शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

कल ग़ज़लों के चराग़ रौशन हुए थे आज गीतों की दीपमाला सजा रहे हैं आदरणीय राकेश खंडेलवाल जी, आदरणीय सौरभ पांडेय जी, गौतम राजरिशी और रविकांत पांडेय ।

दीपावली को लेकर मन में जो विशेष उमंग रहती है वो शायद हम सबके बचपन से जुड़ी होती है । हम सब जो बचपन में पर्वों को, त्‍यौहारों को जी चुके हैं । हम उसी समय को त्‍यौहारों में जी रहे होते हैं । हर पर्व पर तरही का विशेष आयोजन करने के पीछे भी कारण वही है । बचपन में कॉमिक्‍स और बच्‍चों की पत्रिकाएं पढ़ने का बहुत शौक था । हर त्‍यौहार पर पत्रिकाओं के विशेषांक आते थे । नंदन, मधु मुस्‍कान, पराग, चंदामामा, लोट पोट और बड़ों की पत्रिकाओं में सरिता, मुक्‍ता, मायापुरी आदि आदि आदि । इनमें से सबसे जोरदार आयोजन होता था नंदन और मधु मुस्‍कान का । पता नहीं आपमें से कितनों ने मधु मुस्‍कान पढ़ी है । मेरी ये ऑल टाइम फेवरेट है । उसके अंक बरसों तक संभाल कर रखे थे । एक लोहे की पेटी में बंद करके । फिर पता नहीं कब कहां वो ख़ज़ाना खो गया । मधु मुस्‍कान का दीपावली अंक तो कमाल होता था । क्‍या कोई मुझे मधु मुस्‍कान का एक अंक पढ़वा सकता है । खैर तो शायद उत्‍सवधर्मिता बचपन की उन्‍हीं पत्रिकाओं ने सिखाई है जो अभी तक मन में है ।

Gar 

deepawali

घना जो अंधकार हो, तो हो रहे, तो हो रहे

deepawali

आज तरही मुशायरे में गीतों का दिन है । आज हम चार रचनाकारों के गीत सुनने जा रहे हैं । इनमें से राकेश जी और रविकांत तो गीतों के पर्याय हैं ही किन्‍तु आज गौतम और श्री सौरभ पांडेय जी का भी एक गीत है । गौतम और सौरभ जी का ये रूप आज पहली बार सामने आ रहा है । तो आइये सुनते हैं चारों के गीत

deepawali

ravikant pandey

रविकांत पांडेय

सुखी सभी रहें सदा सतत करें प्रयास हम
कहें यही,  सुनें यही,  इदं न मम, इदं न मम

रुके नहीं कदम कभी ये कंटकों से हारकर
लिखें नई कहानियां यूं मौत को भी मारकर
विभा का बंद द्वार हो, तो हो रहे, तो हो रहे
घना जो अंधकार हो, तो हो रहे, तो हो रहे
जला स्वयं को दीप-सा, हरेंगे यूं धरा का तम
कहें यही, सुनें यही, इदं न मम, इदं न मम

लो जिंदगी की भोर करती मृत्यु से है आचमन
विजयतिलक लिए खड़ा कराल काल नत-नयन
रसाल पादपों से कूक कोकिलों की आ रही
सुगंध नित बिखेरती कली-कली ये गा रही
हृदय-हृदय में जग पड़े समष्टि भावना स्वयं
कहें यही, सुनें यही, इदं न मम, इदं न मम

सर्वे भवन्ति सुखिन की कामना से परिपूरित गीत है ये । पहले ही बंद में मिसरे को बहुत सुंदर तरीके से गिरह में बांधा है । विभा का बंद द्वार हो बहुत सुंदर कहा है । दूसरा बंद तीसरी पंक्ति तक आते आते एक मुकम्‍मल गीत बन जाता है । वैसे भी गीत तो रवि की पहचान है । ग़ज़लों में वो अपने को असहज महसूस करता है । बहुत सुंदर गीत । वाह वाह वाह ।

deepawali

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गौतम राजरिशी

नदी की तेज धार हो, तो हो रहे, तो हो रहे
किनारे जीत-हार हो, तो हो रहे, तो हो रहे

जो सामने पहाड़ हो
सफर का बंद द्वार हो
कदम मगर रुके नहीं
ये लक्ष्य की पुकार हो

खड़ी हों रास्ते में आँधियाँ भले ही, या कहीं
घना जो अंधकार हो, तो हो रहे, तो हो रहे

जो मुश्किलों का भार हो
तो हौसला कहार हो
उठे जो पाँव तेरे, फिर
तो जोश की बहार हो

मिले न छाँव कोई भी अगर कहीं, या राह में
गुबार ही गुबार हो, तो हो रहे, तो हो रहे

जो सूर्य का प्रहार हो
प्रचंड तीव्र वार हो,
हजार हों रुकावटें
मगर न मन की हार हो

अगर सुलग रहा हो कंठ, चाहे रोम-रोम से
पसीना आर-पार हो, तो हो रहे, तो हो रहे 

एक फौजी जब गीत लिखेगा तो वो इसी प्रकार का होगा । पूरा का पूरा ऊर्जा से भरा हुआ । जिसकी एक एक पंक्ति समय को चुनौती दे रही हो । जो मुश्किलों का भार हो तो हौसला कहार हो बहुत सुंदर ।  जो सूर्य का प्रहार हो में चौथी पंक्ति जो मन की हार पर आती है वह पूरे बंद को तडि़त से भर रही है । सही कहा है किसीने कि काव्‍य की एक विधा में महारत होने पर दूसरी विधाएं स्‍वयं सध जाती हैं । बहुत सुंदर गीत । वाह वाह वाह ।

deepawali

Saurabh

श्री सौरभ पाण्डेय जी

शिथिल मनस पे वार हो, तो हो रहे तो हो रहे,
प्रहार बार-बार हो, तो हो रहे तो हो रहे !

