सोमवार, 11 मार्च 2013

सुकवि रमेश हठीला स्‍मृति शिवना सम्‍मान की घोषणा और श्री तिलक राज कूपर जी की ग़ज़लें ।

हम हमेशा उसी भाषा में सहज होते हैं जिस भाषा को हमने सबसे पहले बोला और सबसे पहले सुना । हमारी मातृभाषा । दूसरी किसी भी भाषा में हम उतने सहज नहीं होते हैं । कई बार हम उस भाषा का उपयोग करते समय बनावटी लगने लगते हैं । हमारी सहजता खो जाती है । और तिस पर कविता....... कविता तो अंदर से उमड़ने वाला वो प्रवाह है जो सहजता खोते ही खो जाता है । विचार हमेशा मातृभाषा में ही आते हैं । आप रोते भी हमेशा मातृभाषा में हैं और खुश भी उसी में होते हैं । कविता विचारों का प्रवाह है, कविता समाधि में उत्‍पन्‍न हुआ नाद है, कविता गहन पीड़ा में मुंह से निकला स्‍वर है । आप विद्वान बनने के लिये भले ही दूसरी भाषा में कविता कह लें किन्‍तु वो कविता स्‍वभाविक नहीं होगी । बनाया जाना और बन जाना के बीच के अंतर को यदि समझ सकें तो ये बात और स्‍पष्‍ट होगी । कविता बनावट से नहीं आती, कविता मुखौटों से नहीं आती । कविता वहीं आती है जहां सब कुछ सहज होता है स्‍वाभाविक होता है । हर भाषा को अपने अपने कवियों की आवश्‍यकता होती है । कवि ही किसी भाषा को जिन्‍दा रखता है । हम सब पर भी यही दायित्‍व है कि हम उस भाषा को जिन्‍दा रखें जो हमारी मातृभाषा है । पूरी हिम्‍मत के साथ इस काम को करें क्‍योंकि 'कायर' और 'कवि' आप इनमें से कुछ एक ही हो सकते हैं ये दोनों एक साथ नहीं हो सकते ।

ये क़ैदे बामशक्‍कत जो तूने की अता है

शिवरात्रि पर सुकव‍ि रमेश हठीला स्‍मृति शिवना सम्‍मान की घोषणा करने परंपरा पिछले वर्ष से कायम की है । सो आज उस पंरपरा का निर्वाहन करते हुए घोषित करते हैं इस वर्ष के सम्‍मानित कवि का नाम । इस वर्ष के लिये चयन समिति ने सर्व सम्‍मति से श्री तिलक राज कपूर जी का नाम सम्‍मान के लिये चयनित किया है । तो घोषित किया जाता है कि इस वर्ष का सुकवि रमेश हठीला शिवना सम्‍मान श्री तिलक राज कपूर जी को प्रदान किया जाएगा ।

shivna logo copy16-20shivna logo copy

''सुकव‍ि रमेश हठीला स्‍मृति शिवना सम्‍मान''

