शनिवार, 21 जुलाई 2012

गो मुलाकातें अपनी बढ़ी हैं प्रिये, ये नयन आज भी अजनबी हैं प्रिये आइये आज सुनते हैं एक साथ दो शायरों अंकित सफ़र और राजीव भरोल से उनकी ग़ज़लें ।

जैसा कि मैंने पहले कहा था कि इस बार प्रारंभ में तो ग़ज़लें कम ही मिलीं थीं लेकिन उसके बाद एक एक करके काफी ग़ज़लें आती गईं । शुरू में सोचा था कि एक दिन में एक शायर का नियम चला कर काम हो जायेगा, किन्‍तु, अब ऐसा लग रहा है कि एक दिन में दो को ही लेना होगा । अभी भी काफी ग़ज़लें शेष हैं । सो आज से एक दिन में दो ग़जलों को लिया जा रहा है । इस बीच सारे देश्‍ा की तरह हमारे इलाके में भी मानसून की अत्‍यंत कम वर्षा से चिंता की लहर फैली हुई है । मगर जैसा कि अब आने वाला समय है उसमें दो पवित्र महीने एक साथ हैं । पवित्र श्रावण और पवित्र रमज़ान । दोनों महीनों में दोनों तरफ से जब प्रार्थना और दुआ में करोड़ों हाथ उठेंगे तो वर्षा के बादल घिर घिर आएंगे ।

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प्रीत की अल्‍पनाएं सजी हैं प्रिये

आज मुशायरे को आगे बढ़ाते हैं दो दो शायरों के साथ । दोनों ही शायर अत्‍यंत प्रतिभावान हैं और बहुत सुंदर तरीके से बात कहते हैं । नये प्रतीक और बिम्‍बों की तलाश में रहते हैं । आज अंकित सफर और राजीव भरोल की ग़ज़लें हम सुनने जा रहे हैं ।

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अंकित सफ़र

अंकित की ग़ज़लें गूढ़ प्रतीकों की तलाश में रहती हैं । कभी कभी कुछ चौंकाने वाले बिम्‍ब अंकित की ग़ज़लों में आते हैं ।

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गो मुलाकातें अपनी बढ़ी हैं प्रिये.
फिर भी कुछ आदतें अजनबी हैं प्रिये.

उजला-उजला सा है तेरा चेहरा दिखा,
ख़्वाब की सब गिरह जब लगी हैं प्रिये.

ज़िक्र जब भी तेरा इस ज़ुबां से लगा,
शहद सी बोलियाँ लब चढ़ी हैं प्रिये.

यूँ लगे जैसे तेरे तसव्वुर में भी,
खुश्बुएँ मोगरे की गुँथी हैं प्रिये.

दो निगाहें न उल्फ़त छिपा ये सकी,
आहटें दिल तलक जा चुकी हैं प्रिये.

खैरियत सुन के भी चैन पड़ता नहीं,
फ़िक्र में चाहतें भी घुली हैं प्रिये.

ले कई आरजू दिल की दहलीज़ पर,
'प्रीत की अल्पनायें सजी हैं प्रिये.'

बहुत सुंदर शेर निकाले हैं । जिक्र जब भी तेरा इस ज़ुबां से लगा में शहद सी बोलियों की क्‍या बात है । और नीरज जी के ब्‍लाग के मोगरे जिस प्रकार से तसव्‍वुर में गूंथे गये हैं उससे पूरा शेर सुगंधित हो गया है । और फिक्र में चाहतों का घुलना बहुत अच्‍छा प्रयोग है जो शेर को नई ऊंचाइयां दे रहा है । पूरी ग़ज़ल रंग-ए-अंकित से भरी हुई है । बहुत सुंदर बहुत सुंदर ।

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राजीव भरोल

राजीव भरोल की ग़ज़लों में पारंपरिक शैली खूब देखने को मिलती है । और उसी पारंपरिक शैली में नये नये प्रयोग करना राजीव की आदत है ।

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बातें हम दोनों में जो हुई हैं प्रिये,
हो न हो मौसमों ने सुनी हैं प्रिये,

बाग़ में रोज यूं मिलना अच्छा नहीं,
तितलियाँ हमको पहचानती हैं प्रिये.

मैं समझ ही न पाया इन्हें आज तक,
ये नयन आज भी अजनबी हैं प्रिये,

आज जीवन के आँगन में रँगों भरीं,
प्रेम की अल्पनाएं सजी हैं प्रिये.