अजस्र श्रोत-विन्दु था मनस कभी बहार का
यही हृदय उदाहरण व पुंज था दुलार का
प्रवाह किंतु रुद्ध अब, विदीर्ण-त्रस्त स्वर लगें
सनातनी विचार के न तथ्य ही प्रखर लगें

मग़र किसी को दोष क्यों, हमीं युगों से सो रहे
असह्य फिर प्रहार हो.. . तो हो रहे तो हो रहे..

कभी यही समाज था प्रबल, कि लोग शांत थे
विचारवान थे सभी, सुसभ्य गाँव-प्रांत थे
मग़र चली वो आँधियाँ सचेत तक बहक गये
रवां जहाँ सुतंत्र था, विचार तक दहक गये

समाज क्रुद्ध, राज भ्रष्ट, लोग पस्त हो रहे
घना जो अंधकार हो.. . तो हो रहे तो हो रहे..

सुरम्य घाटियों से देख जा रही प्रभा किधर
जघन्य पाप के विरुद्ध क्या करे दुआ असर
विकल पड़ा है व्यक्ति यों, कि त्राण है, न राह है
विचारशील के लिये न वृत्ति का प्रवाह है

झिंझोर दें हुँकार कर तमस प्रभाव ढो रहे
हुँकार जोरदार हो.. . तो हो रहे तो हो रहे..
    

हृदय सन्देह लबलबा तभी लचर लिहाज़ हैं
न दीखते उपाय ही, अहं सने रिवाज़ हैं
विदग्ध राष्ट्र-भावना तभी प्रसूत भाव से
अमर्त्य वीर थे सदा प्रसिद्ध हम स्वभाव से

विद्रोह-ज्वाल से भरे विचार रौद्र हो रहे
प्रघात बेशुमार हो.. . तो हो रहे तो हो रहे..

पहला ही बंद याद दिला रहा है दादा मैथिली शरण गुप्‍त जी की अमर कविता 'हम कौन थे क्‍या हो गये' की । यह केवल कहने की बात नहीं है सच में मुझे लगा कि उसी स्‍तर पर जाकर रचना की गई है । बाद में पूरी रचना मानो सचमुच झकझोरती हुई गुज़रती है । किस पंक्ति को उठा कर उसकी प्रशंसा में कुछ लिखूं, पूरा गीत ही प्रभावशाली है । ग़ज़ल के बाद अब गीत के मैदान को भी मार लिया । वाह वाह वाह ।

deepawali

rakesh khandelwal ji

श्री राकेश खंडेलवाल जी

अमावसी रहे निशा जलेंगे दीप द्वार पर
किरण किरण की ज्योत्सना कहेगी ये पुकार कर
बने भलें ही व्यूह नित, है पार्थ पुत्र ध्येय रत
तो निश्चयों के सामने हुआ है काल चक्र नत
अडिग, अथक अलभ्य की सकाम कामना लिये
किये हैं प्रज्ज्वलित यहां भविष्‍यतों के नव दिये
तो आज का सिंगार हो तो हो रहे तो हो रहे
विलुप्त अन्धकार हो तो हो रहे तो हो रहे

सुभेद्य तीर सी किरण उठी है ज्योति चूम कर
चपल लपट सी थरथरा खड़ी हुई है झूम कर
प्रचंड मुण्ड माल से सजाये अपने वक्ष को
नयन के सामने किये है केन्द्र अपने लक्ष्य को
ये रक्तबीज के लिये है श्वास सिर्फ़ आखिरी
वो खेलती हैं खप्परों से चेतनायें वाखिरी

महिष का अब संहार हो तो हो रहे तो हो रहे
कहो तो अन्धकार हो तो हो रहे तो हो रहे

हजार स्वप्न साथ ले भरी है एक आंजुरी
उतर के आयेगी ही व्योम से नई विभावरी
तो प्रीर-संचयित निधी बहेगी धुल के धार में
निखार आयेगा गमक महक रही बयार में
हो दैत्यवंश भस्म दृष्टि छू ललाट नेत्र की
असुर समूल नष्ट हों, बढ़े तपाभ क्षेत्र की
यों वक्त का प्रहार हो तो हो रहे तो हो रहे
तो शेष अंधकार हो ? तो हो रहे तो हो रहे

