शनिवार, 31 जनवरी 2015

आइये आज जनवरी 2015 के अंतिम दिन श्री राकेश खंडेलवाल की गुदगुदाती हुर्द रचना के साथ हंसते खिलखिलाते करते हैं तरही मुशायरे का विधिवत समापन।

समय की भी क्‍या रफ्तार होती है। देखिए अभी तो हमने 2015 का स्‍वागत किया था और अभी बात की बात में उसका एक महा बीत भी गया । अब बचे हैं कुल 11 महीने । ये भी बीत जाएंगे। खैर आइये कुछ महत्‍तवपूर्ण सूचनाएं आपके साथ साझा की जाएं। सबसे पहले तो यह कि शिवना प्रकाशन को विश्‍व पुस्‍तक मेले में स्‍टॉल का आवंटन हो गया है। हॉल क्रमांक 12 A जो कि हॉल क्रमांक 12 का हिस्‍सा है उसमें स्‍टॉल क्रमांक 288 शिवना प्रकाशन-ढींगरा फ़ाउण्‍डेशन के स्‍टॉल को आवंटित हुआ है। और अधिक सुविधा के लिए नीचे के चित्र में हॉल क्रमांक 12ए में स्‍टॉल की स्थिति दिखाई जा रही है। हॉल में एण्‍ट्री लेने के बाद जब आप बांए हाथ की ओर मुड़ेंगे तो तीसरे खंड में कॉर्नर पर ही 288 नंबर का स्‍टॉल है। आवंटन सूची के अनुसार शिवना प्रकाशन के ठीक बगल में 289-290 में साहित्‍य अकादमी का स्‍टॉल है। शिवना प्रकाशन के ठीक पीछे 257-272 में वाणी प्रकाशन का स्‍टॉल है। आप आइये आपका स्‍वागत है। और हां 16 फरवरी को शिवना प्रकाशन का पुस्‍तक जारी करने का कार्यक्रम हॉल क्रमांक 6 के ऑडिटोरियम क्रमांक 2 (Mezzanine floor) में शाम 6 से 7:30 तक है। यह समय फिक्‍स है क्‍योंकि हमें डेढ़ घंटे का ही टाइम स्‍लॉट मिला है । उसके बाद दूसरे कार्यक्रम होंगे। तो समय से आएं और शिवना प्रकाशन की नई पुस्‍तकों और कुछ पुस्‍तकों के द्वितीय संस्‍करण के जारी होने के साक्षी बनें। इसके अलावा भी कुछ टाइम स्‍लॉट और मिलने हैं लेकिन उनका आवंटन अभी नहीं हुआ है। यदि सब कुछ योजना के अनुसार रहा तो आठ पुस्‍तकों के जारी होने का कार्यक्रम वहां होगा। जिनमें कविता संग्रह, उपन्‍यास, ग़ज़ल संग्रह और कहानी संग्रह शामिल हैं। 

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तो ये थीं कुछ सूचनाएं। और आइये अब हम आज विधिवत रूप से तरही का समापन करते हैं। राकेश खंडेलवाल जी ने एक गुदगुदाती हुई ग़ज़ल भेजी है जो शिष्‍ट और शालीन हास्‍य को समेटे हुए है। तो आइये इसी रचना के साथ हम तरही को समाप्‍त करते हैं। और हां भभ्‍भड़ कवि यदि आए तो आ ही जाएंगे। साथ में यह भी कि एक दो दिन में ही होली के हंगामे का तरही मिसरा प्रदान कर दिया जाएगा।

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मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई

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श्री राकेश खंडेलवाल जी

है बिछी अब भी नज़र कुछ जागती सोई हुई
देख तो लें आपकी है क्या घड़ी खोई हुई

पाग कर नव्वे इमरती और कालेजाम सौ
फिर कढ़ाई में पसर थी चाशनी सोई हुई

थाल भर हलवा सपोड़ा, बिन डकारे एक संग
नीम के नीच लुढ़क, थी भामिनी सोई हुई

सावनी इक मेघ से अभिसार करते थक गई
पौष में दुबकी हुई थी दामिनी सोई हुई

खूब पीटे  ढोल, तबला, बांसुरी, सारंगियाँ
शोर ही केवल मचा, थी रागिनी सोई हुई 

पंकजों के पत्र पर ठहरा प्रतीक्षा में तुहिन
बेखबर हो दूर थी मंदाकिनी सोई हुई

नीरजी पग हैं गगन पर, क्या तरही मिसरा लिया
" मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई "

नाम तो इसको ग़ज़ल का भूल कर मत दीजिये
पास वो आती नहीं अभिमानिनी सोई

कौन है बतलाओ जिसने मिसरा-ए-तरही चुना
इस उमर में फिर जगाता आशिकी सोई हुई

इश्क में शाहेजहां तो ताज ही बनवा सका
हमने रच दी शायरी में नाजनी  सोई हुई

आज फिर परदा नशीँ  इक ख्वाब में आया मिरे
आ गई रफ़्तार में, थी धुकधुकी सोई हुई

हाय ! सी सी कर रहीं वो चाट  की चटखारियां
देख  कर सहसा मुहब्बत जागती, सोई हुई

ये असर भकभॉ  मियाँ का, है खता अपनी नहीं
हम न लिख पाये ग़ज़ल को, वो रही सोई हुई

आपकी इस व्यस्तता को कोई आखिर क्या कहे
भागती रफ़्तार दुगनी कर घड़ी सोई हुई

फोन पर भी आजकल तो आप मिल पाते नहीं
जैसे हो रिंगटोन तक भी आपकी सोई हुई

एक तो जलसा-ए-शिवना, उस पे पुस्‍तक मेला भी 
उस पे तरही की फ़िकर भी जागती सोई हुई

हर गज़ल को पढ़ रहीं, दांतों तले ये उंगलियाँ
छू ना पातीं संगणक की कोई 'की' सोई हुई

यों तो पारा शून्य से दस अंश नीचे आजकल
धूप के हल्के परस से कँपकँपी सोई हुई

जनवरी के अंत  तक शायद तरही चलता रहे
मोगरे के फूल पर थी  चांदनी सोई हुई 

थाल भर हलवा सपोड़ा बिन डकारे एक संग में नीम के नीचे लुढ़क कर सोई हुई भामिनी का सीन तो बहुत ही खूब है। इस एक शेर पर दाद खाज खुजली सब कुछ बाल्‍टी भर भर के दिये जा सकते हैं। और उस पर नव्‍वे इमरती और सौ काले जाम पागने वाली चाशनी की तो बात ही क्‍या है। और तरही मिसरे के कारण इस उमर ?  में आशिकी के जागने की शिकायत बिल्‍कुल वाजिब है। शिकायत पर गौर किया जाएगा। परदा नशीं के आने पर धुकधुकी के रफ्तार पकड़ने का सीन और वो भी ख्‍वाब में ही आने से । कमाल है भाई । तो साहब आपको क्‍या कहें  । बस ये कि कमाल कमाल । और वाह वाह वाह।

तो आप भी आनंद लीजिए इस लम्‍म्‍म्‍म्‍म्‍म्‍म्‍म्‍म्‍म्‍म्‍म्‍म्‍बी सी ग़ज़ल का और दाद देते रहिये। मिलते हैं अगले अंक में होली के तरही मिसरे के साथ।

गुरुवार, 29 जनवरी 2015

हौले हौले चलकर हम तरही के समापन की ओर आ गये हैं। समापन के ठीक पहले सुनते हैं डॉ. संजय दानी, सुमित्रा शर्मा जी, पारुल सिंह की ग़ज़लें ।

तरही का समापन होने को है। बस एक अंक और लगना है इसके बाद। जैसा कि तय किया था कि जनवरी के अंत तक समापन कर लेंगे तो उसी प्रकार से हो रहा है। चूंकि भभ्‍भड़ कव‍ि तो स्‍वतंत्र कवि हैं वे कभी भी आ सकते हैं तो वे समापन के बाद कभी भी तशरीफ का टोकरा लिये अ सकते हैं। फिलहाल तो ये कि आप सब विश्‍व पुस्‍तक मेले में सादर आमंत्रित हैं शिवना प्रकाशन के स्‍टॉल पर। अगली पोस्‍ट में आपको स्‍टॉल की पूरी जानकारी उपलब्‍ध करवाने की कोशिश की जाएगी। विश्‍व पुस्‍तक मेले के अवसर पर शिवना प्रकाशन कुछ महत्‍त्‍वपूर्ण पुस्‍तकों का प्रकाशन करने जा रहा है। आप भी उस अवसर पर उपस्थित रहेंगे तो अच्‍छा लगेगा।

Mogara - Jasmine Four

मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई

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सुमित्रा शर्मा

स्वेद -मोती की फसल सी दूब थी सोई हुई
मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई  हुई

ख्वाब की कब्रें वहां थीं अश्क के दरिया बहे   
देखने में आँख यूँ  हर एक थी सोई हुई  

जननि के उस दर्द को कैसे भला अल्फ़ाज़ दे
लाड़ला  जिसका लुटा औ  भीड़ थी सोई हुई

द्रोपदी का चीर खिचता ही रहा ,खिंचता  रहा   
गूँगा  बहरा ज्ञान था और नीति भी सोई हुई

कंचकों के गीत थे जब घर गली चौपाल पर
शहर के घूरे पे  इक नवजात थी सोई हुई

प्रसव क्रंदन से सिया के जब हुआ जंगल द्रवित
चैन से थी राम की नगरी तभी सोई हुई

इन अंधेरों को झटक कर उठ खड़ी होगी ज़रूर       
है तमस की क़ैद में जो  रोशनी सोई हुई

सुमित्रा जी हमारे मुशायरों में पिछले कुछ समय से आती रही हैं तथा अपनी फिक्र, अपनी सोच से श्रोताओं को प्रभावित करती रही हैं। इस बार भी उन्‍होंने अपनी ग़ज़ल के साथ लगभग दौड़ते हुए ट्रेन पकड़ी है तरही मुशायरे की। सबसे पहले बात की जाए अंतिम शेर की। उसे शेर में जाने क्‍या ऐसा है उसे खास बना रहा है। शायद उसकी बनावट में ही वो वैशिष्‍ट्य अ गया है। और ऐसा ही एक शेर बना है सिया के प्रसव और राम की नगरी का। बहुत अच्‍छा शब्‍द चित्र बना है उस शेर में। बहुत ही अच्‍छी गज़ल़ कही है सुमित्रा जी ने । वाह वाह वाह।

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पारुल सिंह

बस अना है ये उधर के सादगी सोई हुई
जाग ना जाए इधर सादादिली सोई हुई

आप के कान्धे झुका था सर हमारा, यूँ लगा
मोगरे के फूल पर थी चाँदनी सोई हुई 

छोड़ दी है राह तकनी मुद्दतें हमको हुई
जागती पर आहटों से देहरी सोई हुई

रात मैं लोरी न बेटी को सुना पायी इधर
पार सरहद जाग जाती माँ दुखी सोई हुई

नूर जो माँ बाप की आँखों का लेकर चल दिए
थे बङे हैवान उनकी रूह थी सोई हुई

जब मसलते जा रहे थे फ़ूल वो मासूम से
ऐ खुदा तेरी खुदाई क्यूं रही सोई हुई

शायराना हो गया मौसम गज़ल मैं बन गयी
वादिये दिल मे उमंग फिर से जगी, सोई हुई

वो खफ़ा हो जाए तो भी छोड़ कर जाती नहीं
साहिलों पर है समन्दर के, नदी सोई हुई

कह रहे हैं प्यार तुम से, ना, नहीं रे, है नहीं
मुस्कुराहट के तले 'हाँ', है अभी सोई हुई

रात भर ढूढाँ किये हम चाँद, तारे, आसमां
कहकशा, आंगन सजन के जा मिली सोई हुई

गलतियां भगवान भी तो कर चुके अक्सर यंहा
चल दिए बस छोड़ गौतम संगिनी सोयी हुई

सबसे पहले तो बात गिरह की की जाए। ये वो ही गिरह है जिसके बारे में नुसरत मेहदी जी ने कहा था कि पंकज ये मिसरा बहुत ही नाज़ुकी की मांग कर रहा है। सचमुच बहुत ही खूबसूरत तरीके से ये गिरह लगाई गई है। शायरना हो गया मौसम शेर भी बहुत ही सुंदर बन है उसमें जगी काफिया तो कमाल आया है। शब्‍दों का बहुत ही बेहतरीन सामंजस्‍य हुआ है उस शेर में विशेष कर उस मिसरे में। और उसके ठीक बाद की प्रेम रस में पगे हुए तीनों शेर भी वैसा ही कमाल रच रहे हैं। मुस्‍कुराहटों के तले हां है अभी सोई हुई । अलग अलग प्रकार से नकारना और एक हां। कमाल है । बहुत ही सुंदर ग़ज़ल कही है वाह वाह वाह।

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डॉ. संजय दानी

मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई,
तबले के सीने पे मानो बांसुरी सोई हुई।

जाना सच्चाई के कमरे में कठिन है सदियों से,
क्यूंकि सच के दर के आगे है बदी सोई हुई।

ये हवस का दौर है सच्ची मुहब्बत अब कहां,
ज़र के बिस्तर पर है सारी आशिक़ी सोई हुई।

आज भी हिन्दू मुसलमां की लड़ाई जारी है,
माज़ी के उस दौर से गोया सदी सोई हुई।

आज हर सर पे नई कविता का छाता है तना,
गठरी में दरवेशों के गो शायरी सोई हुई।

वृद्धा- आश्रम में है डाला मां को जब से बच्चों ने
है ग़मों के तकिये में मां की ख़ुशी सोई हुई।