DSC_3865DSC_3897DSC_3866

श्री तिलक राज कपूर जी

5 ग़ज़ल के रूप में वर्गीकृत करने की कोशिश की है।

ग़ज़ल-1
फुटपाथ पर अभी तक जो रात काटता है
वो सूर्य का उजाला हर देश में बिछा है।

कॉंधे मेरे पिता के मज़बूत हैं बहुत पर
मेरी ज़रूरतों का कुछ बोझ बढ़ गया है।

मॉं की उदास ऑंखें राहें बुहारती थीं
थक हार कर अब उनका हर स्वप्न सो रहा है।

रिश्ते  बँटे हुए हैं, अहसास सो गये हैं
है कौन जो किसी का दुख दर्द बॉंटता है।

इक दौड़ में लगे हैं बच्चे जवान बूढ़े
मंजि़ल मगर कहॉं है, इसका किसे पता है।

मेरे खि़लाफ़ साजि़श, जिसकी है, नाम उसका
लब बोलते नहीं, पर, ये दिल तो जानता है।

किसने गले लगाई, किसकी समझ में आई
‘ये कैदे बामशक्कत जो तूने की अता है।‘

ग़ज़ल-2

कुनबा चलाए सत्ता किस तंत्र में लिखा है
बोलूँ मैं राजशाही तो मानता बुरा है।

पूछे कोई तो उनसे, ये आग क्यूँ लगाई
जिसमें किसी का सपना, धू-धू हुआ मिटा है।

हरदम धुँआ उगलना आदत यही थी उसकी
जब से बना वो शासक दंगा नहीं हुआ है।

नस्लों  के नाम पर अब, मत कीजिये सियासत
हर दौर में इसी से बाज़ू कोई कटा है।

बेजान तो नहीं पर पुतली बने हुए हैं
इनका ज़मीर बोलो गिरवी कहॉं रखा है।

चारों तरफ़ हैं उसके गिद्धों के झुंड देखो
राहत के काम शायद ये शख्स बॉंटता है।

नोटों पे साख बनकर, जब साथ तुम चले तो
‘राही’गया जहॉं भी, हर काम हो गया है

ग़ज़ल-3 

गुमसुम उदास ऑंखें लेकर वो घूमता है
कहते हैं लोग उसको मँहगाई ने डसा है।

कुछ और तो नहीं पर, गुदड़ी छुपा रहा है
सब कुछ लुटा है उसका, इक लाल ही बचा है।

परचम हरिक दिशा में बनकर जुलूस निकले
कुछ और हो न हो, पर, हर पेट भर गया है।

फिर सामने खड़ा है इक प्रश्नक यक्ष जैसा
कोशिश हज़ार की हैं, उत्तर नहीं मिला है।

ऊँची उड़ान पर है, ये सोच का पर्रिदा
बादल सियाह लेकिन इस पर तना हुआ है।

इस को बदल के उस को, उस को बदल के इस को
सब कुछ बदल के देखा, अंतर नहीं मिला है।

बेख़ौफ़ घूमता है, ख़रग़ोश इक अकेला
कहता है वो कि जंगल, उसके लिये बना है।

ग़ज़ल-4

जिसको चुना था वो तो, खबरों में छा गया है,
वोटर तलाश में है, नेता कहॉं छुपा है।

जंगल के शेर सारे, गीदड़ बने हुए हैं
जादू चला है किसका, हर शख्स जानता है।

दीपक तले अंधेरा, सुनता रहा हूँ लेकिन
जिसको चिराग़ समझा, अँधियार दे रहा है।

ताज़ी हवा कहॉं से लाऊँ मुझे बताओ
जब सोच का बग़ीचा पूरा सड़ा हुआ है।

वादा नहीं निभाना, आदत रही है उसकी
मजबूर वोट फिर भी, उसकी तरफ़ डला है।

अंधियार गर नहीं है दिल में तेरे तो बतला
सूरज की रौशनी से तू क्यूँ डरा-डरा है।

चारों तरफ़ बिसातें, तुमने बिछा रखी हैं
मुझको यकीं है इनसे होकर भी रास्ता है।

ग़ज़ल-5 

शायर बहुत है हैरॉं, क्या  वक्त को हुआ है
क्या  सच वही है जो वो, दिन-रात देखता है।