क्‍या कहूं, कोई बताये मुझे । महाकाली की तस्‍वीर मुझे बचपन से ही आकर्षित करती रही है । राकेश जी ने दूसरा बंद महाकाली के प्रचंड रूप पर लिखा है । इस बदं में क्‍या प्रचंड गिरह बंधी है मिसरे की । इस गीत को पोस्‍ट पर लगाने से पहले मैंने दो बार खूब गाया । आप भी ज़रा इसे ओज के स्‍वर में गाएं । खास कर दूसरे बंद को । एक बात और, राकेश जी के इस मिसरे पर और भी गीत हैं, जिनके साथ हम बासी दीपावली मनाएंगें । मतलब ये कि आगे भी राकेश जी के गीत आने वाले हैं । मगर अभी तो 'प्रचंड मुण्‍ड माल से सजाये अपने वक्ष को' अहा अहा अहा अहा ।

deepawali

तो ये हैं आज के चार गीत । बहुत सुंदर गीत । इनको इतनी ही सुंदरता के साथ सुनिये और पूरे मन से दाद दीजिये । ये बहुत यत्‍न से लिखे गये हैं । याद रखिये कवि अपनी कविता और गृहिणी भोजन किसी पारिश्रमिक के लिये नहीं रचते हैं, ये केवल भाव के भूखे होते हैं । आपकी प्रशंसा ही इनका पारीश्रमिक होता है । किसी गृहिणी के बनाये भोजन की प्रशंसा करिये, उसकी सारी थकान मिट जायेगी । तो देते रहिये दाद और करते रहिये प्रशंसा, कल मिलते हैं कुछ और रचनाओं के साथ ।

deepawali

53 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन गीतों के लिये राकेश जी , सौरभ जी, गौतम जी व राकेश जी को बहुत बहुत बधाइयां।

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  2. मंत्रमुग्ध हूँ... आज आफिस में पहुँच दिवाली कार्यक्रमों में शामिल तो हुआ हूँ.. परन्तु आज इन चार गीतों से गुजरकर कुछ और सोचना मुश्किल है...
    ये दिव्य रूप है श्रेष्ठ कवि गणों के....
    रविकांत भाई, गौतम भाई... क्या सुन्दर प्रस्तुति हुई है.

    आगे दोनों, उस्ताद जनों ने इस धुन को यादगार बनाने में जो भूमिका निभाई है. आनंद ही आनंद !!

    -
    गुरूजी, पत्रिका वाली बात पर गुदगुदा रहा हूँ... मेरे घर में भी खजाना पड़ा है.

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  3. चकित हूँ...असमंजस में हूँ...भाव विभोर हूँ... क्या कहूँ इन रचनाओं पर....आहा आहा आहा....माँ सरस्वती के इन लाडले सपूतों को ह्रदय से नमन करता हूँ...ये ऐसी रचनाएँ हैं जो प्रशंशा के प्रत्येक शब्द से बहुत ऊंची हैं....

    "इदं न मम " का कितना सुन्दर प्रयोग किया है रवि ने वाह...गौतम ने अपनी कविता से जतला दिया है के साहित्य की कोई विधा हो वो उसमें पारंगत है...सौरभ भाई ने "हम क्या थे और क्या हो गए हैं" की स्तिथि को जिस तरह से अपनी रचना में गूंथा है वो अद्वितीय है,,,भाई राकेश जी रचना पर मैं कभी कुछ नहीं कह पाउँगा,,,ऐसे रचनाकार सदियों में अवतरित होते हैं...नमन नमन नमन...

    नीरज

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  4. गुरुदेव, 'मधु मुस्कान' का नाम तो नहीं सुना लेकिन नंदन, चम्पक, चंदामामा और ढेर सारी कॉमिक्स पढ़ी हैं. खैर कॉमिक्स तो आज भी पढता हूँ उसका मज़ा अलग ही है.
    कल ग़ज़लें मन मोह रही थी और आज गीत हाज़िर हैं.

    रवि भाई, गीतों में कमाल करते हैं. अपनी आजकल की तमाम व्यस्तताओं के बीच (क्योंकि आजकल वो ज्यादा कुछ न सुनाते हैं न पढवाते हैं) भी इस बेहतरीन गीत के साथ उपस्थित है.

    "कहें यही, सुनें यही, इदं न मम, इदं न मम", क्या खूबसूरत पंक्ति है. इसमें प्रवाह गज़ब का है, और "इदं न मम, इदं न मम" का तो जवाब नहीं.
    रुके नहीं कदम कभी ये कंटकों से हारकर
    लिखें नई कहानियां यूं मौत को भी मारकर
    विभा का बंद द्वार हो, तो हो रहे, तो हो रहे
    वाह वाह वाह

    ढेरों बधाइयाँ रवि भाई जी.