अब के बच्चों में नहीं है दानी पहले सा जुनूं,
बस नशे में ,हौसलों की पालकी सोई हुई,

डॉ: संजय दानी अपने अलग तरह के शेरों को लेकर मुशायरों में आते रहे हैं। उनकी ग़ज़लों में समसामयिक व्‍यंग्‍य और सरोकारों को लेकर एक प्रकार की बेचैनी होती है। वास्‍तव में यही बेचैनी किसी भी रचना के लिए महत्‍तवपूर्ण होती है। और इस ग़ज़ल में तो दानी जी ने लगभग हर सरोकार को अपने शेरों में गूंथ लिया है। चाहे वो साम्‍प्रदायिकता हो, साहित्‍य हो, बुजुर्गों की समस्‍या हो या नशे की लत की समस्‍या हो । हर समस्‍या को उन्‍होंने अपने शेरों में ढाल कर अपनी सजगता का परिचय दिया है। बहुत सुंदर गजल वाह वाह वाह ।

तो आनंद लीजिए इन तीनों रचनाओं का और देते रहिये दाद। मिलते हैं अगले समापन अंक में 31 जनवरी को ।

मंगलवार, 27 जनवरी 2015

तरही मुशायरा जनवरी के बीतते बीतते अपने अंतिम दौर में आ रहा है। आइये आज तीन और रचनाकारों श्री मंसूर अली हाशमी, डॉ: त्रिमोहन तरल और सुलभ जायसवाल से सुनते हैं उनकी ग़ज़लें।

नुसरत मेहदी जी जब पिछले दिनों सीहोर आईं थीं तो उन्‍होंने इस बात पर खेद जताया कि वे इस बार तरही में अपनी ग़ज़ल नहीं भेज पाईं। उन्‍होंने कारण भी बहुत अच्‍छा बताया। उनका कहना था कि पंकज इस बार मिसरा इतना नाज़ुक और ख़ूबसूरत है कि अगर ज़रा सा भी उसके मिज़ाज को ठेस लगे तो पूरी ग़ज़ल बिखर जाए। उनका कहना था कि मिसरा बहुत ज्‍यादा नाज़ुकी मांग रहा है, इतनी की एक शब्‍द चुन चुन कर लगाया जाए। मुझे लाग कि यदि मैं उतनी नाज़ुक कह पाऊं तो ही भेजूं अन्‍यथा नहीं। जब नुसरत जी की बात पर गौर किया तो मुझे लगा कि बात सही है। मिसरा बहुत नाज़ुक तो है। और चांदनी के रेशम तार से कशीदाकारी की मांग कर रहा है। जब ये मिसरा दिमाग़ में बन रहा था तो मेरे दिमाग़ में भी ये बात नहीं थी कि ऐसा कुछ हो रहा है। खैर तो आइये आज आगे बढ़ते हैं कुछ और आगे।

मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई  

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शिवना प्रकाशन के समारोह के कुछ फोटो जिनमें शिवना प्रकाशन तथा सुबीर संवाद सेवा के वरिष्‍ठ सदस्‍य श्री तिलकराज जी कपूर का काव्‍यपाठ तथा स्‍वागत हो रहा है।

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मंसूर अली हाश्मी

सभ्यताएं मिट रही अक़वाम* भी सोई हुईं
अस्मिताएं लुट रही मर्दानगी सोई हुई.
अक़वाम 'क़ौम' का बहुवचन

रात भर अठखेलियां कर, थक-थका कर बेख़बर
मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई.

कीमती मोती लुटाकर, बेख़बर, अलमस्त सी
बांह में अपने पिया की मोहनी सोई हुई.

"तालिबानी हरकतों से त्राहि-त्राहि की सदा
मर गया ईमान! या कि बन्दगी सोई हुई ?

ज़ुल्म की है इन्तिहा; कि नाम पर मज़हब के आज
क़त्ल मुस्तक़बिल को कर 'हैवानगी' सोई हुई."

नीम शब में फेसबुक पर नाज़नीं की इल्तिजा*
मैं ग़ज़ल गो था इधर बेग़म मेरी सोयी हुई.
*Friendship Request

है ग़ज़ब! कासिद,प्रतिद्वंद्वी बना बैठा है अब
क्या करे तक़दीर तेरी 'हाशमी' सोई हुई

कहते हैं कि हर रचनाकार अपने मूल स्‍वर में ही सबसे मुखर होता है। जैसे कि हाशमी साहब का मूल स्‍वर व्‍यंग्‍य है हास्‍य है तो उनके जो शेर इसका पुट लिए होते हैं वे अधिक प्रभावशाली होते हैं। इस ग़ज़ल में नीम शब में फेसबुक पर नाज़नीं की इल्तिजा ने वो कमाल किया है कि बस । इतनी नफ़ासत के साथ हास्‍य का दृश्‍य रचना बहुत मुश्किल काम होता है और उसे बहुत खूबी के साथ मिसरे में हाशमी जी ने निभाया है। मतले में भी एक दूसरे प्रकार का प्रभाव पैदा किया गया है। सभ्‍यताएं मिटने की ओर कवि ने बहुत कठोरता से इशारा किया है । जो है उसे बचाना कवि का सबसे पहला दायित्‍व होता है। ण्‍क के बाद एक दो शेरों में पेशावर की पीड़ा तो कवि ने तालिबानी और जुल्‍म की है इन्तिहा में अभिव्‍यक्‍त किया है । और बिना क्षमा किये किया है। कवि को क्षमा नहीं करना चाहिए क्‍योंकि जब कवि क्षमा करने लगते हैं तो सभ्‍यताएं और समाज दोनों समाप्‍त हो जाते हैं। बहुत ही उम्‍दा ग़ज़ल, वाह वाह वाह।

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डॉ. त्रिमोहन तरल

मोगरे की ड़ाल पर थी चाँदनी सोई हुई
लग रहा था जैसे कोई सुंदरी सोई हुई

वक़्त का दरिया लबालब पर सदी के होंठ पर
ये समझ आता नहीं क्यों तश्नगी सोई हुई 

हो रहे हैं हादिसों पर हादिसे इस दौर में
तीरगी जागी हुई है रौशनी सोई हुई

छेड़ मत, आवाज़ मत दे, इस तरह जग जाएगी
सरहदों के पास में जो दुश्मनी सोई हुई

राजधानी के महल में जश्न में मशगूल है
मुफ़लिसों की बस्तियों में ज़िन्दगी सोई हुई

इश्क़ कोई लग गया उस शख़्स को जो रात में 
जागता है तब कि जब सारी गली सोई हुई 

अब सितार-ए-ज़िन्दगी को इस तरह छेड़ो 'तरल'
जाग जाए प्यार की जो रागिनी सोई हुई
 

हो रहे हैं हादिसों पर हादिसे इस दौर में शेर में मिसरा सानी में तीरगी के जागे होने और रौशनी के सोने का प्रयोग बहुत प्रभावशाली है। सचमुच हमारे समय की सबसे बड़ी व्‍यथा यही है कि तीरगी पूरी शिद्दत से जागी हुई है और रौशनी जाने कहां सो रही है। इश्‍क़ कोई लग गया उस शख्‍़स को जो रात में शेर में जागता है तब कि जब सारी गली सोई हुई में बहुत सुंदर दृश्‍य बना है। यह दृश्‍य इमेजिन हो रहा है। राजधानी के महल तो जश्‍न में मश्‍गूल हैं में मिसरा सानी कन्‍ट्रास्‍ट का बिम्‍ब लेकर आया है और मुफ़लिसों की बस्तियों में जि़दगी के सोए होने की पीड़ा रच रहा है। मकते के शेर में सितार ए जिंदगी को छेड़ने की बात खूब कही है और उसके साथ प्‍यार की रौशनी की बात भी खूब है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल । वाह वाह वाह।

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सुलभ जायसवाल

है घना कोहरा यहाँ औ’ रोशनी सोयी हुई
देखता हूँ मुंह पलट कर ज़िन्दगी सोयी हुई

क्या कहें किस से कहें तकदीर की यह चाल है
सोम मंगल बुध शनीचर हर घड़ी सोयी हुई

इस बड़े से आसमाँ में चाँद जगमग साथ है
सुस्त से तारों की आंखें, अधखुली सोई हुई

मंदिरों में शांति अब ढूंढे नहीं मिलती कहीं 
ढोल बाजे की टशन है, बंदगी सोयी हुई

देख कर वो दृश्‍य आगे चल दिए चुपचाप हम  
मोगरे के फूल पर थी चाँदनी सोयी हुई

क्‍या कहें किससे कहें में एक प्रयोग बहुत सुंदर बना है, सोम मंगल बुध शनीचर, बहुत ही अच्‍छे तरीके से इनको मिसरे में गूंथा गया है। मतले में भी सुबह के होने का दृश्‍य बनाया है । है घना कोहरा यहां औ रौशनी सोई हुई। वास्‍तव में रात का अंधेरा उतना परेशान नहीं करता जिनता सुब्‍ह का करता है। रात तो होती ही अंधेरे के लिए है लेकिन सुब्‍ह का काम तो रौशनी को लाना होता है। ऐसे में जब सुब्‍ह में कोहरे के चलते अंधेरा हो जाता है तो वह बहुत कष्‍ट देता है। बहुत ही सुंदर तरीके से मतले को रचा है। देखता हूं मुंह पलट कर जिन्‍दगी सोई हुई। वाह  वाह वाह खूब गज़ल़ है।

तो आप भी आनंद लीजिए इन तीनों रचनाकारों की शानदार ग़ज़लों का दाद देते रहिये, मिलते हैं अगले अंक में कुछ और रचनाकारों के साथ।

शनिवार, 24 जनवरी 2015

आइये आज ज्ञान की देवी सरस्‍वती का पूज करते हैं शब्‍दों से भावों से और विचारों से। पूजा की थाली में गीत की दीपक और द्विपदी की धूप लिये आए हैं श्री राकेश खंडेलवाल जी।

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या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥1॥

शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं
वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्‌।
हस्ते स्फटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्‌
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्‌॥2॥

आज का दिन साहित्‍यकारों का दिन होता है। क्‍योंकि आज ज्ञान की देवी सरस्‍वती के पूजन का दिवस होता है। आज हम सबके लिए यही प्रार्थना करते हैं कि सबको ज्ञान मिले सबको बुद्धि का वरदान मिले और सबके अंदर साहित्‍य के प्रति अनुराग उत्‍पन्‍न हो।

मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई

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आज वरिष्‍ठ गीतकार और बहुत ही अच्‍छे कवि श्री राकेश खंडेलवाल के साथ हम सब मिलकर करते हैं मां सरस्‍वती की आराधना अपने भावों से विचारों से और शब्‍दों से।

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श्री राकेश खंडेलवाल जी

भोर की ले पालकी आते दिशाओं के कहारों
के पगों की चाप सुनते स्वप्न में खोई हुई
नीम की शाखाओं से झरती तुहिन की बूँद पीकर
मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई

पूर्णिमा में ताज पर हो
छाँह तारों की थिरकती
याकि जमाना तीर पर हो
आभ रजती रास करती
झील नैनी में निहारें
हिम शिखर प्रतिबिम्ब अपना
हीरकणियों में जड़ित
इक रूप की छाया दमकती

दूध से हो एक काया संदली धोई हुई
मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई

वर्ष के बूढ़े थके हारे
घिसटते पाँव रुककर
देखते थे अधनिमीलित
आँख से वह रूप अनुपम
आगतों की धुन रसीली
कल्पना के चढ़ हिंडोले
छेड़ती थी सांस की
सारंगियों पर कोई सरगम

मोतियों की क्यारियों में रागिनी बोई हुई
मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई

एक पंकज पर सिमट कर
क्षीर सागर आ गया हो
खमज,जयवंती कोई
हिंडोल के सँग गा गया हो
देवसलिला  तीर पर
आराधना में हो निमग्ना
श्वेत आँचल ज्योंकि  प्राची का
तनिक लहरा गया हो

या कहारों ने तुषारी, कांवरी ढोई  हुई
मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई

सोम का हो अर्क आकर
घुल गया वातावरण में
कामना की हों उफानें
कुछ नईं अंत:करण  में
विश्वमित्री भावनाओं का
करे खण्डन  समूचा
रूपगर्वित मेनका के
आचरण के अनुकरण में

पुष्पधन्वा के शरों  में टाँकती कोई सुई
मोगरे के फूल पर है चांदनी सोई हुई

तो आप ये भी चाह रहे हैं कि मेरे जैसा अकिंचन इस गीत की प्रशंसा के लिये शब्‍द जुटाए भी और उन शब्‍दों से प्रशंसा करने की धृष्‍टता भी करे। जो शब्‍द राकेश जी ने इस गीत में टांके हैं उन शब्‍दों के सामने ठहर सकने वाले शब्‍दों को मैं कहां से लाऊं। आचरण के अनुकरण जैसा वाक्‍य रचने वाले रचनाकार के आगे मेरी और मेरे शब्‍दों की क्‍या बिसात । तो मैं भी वही करता हूं जो आप कर रहें हैं कि बस मौन होकर सुनता हूं इस गीत को फिर फिर। 

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श्री राकेश खंडेलवाल जी

सुबीर संवाद सेवा पर आने वाली मनमोहक रचनायें अपनी महक से सराबोर किये हुये हैं. उस्ताद शायरों की गज़लें पढ़ कर कलम ने सहसा ही एक द्विपदी की दिशा में अग्रसर कर दिया. आपके समक्ष प्रस्तुत है यह द्विपदी

कोई प्रतिमा मरमरी हो दूध की धोई हुई
मोगरे के फूल पर थी चाँदनी सोई हुई

आजकल तो राम गाड़ी से उतरता ही नहीं
रह गई फिर से शिला में गौतमी सोई हुई

क्यों उसे भगवान मानूँ ये बताओ तो जरा
छोड़ता अर्धांगिनी जो लुम्बिनी सोई हुई

रहनुमा की आँख में उतरी नहीं है आज तक
वर्ष सड़सठ की हुई, शर्मिन्दगी सोई हुई

द्वारका में जिस्म है पर प्राण तो ब्रज में बसे
बाँसुरी में तान ढूँढ़े, रुक्मिणी, सोई हुई

"शीघ्र ही फ़िर जायेंगे दिन" इस कथन की सत्यता
कुम्भकर्णी नींद से जागी नहीं सोई हुई

हो नमन स्वीकार पंकजजी, यहाँ अब मंच पर
नृत्य करती गुनगुनाती चाँदनी सोई हुई

मैं गज़ल कह कर करूँ गुस्ताखियाँ ? संभव नहीं
हो गज़ल में जो निहां शाइस्तगी सोई हुई.