उथला हुआ है सागर, मोती नहीं बचे हैं
लहरें भटक रही हैं, सब कुछ नया नया है।

सूरज बुलंदियों पर इतरा रहा है लेकिन
क्या  जानता नहीं ये, इसको भी डूबना है।

मुझको मलय पवन की तुम याद मत दिलाओ
बदला हुआ है मौसम, बदली हुई हवा है।

वाराणसी सवेरा, संध्या अवध की प्यारी
वो रात मालवा की, इनका पता गुमा है।

पर्यावरण की बातें कल तक जो कर रहा था
वो काटता है जंगल, अखबार में छपा है।

नाविक हैं नींद में पर, जागी हुई हवाओं
तुमको नज़र है रखनी क्या  नाव की दिशा है।

इसे कहते हैं धमाके पर धमाका । सम्‍मान की घोषणा के साथ साथ पांच पांच ग़ज़लें । मां की उदास आंखें राहें बुहारती थीं, बहुत भावप्रवण शेर है ये, और उसी के साथ कांधे मेरे पिता के वाला शेर एक भावनात्‍मक जुगलबंदी कर रहा है । बेजान तो नहीं पर पुतली बने हुए हैं वाला शेर वर्तमान पर बहुत सटीक बयान दे रहा है । हमारे आस पास के पुतलों पर । उसको बदल के इसको वाला शेर गठन के हिसाब से खूब खूब बना है । इसमें दोनों मिसरे जिस प्रकार से एक दूसरे की आवाज़ में आवाज़ मिला रहे हैं वो वाह वाह करने पर मजबूर कर रहा है । अंधियार गर नहीं वाला शेर भी इसी प्रकार का शेर है जिसमें मिसरा सानी मिसरा उला से ठीक समन्‍वय कर रहा है । पर्यावरण की बातें कल तक जो कर रहा था ये शेर मध्‍यप्रदेश पर ही बहुत सटीक हो रहा है । क्‍यों हो रहा है ये पब्लिक है सब जानती है । बहुत सुंदर ग़ज़लें । वाह वाह वाह ।

तो बधाइयां दीजिये तिलकराज जी को और दाद भी दीजिये इन सुंदर ग़ज़लों पर । और हां याद रखिये कि होली का मुशायरा 24, 25 और 26 मार्च को होगा । 27 को होली है सो हम होली के तीन दिन पहले ये आयोजन करेंगे ।  होली को लेकर जो मिसरा दिया जा रहा है वो ये है । ''केसरिया, लाल, पीला, नीला, हरा, गुलाबी'' मिसरा समान बहर पर है जो चल रही है अर्थात 221-2122-221-2122 (मफऊलु-फाएलातुन-मफऊलु-फाएलातुन)  । इसमें क़ाफिया  भी वही है जो अभी चल रही तरही में  है अर्थात 'आ' की मात्रा ( हरा की आ की मात्रा ) । और रदीफ है 'गुलाबी' ।

37 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन ग़ज़लें तिलक राज जी को बधाइयां।

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत- बहुत मुबारक हो तिलकराज कपूर जी को ये सम्मान |
    पांचो गज़लें गंभीर हैं ..........

    उत्तर देंहटाएं
  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं

  4. सुकवि रमेश हठीला स्मृति शिवना सम्मान के लिए चयनित होने पर श्री तिलकराज कपूर जी को हार्दिक बधाई.
    आज के हालत की व्याख्या करती शायरी के लिए दिली मुबारकबाद। तिलकजी की शायरी हमेशा पसंद आयी है.

    तरही मिसरा "ये क़ैदे बामशक़्क़त जो तूने की अता है"

    में निहित समर्पण, समर्थन और इस 'सज़ा' के नामालूम कारणों को बूझने की कोशिश में 'शायर' एक ख़ास किस्म की मानसिक अवस्था में पहुँच जाता है .मजबूरी, खौफ, अन्धकार, उदासीनता, बेहिसी, उदासी, असफलताओं, वादाखिलाफी और आशंकाओं में खुद को घिरा पाता है. लाचार भी इस क़दर दिखता है कि हवाओं के सुपर्द ही अपनी कश्ती को कर देता है। लेकिन यकीन की दौलत अब भी उस के पास है :-

    "चारो तरफ बिसाते तुमने बिछा रखी है
    मुझको यक़ीं है इनसे होकर भी रास्ता है।"

    बहुत खूब, यक़ीन ही कामयाबी की ज़मानत भी है. किसी शायर का यह शेर बरबस याद आ गया है:-

    "यक़ीनो अज़में मुसलसिल में राज़े हस्ती है
    क़दम बढ़ाओं के वहमो गुमाँ का दौर गया.

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. @आदरणीय हाशमी साहब
      हृदय से आभारी हूँ आपकी इस विस्‍तृत टिप्‍पणी के लिये।
      इसमें कोई शक नहीं कि 'कैदे बामशक्‍कत' का दायरा बहुत बड़ा है, इतना बड़ा कि इससे जुड़े सवाल हल करते करते ही यह कैद कट जाती है।
      यकीन-ओ-अज्‍़म-ए-मुसल्‍सल में राज़-ए-हस्‍ती है
      कदम बढ़ाओ कि वह्म-ओ-गुमां का दौर गया
      तो बाकमाल शेर है, ऐसे शेर यदा-कदा ही होते हैं।

      हटाएं
  5. सभी गज़ल वर्तमान दौर पर हैरानी के साथ उससे लड्ने की/पार पाने की इच्छा तथा जिजीविषा से तर हैं.
    सीमित समझ के बावजूद,सभी गज़लेँ बेहद अच्छी लगी.धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. @प्रिय शुभंकर
      आपने समय निकाला और रुचि ली, यह शुरुआत है।
      आभारी हूँ।

