मसरूफ लोग देखे,
ईमान डगमगाया इन्‍सां लुटा पिटा  है,

तकदीर के भरोसे लाखों गरीब बैठे,
हिम्मत सदैव हारें इनकी यही खता है,

अपमान नारियों का करता रहा अधर्मी,
संसार आफतों का भण्डार हो चला है.

धोखाधड़ी में अक्‍सर मसरूफ लोग देखे शेर शेर अच्‍छा बन पड़ा है । अरुन की ये शुरूआत है और शुरूआत के हिसाब से गज़ल अच्‍छी बनी है । शुरू के दौर में कहन और वज्‍न का संतुलन साधना बहुत मुश्किल होता है । उस समय में यदि ग़ज़ल में हम ये संतुलन साध लें तो आगे के लिये काफी संभावनाएं जाग जाती हैं । मतले भी उसी प्रकार की संभावना दिखाई दे रही है । तकदीर के भरोसे बैठने वाला शेर भी उसी प्रकार से बना है । बहुत सुंदर ग़ज़ल वाह वाह वाह ।

तो आनंद लीजिये दोनों ग़ज़लों का और दाद देते रहिये और हां दिमाग में गुंजाते रहिये 'केसरिया, लाल, पीला, नीला, हरा, गुलाबी' ।

12 टिप्‍पणियां:

  1. क्या रंग क्या ढंग क्या अंदाज़.. . इन्द्रधनुष उतर आया है.

    डॉ.सजय दानी साहब को उनकी हा-हा-हास्य ग़ज़ल के लिए बधाई. मतले की तिर्यक ज़ुबान कमाल कर रही है ! वाह डॉक्टर साहब वाह !

    निर्मल सिद्धु भाईजी की ग़ज़ल मंदधार बहती उस नदी की तरह लगी जो अपने दौर-दायरों में बहुत कुछ देख-झेल चुकी है, मग़र अब क्या कहना सोचती हुई इशारों में बात करती है. बहुत सुन्दर ! हार्दिक बधाइयाँ.

    प्रिय अरुन शर्मा मेहनत कर रहे हैं. विश्वास बना है, उम्मीदें लगी हैं. शुभेच्छाएँ.

    समस्त पारिवारिक सदस्यों को फागुन माह की ढेर सारी शुभकामनाएँ.. .

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  2. तीनों ही शायरों की गजलें बहुत ही बेहतरीन है,सबको धन्यबाद.

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  3. आदरणीय पंकज सर एवं आदरणीय गुरुदेव श्री सौरभ सर आप दोनों का आशीष और स्नेह पाकर मैं धन्य हुआ, आप गुरुजनों का आशीष जब तक साथ है प्रयास जारी रहेगा. हार्दिक आभार

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  4. बहुत ही सार्थक व् सराहनीय तीनों ही ग़ज़ल ........

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  5. गुरूवर,

    अपनी व्यस्तताओं और जिम्मेदारियों के चलते बसंत की तरही में न तो भाग ले पाया और न ही बेहतरीन्गज़लों को पढ़ पाया। आज से शुरूआत कर रहा हूँ पिछले सभी अंक पढ़ने की और सीखने की, क्योंकि यहाँ सीखने को इतना कुछ मिल जाता है और वो आनन्द के साथ। एक से बढ़कर एक गज़लें, और उससे भी बढ़कर टिप्प्णियाँ फिर आपकी भूमिका....क्या कहने।

    डॉ. दानी की हज़ल में एक कामयाब नुस्खा है किसी भी रूके हुए काम कैसे निकलवा सकते हैं और सारे दुखों से ये दुख इस दुनिया बड़ा है...कितनी खूबसूरती से कहा गया है, अंतर्व्यथा सा....

    सिद्धू जी की बात बड़ी गहरी लगी और आज की व्यवस्था में ईश्वर से प्रश्न पूछती हुई " तू ही हमें बता दे त्तुझको तो सब पता है " वाह...