पहली ही द्विपदी से जो भाव उत्‍पन्‍न होते हैं वो पूरी रचना में चलते रहते हैं। कोई प्रतिमा मरमरी में दूध से धोए जाने की बात बहुत सुंदर आई है। और उतना ही सुंदर है राम तथा बुद्ध के बारे में प्रतीकों के माध्‍यम से कहना। बुद्ध का प्रतीक तो वैसे भी मेरे मन के करीब है। और शर्मिंदगी के सड़सठ सालों से सोए होने का प्रतीक भी कमाल का बना है। खूब।

तो आज आनंद लीजिए दोनों रचनाओं का और दाद देते रहिये। मिलते हैं अगले अंक में कुछ और रचनाकारों के साथ।

शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

आइये आज कुछ और आगे चलते हैं तीन शायरों के साथ श्री राजेन्‍द्र तिवारी, श्री सत्‍यप्रकाश शर्मा और श्री नीरज गोस्‍वामी जी के साथ।

मित्रो बहुत अच्‍छे तरह से कोई कार्य हो जाए तो उस कार्य के पश्‍चात जो थकान होती है वो भी मीठी लगती है। शिवना प्रकाशन का आयोजन बावजूद इसके कि फूफाजी नहीं पहुंच पाए, अच्‍छी तरह से हो गया। आप हैरत में होंगे कि ये कौन से फूफाजी हैं। असल में हर विवाह में सबसे ज्‍यादा ध्‍यान फूफाजी का ही रखा जाता है और यदि किसी कारण वश फूफाजी किसी शादी में नहीं आ पाएं तो सबसे ज्‍यादा प्रश्‍न भी फूफाजी के ही बारे में पूछे जाते हैं कि क्‍या हो गया, कुछ नाराज़गी है क्‍या। किस बात पर क्‍या हो गया। आदि आदि। शिवना प्रकाशन के आयोजन में भी यही हालत श्री नीरज गोस्‍वामी जी की है। वे नहीं आएं तो हर व्‍यक्ति उनके बारे में पूछता है कि वे क्‍यों नहीं आए। काय कछु नाराजगी तो नइ है फूफाजी को। तो बस ये कि फूफाजी नहीं आ पाए मगर कार्यक्रम ठीक से हो गया। फूफाजी की कमी बनी रही। सब पूछते रहे। तो फूफाजी के न आने का गम आज उनकी ग़जल सुन कर दूर करते हैं। आज तीन शायर हैं। इनमें से एक तो फूफाजी ही हैं और बाकी के दोनों पहली बार आ रहे हैं। हालांकि आ ये फूफाजी के साथ ही रहे हैं मतलब ये नीरज जी के मित्र हैं तथा उनके ही द्वारा इस ब्‍लॉग का बताने पर यहां अपनी रचनाएं लेकर पहली बार आए हैं । तो इनका स्‍वागत है। पहले एक पारिवारिक चित्र जो कि 19 जनवरी को श्री बब्‍बल गुरू द्वारा लिया गया।

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मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई

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राजेन्‍द्र तिवारी

राजेंद्र जी कानपुर से हैं तथा आपका एक ग़ज़ल संग्रह 'संभाल कर रखना' प्रकाशित हो चुका है। देश भर की प्रमुख पत्रिकाओं में आपकी ग़ज़लें प्रकाशित होती रहती हैं। आप अपनी अनूठी शैली की ग़ज़लों के लिए जाने जाते हैं। इस मुशायरे में पहली बार आ रहे हैं सो आपका स्‍वागत है ।

चाँद की बाहों में, जैसे हो नदी सोई हुई
मोगरे के फूल पर, थी चाँदनी सोई हुई

नींद को बेचैन थीं रातें हवेली की, मगर
चैन से फुटपाथ पर थी ज़िंदगी सोई हुई

ताज की सूरत में थी यमुना किनारे रात में
चाँदनी ओढ़े हुए..... कारीगरी सोई हुई

कह रही थी रात तुम इनको जगाते क्यों नहीं
हैं दिये ख़ामोश, क्यों है रौशनी सोई हुई

'कृष्ण' ने यह भी बताया है कि 'नीरो' मत बनो
शंख गूंजे वक़्त पर हो 'बांसुरी' सोई हुई

ये तो हम पर है कि हम चाहे जिसे आवाज़ दें,
हर किसी के दिल में है नेकी-बदी सोई हुई

वक़्त हर दम एक सा ''राजेन्द्र'' रहता ही नहीं,
जाग सकती है तेरी क़िस्मत कभी सोई हुई

वाह वाह वाह, क्‍या शेर कहे हैं। एक से बढ़कर एक शेर। मेरे लिए तो छांटना ही मुश्किल हो रहा है कि किसकी बात करूं।  फिर भी बात मतले से ही की जाए जिसमें दो दो उपमाएं एक दूसरे में गुंथ कर अनूठा रंग संयोजन प्रस्‍तुत कर रही हैं। नदी और चांद तथा मोगरा और चांदनी। वाह क्‍या बांधा है। और उसके ठीक बाद के शेर में दृश्‍य एकदम भिन्‍न हो गया है। नींद को बेचैन थी रातें हवेली की में फुटपाथ पर सोती जिंदगी का कमाल का चित्रण है। खूब । और फिर उसके बाद ही अगले शेर में चौंकाने वाला काफिया लगाया गया है। कारीगरी के सोने की बात और उसके पहले मिसरा उला में ताज और यमुनना का बिम्‍ब बहुत सुदंर बना है। कृष्‍ण का शेर बहुत गहरा अर्थ लिए हुए है। बहुत गहरा कब बांसुरी बजानी है और कब शंख फूंकना है ये पता होना चाहिये। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल कही है वाह वाह वाह।

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सत्‍यप्रकाश शर्मा

सत्‍य प्रकाश जी भी कानपुर से ही हैं। आपका भी एक ग़ज़ल संग्रह 'रौशनी महकती है' प्रकाशित हो चुका है। आप जाने माने शायर हैं। देश भर की पत्रिकाओं में आपकी ग़ज़लें प्रकाशित हो चुकी हैं । आप कानपुर में भारतीय स्‍टेट बैंक में उप प्रबंधक के रूप में पदस्‍थ हैं ।

जागती थी एक ख़ुश्‍बू दूसरी सोई हुई
मोगरे के फूल पर थी चाँदनी सोई हुई

थी फ़िज़ा के नर्म बिस्तर पर नमी सोई हुई
मोगरे के फूल पर थी चाँदनी सोई हुई

जागते ही इसके गुलशन जाग जाएगा, मगर
ये चमन की राजरानी है अभी सोई हुई

मुफ़लिसों के वास्ते सूरज कभी उगता नहीं
उनके हाथों की लकीरें आज भी सोई हुई

हादसों से इसने कोई भी सबक सीखा नहीं
जाने कब बेदार होगी ये सदी सोई हुई

वाह वाह वाह क्‍या मतला कहा है । मिसरे पर क्‍या गिरह लगाई है। जागती थी एक खुश्‍बू दूसरी सोई हुई। वाह वाह वाह। और दो शेरों में गिरह लगाई है। मतलब दो दो मतले हैं। दूसरे में भी उतना ही कमाल रचा है। जागते ही इसके गुलशन जाग जाएगा में राजरानी काफिये की क्‍या कही जाए। कमाल का काफिया लिया है। राजरानी । वाह वाह। सच में ग़ज़ल काफिये का ही खेल है। उस्‍ताद कहते थे कि बेटा ग़ज़ल की जान काफिया होता है। इसके बाद के दोनों शेर सामाजिक सरोकारों के प्रति युग चेतना को जगाने का कार्य कर रहे हैं और बखूबी कर रहे हैं। मुफलिसों के वास्‍ते में सूरज के नहीं उगने तथा हाथों की लकीरों के सोने का दृश्‍य बहुत मार्मिक है। और उसके बाद के शेर में सदी के सोए हुए होने में पूरे समय को खूब उठाया गया है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल । वाह वाह वाह। कमाल ।

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नीरज गोस्‍वामी

आप वे फूफाजी हैं जो इस बार शिवना प्रकाशन के कार्यक्रम में नहीं आए और जिनके बारे में हर कोई पूछता रहा।

देख कर आँखे किसी की मदभरी सोई हुई
जागती हैं ख्वाइशें सारी दबी सोई हुई
 

मत उतरना यूँ बिना सोचे हुए इसमें कभी
याद रख होती बहुत गहरी नदी सोई हुई

नफरतों में डूब कर सब भूल बैठे नाचना
आ बजा फिर से मुरारी बाँसुरी सोई हुई
   

बे-कसूरों को सजा ये क्यूँ कि गुज़रो आग से
पूछती सब से जमीं में जानकी सोई हुई

ग़र तुझे दिखता नहीं सबमें 'वही' तो मान ले
है तेरी पूजा इबादत बन्दगी सोई हुई

जागने से टूट कर बिखरे जो सारे ख़्वाब, वो
देख कर फिर से हँसी है बावरी सोई हुई

चाँद ने देखा उसे तो देखता ही रह गया
मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई

लफ़्ज़ ही मिलते नहीं कैसे बयां मंज़र करूँ
मेरे पहलू में थी जब तू अध-जगी सोई हुई

ख्वाब में नीरज किसी ने छू लिए होंगे तभी
सुब्‍ह तक है इन लबों पर चाशनी सोई हुई

अहा मतले में क्‍या खूब कमाल कर दिया है । मन कर रहा है कि मतले से आगे ही नहीं बढ़ा जाए। देख कर आंखें किसी की मदभरी सोई हुई में अगला मिसरा ख्‍वाहिशों के जागने का जादू जगा रहा है। वाह वाह। और उसके ठीक बाद का शेर नदी के गहरे और सोए होने की बात को क्‍या सुंदर तरीके से कह रहा है। और एक शेर में ऐसा ही जादू जगा दिया है वो शेर है गर तुझे दिखता नहीं सबमें वही, में पूजा इबादत और बंदगी के सोए हुए होने की बात क्‍या सलीके से कह दी है। वाह वाह । और एक अनूठा दृश्‍य रचा गया है मिसरा ए तरह पर गिरह लगाने में । चांद ने देखा उसे तो देखता ही रह गया, वाह क्‍या सुंदर तरीके से गिरह का मिसरा रचा है। देखता ही रह गया की तो बात ही निराली है । और एक चित्र अगले शेर में अधजगी सोई के माध्‍यम से बहुत ही सुंदर बनाया है। ऐसा लग रहा है कि पूरा का पूरा दृश्‍य शब्‍दों से बना दिया गया है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल कही है नीरज जी ने । क्‍या बात वाह वाह वाह।

तो इन तीनों शायरों की ग़ज़लों का आनंद लीजिए और दाद देते रहिए। मिलते हैं अगले अंक में कुछ और रचनाकारों के साथ।

बुधवार, 21 जनवरी 2015

शिवना प्रकाशन का सम्‍मान समारोह तथा पुस्‍तक विमोचन सफलतापूर्वक हुआ। और अब आइये तरही को आगे बढ़ाते हैं श्री द्विजेन्‍द्र द्विज, श्री सागर सियालकोटी और श्री विनोद पाण्‍डेय के साथ।