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    1. मधु मुस्‍कान नहीं पढी़ तो क्‍या पढ़ा बच्‍चे । उफ वो मोटू पतलू, डॉ झटका, वो जासूस बबलू, छोटू लम्‍बू और मधु मुस्‍कान की वो कामिक्‍स जिसमें एस्ट्रिक्‍स और कडाहे का रहस्‍य, एस्ट्रिक्‍स और बड़ी लडा़ई साथ में तार के कामिक्‍स और जाने क्‍या क्‍या । मधु मुस्‍कान खरीदने और उसे पढ़ने का रोमांच शब्‍दों में व्‍यक्‍त नहीं हो सकता ।

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    2. गुरुदेव ये गलत बात है, आपको सिर्फ ये कह के छोड़ देना चाहिए था की "मधु मुस्कान नहीं पढ़ी तो क्या पढ़ा बच्चे".
      वो "एस्ट्रिक्स और कढाहे का रहस्य" आदि का ज़िक्र तो कतई नहीं करना चाहिए था, अब तो आपको "कढाहे का रहस्य" भी बताना और पढवाना पड़ेगा.

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    3. एस्ट्रिक्‍स के पांच कामिक्‍स आये थे कुछ 1 एस्ट्रिक्‍स और कढ़ाहे का रहसय 2 एस्ट्रिक्‍स और बड़ी लड़ाई 3 एस्ट्रिक्‍स और क्‍लयोपेट्रा 4 एस्ट्रिक्‍स और ज्‍योतिषी 5 एस्ट्रिक्‍स और रोमन घुसपैठिया । इनमें से सबसे मजेदार थी कढ़ाहे का रहस्‍य । उफ क्‍या शब्‍दावली उपयोग की गई थी उसमें । गोसिनी और उडरज़ो की बनाई हुई कॉमिक्‍स थीं ये । एस्ट्रिक्‍स ओबेलिक्‍स और मोटूमलिक्‍स इस तरह के पात्र थे उसमें । मैं कॉमिक्‍स पढ़ने वाली दुनिया को दो भागों में बांटता हूं, एक वो जिन्‍होंने एस्ट्रिक्‍स और कढ़ाहे का रहस्‍य पढ़ा है दूसर वो जिन्‍होंने नहीं पढ़ा है ।

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    4. गुरूदेव, आपने भी क्या याद दिला दिया...लेकिन मधुमुस्कान का ज़िक्र करते हुये आप उसके दो सबसे मजेदार और गुदगुदाने वाले चरित्र तो भूल ही गए ...डैडी जी और पान सिंह-सुपारी लाल की जोड़ी |....एक और जानकारी देना चाहूँगा गुरूदेव, एस्ट्रिक्स के कुल 16 कोमिक्स आए थे हिन्दी में और सोलह के सोलह मेरे पास हैं...अंगेरेजी में अट्ठाईस हैं |पात्रों के अलावा उन कबीले के गाँव के नाम...मारत-पीटम...चीख-पुकारम आदि थे| :-)

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    5. अरे हां भूला पान सिंह और सुपारी लाल तो मस्‍त मस्‍त थे विशेष कर सुपारी लाल की मूंछें । एक बार पान सिंह ने आखिरी गेंद पर पैर से छक्‍का मारा था । पान सिंह तो कभी नहीं भूला जा सकता । सुस्‍तराम चुस्‍त राम, भूतनाथ और जादुई तूलिका आद‍ि बहुत तो हैं नाम मधु मुस्‍कान के पात्रों के । एस्ट्रिक्‍स के सारे कॉमिक्‍स की फोटोकापी मुझे चाहिये ही चाहिये दिस इज एन ऑर्डर ।

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    6. फोटोकोपी देना तो कुफ़्र के समान होगा, गुरूदेव मेरे जैसे कोमिक्स-फेनेटिक के लिए...जल्द-से-जल्द व्यवस्था की जाएगी आपके लिए पूरा सेट उपलब्ध करवाने की |

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    7. उफ़ क्या क्या याद दिला दिया आप लोगों ने। अब तो नेट से मधु मुस्कान डाउनलोड करके पढ़नी ही पड़ेगी।

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    8. नहीं है कहीं भी नेट पर । यदि आपको मिले तो लिंक ज़रूर भेजियेगा ।

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    9. गौतम यदि ऐसा करोगे तो आनंद ही आ जायेगा। अहा अहा

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  5. गौतम भैय्या ने तो एक दिन में गीत लिखके रवाना कर दिया था, ये बताता है कि ये नए गीत लिखने वाले तो है नहीं. ग़ज़ल में महारत, कहानियों में बढता वर्चस्व और नज़्मों का अलहदा अंदाज़ तिस पे गीत लेखन में भी आगमन.................उफ्फ्फ. क़यामत का इरादा रखने वाली बड़े भाई के लिखे इस गीत को उन्ही से आमने-सामने बैठ के सुनना एक अलग ही अनुभूति थी.

    आज जब इसे पढ़ रहा हूँ तो पढ़ते-पढ़ते पीछे से उन्ही की आवाज़ और लहजा गूँज रहा है.
    जो मुश्किलों का भार हो
    तो हौसला कहार हो
    उठे जो पाँव तेरे, फिर
    तो जोश की बहार हो

    जो सूर्य का प्रहार हो
    प्रचंड तीव्र वार हो,
    हजार हों रुकावटें
    मगर न मन की हार हो

    वाह वाह वाह

    जोश से लबरेज़ ये गीत खूब पसंद आया.