प्रेम हो और सिवा उसके कुछ भी नहीं,
धड़कने बस यही कह रही हैं प्रिये.

सबसे पहले मतला ही बहुत सुंदर बना है वही जो मैंने कहा था कि राजीव की ग़ज़लों में पारंपरिक शैली अपनी पूरी सुंदरता के साथ दिखाई देती है । और इसके बाद का ही शेर बहुत सुंदर बन पड़ा है तितलियां हमको पहचानती हैं प्रिये बहुत बहुत सुंदर कहा है । अंकित की ही तरह राजीव ने भी अजनबी काफिये का प्रयोग किया है और बहुत सुंदर तरीके से किया है । बहुत बहुत सुंदर ग़ज़ल कही है । आनंद आनंद ।

16 टिप्‍पणियां:

  1. यानि अब से मुशायरा सघन होता जा रहा है.

    अंकित सफ़र को सुनना हमेशा से अच्छा लगा है. सन्निहित लिहाज़ के कारण भी और आज की कलम को समझने के लिये भी. ग़ज़ल अच्छी बनी है. हार्दिक बधाई.

    राजीव भरोल जी की ग़ज़ल का मतला स्वयं में एक शाश्वत संप्रेषण है.
    बाग़ में रोज यूँ.. . का होना कहे हुए को नया कलेवर और नयी रंगत दे गया है. हृदय से बधाई.
    प्रेम हो और सिवा.. इस शेर पर राजीव जी मेरी विशेष बधाई स्वीकारें.

    -सौरभ पाण्डेय, नैनी, इलाहाबाद (उप्र)

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  2. तसव्‍वुर में मोगरे की खुश्‍बुओं का अहसास से दिल की दहलीज़ पर अल्‍पनायें। नर्म अहसास
    नर्म अहसास की ओढ़नी ओढ़ कर
    एक तस्‍वीर ही खींच दी है प्रिये।
    अंकित को बधाई नर्म अहसास से शेर लाने के लिये। राजीव जी आप दानों की बातें सुनकर ही मौसम खुशगवार हुआ है।
    और भाई एक तो घर में है, ये बाग में कौन मिल रही है।
    आखिरी शेर में शब्‍द कुछ इधर उधर हो गये लगते हैं। शायद ऐसा होगा
    प्रीत हो और उसके सिवा कुछ नहीं।
    बधाइ भाई राजीव जी।

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  3. मोगरा शब्द का क्या खूब प्रयोग किया है अंकित ने...वाह...ये बालक अपनी ग़ज़लों से हमेशा मुझे चौकंता रहा है...बित्ते भर के इस लड़के में कमाल की प्रतिभा है...जो दिन दूनी रात चौगनी गति से बढ़ रही है...जियो अंकित आज फिर तुमने अपनी कलम का लोहा मनवा लिया है...

    राजीव जी की तो बात ही निराली है...जितने खुद सुन्दर हैं उतनी ही उनकी ग़ज़लें होती हैं...तितलियों की पहचान वाले शेर को पढ़ कर दिल बाग़ बाग़ हो गया...वाह राजीव जी वाह...

    जिस मुशायरे की शुरुआत ही सातवें आसमान से हुई हो वो कौनसी ऊंचाइयों पे थमेगा भगवान् ही जाने...

    नीरज

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  4. दोनों ही शायरों -अंकित और राजीव की गज़लों के शेरों में अपने तरीके का नयापन है !

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  5. अब स्थिति यह हो गई है कि केवल पंकजजी को ही बधाई देनी पड़ेगी जिनके प्रयास से सभी विद्यार्थी हर बार अभिव्यक्तियों के नये प्रतिमान बना रहे हैं.प्रकाश और वीनस से लेकर राजीव और अंकित या रवि सभी एक से आगे एक.

    अब तो नजरें बिछी हुईं है प्रतीक्षा में सिद्धहस्त शायरों के कलाम --कमल की पंखुड़ी पर ओस का टीका.