शिवना प्रकाशन द्वारा शाम आयोजित पुण्य स्मरण संध्या में स्व. जनार्दन शर्मा, स्व. नारायण कासट, स्व. अबादत्त भारतीय, स्व. ऋषभ गांधी, स्व. कैलाश गुरू स्वामी, स्व. कृष्ण हरि पचौरी, स्व. मोहन राय तथा स्व. रमेश हठीला को काव्यांजलि अर्पित की गई। कार्यक्रम की अध्यक्षता मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी की सचिव श्रीमती नुसरत मेहदी ने की जबकि मुय अतिथि के रूप में नगरपालिका अध्यक्ष श्री नरेश मेवाड़ा तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में इछावर के विधायक श्री शैलेन्द्र पटेल उपस्थित थे। दीप प्रज्जवलन तथा दिवंगत साहित्यकारों, पत्रकारों को अतिथियों द्वारा श्रद्धांजलि अर्पित करने के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। बी बी एस क्लब की ओर से वसंत दासवानी ने पुष्प गुच्छ भेंट कर सभी अतिथियों का स्वागत किया।  इस पुण्य स्मरण संध्या में शिवना प्रकाशन द्वारा साहित्यकारों को समानित किया गया। अतिथियों ने स्व. बाबा अबादत्त भारतीय स्मृति शिवना समान जानी मानी कथाकारा श्रीमती स्वाति तिवारी को, जनार्दन शर्मा स्मृति शिवना समान सुप्रसिद्ध कवि श्री मोहन सगोरिया को, स्व. रमेश हठीला शिवना समान वरिष्ठ शायरा श्रीमती इस्मत ज़ैदी को तथा स्व. मोहन राय स्मृति शिवना समान सीहोर के ही वरिष्ठ शायर श्री रियाज़ मोहाद रियाज़ को प्रदान किया गया। सभी को शॉल श्रीफल समान पत्र तथा पुष्प गुच्छ भेंट कर ये समान प्रदान किये गये। इस अवसर पर शिवना प्रकाशन की आठ पुस्तकों, मुकेश दुबे के तीन उपन्यासों ‘क़तरा-क़तरा ज़िंदगी’, ‘रंग ज़िंदगी के’ तथा ‘कड़ी धूप का सफ़र’, नुसरत मेहदी के उर्दू ग़ज़ल संग्रह ‘घर आने को है’, अमेरिका की कवयित्री सुधा ओम ढींगरा के काव्य संग्रह ‘सरकती परछाइयाँ’, पूर्व पुलिस महानिरीक्षक श्री आनंद पचौरी के काव्य संग्रह ‘चलो लौट चलें’ तथा मुबई की कवयित्री मधु अरोड़ा के काव्य संग्रह ‘तितलियों को उड़ते देखा है’, हिन्दी चेतना ग्रंथमाला ‘नई सदी का कथा समय’ का विमोचन किया गया। समान समारोह के पश्चात कवि समेलन में समानित तथा आमंत्रित कवियों ने अपनी प्रतिनिधि रचनाओं का पाठ किया। स्वाति तिवारी,  मोहन सगोरिया, इस्मत ज़ैदी, नुसरत मेहदी, तिलकराज कपूर, रियाज़ मोहमद रियाज़, मुकेश दुबे, गौतम राजरिशी, हरिवल्लभ शर्मा, डॉ. आज़म तथा वंदना अवस्थी दुबे ने अपनी प्रतिनिधि रचनाओं का पाठ कर दिवंगत साहित्यकारों को काव्यांजलि प्रदान की। कार्यक्रम में बड़ी संख्‍या में शहर के सुधि श्रोता, पत्रकार एवं प्रबुद्ध जन उपस्थित थे।

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और अब आइये तरही को आगे बढ़ाते हैं श्री द्विजेन्‍द्र द्विज, श्री सागर सियालकोटी और श्री विनोद पाण्‍डेय के साथ।

मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई 

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द्विजेन्द्र द्विज

बेख़ुदी ओढ़े हुए है ज़िन्दगी सोई हुई
क्या जगाएगी उसे अब शायरी सोई हुई

जागते हों ग़म ही ग़म और हर  ख़ुशी सोई हुई
ऐ ख़ुदा किस्मत न देना  तू कभी  सोई हुई

क़ाफ़िले की पीठ पर ख़ंजर न क्यों आता भला
रहज़नी जागी हुई थी रहबरी सोई हुई

दोस्ती का यह भी प्यारे दोस्तो है इक मुक़ाम
दुश्मनी जागी हुई है  दोस्ती सोई हुई

इसमें सन्नाटों के साज़ों  के सिवा कुछ भी नहीं
सुन - सुना पाती नहीं मेरी सदी सोई हुई

पंखुड़ी से पत्थरों को काट कर दिखला सके
है कहाँ अब वो ग़ज़ल की नाज़ुकी सोई हुई

हाँ , पहुँच कर ही उसे मंज़िल पे मिलता है सुकून
राह में देखी नहीं दीवानगी सोई हुई

है वही ज़ीनत शहर की और है रौनक़ वही
है अभी फुटपाथ पर जो खलबली सोई हुई

सुबह तक हर शय सजाएगी क़रीने से यही
दिख रही है जो अभी ये हड़बड़ी सोई हुई

बाग़ में फूलों को भी वहशत की गोली खा गयी
मौत थी जागी हुई और ज़िन्दगी सोई हुई

लाख इन आँखोँ ने कोशिश की छुपाने की मगर
थी लबों पर पीर कोई अनकही सोई हुई

छटपटा  कर मर गया अब या मेरे अंदर का शोर
या लबों पर है मेरे इक ख़ामुशी सोई हुई

फिर अचानक छिड़ गईं बातें तेरी अंदाज़ की
फिर अचानक जाग उट्ठी नग़्मगी सोई हुई

अब मज़ा देते हैं मेरे पाँवों के छाले मुझे
ये जगाते हैं मेरी आवारगी सोई हुई।

फिर उमड़ पाई न वो सपनों  के मर जाने के बाद
आँसुओं की भीड़ आँखों में रही सोई हुई

एक  फोटो यह भी इस तहज़ीब की अल्बम का है
चुटकुले जागे हुए संजीदगी सोई हुई

धुन्ध की चादर हटा देंगे अभी सूरज मियाँ
फिर पहाड़ों पर खिलेगी धूप भी सोई हुई

रास्ता काली सुरंगों से निकालेगी ज़रूर
लेगी जब अँगड़ाइयाँ यह रौशनी सोई हुई

मेरी आँखों मेँ है अब तक उस हसीं मंज़र का नूर
'मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई'

जान कम पड़ती वफ़ा की इस इमारत के लिए
इसलिए 'द्विज'  रह गयी इसमें कमी सोई हुई

अब मज़ा देते हैं मेरे पांवों के छाले मुझे, ये शेर बहुत खूब बन पड़ा है। वैसे तो द्विज भाई की ग़ज़लों का हर शेर ही सुंदर होता है। और इस बार तो ग़ज़ल भी लम्‍म्‍म्‍म्‍म्‍बी है तो इसमें से किसी एक को छांटना तो वैसे ही बहुत मुश्किल है। द्विज भाई नए बिम्‍बों को शायर हैं। रहज़नी जागी हुई थी रहबरी सोई हुई क्‍या कमाल रचा है। और उसमें मिसरा उला में खंजर तो कमाल कमाल है। एक खंजर के बहाने जाने कहां कहां इशारा कर दिया है शायर ने । वाह । और हां तहज़ीब के एल्‍बम में चुटकुलों के जागने और संजीदगी के सोने की जो टीस हम सबके मन में है उस टीस की तरफ शेर ने क्‍या सलीके से इंगित किया है। और एक शेर में बिम्‍ब का कमाल है। जिस में पत्‍थरों को पंखुड़ी से काटने की बात कही है। सुरेंद्र वर्मा के उपन्‍यास का शीर्षक याद आ गया 'काटना शमी का वृक्ष पद्म पंखुरी की धार से' । खूब कहा । पूरी की पूरी ग़ज़ल बहुत सुंदर बनी है। हर शेर एक से बढ़कर एक । वाह वाह वाह। कमाल।

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सागर सियालकोटी
आप पहली बार हमारे मुशायरे में आ रहे हैं तो पहले आपका स्‍वागत । आपकी एक ग़ज़लों की किताब " उर्दू शायरी आवाज़ें " यश पब्लिकेशन दिल्ली से 2013 में छप कर आ चुकी है। 

हर शजर पर रात को इक आश्ती सोई हुई
मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई

मैकदा सुनसान था बस्ती भी कुछ खामोश थी
हर तरफ जैसे नुमायां ज़िन्दगी सोई हुई

लोग महंगाई से हर सू घिर गए हैं दोस्तों
दर बदर जैसे भयानक मुफलिसी सोई हुई

क्या बताएं हाल अपना दोस्तों से या खुदा
जल रहा हूँ बेबसी में हमग़मी सोई हुई

जोड़ मत इस ज़िन्दगी के तार जो टूटे हुए
दर्दे दिल में बेकसी की रागनी सोई हुई

हम तो "सागर" जीत कर भी आपसे जीते नहीं
हुस्न जोरावर रहा मर्दानगी सोई हुई

आश्ती :खामोशी, शांति

मतले के साथ ही गिरह का शानदार कमाल रचा है सागर जी ने। आश्‍ती शब्‍द के सौंदर्य को जिसमें महसूस किया जा सकता है। और एक शेर है मैकदा सुनसान था बस्‍ती भी कुछ खामोश थी हर तरफ जैसे नुमांया जिन्‍दगी सोई हुई। सन्‍नाटे का चित्र बहुत ही सुंदरता के साथ बनाया गया है। उस खामोशी को महसूस किया जा सकता है इस शेर में। और दोस्‍ती वाले शेर में हमग़मी का सो जाना और उसकी पीड़ा को खूब स्‍वर दिया गया है। बहुत सुंदर ग़ज़ल कही है सागर जी ने। वाह वाह वाह।

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विनोद पाण्डेय

बिन किसी के लग रही थी हर ख़ुशी सोई हुई
वो मिला तो जग गयी यह जिंदगी सोई हुई

इक अदब के साथ भँवरे बाग़ में दाखिल हुए
लग रहा है आज उनकी है कली सोई हुई

धूल,बारिश,नाव,किस्से,काठ घोड़ा अब कहाँ
आजकल तो बालकों की है हँसी सोई हुई

है ख़ुशी नववर्ष की पर मन हमारा कह रहा 
मत पटाखे तू बजा है लाडली सोई हुई

बेचता था स्वप्न वो,सौदा किया फिर चल दिया
ख्वाब में डूबी रही वो बावली सोई हुई

पेड़ सारे कट गए हैं गाँव विकसित हो गया 
बन गयी सड़कें नदी, में है नदी सोई हुई

मनचले कुछ भेड़ियों का बढ़ रहा है हौसला
कब तलक आखिर रहेगी शेरनी सोई हुई

चौंधियायी चाँद की आँखें जमीं पर देख यह 
मोगरे के फूल पर थी चाँदनी सोई हुई

हर दफा इक जनवरी को सब यही हैं सोचते
इस दफा किस्मत जगेगी है अभी सोई हुई

बेचता था स्‍वप्‍न वो, सौदा किया फिर चल दिया में क्‍या विरह है। उस बावली का ख्‍वाब में सोए रहना बहुत ही सुंदर बिम्‍ब है। विरह को प्रेम कविताओं का सबसे सुंदर रंग इसीलिए तो माना जाता है। यदि विरह न हो तो प्रेम ही क्‍या है। पेड़ सारे कट गए हैं गांव विकसित हो गया में सड़कें  नदी में बनना और फिर नदी का सोना, वाह वाह इस तरह भी सोचा जा सकता है। क्‍या बात है। और जनवरी में सबाक यही सोचना कि इस दफा जागेगी किस्‍मत है अभी सोई हुई में मानव मन की आशावादिता को अच्‍छा चित्रण किया गया है। हम सब जनवरी से यही तो उम्‍मीद लगाते हैं कि बस अब ये जो नया है इसमें सब कुछ बदल जाएगा। धूल बारिश नाव किस्‍से काठ घोड़ा में बचपन के सारे प्रतीकों को बहुत सुंदरता के साथ पिरोया गया है। वे सारे प्रतीक जो अब विलुप्‍व्‍त हो गये हैं उनको फिर से याद करवा दिया । बहुत ही सुदंर गजल कही है। क्‍या बात है वाह वाह वाह।

शनिवार, 17 जनवरी 2015

मकर संक्रांति का पर्व बीत गया सूर्य भी उत्‍तरायण हो गया है आइये आधी आबादी के साथ चलते हैं आगे लावण्‍या शाह जी, शार्दूला नोगजा जी, पूजा भाटिया जी और डिम्‍पल सिरोही जी की ग़ज़लों के साथ।

सूर्य के उत्‍तर की ओर हो जाने को एक प्रतीक माना जाता है कि अब ऊर्जा का समय वापस आ रहा है। वैसे तो पृथ्‍वी के कारण ही सूर्य इस प्रकार उत्‍तर और दक्षिण होता रहता है। हमारी भी वही स्थिति होती है। हम कहते हैं कि हमारी ऊर्जा कम हो रही है शक्ति कम हो रही है, लेकिन असल में तो ऊर्जा के सापेक्ष हमारी स्थिति आगे या पीछे, उत्‍तर या दक्षिण या उत्‍तर होती रहती है। ऊर्जा कभी कम नहीं होती, वो कम हो भी कैसे सकती है। बात केवल सापेक्षता की होती है। मुझे लगता है कि आइंस्‍टीन का सापेक्षता का सिद्धांत जीवन में हर जगह लागू होता है। इसीलिए मुझे लगता है कि किसी एक परम सत्‍य को छोड़ कर बाकी सब कुछ सापेक्ष सत्‍य ही है। जो मेरे लिए सत्‍य है वो किसी और के लिए नहीं है। इसका मतलब ये कि वो मेरा सापेक्ष सत्‍य है। दुनिया भर में सारे युद्ध, सारी लड़ाइयां केवल इसी बात को लेकर तो हैं कि हम केवल अपने सापेक्ष सत्‍य को सच मानते हैं और दूसरे के सापेक्ष सत्‍य के बारे में सोचते भी नहीं हैं। एक दिन कहीं प्रबुद्ध चर्चा में मैंने कहा था कि हिन्‍दु और मुस्लिम के बीच मंदिर मस्जिद का कोई झगड़ा नहीं है, असल में दोनों एक दूसरे के सापेक्ष सत्‍य को पहचान नहीं पा रहे हैं। पुरानी अनपढ़ और अशिक्षित पीढ़ी जानती थी, समझती थी, इसलिए सब मिलजुल कर रहते थे । लेकिन आज की ये भौतिक शास्‍त्र और आइंस्‍टीन को रट रट कर बड़ी हुई पीढ़ी नहीं समझ पा रही है। खैर बात कहां से शुरू हुई और कहां पर पहुंची । लेकिन सापेक्षता के सिद्धांत का मैं अपने जीवन में खूब उपयोग करता हूं। जब किसी से कोई विवाद की स्थिति बनती है तो हमेशा ये जानने की कोशिश करता हूं कि उसका सापेक्ष सच क्‍या है। और कई सारे विवाद होने से पहले ही समाप्‍त हो जाते हैं। 