      हटाएं
  6. सच कहूँ तो अगर कोई अनुमान लगाने को कहता तो मैं यही कहता कि इस बार का सम्मान तिलक जी को ही मिलेगा। बहुत बहुत बधाई उन्हें इस सम्मान के लिए। तिलक जी के अंतर्जाल पर उपलब्ध बहुत सारे लेख हम जैसों को ग़ज़ल का ‘ग़’ समझाने में काफ़ी महत्वपूर्ण सिद्ध हुये हैं और आला दर्जे के शायर तो वो हैं ही। उनकी ये चार ग़ज़लें इस बात का सुबूत हैं। बहुत बहुत बधाई तिलक जी को इस सम्मान के लिए और ढेर सारी बधाई इन शानदार ग़ज़लों के लिए।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. आभारी हूँ धर्मेन्‍द्र जी। मैनें भी किसी से सीखा है (एकलव्‍य की तरह भी), अब जिससे सीखा उसे तो सिखाने से रहा सो उनसे साझा करता हूँ जो इच्‍छुक हैं।

      हटाएं
  7. Kamaal aur dhamaal. Tilak sir ji ne.khub khabar lee hai vartman ki. Ek.par ek laajawaab. Sukavi Hatheela Samman ke liye Aadarniy Tilak Raj Kapur ji ko bahut bahut badhaai.
    Aur bahut khushi ho rahi hai, Holi ka maahaul bhi ban rha hai.

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. आभारी हूँ सुलभ। भाई अब तो आप भी खूबसूरत कलाम कहने लगे हैं।

      हटाएं
  8. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति मंगलवारीय चर्चा मंच पर ।।

    उत्तर देंहटाएं
  9. चयन समिति द्वारा लिया गया फैसला बिल्कुल सही है ! और इस मार्फत तिलक जी को शिवना सम्मान के लिये चुने जाने पर बहुत बहुत बधाई !
    तिलक जी की पांचों ग़ज़लें क़माल की हैं! कुछ शे'र बहुत ही पसन्द आये ! पांचों ग़ज़ल मे से चार में गिरह को पढने का लोभ बाकि है ! वेसे पूरी कि पूरी ग़ज़ल लाजवाब है !
    बहुत बधाई तिलक जी फिर से !

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. आभारी हूँ।
      सभी के साथ एक एक गिरह का शेर देने का इरादा तो था जिसे कुछ कारणों से अभी शेष रखा। तरही मिसरे में बहुत संभावनायें हैं अलग-अलग मिसरा-ए-ऊला लाने की।

      हटाएं
  10. उम्दा शेर... बहुत अच्छी गज़लें...बहुत बहुत बधाई...

    उत्तर देंहटाएं
  11. आदरणीय तिलकराज जी को ’सुकवि रमेश हठीला स्मृति शिवना सम्मान’ से नवाज़ा जाना.. अतिरेक के क्षणों में हूँ. आपका समर्पण, आपकी नम्रता आपके विशद ज्ञान को कितना सुलभ बनाती है ! और आपके आत्मीय-वृत की परिधि बहुत बड़े घेरे को साधती है. आपके लिये बधाइयाँ क्या कहूँ, आदरणीय ? स्वयं को ही गौरवान्वित होने की अनुभूति हो रही है.

    पंच-वायु सदृश पाँच ग़ज़लें.. सभी की सभी मननीय ! शब्द नहीं आदरणीय, भाव साझा कर रहा हूँ.
    सादर.. .


    आजकी भूमिका ऐसे अनिवार्य तथ्य को साझा करती है कि इस पर बहुत कुछ कहा जा सकता है. सत्य यह है कि, भारत के उत्तरी भाग की अमूमन सभी प्रौढ़ आंचलिक भाषाओं को महज़ ’हिन्दी की बोलियों’ का दर्ज़ा दे कर हिन्दी भाषा के तथाकथित शुभचिंतकों द्वारा हिन्दी की बाड़ में ही चुपचाप आग लगा देने का ऐसा काम किया गया है जो आज चालीस-पचास सालों में वह सुलगने तो क्या लगी है लेकिन उसने धुआँ देना तो शुरु ही कर दिया है. इसे दावानल बनने से कबतक रोका जा सकता है, यह देखने की बात होगी. साहित्य-क्षेत्र में ’रक्षा में हत्या’ का इससे सुन्दर उदाहरण कम ही मिलता है.
    आदरणीय पंकजभाईजी, आपके विचारों के लिए आपका सादर धन्यवाद.