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  6. रवि, इस उम्र में 'इदं न मम्' का सूत्र जिसने पा लिया उसका जीवन तो कंटकविहीन हो गया।
    चारों गीत पढ़ रहा हूँ और नेपथ्‍य में 'हिमाद्रि तुंग श्राग से' ध्‍वनित हो रहा है।
    अभी टिप्‍पणी नहीं दूँगा, बस पढ़ रहा हूँ और लालायित हूँ कि गीत पर प्रयास क्‍यों नहीं करता, हिन्‍दी काव्‍य का एक युग मेरे समक्ष पुर्नजीवित हो गया है आज।
    हर रचना अपने तरह से अपनी बात रख रही है और एक सुयोग कि चारों गीतकारों का शब्‍द चयन इतना सटीक है कि कहीं लगता ही नहीं कि यहॉं कुछ और हो सकता था।
    एक साथ इतने खूबसूरत गीत बहुत कम पढ़ने को मिलते हैं।

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  7. 'तो हो रहे तो हो रहे' में जो आखिरी युद्ध की वीरोचित भावना है वह इन गीतों में स्‍पष्‍ट ध्‍वनित हो रही है।

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  8. सभी रचनाएं बहुत अच्छी
    राकेश जी का गीत तो मै खुद.. गा कर पढ़ रही हूँ .

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  9. रवि तुमने अगली किसी एक तरही के लिये बड़ा सुंदर मिसरा दे दिया " इदं न मम्, इदं न मम्" खैर गीत की विधा में तुम्हारी और आदरणीय राकेश जी की प्रशंसा करने के लिये वाक्य बनाने का दुस्साहस कौन कर सकता है भला ?

    आदरणीय राकेश जी, शब्द जिनके इशारे पर बँधते हैं, उनका तो कहना ही क्या ? बस चित्रलखित सा निरखिये, सँजोइये और बार बार गुनिये। भाव विभोर सी, गुन रही हूँ बार बार मन में।

    गौतम भईया का ये असली रूप है, जिसमें वो अपना बेस्ट दे पाते हैं। वो एक कविता थी ना
    वीर तुम बढ़े चलो।
    धीर तुम बढ़े चलो।
    सामने पहाड़ हो,
    सिंह की दहाड़ हो।

    उसी की याद आ गई।

    सौरभ भाई साहब का ये रूप पहली बार देखा और पाया कि यह रूप भी उतना ही अनोखा है, जितना ग़ज़ल वाला ।

    सभी को बधाई. दीपावली उतनी ही सुंदर हो जितनी ये रचनाएं....!!

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  10. गुरूजी आपने इन पत्रिकाओं की याद दिलवा कर बचपन की यादें ताज़ा कर दीं. मधु मुस्कान मेरी भी प्रिय पत्रिका थी. भारत से कोई भी हमारे यहाँ आ रहा हो और पूछे क्या लेकर आऊँ तो मैं इन्हीं पत्रिकाओं की लिस्ट उन्हें दे देता हूँ. हालांकि अब कुछ पत्रिकाएं पहले जैसी नहीं रहीं.

    बात गीतों की की जाए तो कहूँगा की ये चारों ही गीत बहुत ऊंचे स्तर के हैं. सहेज कर रखने वाले. प्रशंसा के लिए शब्द ढूँढ नहीं पा रहा. कमाल कर दिया है. चारों गीतकारों को शत शत नमन.

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  11. सौरभ जी ने बहुत असरदार गीत रचा है. गीत का प्रवाह अपने साथ बहा ले जा रहा है.

    कभी यही समाज था प्रबल, कि लोग शांत थे
    विचारवान थे सभी, सुसभ्य गाँव-प्रांत थे
    मग़र चली वो आँधियाँ सचेत तक बहक गये
    रवां जहाँ सुतंत्र था, विचार तक दहक गये
    समाज क्रुद्ध, राज भ्रष्ट, लोग पस्त हो रहे
    घना जो अंधकार हो.. . तो हो रहे तो हो रहे..

    वाह वाह वाह
    लाजवाब ............ एक एक पंक्ति हिला कर रख दे रही है, और उसे गुनगुना कर पढना अलग ही आनंद दे रहा है.

    सौरभ जी इस अद्भुत गीत के लिए ढेरों बधाइयाँ स्वीकार करें.

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  12. आदरणीय राकेश जी तो गीत-सम्राट हैं, कुछ भी कहना कम होगा.

    गीत की शुरुआत ही बाँध लेती है.
    "अमावसी रहे निशा जलेंगे दीप द्वार पर ....................."
    क्या कहने....... अद्भुत

    "सुभेद्य तीर सी किरण उठी है ज्योति चूम कर .............."
    और दूसरे बंद में जो शब्दों और भाव के जादू से जो रचा गया है उसे गुनगुना कर उसमे डूब की अनुभूति बयान नहीं की जा सकती है.

    अविस्मर्णीय गीत है. नमन स्वीकार करें.

    ये सुन कर और ख़ुशी हुई की अभी राकेश जी के और गीत भी आयेंगे यहाँ पर. उनका भी बेसब्री से इंतज़ार है.

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  13. दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ..