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मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई

आज के प्रवचन समाप्‍त होते हैं तो आइये आज तीनों कवयित्रिओं के साथ चलते हैं आगे की काव्‍य यात्रा पर । आइये आधी आबादी के साथ चलते हैं आगे लावण्‍या शाह जी, शार्दूला नोगजा जी, पूजा भाटिया जी और डिम्‍पल सिरोही जी की ग़ज़लों के साथ।

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लावण्या शाह

वह मिलन की यामिनी थी अश्रु से धोई हुई
रूठ कर अभिसारिका थी नींद में खोई हुई

ये कहा उसने था मिलने आऊंगा में ईद पर 
अबके इस महताब की होगी न केवल दीद भर
हाय लेकिन वो न आया ईद फीकी रह गई
अनछुई सी देह की सूनी हवेली रह गई
पड़ गया सिंगार फीका उस नई दुल्हन का सब
ले मिलन की आस तारा आखिरी भी डूबा जब

दो नयन में आंसुओं की फ़स्ल थी बोई हुई
मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई

लावण्‍या जी की इंतज़ार हमेशा हम सबको इसलिए ही रहता है कि अब उनसे कोई सुंदर सा गीत सुनने को मिलेगा। और इस बार विरह का सुदंर सा गीत लेकर वे आईं हैं। गीत क्‍या है, मानो किसी ने एक रूठ कर सोई हुई अभिसारिका का चित्र बना दिया है। जिस चित्र में ईद है, ईद का चांद है। हवेली है जो इंतज़ार कर रही है कि कोई आए तो वो जगमगा उठे। एक नई दुल्‍हन है जो विवाह के बाद की पहली ईद पर सज संवर के, पूरा सिंगार करके अपने पी की प्रतीक्षा कर रही है जो परदेस कमाने गया है और ईद पर आने का कह के गया है। पर आया नहीं है। सारा सिंगार आंसुओं के खारे खारे पानी  से धुल कर बह रहा है और नायिका रूठ कर सो रही है। देखिये आप भी इस चित्र को और आनंद लीजिए। वाह वाह वाह।

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शार्दूला नोगजा

ज़िन्दगी पथराई, खुशियों की घड़ी सोई हुई
कब कुंवर चूमेगा आ के सुंदरी सोई हुई?

सो नहीं पातीं कपिलवस्तु में व्याकुल नारियाँ
तज गया सिद्दार्थ जब से संगिनी सोई हुई

माफ़ करता है फ़लक इन्सान को सौ बार, फ़िर
छोड़ देता है सुदर्शन शिंजिनी सोई  हुई

ये सियासी जंग वर्णावत में हो, बस्तर में हो
बच निकलते शाह, जलती भीलनी सोई हुई

कर सबर, अपने सिदक तक नेक-बद ख़ुद जायेंगे 
हाँक कर क्या तू जगाता, बन्दगी सोई हुई?

मुस्कुरा, अरुणिम उषा ने पाँव धीमे कर लिए
मोगरे के फूल पर थी चाँदनी सोई हुई

राधिका! ओ राधिका! ओ राधिका! ओ राधिका!
श्याम मथुरा को चले, तू रह गई सोई हुई

क्‍या आपने अंतिम शेर का जादू देखा, राधिका को पुकारने, बार बार पुकारने से शेर क्‍या सौंदर्य से जगमगा उठा है। मैं इस शेर को पढ़ने के बाद ठिठक गया, ठहर गया। कुछ देर तक उलझा रहा । जब होश आया तो लगा कि ये शेर तो जादू कर रहा है। और एक शेर मेरे मन का, सो नहीं पातीं कपिलवस्‍तु में, मिसरा उला के दर्द को ज़रा महसूसिए। उन नारियों के दर्द को महसूसिए तो उस दर्द को भोग रही हैं । उस्‍ताद कहते थे कि जब तुम दूसरों के दर्द को ठीक प्रकार से स्‍वर दे देते हो तो कविता हो जाती है। यहां भी कविता हो गई है। ऐसा ही एक शेर है वर्णावत में भीलनी के जल जाने का शेर। बहुत सुंदर। और हां उतनी ही नाज़ुकी से गिरह का शेर बांधा है। उफ सुबह के पांव धीमे होना । ग़ज़ब। ग़ज़ब। क्‍या दृश्‍य है । वाह वाह वाह ।

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पूजा भाटिया

था वो आँगन मुफलिसी का,थी ख़ुशी सोई हुई
मौत पहरे पर थी ऑ थी ज़िन्दगी सोई हुई

वो नज़ारा देख कर हम हो गए हैरतज़दा
तीरगी की बांह पर थी रौशनी सोई हुई

था तक़ाज़ा वक़्त का सो ख़र्च लफ़्ज़ों को किया
देखना था किस जगह है  ख़ामुशी सोई हुई

रात में देखा था माँ को जागते सोते हुए
अब ये जाना कैसी लगती है परी सोई हुई

बाग़ है ये या किसी शाइर का इक दीवान है
ओस है पत्तों पे या फिर शायरी सोई हुई

ख़्वाब आँखों में थे लेकिन आंसुओं की ओट में
जैसे हो सहरा की आँखों में नमी सोई हुई

हर तरह के चोंचले हैं हर तरफ़ शो ऑफ है
क्या सभी के दिल में है कोई कमी सोई हुई?

शहर भर में ढूंढती फिरती रही शब् भर जिसे
मेरे दिल में ही मिली वो बेबसी सोई हुई

शाख झुक झुक कर ज़मीं छूती रही थी रात भर
"मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई"

पूजा जी का शायद तरही में प्रथम आगमन है लेकिन धमाकेदार आगमन है। ख्‍़वाब आंखों में थे लेकिन आंसुओं की ओट में, इस शेर में मिसरा सानी में सहरा और नमी के प्रतीक बहुत खूबी से इस्‍तेमाल हुए हैं। बहुत सुंदर तरीके से। इसी प्रकार वो नज़ारा देख कर हम हो गए हैरतज़दा वाला शेर है तीरगी की बांह पर रौशनी के सोए होने का सुंदर दृश्‍य रचा गया है। बहुत ही सुदंर तरीके से। रात को देखा था मां को जागते सोते हुए में मां की तुलना परी से की गई है, इससे पहले सारी ग़ज़लों में बेटी की तुलना परी से की गई थी। लेकिन चूंकि ये एक बेटी का शेर है इसलिए परी की तुलना तो मां से होगी ही। गिरह का शेर भी बहुत सुंदर बन पड़ा है। शाखों का झुक कर ज़मीं छूना बहुत सुंदर है। वाह वाह वाह।

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डिम्पल सिरोही

मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई
यूं लगा उपवन में कोई हो परी सोई हुई

नींद आ पाती नहीं मुझको किसी भी हाल में
देखती हूं जब मैं भूखी जिंदगी सोई हुई

आंख मलती सी सुबह यूं आई है नववर्ष की
नींद से जागी हो जैसे लाडली सोई हुई

भूलकर शिकवे शिकायत यूं सभी आगे बढ़ो
रह न जाए एक इन्सां की खुशी सोई हुई

नींद से मुझको जगा देती है डिम्पल रात में
दिल में कोई आरज़ू कुचली दबी सोई हुई

डिम्‍पल जी पूर्व में भी अपनी ग़ज़ल लेकर हमारे मुशायरे में आ चुकी हैं, आज उनका एक बार फिर से स्‍वागत है। सबसे पहले बात उस शेर की जिसमें आंख मलती हुई नव वर्ष की सुबह इस प्रकार आ रही है  जैसे नींद से जाग कर लाड़ली चली आ रही हो। बहुत खूब । इसी प्रकार से मतले में ही मिसरा ए तरह पर बहुत सुंदर तरीके से गिरह बांधी गई है। दोनों मिसरे एक दूसरे के पूरक होकर उभर रहे हैं। नींद आ पाती नहीं मुझको किसी भी हाल में शेर उसी सामाजिक सरोकार की बात कर रहा है जिसकी चर्चा हम कल भी कर चुके हैं । अच्‍छा लगता है जब शायर इस प्रकार से सामाजिक सरोकारों की ओर इशारा करता है उनकी चर्चा करता है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल कही है डिम्‍पल जी ने । वाह वाह वाह।

तो आनंद लीजिए इन चारों रचनाओं का और दाद देते रहिए। मिलते हैं अगले अंक में कुछ और रचनाकारों के साथ।

गुरुवार, 15 जनवरी 2015

19 के कार्यक्रम की व्‍यस्‍तता के बीच आज तरही का सिलसिला कुछ और आगे बढ़ता है नकुल गौतम, दिनेश कुमार और प्रकाश पाखी के साथ।

मित्रों कई बार लगता है कि आयोजन और उत्‍सव क्‍यों हों। मगर फिर लगता है कि होने ही चाहिये। कारण कि साहित्यिक आयोजन किसी भी शहर और समाज की चेतना को जगाए रखने का कार्य करते हैं। हम जो साहित्यिक लोग हैं हम केवल लिखने के लिये नहीं हैं। हमें अपने शहर और समाज की चेतना का भी ध्‍यान रखना है। हम जहां भी रहें वहां पर कुछ न कुछ ऐसा करते रहें कि लोगों को लगता रहे कि सब कुछ अभी समाप्‍त नहीं हुआ है। और इस कुछ करने में साहित्यिक आयोजन भी आते हैं। आप जहां हों वहीं कुछ न कुछ करें। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वो आयोजन कहां हो रहा है।  यदि आपके कारण शहर के दस लोगों में भी साहित्यिक चेतना जागती है तो आप का कार्य पूरा हुआ। मेरे गुरू कहते थे कि पंकज मत देखो कि तुम्‍हारे आयोजन में कितने लोग आ रहे हैं, तुम्‍हारा सभाकक्ष छोटा है, उसमें श्रोता भी कम हैं। वो कहते थे कि अच्‍छे कार्य के लिए लोग बहुत मुश्किल से साथ आ पाते है। तुम बस ये जानो कि जो आ गये हैं वो ही तुम्‍हारे लिए महत्‍त्‍वपूर्ण हैं। जो आ गये हैं उनका ध्‍यान रखो, बाकी सब भूल जाओ। सीहोर जैसे छोटे शहर में जब हम कुछ मुट्ठी भर लोग मिलकर आयोजन करते हैं तो हम भूल जाते हैं कि हमारे संसाधन क्‍या हैं, हमारे साथ कौन है। हम बस कुछ करना चाहते  हैं।खुशी ये है कि कुछ युवा साथ जुड़े हैं कुछ कार्य आगे बढा है। जैसे 19 जनवरी का ये आयोजन जो पिछले लगभग 40 सालों से लगातार इसी तारीख का आयोजित होता आ रहा है। मुश्किलें आती हैं, परेशानी होती है लेकिर हम जुट जाते हैं इसको आयोजित करने में। एक छोटा सा हमारा सभाकक्ष, जो हमारे ही एक साथी के स्‍कूल का सभाकक्ष है, उसमें जुटे शहर के प्रबुद्धजन और हमारे अतिथि, हम किसी चेतना को बचाने के लिए संघर्ष करते हैं मिलकर। आइये आप सब भी भागीदारी करें। 19 जनवरी को।

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मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई

आइये आज तरही के क्रम को आगे बढ़ाते ह‍ैं तीन रचनाकारों के साथ । नकुल गौतम, दिनेश कुमार और प्रकाश पाखी जैसे गुणी युवा रचनाकारों के साथ। 

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दिनेश कुमार

बुजदिलों के शह्र में मर्दानगी सोई हुई
जुल्मतों की शब मुसलसल, रोशनी सोई हुई

बच्चियों पर बढ़ रहे अपराध सीना तानते
हर किसी की आँखों में शरमिन्दगी सोई हुई

शह्र के फुटपाथ पर रातों का मंजर खौफनाक
मुफलिसी की ओढ़ चादर जिन्दगी सोई हुई

मुज़रिमों का हौसला अब दिन-ब-दिन बढ़ता हुआ
मुल्क के सब मुन्सिफ़ों की लेखनी सोई हुई

चाँद सूरज फूल कलियाँ इन पे मैं लिक्खूँ ग़ज़ल?
एक मुद्दत से मिरी तो शायरी सोई हुई

तरही मिसरा ये रहा जिस पर मेरे अश'आर थे
"मोगरे के फूल पर थी चाँदनी सोई हुई"