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. @सौरभ जी
      मैं तो आपके विशद्-ज्ञान और भाषा पर प्रभावी नियंत्रण से प्रभावित हूँ। सृष्टि का सार संतुलन में है और इसी में है सकारात्‍मक सोच और नकारात्‍मक सोच। दोनों में ही आत्‍मीय-वृत होता है और हम सभी अपनी तरह आत्‍मीय-वृत की परिधि में जीते हैं। आप सबके साथ मुझे सकारात्‍मक सोच के वृत में ईश्‍वर ने रखा यह मेरा सौभाग्‍य है।
      धर्म, नस्‍ल, जाति, भाषा आदि के विवादों से बाहर निकल कर ही सबका कल्‍याण है यह सकारात्‍मक सोच का आत्‍मीय वृत है।
      अन्‍य वृत के प्रति सोचने से मुझे इपीक्‍टीटस का ज्ञान रोकता है।

      हटाएं
  12. इस बार तरही के शेर कहते समय दो मुख्य बात मेरे समक्ष थीं; पहली तो यह कि जो कुछ कहना है वो आज की व्यवस्था पर हो और जहॉं इस व्यवस्था से उपजी पीड़ा हो वहॉं व्यवस्था पर प्रहार भी हो, दूसरी यह कि शब्दों का मायाजाल पाठक पर भारी न हो – भाषा सरल हो। प्रयास रहा कि इन दो बातों के पालन में चूक न हो।
    मेरा पालन-पोषण कुछ इस तरह हुआ कि जहॉं एक ओर तो मैं पीड़ा की पराकाष्ठा में जीता हूँ जिसे व्यक्त करते समय अक्सर गला रुँध जाता है, अश्रु किनारे आकर ठहर जाते हैं और भाव शेर का रूप लेने लगते हैं; दूसरी ओर हर पल को उस मालिक की धरोहर मानकर पूर्ण आनंद के साथ जीता हूँ।
    लगभग 20 वर्ष तक सोये रहे मेरे ग़ज़ल प्रेम को इस ब्लॉंग ने एक नया जीवन दिया था लगभग तीन वर्ष पूर्व, और मेरे लिये इस ब्लॉ़ग की पहचान मुख्यत: ग़ज़ल की पाठशाला के रूप में रही है इस कारण शालेय मर्यादाओं के साथ-साथ इस पाठशाला के स्थापित सम्मान की गरिमा भी यहॉं प्रकाशन के लिये मेरे द्वारा प्रेषित ग़ज़लों की सृजन प्रक्रिया का मुख्य‍ अंश रहता है।
    लगभग 20 वर्ष पूर्व एक पुस्तक पढ़ी थी ‘प्लॉनिंग फ़ॉर द मिलियन्स’, उस पुस्ताक का एक अंश इस तरह सोच में घर कर गया कि मेरी सोच स्थिर हो गयी। उस अंश का सार यह है कि इस देश का दुर्भाग्य है कि जन-सेवक जनता को अपना सेवक समझता है। मुझे लगता है कि हर जन-सेवक इतनी सी बात समझ ले तो बहुत कुछ बदल सकता है।
    एक जन-सेवक और एक जन-कवि में एक साम्य तो स्पष्ट दिखता है, वह यह है कि दोनों का विचार जन-जन पर केन्द्रित होता है। एक का कर्म-क्षेत्र के रूप में दूसरे का सृजन-क्षेत्र के रूप में। एक का कर्म जन-जन के पक्ष में उदाहरण बन सकता है दूसरे का सृजन। दोनों सोच में बदलाव के माध्युम से अपना लक्ष्य प्राप्त करते है, मंजि़ल एक ही होती है। मैं ईश्वर का आभारी हूँ कि मेरे लिये ईश्वर ने दोनों मार्ग चुने और उनपर अपनी पूर्ण क्षमता के साथ चलने की प्रेरणा व उर्जा दी।
    मेरी बात अधूरी रहेगी यदि मैं ईश्वर के बाद उनका आभार व्यक्त नहीं करता जिन्होंने मुझे इस सम्मान के योग्य समझा और मेरी बात को पूर्णता प्राप्त होगी आप सभी के प्रति आभार व्यक्ते करने से जिन्होंने मुझे पढ़ने व समझने के लिये समय निकाला। आप सबका हृदय से आभारी हूँ।