    पत्रिकाओं पर कितनी सार्थक बात हुई है. कितना सही कहा है आपने. वस्तुतः पत्रिकाएँ रचना-कर्म और वाचन के प्रति ललक तो पैदा करती ही हैं, एक विशेष संस्कार गढ़ने का कार्य भी करती हैं. उनका होना और न होना कितने बड़े अंतर का कारण है, यह अब स्पष्ट है. आश्चर्य कि यहाँ उद्धृत सभी पत्रिकायें हमने पढ़ी हैं. लगातार पढ़ी हैं. चंदामामा की कहानियों के कथानक से हम तब डरते थे फिर भी पढ़ते थे. कुछ एक पत्रिका रह गयी उद्धृत होने से, जैसे बाल भारती, बालक आदि. किन्तु यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि कई पत्रिकाएँ आज बन्द हो गयी हैं, यह वास्तविकता. आज कुछ नयी बाल पत्रिकाएँ भी दीखती हैं. जैसे मध्यप्रदेश की बालहंस आदि.
    लेकिन जिस पत्रिका ने अधिक अत्यंत प्रभावित किया था वह मेरे लिये धर्मयुग थी, साप्ताहिक हिन्दुस्तान थी. इन दोनों का बन्द होना कुछ देह से कुछ कढ़ जाने की तरह हुआ है.

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  14. भाई रविकांत जी समर्थवान शब्दों के धनी तो हैं ही, उत्कृष्ट विचारों से भी समृद्ध हैं.
    इदं न मम्, इदं न मम्.. का ही प्रारूप नमस्ते हुआ करता है, न मः ते, मैं नहीं वे.. यह हमारी संस्कृति है.

    लो ज़िन्दग़ी की भोर करती मृत्यु से है आचमन
    विजयतिलक लिये खड़ा कराल काल नत नयन

    वाह .. एक व्यक्ति का प्रबुद्ध मनस एवं वर्तमान की समस्त सीमाओं को लांघने जाने का अदम्य साहस जिस मुखरता से अभिव्यक्त हुआ है वह मुग्धकारी है.

    रसाल पादपों से कूक कोकिलों की आ रही
    सुगंध नित बिखेरती कली-कली ये गा रही

    क्या ही दृश्य उभर रहा है ! वाह ! बसंत उभर आया है.

    हृदय-हृदय में जग पड़े समष्टि भावना स्वयं
    व्यक्तिवाची सकारात्मक साहस और समर्पण समष्टि के लिये किस सहजता से उपलब्ध होता है इसे मुखरित करती बहुत ही सधी हुई पंक्तियाँ बन पड़ी हैं.

    रवि भाई को प्रस्तुत गीत के लिये हार्दिक बधाई व शुभकामनाएँ.

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  15. जिसकी प्रशंसा स्वयं प्रबुद्ध पाठक और सतत रचनाकर्मी करते हों उसके बारे में क्या कह कुछ कह सकता हूँ. इस निराले मंच के माध्यम से गौतम भाई को एक प्रारम्भ से पढ़ता रहा हूँ. किंतु अभी तक आपकी ग़ज़लें ही उपलब्ध हुई हैं.
    इस ओजस्वी तथा ऊर्जस्वी गीत के लिये हृदय से बधाई कह रहा हूँ.
    वीर तुम बढ़े चलो, धीर तुम बढ़े चलो.. की आवृति आपके गीत के वाचन के क्रम में सिंक्रोनाइज़ न हो जाये यह हो ही नहीं सकता.

    जो सूर्य का प्रहार हो
    प्रचंड तीव्र वार हो
    हज़ार हों रुकावटें
    मगर न मन की हार हो
    अगर सुलग रहा हो कंठ, चाहे रोम-रोम से .. .

    बहुत-बहुत बधाई व शुभकामनाएँ, गौतम राजरिशी भाई.

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    1. सौरभ जी, इस स्नेह पर शब्दातीत हूँ...अपना आशीर्वाद बनाए रखें !

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    2. हार्दिक आभार, गौतम भाईजी.. .

      हटाएं
  16. आदरणीय राकेश खंडेलवालजी के प्रति इस भाव-गीत के परिप्रेक्ष्य में मैं शत्-शत् नमन करता हूँ.
    आपकी भाव-दशा आज की विसंगतियों से आहत हो सार्थक समाधान पौराणिक पात्रों के कलापों में देखती है.
    यह विचार-दशा आज कितना समीचीन है इसका पता प्रस्तुत गीत को पढ़ कर स्वतः ही हो जाता है. आपका गीत पौराणिक प्रतीकों को आज के संदर्भ में अत्यंत सफलता पूर्वक रख रहा है.
    आपकी उत्कृष्ट सोच और अद्भुत लेखिनी को मेरा पुनः नमन.
    सादर

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  17. प्रभु आपकी आज की पोस्ट साहित्य का एक ऐसा पन्ना है जिसके स्तर की पुनरावृति निकट भविष्य में असंभव है...ये संग्रहणीय पोस्ट है...

    नीरज

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    1. सही कहा नीरज जी आपने । ये चारों गीत मिलकर जो प्रभाव उत्‍पन्‍न कर रहे हैं वह अनोखा है । राकेश जी और रवि तो गीतों के राजा और राजकुमार हैं ही किन्‍तु जिस प्रकार से सौरभ जी और गौतम ने गीत रचे हैं उसने मानो सोने पर सुहागा लगा दिया है । सचमुच इसकी पुनरावृत्ति नहीं हो सकती ।

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    2. इन चारों को एक साथ इसीलिये लगाया है कि ये चारों मिल कर चार चांद लगा दें ।

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    3. आपका सादर आभार, आदरणीय पंकजभाईसाहब..