दिनेश जी कैथल हरयाणा से हैं और शायद पहली बार तरही में आए हैं। बहुत अच्‍छी ग़ज़ल लेकर इन्‍होंने इण्‍ट्री की है। पूरी की पूरी ग़ज़ल सामाजिक सरोकारों से जुड़ी हुई ग़ज़ल है । याद आ रहे हैं रामधारी सिंह दिनकर जो कहते थे कविता को समाज की ओर देखना ही होगा। बच्चियों पर बढ़ रहे अपराध शेर सम सामयिक है और बहुत प्रभावी तरीके से बात को रख रहा है। उसी प्रकार का शेर है मुन्सिफों की लेखनी के सोए हुए होने का। असल में ये हौसला केवल कवि ही कर सकता है कि वो हर किसी पर प्रश्‍न चिन्‍ह लगाए और चेतना को जगाए जिसकी बात आज मैंने भूमिका में की है।  और हां एक सर्वथा भिन्‍न तरीके से लगाई हुई गिरह । क्‍या अनूठे तरीके से गिरह लगाई है । वाह वाह वाह।

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प्रकाश पाखी

दर्द बिखरा है यहाँ पर, है हंसी सोई हुई
चैन किसको, हर जगह जब बेबसी सोई हुई 

उस पिता का दर्द देखो नूर जिसका चल दिया
आज है ताबूत में इक वापसी सोई हुई

बाग़ था खामोश बिलकुल रात रोई रात भर
वहशियों ने जब कुचल दी हर कली सोई हुई

चाँद से आई उतर कर डालियों पर झूलकर
मोगरे के फूल पर थी चाँदनी सोई हुई

जब से जानी ग़म की फितरत फ़िक्र मैं करता नहीं
पास में हर ग़म के जो थी इक ख़ुशी सोई हुई

सबसे पहले बात उस शेर की जो अंदर तक उतर गया है। ये दुनिया भर के हर सैनिक के पिता का दर्द है। उस पिता का दर्द देखो नूर जिसका चल दिया । क्‍या बात है। क्‍या मार्मिक दृश्‍य उतारा है शेर में । आज है ताबूत में इक वापसी सोई हुई। कमाल। बाग़ था ख़ामोश बिल्‍कुल में भी उतने ही मार्मिक तरीके से दृश्‍य उतारा गया है। जिस प्रकार से ऊपर की ग़ज़ल में दिनेश कुमार ने सामाजिक सरोकारों को याद रखते हुए ग़ज़ल कही थी उसी प्रकार से प्रकाश पाखी ने भी शेर निकाले हैं । और उसी प्रकार से सुदंर तरीके से गिरह भी लगाई हे मिसरे पर, पूरा का पूरा एक सजीव चित्रण हो गया है उस शेर में चांदनी के उतर आने का । कामल की ग़ज़ल बहुत खूबत्र वाह वाह वाह।

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नकुल गौतम

देर कल दफ्तर से निकला, थी गली सोई हुई
याद फिर से आ गयी आवारगी सोई हुई

इक पुराना बक्स खोला, वक़्त मुस्काने लगा
चल पड़ी यादों की चाबी से घड़ी सोई हुई

रात भर ठंडी हवा से खिड़कियां हिलती रहीं,
कुछ वरक़ पलटे तो रो दी डायरी सोई हुई

हाथ हाथों में लिए अलफ़ाज़ ने एहसास के,
मुस्कुराने फिर लगी ये शायरी सोई हुई

ओढ़ कर शबनम की चादर, जनवरी की रात में
"मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई"

गर छपी होती न वो झूठी ख़बर अख़बार में
यूँ नहीं इंसानियत दिखती कभी सोई हुई

कम्बलों की इक दुकां है आज जिस फुटपाथ पर
ठण्ड में कल इक  भिखारन मर गयी सोई हुई

रूह को जाते हुए देखा नहीं जन्नत कभी
हाँ मगर हो चैन से मिट्टी मेरी सोई हुई

नकुल की ग़ज़ल ने एक और कमबख्‍़त गौतम की याद दिला दी। सबसे पहले बात गिरह की । वाह वाह वाह। क्‍या गिरह बांधी है । उसमें भी जनवरी की रात के तो क्‍या कहने। और हां शबनमी चादर भी, कमाल है । आंखें बंद करके ज़रा इस शेर को सोचिए और आनंद लीजिए पूरे के पूरे दृश्‍य का। उसके बाद बात की जाए मतले की । वाह क्‍या मतला है । मतले के दोनों काफिये क्‍या ग़ज़ब का कॉम्बिनेशन पैदा कर रहे हैं। गली और आवारगी का तो पूराना रिश्‍ता है। दफ़्तर शब्‍द खूब आया है मिसरे में, सौंदर्य को दोगुना करता हुआ। मतले के बाद के दो शेर तो डाउन मेमोरी लेन के शेर हैं। दोनों बस महसूसे जाने के शेर हैं और महससूते समय यदि आपकी आंखों की कोर से कुछ पनीला सा बह निकले तो उसमें शायर का क्‍या दोष। वाह नकुल क्‍या कमाल की ग़ज़ल कही है। कमाल की ग़ज़ल। वाह वाह वाह।

तो दाद देते रहिये और आनंद लेते रहिये । और हां ये आमंत्रण पत्र आपके लिए, आप आ रहे हैं ना.....?

INVITATION CARD 19 JAN UARY

मंगलवार, 13 जनवरी 2015

आइये आज तरही मुशायरे को आगे बढ़ाते हैं तीन शायरों श्री तिलक राज कपूर, श्री शाहिद मिर्जा शाहिद और अभिनव शुक्‍ल के साथ

जैसा कि मैंने पहले भी कहा कि इस बार के तरही मुशायरे में ग़ज़लें बहुत कोमल भावों के साथ आ रही हैं। हालांकि सोई हुई रदीफ के साथ बहुत सी बातें कही जा सकती हैं। मगर फिर भी चूंकि मिसरा कोमलकांत है इसलिये ग़ज़लें भी उसी अनुसार आ रही हैं। कोमलता काव्‍य का वो गुण है जो श्रोता के मन में रस की उत्‍पत्ति करता है। श्रोता के अंदर जो कुछ भी मृदुल है कोमल है उसे ये काव्‍य कोमलता अपने रेशम से जाकर छूती है जगाती है। और उसे अपने साथ एक दूसरे संसार में ले जाती है। जहां चारों तरफ मोर के पंख, गुलाब की पंखुरियां, सेमल की रूई के स्‍पर्श को आमंत्रण बिछा होता है। यह आमंत्रण बरबस खींच ले जाता है उस दुनिया में। और जब श्रोता वहां वाह वाह कर रहा होता है तो वो दिमाग से नहीं दिल से कर रहा होता है। उस तो पता ही नहीं होता है कि वो कब वाह वाह कर उठता है। वह सम्‍मोहन में होता है। यह सम्‍मोहन ही किसी कव‍ि की सबसे बड़ी सफलता होती है। यदि कोई कवि अपने शब्‍दों के, अपने भावों के, अपने विचारों के सम्‍मोहन से ( गायन के सम्‍मोहन से नहीं) श्रोता को मंत्रमुग्‍ध कर देता है तो उसकी कविता सफल और सुफल दोनों हो जाती है। जब वो अपनी कविता को बहुत अच्‍छे से गा कर मंत्रमुग्‍ध करता है तो यह समझना मुश्किल होता है कि श्रोता उसकी कविता के रस का आनंद ले रहा है या उसके गले का। मेरे विचार में कविता की परिभाषा कुछ यूं होनी चाहिये ''कविता, 'शब्‍दों' और 'विचारों' के सर्वश्रेष्‍ठ कॉम्बिनेशन से बनी हुई वो इकाई है जो अपनी अभिव्‍यक्ति के लिये अपने रचनाकार की ओर से किसी अतिरिक्‍त भूमिका, प्राक्‍कथन या पुरोवाक् की मांग नहीं करे।''

मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई

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आइये आज मुशायरे को तीन शायरों के साथ मिलकर आगे बढ़ाते हैं। तीनों नाम चिर परिचित नाम हैं । और तीनों ही अपनी विशिष्‍ट शैली और अंदाज़ के कारण जाने जाते हैं और मुशायरे में इनका सबको इंतज़ार भी रहता है। तिलक राज कपूर जी, शाहिद मिर्जा शाहिद जी और अभिनव शुक्‍ल। ये तीनों ही इस मुशायरे और इस ब्‍लॉग के प्रारंभिक समय से इसके साथ हैं। हमने इन्‍हें जी भरकर सुना और सराहा है। आइये आज भी इनकी शानदार ग़ज़लें सुनते हैं।

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तिलक राज कपूर

पैंजनी पहने हुए नाज़ुक कली सोई हुई
मुग्ध मन देखा किया नन्ही परी सोई हुई।

मैं चुनौती बन गया हूँ, जानकर उसने कहा
आओ फिर से हम जगायें दोस्ती  सोई हुई।

मैं जगाने जब अलख निकला तो आया ये समझ
इक चुनौती है जगाना जिन्दगी सोई हुई।

एक परिभाषा नई धारे हुए मजहब मिला
घुप अंधेरे में है जिसके रोशनी सोई हुई।

क्या  हिफ़ाज़त की रखें उम्मीद इस माहौल से
हर तरफ़ देखी है जिसमें चौकसी सोई हुई।

गोप-गोपी आ गये पर, नृत्य कैसे हो शुरू
कृष्ण  के अधरों धरी है बांसुरी सोई हुई।

साथ में पुरुषार्थ लेकर वो सिकंदर हो गया
भाग्य में जिसके लकीरें थीं सभी सोई हुई।

ओस की इक बूँद देखी है अधर पर आपके
डर मुझे है उठ न जाये तिश्नगी सोई हुई

प्रस्फ़ुटित होने लगीं विद्रोह की चिंगारियॉं
कब तलक रहती कहो तुम बेबसी सोई हुई।

ज्यूँ शरद की पूर्णिमा की ओढ़नी हो ताज पर
मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई।

मैं चुनौती बन गया हूं जानकर उसने कहा, सबसे पहले बात इसी शेर की हो। कितने सलीके से बात को कहा गया है। ग़ज़ल का एक और सबसे बड़ा गुण सलीक़ा इस शेर में उभर के सामने आ रहा है। वाह क्‍या बात है। और एक और शेर है कृष्‍ण के अधरों पर धरी बांसुरी का सोया होने वाला। यह शेर जाने कहां कहां की यात्रा करता हुआ गुज़र रहा है। वह बांसुरी एक प्रतीक बनकर मानो हर सोए हुए के पीछे के कारण को इंगित कर रही है। वाह वाह । एक बहुत ही कोमल शेर इसमें बना है ओस की इक बूंद वाला शेर, इसकी नफ़ासत और नाज़ुकी पर निसार होने को जी चाह रहा है। कमाल का बिम्‍ब रचा है । प्रेम के सातवें आसमान का बिम्‍ब। और उसी अनुसार रचा गया है आखिरी का गिरह का शेर । ताजमहल को मोगरे के फूल के समानांतर स्‍थापित कर सुंदर प्रयोग किया गया है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल। वाह वाह वाह।

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शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

दर्द ए दिल जागा हुआ और हर ख़ुशी सोई हुई
गोद में हालात के है ज़िंदगी सोई हुई

अब जहां बारूद है मासूम खेतों में वहां
मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई

देखकर मंज़र अंधेरे भी बहुत हैरान हैं
इस चरागों के नगर में रोशनी सोई हुई

ऐ घटा उम्मीद की, अबके बरस कुछ तो बरस
सूखे दरिया में जगा दे तश्नगी सोई हुई

धुंध में मायू्सियों की क्या करे सूरज भला
रोशनी की है यहां उम्मीद भी सोई हुई

आज भी ’वो तोड़ती पत्थर’ अजब तकदीर है
उसकी मंज़िल थम गई है, राह भी सोई हुई

रंग पल-पल में बदलती रहती है ये उम्र भर
है अभी जागी हुई क़िस्मत अभी सोई हुई

गर्मजोशी की ज़रूरत जब हुई शाहिद मुझे
सर्द रिश्तों सी मिली है दोस्ती सोई हुई

सबसे पहले बात करते हैं गिरह के शेर की । बिल्‍कुल अलग तरह से गिरह लगाई गई है। अलग भावों के साथ। इसे ही कहते हैं कन्‍ट्रास्‍ट गिरह। मोगरे के फूल और चांदनी के बीच भी सामाजिक सरोकारों को याद रखने के कवि धर्म को निभाया गया है। बहुत खूब। और अगले ही शेर में अंधेरों की हैरानगी की बात बहुत उम्‍दा तरीके से कही गई है। और कोई नहीं स्‍वयं अंधेरे ही हैरान हैं रोशनी के सोए होने पर । वाह क्‍या बात है। जब भी कोई रचनाकार अपने पूर्वज रचनाकार के यहां से कोई बिम्‍ब उठाता है तो उसके ऊपर बड़ा दबाव होता है जैसा कि शाहिद जी ने निराला जी की तोड़ती पत्‍थर से बिम्‍ब लेकर किया है। लेकिन बहुत कुशलता से उस दायित्‍व को निभा भी दिया है। और मकते को शेर भी अलग मिज़ाज का शेर है। आज की दोस्‍ती को परिभाषित करता। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल वाह वाह वाह।