    अरूण ने बड़ी उम्मीद वाली बात कही है " हिम्मत सदैव हारे इनकी यही खता है "

    होली की अग्रिम शुभकामनाएँ समस्त गुरूकुल को

    सादर,

    मुकेश कुमार तिवारी

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  6. संजय दाणी जी के प्रान्त की समस्या गंभीर ही नहीं देशव्यापी है। भाई ये कैटरीना के चक्कर में मत पड़ना अमेरिका में इसके सताये हुए बहुत से हैं। साड़ी से गाड़ी चल निकली आफिस की; नया प्रयोग है और भाई कभी सायकल के हैंडल पर भी बैठ कर देखें सायकल हवा से बातें करेगी। भाई ये ग़ज़ल कैदे बामश्क्कत को बाकायदा होली के हास्यल में तब्दील करने की है।
    सिद्धू जी आध्यात्म से आरंभ होकर आस-पास के वातावरण को खूबसूरती से बयां करते हुए वापिस अध्यात्म में पहुँच गये। इस उम्र में ज़रूरी है।
    अरुण शर्मा जी ने 5 शेर में बहुत कुछ कह दिया।
    आनंद आ गया। अब लास्ट में एकल प्रस्तुति तो भभ्भड़ कवि की ही बची है।
    स्वागत है।

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  7. दानी साहब ने शानदार हज़ल कही है। हज़ल के माध्यम से देशव्यापी समस्याओं पर बात की है दानी जी ने। इसके लिए उन्हें बहुत बहुत बधाई।

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  8. सिद्धू जी ने शानदार ग़ज़ल कही है। इन शानदार अश’आर के लिए उन्हें बहुत बहुत बधाई।

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  9. अरुन जी की ग़ज़ल अच्छी लगी। अच्छे अश’आर कहे हैं उन्होंने। उनको बहुत बहुत बधाई और भविष्य के लिए शुभकामनाएँ।

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  10. संजय दानी जी ने तो माहोल बना दिया है आने वाले दिनों का ...
    समस्याओं को लेकर हास्य, व्यंग का तड़का ... मज़ा आ गया ... ओर रामू के होटल का पता तो हमें भी चाहिए ... ओर बीबी से डरने की सच्चाई तो सभी को पता है ...
    निर्मल जी ने तो मतले के शेर से ही कमाल शुरू कर दिया ... फिर हर शेर में सचाई को लिखा है ... सम्ब्लेंगे कब ये बिगड़े हालात ... अंत में इंसान उसी के पास जाता है जिसके पास सब बातों का जवाब है ...
    अरुण जी का भी मतले का शेर खूबसूरत बन पड़ा है ... अंधा समाज बैरी इंसान ... आज की पड़ी लिखी युवा पीड़ी को सावधान करता शेर है ... संसार आफतों का ... सच लिखा है की जहां नारी की इज्ज़त नहीं होती वो समाज आफतों में घिरा रहता है ...

    इस मुशायरे ने अपनी बुलंदियों को छुआ है ... ओर ये सब आपकी बदोलत ही है गुरुदेव ...
    अब आकरी गैस तो अपने पुराने कवि ... कवि भभ्भड़ ही बचे हैं ...मतलब मज़ा आने वाला है ...

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  12. आदरणीय डॉ. संजय दानी जी बहुत खूब हजल कही है मजा आ गया पड़ कर

    महंगी है "माल" की सब चीज़ें तो फिर हुआ क्या,
    वो मुफ़्त में मुहब्बत का ठौर खोलता है।

    वाह वाह

    आदरणीय निर्मल सिद्धू जी वाह वाह क्या गजल है -

    जो साथ चल रहा है वो भी नहीं हमारा
    परखा उसे तो जाना उसमें कहाँ वफ़ा है,
    क्या बात क्या बात वाह वाह


    आदरणीय अरुन शर्मा जी वाह बहुत अच्छी गजल


    धोखाधड़ी में अक्सर मसरूफ लोग देखे,
    ईमान डगमगाया इन्‍सां लुटा पिटा है

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