    उत्तर देंहटाएं
  13. वाह वा
    आज तो सच में धमाका हो गया है
    सबसे पहले आदरणीय तिलक जी को बारम्बार बधाई प्रेषित करता हूँ और उसके बाद बात ग़ज़ल की

    एक ग़ज़ल के पाँच रूप या एक केन्द्र की ओर स्थापित पांच ग़ज़लें मैं इस चक्कर में नहीं पड़ता क्योकि जब पढ़ना शुरू किया तो एक साथ पढता ही गया ....

    कैसा हसीन इत्तेफाक है कि जब फिर से ग़ज़ल को पढ़ा तो ग़ज़ल खंड में आख़िरी के शेर सबसे अधिक पसंद आते गये
    एक से बढ़ कर एक शेअर से सजी इस खूबसूरत ग़ज़ल के लिए ढेरों ढेर मुबारकबाद

    एक बार फिर से आपको ह्रदय की गहराईयों से अनेकानेक शुभकामनाएं व बधाई ...

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. @वीनस
      आभारी हूँ।
      आप सब का स्‍नेह ही मेरी ऊर्जा का स्रोत है।

      हटाएं
  14. तिलक जी सुकवि श्री रमेश हठीला स्मृति शिवना सम्मान के लिए हार्दिक बधाई.
    गज़लों ने तो निशब्द कर दिया है. हमेशा की तरह इतने सारे शेर और सभी ऐसे की बार बार पढ़ने को जी चाहे. ऐसा सिर्फ तिलक जी ही कर सकते हैं. कमाल की ग़ज़लें.

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. @राजीव
      आभारी हूँ।
      मैं कई बार सोचता हूँ कि कहन का दायरा कितना विस्‍तीर्ण है। कितने ही शायर कह चुके और आगे भी कहते रहेंगे फिर भी नया कुछ कहने की स्थिति निकल आती है।
      संख्‍या के बारे में तो मुझे लगता है कि एक प्रवाह होता है भावों और शब्‍दों का जो अविरल बहता रहता है और कुछ अभ्‍यास के बाद इसे शेर का रूप देना आ ही जाता है।

      हटाएं
  15. तिलक राज कपूर साहब को सबसे पहले 'शिवना सम्मान' की हार्दिक बधाई।इस योग्य चुनाव के लिए चयन समिति को भी साधुवाद। कपूर साहब एक ज़मीन में जितने शेर निकाल देते हैं,ये हम जैसे नए लोगों के लिए सीखने की चीज़ है। यहाँ भी पाँचों ग़ज़लें एक से बढ़ कर एक हैं। दाद तो हम आपको खैर क्या देंगे,शुक्रगुज़ार हैं आपके,इस 'लेसन' के लिए।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. @सौरभ जी
      आभारी हूँ।
      मुझे भी यही लगता है कि अधिकाधिक शेर कहने की मेरी प्रवृत्ति के पीछे अप्रत्‍यक्ष निहित उद्देश्‍य यह उदाहरण प्रस्‍तुत करने का ही होता है कि शेर कहने की संभावनायें असीमित होती हैं। इससे उन्‍हें अवश्‍य ही लाभ पहुँचना चाहिये जो आरंभि‍क दौर में हैं ग़ज़ल कहने के।

      हटाएं
  16. पिछले दिनों चीन में होने के कारण ब्लॉग से दूर रहा , आज ही लौटा हूँ और आते ही ये नेक काम कर रहा हूँ।

    तालियाँ तालियाँ तालियाँ सुकवि रमेश हठीला सम्मान के लिए चयनित मेरे अनुज तिलक राज कपूर जी के लिए ढेरों तालियाँ। दिल बल्लियों उछल रहा है। कपूर साहब एक जीवित ज्वाला मुखी हैं जिनमें से ग़ज़लों का लावा अविरल बहता रहता है। जहाँ हम जैसों को एक शेर कहने में नानी याद आ जाती है वहीँ कपूर साहब एक नहीं पांच पांच भरी पूरी ग़ज़लें कह देते हैं। ऐसी ग़ज़लें जिनका एक एक शेर बोलता है दहाड़ता है। विलक्षण प्रतिभा के इस शायर को हठीला सम्मान मिलना बहुत ख़ुशी की बात है . इसी बहाने सीहोर आने और उनसे मिलने का एक और मौका मिलेगा। मेरी तरफ से उन्हें बहुत बहुत बधाई .