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अभिनव शुक्‍ल

आशिकी की बांह थामे शायरी सोई हुयी,
मैंने अपने घर में देखी रोशनी सोई हुयी,

कर के पोंछा और बासन, चूल्हा चौका पाट के,
मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुयी,

रतजगा था जुगनुओं की भीड़ में जागा हुआ,
यामिनी की गोद में थी दामिनी सोई हुयी,

एक लोरी गुनगुनाई थी कभी उसने इधर,
इस गली में है अभी तक रागिनी सोई हुयी,

धीरे बोलो, कोई खटका  मत करो तुम इस तरफ,
देर तक जागी थी मेरी ज़िन्दगी सोई हुयी।

सबसे पहले तो यह कि अभिनव को बधाई, उसके आने वाले कविता संग्रह हेतु जो कि शिवना प्रकाशन से विश्‍व पुस्‍तक में लांच होने जा रहा है। काव्‍य संग्रह का नाम है ''हम भी वापस जाएंगे'' । कर के पोंछा और बासन, चूल्‍हा चौका पाट के, में ज़बरदस्‍त गिरह लगी है, कमाल की गिरह, स्‍तब्‍ध कर देने वाली गिरह। मैं बहुत देर तक बिम्‍ब को अपने दिमाग में रचता रहा मिटाता रहा । मोगरे का फूल कौन और चांदनी कौन है। बहुत खोलना नहीं चाहता लेकिन जब आप भी उस विचार तक पहुंचेंगे तो आपको भी आनंद आएगा। कमाल की गिरह है। क्‍या इस तरीके से भी गिरह लगाई जा सकती है। वाह क्‍या बात है। मैं वैसे तो गिरह के शेर के अलावा किसी और शेर की बात करना ही नहीं चाहता। लेकिन लोरी गा कर गली की रागिनी के सोने का शेर भी सुंदर बन पड़ा है। वाह वाह क्‍या बात है। कमाल की गिरह कमाल की ग़ज़ल ।

तो आनंद लेते रहिये इन तीनों ग़ज़लों का और दाद देते रहिये । तीनों शानदार ग़ज़लों का । मिलते हैं अगले अंक में कुछ और रचनाकारों के साथ।

शनिवार, 10 जनवरी 2015

आइये आज तरही मुशायरे के क्रम को और आगे बढ़ाते हैं। धर्मेंद्र कुमार सिंह और भुवन निस्‍तेज के साथ।

मित्रों ये समय बहुत व्‍यस्‍तताओं से भरा हुआ है । कई सारे काम एक साथ समानांतर चल रहे हैं । और उनमें ही अपना ये तरही मुशायरा भी चल रहा है। व्‍यस्‍तताओं का अपना ही एक आनंद होता है । और उनके बीच में से ही निकल आता है थोड़ा सा समय। विचार और व्‍यस्‍तता का छत्‍तीस का आंकड़ा होता है। जहां व्‍यस्‍तता है वहां विचार होना ज़रा मुश्किल होता है। लेकिन बात वही है कि फिर भी संभावना तो हर समय होती ही है। जैसे इस समय है । कुछ लोग कहते हैं कि लेखक रचना को रचता है । मेरा मानना है कि विचार ही किसी रचना को रचते हैं, लेखक नहीं । और विचार के लिये आवश्‍यक है कि दिमाग कुछ व्‍यस्‍तता से दूर हो। खैर । आइये आज चलते ह‍ैं। तरही मुशायरे की ओर। आज हमारे चिर परिचित धर्मेंद्र कुमार सिंह हैं और एक नये शायर भुवन निस्‍तेज हैं। भुवन के रूप में हमारे मुशायरे में पहली बार नेपाल से कोई शायर आ रहे हैं। भुवन का फोटो मैंने बस अंदाज से इंटरनेट पर तलाश करके लगा दिया है । तो आइये दोनों का स्‍वागत करते हैं और दोनों से उनकी ग़ज़लें सुनते हैं।

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मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई

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धर्मेन्द्र कुमार सिंह

मुस्कुराने जब लगी नन्हीं परी सोई हुई
रूह में जगने लगी हर गुदगुदी सोई हुई

आप को जो लग रही है बेख़ुदी सोई हुई
फाड़ देगी छेड़िये मत शेरनी सोई हुई

मेघ का प्रतिबिम्ब दिल में किन्तु जनहित के लिए
बाँध की बाँहों में है चंचल नदी सोई हुई

जाग जाए तो यकीनन क्रांति का हथियार ये
है दमन की सेविका भर लेखनी सोई हुई

मौत के पैरों तले कुचली गई थी कल मगर
आज फिर फुटपाथ पर ही जिंदगी सोई हुई

आ के आधी रात को चुम्बन लिया नववर्ष ने
ले के अँगड़ाई उठी है जनवरी सोई हुई

उस मिलन से खूबसूरत दॄश्य फिर देखा नहीं
मोगरे के फूल पर थी चाँदनी सोई हुई

हूं.... चूंकि धर्मेंद्र जी बांधों आदि से जुड़े हैं उसी महक़मे में हैं इसलिये बांध की बांहों में चंचल नदी के सोने का कमाल दृश्‍य खींचा है। और अहा हा हा जनवरी के उठने का सीन तो कमाल है। नव वर्ष का ये मुशायरा सार्थक हो गया है। आ के आधी रात को चुम्‍बन लिया नव वर्ष ने अहा। मौत के पैरों तले कुचलने के बाद भी उसी फुटपाथ पर सोने की बेबसी को बहुत मार्मिक ढंग से शेर में बांधा गया है। शायर की लेखनी उस दर्द को उकेरने में कामयाब रही है। और अंतिम शेर पर जिसे कमाल के साथ मिसरे पर गिरह लगाई है उसके लिये सलाम। उस मिलन से खूबसूरत दृश्‍य फिर देखा नहीं । वाह वाह । क्‍या बात है।

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भुवन निस्तेज

मैं भुवन बोहरा हूँ नेपाल से  और आपके ब्लॉगका नया नया पाठक हूँ. नेपाली भाषा में गजले लिखा करता हूँ और सीखने के उद्देश्य से हिंदी भाषा में भी लिखने का प्रयत्न करता हूँ. आपके द्वारा नए साल्पर तरही मयोजन्संचलित होने की खबर कल ही पढ़ पाया तो मुझमे भी एक रचना प्रेषित करने की इच्छा जाग गयी. आशा है उचित मार्ग दर्शन होगा.

ख्वाब देखा बांह में थी उर्वशी सोई हुई
जग गई फिर नींद से शाइस्तगी सोई हुई

ये ख़ुशी सोई हुई ये शायरी सोई हुई
ज़िन्दगी-जिंदादिली सोई हुई सोई हुई

खामुशी की बर्फ़ को यों भी कुरेदा मत करो
है यहाँ चुपचाप कोई हिमनदी सोई हुई

इस महल के खंडहर से ये हवा टकराई तो
आगई लेकर कहानी अनकही सोई हुई

चोट खाकर मुस्कुराती मूर्ति पत्थर बनी
ज़िन्दगी बेजान पत्थर में मिली सोई हुई

बाग़ में अब भी असर उस रात का बाकी ही है
रतजगे से फूल की है पंखुड़ी सोई हुई

राह भटके जुगनुओं के ये उजाले देखकर
गुनगुनाने लग गई है खामुशी सोई हुई

क्यों किसी मज़लूम को इतना डराया जाये कि
जागने लग जाये अन्दर छावनी सोई हुई

रात ने शामो-सहर औ’ चाँद से पूछा मगर
'मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई'

मैकदे की रौनकें जिसको जगा पाई न हो
जग उठी तन्हाई में वो तिश्नगी सोयी हुई

क्‍या कमाल की इण्‍ट्री की है। विशेष कर उस शेर में जहां सोई हुई के ही दोहराव से काफिये को बांधने की कोशिश की है । रदीफ को काफिया में बदलने का कमाल किया है। खूब। और ठीक उसके बाद का शेर भी खूब है जिसमें हिमनदी का काफिया चौंकाता हुआ आया है। नदी काफिया तो हर गजल में आ रहा है लेकिन हिमनदी आना और सुंदर हो गया है। बाग में फूल की पंखुरी के सोने का बिम्‍ब भी सुंदर बन पड़ा है। और एक और शेर जिसमें छावनी काफिये को सुंदर तरीके से गूंथा गया है। जागने लग जाये अन्‍दर छावनी सोई हुई। वाह वाह । कई कई आंदोलनों को प्रतिध्विनत करता है ये शेर। खूब वाह वाह वाह।

तो ये हैं आज के दोनों शायर । दोनों की ग़ज़लें सुनिये और दाद दीजिये । मिलते हैं अगले अंक में ।

बुधवार, 7 जनवरी 2015

बहुत अच्‍छी ग़ज़लें इस बार तरही में आईं हैं। ते आइये आज इस्‍मत ज़ैदी जी और सौरभ पाण्‍डेय जी के साथ चलते हैं ग़ज़ल गांव में ।

ग़ज़ल में नाज़ुकी का बड़ी महत्‍त्‍व है। उस्‍ताद लोग कहते हैं कि ज़रा भी यदि शब्‍द कठोर उपयोग में ले आये तो ग़ज़ल चटख जाती है, टूट जाती है। इसलिये ग़ज़ल बुनते समय शब्‍दों को पहले उसी प्रकार से परखना चाहिये जिस प्रकार कोई बहुत अच्‍छा रसोइया खाना पकाने से पहले मसालों को अच्‍छी तरह से जांचता है। कोई मूर्तिकार पत्‍थर की जांच करता है । कहा जाता है कि ग़ज़ल में जो शब्‍द आएं उनका वज़न फूलों से, पंखों से भी हलका हो। इतना कि वे ग़ज़ल के प्रवाह में कहीं भी बाधा न बनें। हर काव्‍य के अपने शब्‍द होते हैं। जैसे भक्तिकाल के काव्‍य के अपने शब्‍द थे और छायावाद के अपने। यदि आप भक्ति काल के शब्‍दों को छायावाद में डालेंगे तो काव्‍य ढह जाएगा। इसीलिये पहले उस्‍ताद लोग स्‍पष्‍ट कहते थे कि नहीं भाई ये ग़ज़ल का शब्‍द नहीं है कुछ और लाओ इसके स्‍थान पर । अब न वे उस्‍ताद रहे न उनकी स्‍पष्‍टवादिता रही । याद आते हैं वे सब। जिनके मुंह से एक वाह सुनने के लिये मेरे जैसे शागिर्द तरसते रहते थे, शेर दर शेर, ग़ज़ल दर ग़ज़ल।

Mogara - Jasmine Four

मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई

इस बार की ग़ज़ल बहुत नफ़ासत मांग रही है क्‍योंकि मिसरा ही ऐसा है। और जब बात नफासत के साथ सलीक़े के साथ बात करने की हो तो इस्‍मत ज़ैदी जी तथा सौरभ पाण्‍डेय जी का नाम तो ज़ेहन में आता ही है। वैसे भी आने वाली 19 जनवरी को इस्‍मत ज़ैदी जी को शिवना सम्‍मान प्रदान किया जाएगा। तो आइये आज इन दोनों रचनाकारों की गज़लें सुनते हैं।

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'शिफ़ा’ कजगाँवी

ज़ुल्म की ये इन्तहा और मुंसिफ़ी सोई हुई
गर्म है बाज़ार ए ग़म, लेकिन ख़ुशी सोई हुई

रेशमी बिस्तर प जागी बादशाहत रात भर
पत्थरों के फ़र्श पर है मुफ़लिसी सोई हुई

ख़ुश्बुओं की ओढ़ कर चादर, बिछा कर रौशनी
"मोगरे के फूल पर है चाँदनी सोई हुई "

परचम ए इंसानियत ले कर जो गुज़रे चंद लोग
जाग उट्ठी यक ब यक फिर हर गली सोई हुई

इक सुकूँ चेहरे प नन्हे हाथ माँ के गिर्द हैं
मामता की गोद में है ज़िंदगी सोई हुई

उम्र गुज़री है  तलाश ए रौशनी में आज तक
ऐ 'शिफ़ा’ वो अपने अँदर ही मिली  सोई हुई

मतला ही उस एक कड़वे सत्‍य की ओर इशारा कर रहा है जिससे इस समय पूरी मानवता दो चार हो रही है। ख़ूब कहा। लेकिन गिरह का शेर और उसकी गिरह..... कमाल कमाल। क्‍या विम्‍ब बांधे हैं मिसरे में । खुश्‍बुओं की चादर ओढ़ कर रौशनी को बिछा कर सोना। क्‍या बात है। इक सुकूं चेहरे पे नन्‍नहे हाथ में क्‍या चित्र बनाया है । यदि आंखें बंद कर इस शेर को सुनो तो मानो सब कुछ दिखाई ही देने लगे । उस्‍ताद कहते थे कि जिस शेर का पूरा चित्र सुनने वाले के दिमाग़ में बन जाए उससे अच्‍छा कोई शेर नहीं होता। और फिर मकता, क्‍या कमाल है । सूफियों के तसव्‍वुर को छूता हुआ गुज़रता है। हम सबके अंदर सोई हुई रौशनी का शेर। परचम ए इंसानियत में गली को प्रतीक के रूप में जिस प्रकार से उपयोग किया गया है वाह । कमाल कमाल, वाह वाह वाह।