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  6. दोनों शायर को शानदार व मुकम्मल गज़ल के लिये मुबारकबाद्। अंकित जी मक्ता बहुत ही अच्छा लगा व भरोल जी का ये शे"र बेमिसाल है और एक नये ही बिम्ब को परिभाषित कर र्हा है कि" बाग़ में यूं रोज़ मिलना अच्छा नहीं, तितलियां हमें पहचानती हैं प्रिये।

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  7. गो मुलाकातें अपनी बढ़ी है प्रिये...
    क्या खूबसूरत मतला है अंकित भाई !
    और ये तो आलग ही खुशबू समेटे हुये है‍ खुशबुएँ मोगरे की...
    बहुत सुंदर !

    राजीव जी ने, हमेशा की तरह नये अंदाज मे मतला कहा है.

    तरही जिंदाबाद!

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  8. दोनों ही ग़ज़लें बहुत सुंदर हैं
    अंकित की ग़ज़ल का मतला बेहद ख़ूबसूरत है
    ख़ैरियत सुन के भी चैन ,,,,,,
    क्या शेर कह दिया अंकित !
    सच्ची भावनाओं को शब्दों का रूप दे कर ग़ज़ल के शेर में ढाल दिया
    ख़ुश रहो कामयाब रहो !!

    राजीव जी ,,
    बहुत ख़ूब !!
    मैं समझ ही न पाया ,,,,,
    इस शेर की प्रशंसा के लिये शब्द ढूंढ रही हूं
    क्या बात है !!
    वाह !

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  9. वाह .. दोनों ही ही ग़ज़लें अपना कमाल दिखा रही हैं ...
    ज़िक्र जब भी तेरा इस जुबां से लगा .. वाह कमाल किया है अंकित जी ... और ले कई आरजू दिल की दहलीज़ पर ... जैसे की दिल अल्पना में में रख दिया हो ... बहुत लाजवाब अंकित जी ... बधाई ...

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  10. और राजीव जी ने तो पांच शेरों में ही प्रेम के रंग को आसमां तक पहुंचा दिया ... बाग में रोज यूं मिलना अच्छा नहीं ... क्या बात कह दी .. पर प्यार तो फिर भी दिख जायगा कहीं न कहीं से ... मैं समझ ही न पाया ... ये सच है की समझने में कभी कभी सदियों लग जाती हैं ... नयनों की भाषा ऐसी ही है ... प्रेम हो और सिवा उसके कुछ भी न हो ... पूरे माहोल को जैसे प्रेममय कर दिया ... बहुत लाजवाब ....

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  11. दोनों ग़ज़लों का हर एक शे’र जानदार है। दोनों शायरों को बहुत बहुत बधाई। अंकित जी ने आखिरी शे’र में जबरदस्त तरीके से गिरह बाँधी है। राजीव जी के मत्ले ने दिल जीत लिया।

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  12. तरही में मुझे हमेशा अपने चहेते शायर राजीव जी का इंतज़ार रहता है.
    मतला जिस अंदाज़ में कहा गया है, उसके बारे में कुछ कहने से अच्छा है, उसे बारहा पढ़कर उसका आनंद लिया जाए............लाजवाब मतला बुना है.
    "बाग़ में रोज़.................", इस शेर में अंदाज़े बयां बहुत खूब है
    "प्रेम हो.........." ये शेर भी अच्छा बना है.
    तहे दिल से मुबारकबाद कुबूल करें.

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  13. वाह! एक साथ दो अच्छे शायरों को पढना सुखद है.और उम्मीद के मुताबिक़ ही ये दोनों ग़ज़लें तरही को नई उचाइयां दे रहीं हैं.राजीव भारोल साहब और अंकित भाई को हार्दिक बधाईयाँ.

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  14. दोनों ही ग़ज़लें कमाल की हैं... अंकित का मतला एक मुलायम शिक़ायत है , फिक़्र्मन्दी है बेचैनी है... वहीं रजीव जी का मतला एक दस्तक है ! लाजवाब मतला है दोनों के ! दूसरे शे'र में जहाँ अंकित ने ख़ाब की बात रौशन चेहरे के साथ ओह.. क्या राबिता है ! मगर राजीव जी ने तितलियों से जो राज़ की बात की है वो अपने आप मे नायाब है और नया एह्सास है ! बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल हैं दोनों के ! बहुत बधाई !

    अर्श

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  15. बहुत देर हो गयी आते आते। कम्प्यूटर दगा दे गया था इन दोनो की गज़लें तो मै हमेशा शौक से पढती हूँ। और दोनो ही कमाल के शायर घडे हैं शेर कोट न करने के लिये क्षमा चाहती हूँ दोनो को बहुत बहुत बधाई।

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