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  18. आपका इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (10-11-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  19. गुरुवर,

    आज के गीतों को दिसंबर में होने वाले कार्यक्रम में क्यों न संगीतबद्ध सुना जाए? आज के दौर की श्रेष्ठ कृतियों इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं कहना बस सुनना और गुनगुनाना है।

    मुकेश कुमार तिवारी

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  20. हे गुणी अनुज
    आप के गुणों की पहचान का द्योतक एक आपका यह सुंदर सुचारू ब्लॉग भी है I
    आप द्वारा आयोजित समारोह सफल हो रहा है I ये भी आपके श्रम के संग
    एक एक शब्द चयन , भाव तथा आदर व् स्नेह से पूरित प्रस्तुति से उजागर हो रहा है अत: सबसे प्रथम आपको बधाई !
    आज असंख्य दीप वर्तिकाओं सम प्रज्वलित भाई श्री राकेश जी , वीर गौतम, श्री सौरभ जी एवं श्री रविकांत जी की
    उत्कृष्ट गेय , मनोरम शब्दावली से सजी, उत्साह- उमंग सभर- ओज से निखरी ये चारों कविताएँ पढ़ कर मन अत्यंत हर्षित है !
    आप चारों को और यहाँ पधारे हरेक साहित्य जगत के साथी को मेरी दीपावली के शुभ अवसर पर मंगल कामनाएं I
    प्रार्थना यही है के
    इसी तरह माँ सरस्वती की कृपा आप पर बनी रहे
    और आप की रचनाधर्मिता गंगा की पावन धारा की भाँति सदैव निसृत हो ..
    ये मनोकामना भी प्रेषित हैं I
    स स्नेह सादर
    - लावण्या

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  21. अहह, वाह, वाह, वाह। क्या गीत रचे हैं चारों ही गीतकारों ने। आनंद लेने दीजिए, आनंद लेने दीजिए....।

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  22. अपना गीत लिखने के बाद यूं ही इतराता फिर रहा था...ऐसे दिग्गजों के लिखे गीत के सामने कितना फ़ीका लगने लगा है वही|

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  23. राकेश जी के लिखे की तारीफ़ में क्या कहा जाये...वो तो खुद भी अब ऊब गए होंगे अपने लिखे की तारीफ़ सुन-सुन कर| वैसे मैं कयास लगा रहा था कि राकेश जी किस प्रकार का थीम चुनेंगे, जब मैंने खुद इस बार गीत लिखने का निर्णय लिया था| मुझे लगा था कि सिर्फ राकेश जी ही गीत लिखेगे इस बार तो॥| मेरा कयास तो कहीं से भी उनके लिखे के करीब नहीं पहुँच पाया|

    उनकी असीम विराट विस्तृत वोकेबलरी और उनका छंद पे कसा हुआ वाक्य-विन्यास, दोनों में द्वंद्व होता है कि कौन ज्यादा हैरान करेगा पाठकों को...और हम जैसा पाठक हैरानी के चरम पर भूल जाता है ठीक ढंग से वाह-वाही निकालना भी!

    उनके गीत के साथ मेरे तुच्छ से प्रयास को जगह देकर आपने जो मुझे अतिरिक्त स्नेह दिया है गुरूदेव, उसके लिए आभार !

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  24. सौरभ जी के गीत का हर अंतरा जो एक अलग-अलग तस्वीर बना रहा है, वो अद्भुत है| ॥और आखिरी बन का "अमर्त्य वीर थे सदा प्रसिद्ध हम स्वभाव से को पढ़ कर अनायास सीना चौड़ा हो गया|

    बहुत ही खूबसूरत गीत !

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    1. हृदय से धन्यवाद कह रहा हूँ, गौतम भाई.

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  25. और इस बार की तरही का हासीले-मुशायरा मिसरा होगा "कहें यहीं सुने यहीं इदं न मम इदं न मम"... :-)

    हमेशा की तरह बेजोड़ लिखा है रवि !

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    1. अभी तक मैं आफिस में था सो तुम्‍हारे कमेंट स्‍पैम से निकाल रहा था अब ऑफिस से उठने का समय हो गया है सो अब बाकी के कल निकाले जाएंगे ।

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  26. .
    .
    .
    सभी गीत बार बार पढ़ने-गाने लायक... बेहतरीन...



    ...