Saurabh

सौरभ पाण्‍डेय

दिख रही निश्चिंत कितनी है अभी सोयी हुई 
गोद में ये खूबसूरत जिन्दगी सोयी हुई

बाँधती आग़ोश में है.. धुंध की भीनी महक
काश फिर से साथ हो वो भोर भी सोयी हुई

चाँद अलसाया निहारे जा रहा था प्यार से
मोगरे के फूल पर थी चाँदनी सोयी हुई

खेलता था मुक्त.. उच्छृंखल प्रवाही धार से
लौट आया वो लिये क्यों हर नदी सोयी हुई

बोलिये किसको सुनायें जागरण के मायने
पत्थरों के देस में है हर गली सोयी हुई

अब नहीं छिड़ता महाभारत कुटिल की चाल पर
अब लिये पासे स्वयं है द्रौपदी सोयी हुई

जा रहा है रोज सूरज पार सरयू के सदा
स्वर्णमृग की सोनहिरनी हो अभी सोयी हुई

सौरभ जी की ग़ज़लों का मुझे इसलिये भी इंतज़ार रहता है क्‍योंकि उनकी ग़जलों में पौराणिक आख्‍यानों से संदर्भित कुछ न कुछ ज़रूर मिलता है। और वो मेरा भी प्रिय विषय है । मेरी सर्वकालिक प्रिय पात्र द्रोपदी पर इस बार जो शेर रचा है वो बहुत गूढ़ार्थ लिये हुए है। अब लिये पासे स्‍वयं है द्रोपदी सोई हुई। वाह वाह। और फिर बात गिरह के शेर की। वाह कमाल की गिरह बांधी है। मिसरा उला ऐसा है मानो इस मिसरा सानी हेतु केवल और केवल यही बना हो। क्‍या कमाल का जोड़ है कि सिलाई दिख तक नहीं रही। कमाल वाह। और मेरे एक और प्रिय विषय पर कहा गया शेर बांधती आगोश में है धुंध की भीनी महक में सोयी हुई भोर का इशारा जिस ओर है वो इशारा जिस सलीक़े से किया गया है इस पर सब कुछ निसार। वाह वाह वाह। क्‍या बात है ।

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तो सुनते रहिये दोनों ग़ज़लों को और दाद देते रहिये आनंद लेते रहिये। आने वाली 19 जनवरी को इन चारा रचनाकारों का सम्‍मान सीहोर में होना है । आइये आपका स्‍वागत है। मिलते हैं अगले अंक में।

सोमवार, 5 जनवरी 2015

आइये आज तरही मुशायरे को आगे बढ़ाते हैं। आज अंकित सफ़र और दिगंबर नासवा की सुंदर ग़ज़लों के साथ चलते हैं तरही मुशायरे में ।

मित्रों दो दिन जब तरही की अगली पोस्‍ट नहीं लगी तो पाठक चिंतित हो गये कि क्‍या हो गया अचानक । किन्‍तु चिंता की कोई बात नहीं है असल में हुआ ये है कि सामान्‍य तरही में हम दो दिन छोड़ कर ही पोस्‍ट लगाते रहे हैं । चूंकि बहुत दिनों के बाद कोई रेगुलर तरही हो रही है इसलिये पिछली आदतें याद नहीं रही । खैर । तो बात ये भी कि 19 जनवरी के कार्यक्रम की विध्वित घोषणा हो चुकी है। और कुछ लोगों के आने की सूचना भी मिल चुकी है। कुछ लोगों ने अपनी असमर्थता जताई है। अभी तक की प्राप्‍त सूचना के अनुसार वंदना अवस्‍थी जी, गौतम राजरिशी, अंकित सफर आदि पहुंच रहे हैं।

नव वर्ष तरही मुशायरा

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मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई

इस बार बहुत ही नाज़ुक ग़ज़लें मिली हैं। शायद मिसरे का असर है। बहुत सुंदर शेर निकाले गये हैं इस बार। हालांकि मुझे अभी भी ऐसा लगता है कि कई सुंदर काफिये छूट गये हैं और यदि सब कुछ ठीक रहा तो भभ्‍भड़ कवि उन छूटे हुए काफियों पर ही ग़ज़ल कहेंगे इन्‍शाअल्‍लाह । आज हम दो नौजवान शायरों की दिलकश ग़ज़लें सुनने जा रहे हैं । दोनों को एक साथ लगाने के पीछे एक कारण है। कारण ये कि दोनों ग़ज़लें मानो एक दूसरे की ध्‍वनि से ही गूंज रही हैं। मानो जहां एक छोड़ रहा है वहां से दूसरा उठा रहा है। अंकित और दिगंबर दोनों ही महत्‍तवपूर्ण शायर हैं और दोनों ही कुछ अलग करने में विश्‍वास रखते हैं। तो आइये सुनते हैं दोनों की ग़ज़लें।

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दिगंबर नासवा

कुदरती एहसास है या जिंदगी सोई हुई
बर्फ की चादर लपेटे इक नदी सोई हुई

कुछ ही पल में फूल बन कर खिलखिलाएगी यहाँ
कुनमुनाती धूप में कच्ची कली सोई हुई

रात भर आँगन में पहरा जान कर देता रहा
मोगरे के फूल पर थी चाँदनी सोई हुई

थाल पूजा का लिए तुम आ रही हो दूर से
आसमानी शाल ओढ़े जागती सोई हुई

यूं भी देखा है कभी इस प्रेम के संसार में
जागता प्रेमी मिला और प्रेयसी सोई हुई

फेस-बुक के शोर में सब इस कदर मसरुफ हैं
ब्लौग पे लगता है जैसे शायरी सोई हुई

कुछ कटे से हाथ, कुछ साँसें, सुलगती सिसकियाँ
संग-मरमर ओढ़ कर मुमताज़ थी सोई हुई

मतले से ही ग़जल़ को क्‍या खूब उठाया गया है। मौसम का पूरा चित्र सामने आ गया है। बर्फ की चादर लपेटे सो रही नदी का बिम्‍ब बहुत सुंदर बना है। और फिर गिरह का शेर भी कुछ अलग बन गया है। मिसरा ए तरह को पूरी तरह से अपने में समेटे हुए। थाल पूजा का लिये आने में इस ओढ़े हुए आसमानी शाल की तो बात ही क्‍या है, एक प्रतीक ही सब कुछ कह गया है। अब बात अंतिम शेर की, ताजमहल का पूरा का पूरा चित्र खींच दिया है उस एक शेर में । मुमताज के सोने का दृश्‍य मानो सामने ही आ गया है। बहुत ही सुंदर है ग़ज़ल। वाह वाह वाह ।

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अंकित सफ़र

नीम करवट में पड़ी है इक हँसी सोई हुई
देखती है ख़ाब शायद ये परी सोई हुई

है बहुत मासूम सी जब तक है गहरी नींद में
परबतों की गोद में ये इक नदी सोई हुई

रात की चादर हटा जब आँख खोली सुबह ने
मोगरे के फूल पर थी चाँदनी सोई हुई

कोई आहट से खंडर की नींद जब है टूटती  
यक-ब-यक है जाग उठती इक सदी सोई हुई

अपनी बाहों में लिये है आसमाँ और धूप को
इक सुनहरे ख़ाब में है ये कली सोई हुई

एक गहरी साँस में निगलेगा पूरी ही ज़मीं
प्यास शायद है समंदर की अभी सोई हुई

ख़ाब में इक ख़ाब बुनते जा रही है आदतन
नींद के इस काँच-घर में ज़िन्दगी सोई हुई

अहा क्‍या कमाल की गिरह बांधी है जीओ । क्‍या कमाल । गिरह का शेर हाथ पकड़ कर अपने साथ देर तक रोक रहा है। और उसके ठीक बाद का ही शेर और कमाल का है। आहट, खंडहर और सदी। ये तीन शब्‍द ही अपने आप में पूरी कहानी होते हैं। इन तीनों को लेकर कमाल का शेर बुना है। कमाल। और अंतिम शेर भी छायावाद के प्रभाव को लेकर रचा गया है । वैसे ये पूरी की पूरी ग़ज़ल ही छायावादी ग़ज़ल है। इसमें सारे प्रतीक छायावाद के हैं। नींद के इस कांच घर में जिन्‍दगी सोई हुई में खाब में खाब बुनने की बात खूब है। वाह वाह वाह । कमाल की ग़ज़ल ।

तो आज की दोनों ग़ज़लों का आनंद लीजिये । और दाद देते रहिये। कुछ लोगों को टिप्‍पणी करने में परेशानी आ रही है । कृपया बताएं कि आप कौन से ब्राउज़र का उपयोग कर रहे हैं क्‍योंकि मोजि़ला में ये समस्‍या नहीं आ रही है। यदि हो सके तो मोजिला का प्रयोग करें। दाद देते रहें। मिलते हैं अगले अंक में।

गुरुवार, 1 जनवरी 2015

नव वर्ष की शुभकामनाएं। आप सबके लिये नया साल शुभ हो मंगलमय हो । और आज शाहिद मिर्जा जी के बहुत ही सुंदर प्रयोग के साथ प्रारंभ करते हैं तरही मुशायरा ।

हमने कई कई आयोजन किये हैं। विशेषकर नये साल को लेकर तो कई सारे आयोजन किये हैं। और उनमें सभी ने बहुत दिल खोलकर भाग भी लिया है। इस बार भी ऐसा ही हुआ है। पहले तो ग़ज़लें आईं नहीं और जब आईं तो छप्‍पर फाड़ के आईं हैं। पूरा फोल्‍डर भर चुका है ग़जल़ों से । लेकिन जैसा कि तय था कि हम ठीक पहले ही दिन इस तरही को प्रारंभ करेंगे । तो आज इस 2015 के ठीक पहले दिन तरही को शुरू करते हैं। पिछले सप्‍ताह शाहिद मिर्जा जी का कॉल आया तथा उन्‍होंने मुझे कुछ बताया। तो मुझे लगा कि इससे बेहतर और शुरुआत हो क्‍या सकती है तरही की । उन्‍होंने मां पर एक पूरी ग़ज़ल कही और बेहतरीन ग़ज़ल कही । हैरत की बात ये है कि मैं स्‍वयं एक शेर को उस दौरान गढ़ रहा था और उस शेर में मेरा मिसरा सानी लगभग उसी ध्‍वनि पर था जैसा शाहिद भाई ने मतले के मिसरे सानी में रखा है। शाहिद भाई की पूरी ग़ज़ल पढ़कर आनंद आ गया । और सबसे बड़ी बात कि जो भावना इस ग़ज़ल के पीछे है वो कितनी पवित्र है। जब तक यह भावना है तब तक हम सब इसी प्रकार आपस में अमन और शांति के दीपक जलाते हुए रह सकते हैं ऐसा मेरा मानना है। तो आइये चलते हैं तरही की ओर।

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मोगरे के फूल पर थी चांदनी सोई हुई

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शाहिद मिर्ज़ा शाहिद
हालांकि इस मिसरे का मां लफ़्ज़ से कोई ताअल्लुक भी नहीं था...फिर भी कुछ शेर मां के लिए हो गए....देवी के रूप में कवि सम्मेलनों की रिवायत मां शारदे की वंदना से होती है....इस मुशायरे में जन्म देने वाली मां को याद करते हुए अपने चंद अशआर भेज रहा हूं...शुक्रिया

पास हो या दूर हो, या जागती, सोई हुई
मामता देखी नहीं मैंने कभी सोई हुई

हैं यशोदा की निगाहें सिर्फ़ माखनचोर पर
ख्वाब कान्हा के ही देखे देवकी सोई हुई

रात भर उसको फ़रिश्ते भी दुआ देते रहे
देखकर ममता के आंचल में परी सोई हुई

लौटकर आता नहीं जब तक मैं घर पर, मेरी मां
जागती रहती है, लगती है थकी सोई हुई

मां को जब से छोड़कर आया हूं तन्हा गांव में
है उसी दिन से मेरी तक़दीर भी सोई हुई

दूर हो कर भी ऐ ’शाहिद’ हर घड़ी नज़दीक है
कब्र से भी मां दुआएं दे रही सोई हुई

कुछ कहा जाए क्‍या ? ममता और मां के लिए कुछ कहा जाए और उस रचना पर कुछ कहा जाए तो शब्‍द कहां से आएं। रात भर उसको फ़रिश्‍ते भी दुआ देते रहे में मिसरा सानी अहा अहा अहा, बस एक पूरा का पूरा चित्र मानो आंखों के सामने आ गया हो । मिसरा सानी चांदनी की छुअन लिये है। लौटकर आता नहीं जब तक मैं घरपर में मानो दुनिया भर की मांओं की कहानी कह दी गई है । सच शत प्रतिशत सच। और यशोदा तथा देवकी का शेर कमाल है एक ही शेर में दोनों मांओं को एक साथ साकार कर दिया है। मतला के बारे में तो पहले ही कह चुका हूं कि वो तो मानो मेरी ही भावनाओं को शाहिद भाई न शब्‍द दे दिये हैं । और कमाल दिये हैं। शाहिद भाई सलाम आपको । बहुत खूबसूरत गज़ल़। और हम सब शुक्रगुज़ार हैं शाहिद भाई के कि उन्‍होंने नये साल के ठीक पहले दिन ही हम सबको मां के आगे शीश नवा कर आशिर्वाद लेने का अवसर दिया ।

इससे बेहतर शुरुआत कुछ हो नहीं सकती थी । शाहिद जी को धन्‍यवाद और आप सब भी अपने अपने तरीके से धन्‍यवाद दीजिये अपनी दाद और वाह वाह से । नये साल की सबको शुभकामनाएं।