    ग़ज़लों की क्या बात करूँ? किस शेर की बात करूँ? बहुत मुश्किल काम है। मैं इन्हें पढ़े जा रहा हूँ और ग़ज़ल कहने का हुनर सीखे जा रहा हूँ। सब कुछ तो समेत लिया हैं उन्होंने अपनी इन ग़ज़लों में। उनकी कहन का कैनवास विशाल और अचंभित करने वाला है। लाजवाब कपूर जी लाजवाब

    नीरज

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. अब मुझे समझ आया कि आप यूरोप में नहीं चाईना में थे। मुझे लग रहा था आपका मैसेज किसी स्‍कैन्‍डीनेवियन देश से आया है। चाईना में तो आपको बहुत से मैनेजिंग डायरेक्‍टर्स ने अपने हाथों से चाय बना बना कर पिलाई होगी।
      दिल का उछलते रहना ही आपकी सदाबहार सेहत का राज़ है।
      सीहोर में तो आपका इंतज़ार रहेगा ही, एक वायदा सिर्फ़ भोपाल आने का भी है आपका।
      हृदय से आभारी हूँ आपके हृदयोद्गारों के लिये।

      हटाएं
  17. जहाँ हमें एक गज़ल को लिखना ही मुश्किल हो रहा था ... वहाँ पांच पांच ग़ज़लें ... ये कमाल तिलक जी जैसे दिग्गज ही कर सकते हैं ...
    व्यवस्था पे कड़ा प्रहार ... अनेक बिम्ब लिए ... पैनी धारदार गज़लें है सभी ...
    हर शेर पे दांतों तले ऊँगली दबाने का मन करता है ... एक ही सांस में पता नहीं कितनी बार पढ़ने के बाद आया हूं टिप्पणी करने ...
    एक बार फिर से दिल की गहराइयों से तिलक जी को बधाई ... ढेरों शुभकामनाएं ...
    मिठाई का इंतजाम करके रक्खें तिलक जी ... जब कभी मिलना होगा ... खा लूँगा ...

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. @दिगम्‍बर जी
      आभारी हूँ।
      अबकी छुट्टियों में भारत आयें तो भोपाल के लिये समय विशेष रूप से निकालें।
      कुछ और दीवाने आमंत्रित कर लेंगे और आनन्‍द लेंगे आपकी उपस्थिति का।

      हटाएं
  18. वाह वाह वाह..... छ: धमाके (सम्मान+पाँच ग़ज़लें) एक साथ! सुकवि रमेश हठीला स्मृति सम्मान....आदरणीय तिलक राज कपूर जी ”राही” साहब को .चयन समीति को सुलझे हुए फ़ैसले के लिये और आदरणीय तिलक राज कपूर जी ”राही” साहब को सम्मान के लिए हार्दिक बधाई.

    ग़ज़लें ख़ूबसूरत और ख़ूबसीरत हैं. सामयिक चिंता और चिंतन-मंथन अप्रतिम ढंग से तरही के मूड को प्रतिबिम्बित करता हुआ इन ग़ज़लों के माध्यम से हमारे सामने है. हार्दिक बधाई. सादर.

    उत्तर देंहटाएं
  19. @द्विजेन्‍द्र जी,
    आभारी हूँ।
    कुछ असर है सोहबत का, कुछ उसकी रज़ा भी है।

    उत्तर देंहटाएं
  20. सबसे पहले आदरणीय तिलक जी को सुकवि हठीला सम्मान के लिए बधाई ! आदरणीय आपने दिल को छु जाने वाली गजल कही है गजल के पाँचो रूप बहुत खूब है . बहुत बहुत बधाई

    उत्तर देंहटाएं