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  27. अरे भाई दीवाली का क्या उपहार दिया है , धर्मेन्द्र कुमार सिंह, अभिनव शुक्ल और सौरभ शेखर की रचनाएँ ही बार -बार पढ़ रही थी । अब गीतों की ऐसी फुलझड़ियाँ छूटी हैं जिनमें भावों के कई रंग निकले हैं । मेरे जैसा विद्यार्थी तो सराबोर हो गया । एक -एक गीत हीरे पन्ने सा जड़ित है । रविकांत की '' लो जिंदगी की भोर .....गौतम के गीत की ऊर्जा , सौरभ जी के गीत ने बचपन में पढ़े कई गीत याद दिला दिए और राकेश जी के गीत का ओज सभी से विभोर हूँ । सब को हार्दिक बधाई .....बहुत -बहुत शुभकामनाएँ ।

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  28. क्या कहने ! एक साथ चार-चार उत्कृष्ट रचनाएं।गीत लिखना किसी भी और विधा के मुकाबले जियादा दुरूह है और यही कारण है कि आज गिने-चुने लोग ही गीत लिख रहे हैं।



    रविकान्त भाई ने तो अपने गीत से मन मोह लिया।छायावाद युगीन शब्दावली का तरही के मिसरे के साथ संयोजन अत्यंत सुन्दरता से किया गया है।बधाई।



    गौतम भैया की प्रतिभा के कितने आयाम हैं, ये धीरे धीरे पता चल रहा है। ग़ज़लों,कहानियों के बाद अब गीत भी।और क्या सुन्दर गीत!तरही के मिसरे में जो 'ओज' है वह उनके इस गीत के शब्द-शब्द से ध्वनित हो रहा है।आनंद आ गया भैया।



    आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी की प्रत्येक रचना उनके व्यक्तित्व की सहज सदाशयता से स्पंदित होती है।उनके गीत पहले भी पढ़े हैं,और आज भी क्या कमाल की रचना है।समाज और समय की कुप्रवृतियों से आहत एक निश्चल आवेश !ऐसी रचनाएं तरही का स्तर ऊपर उठा देती हैं।बधाई स्वीकार करें।



    और श्रद्धेय राकेश जी के बारे में क्या कहूँ।उन्हें ठीक ही गीत सम्राट कहा गया है।यहाँ की तरही में जिन लोगों की रचनाओं की व्यग्रता से प्रतीक्षा रहती है,वे उनमे से हैं।इस दीपोत्सव पर लिखा गया उनका यह गीत हमेशा याद रखा जायेगा।

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    1. भाई सौरभ शेखरजी, आपकी उदार टिप्पणी के हम आभारी हैं. हार्दिक शुभकामनाएँ..

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  29. अहा क्या बात है ! चार चार गीत .....!!!! सच में चार चाँद लग गया है आज तो !
    रवि भाई को बहुत बधाई इदं नमम पर ! सच कहूं तो कुछ कह नहीं पा रहा ! क्या कहूँ समझ नहीं पा रहा !
    गौतम भाई के आजकल बहुत सारे चेहरे नज़र आ रहे हैं और क्या खूब आ रहे हैं जीस तरह से ये ग़ज़लों और कहानियों के लिए छाये हुए है फेस बुक पर उसके क्या कहने ! खैर ये गीत तो है ही कमाल का ! बहुत बधाई इस नए चहरे के लिए !
    सौरभ जी को पहले बार पढ़ रहा हूँ गीत के ज़रिये ! बेहद खुबसूरत गीत है ये ! हर बंद में नयापन जो आपको बेरोचक नहीं होने दे ! वाह वाह कमाल का गीत है !
    गीत सम्राट राकेश जी के लिए कुछ भी कहने में सामर्थ्य नहीं हूँ ! बस सादर !

    आप सभी को बहुत बहुत बधाई !

    अर्श

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  30. चारो गीत ने ऐसा समां बाँध दिया जैसे किसी जादूगर ने मन्त्रों से वशीभूत कर लिया है

    ऐसा प्रवाह, शब्द संयोजन और प्रस्तुति किसी जादुई मन्त्र से कम नहीं हैं

    जो मन्त्र मुग्ध हो उसके पास कहने को कुछ बचता ही नहीं है

    गीतकारों को शत शत नमन व बारम्बार प्रणाम करता हूँ

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  31. प्रचंड तेज ले रवी है मंच पर चमक रहा
    प्रभाव गौतमी नई ही आभ में दमक रहा
    विखेरते सुरभि यहाँ आ जो स्वयं है सौरभी
    तिलक लगाये भाल पर हुये हैं आज नीरजी
    सुधाओं से कलश भरे भरोल मन में लावनी
    हाँ पारुली श्रूंगार आज हो रहा है कंचनी
    प्रवीण शब्द अंकिता विराट काल भाल पर
    बता रहीं हैं रश्मियाँ ये स्वस्ति रच दिवाल पर
    वो गीत हो गज़ल कि छन्द, मंच पर सदा रहे
    सुबीर पर निसार हो ! तो हो रहे तो हो रहे

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  32. सभई गीत एक-से-एक बढ़ कर,कुछ कहते नहीं बन रहा !

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  33. आनन्द आ गया धुरंधरों को पढ़ कर...

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  34. आप समस्त सुधीजनों ने मेरे कहे का मान किया, मेरे लिखे को सम्मान दिया, प्रयास सफल हुआ. मुग्ध हूँ. अभिभूत हूँ.
    इस मंच विशेष के प्रति सादर आभार.. .

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  35. सुन्दर कृतियाँ |
    कोटि-उच्च |
    बधाइयाँ आदरणीय बंधुओं -
    शुभकामनायें दीप पर्व की ||

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