गुरुवार, 19 जुलाई 2012

तेरी पहली छुअन ने गज़ब ये किया, स्याह रातों मे अब रौशनी है प्रिये, आज की तरही ख़ास है क्‍योंकि आज प्रकाश अर्श की ग़ज़ल स्‍वागत कर रही है माला का दिल्‍ली आगमन पर ।

prakash mala

प्रीत की अल्‍पनाएं सजी हैं प्रिये

सुना है कि ''नीर भरी सुख की बदली'' इन दिनों दिल्‍ली में बरसा रही है । सुना है कि माला का आगमन बिहार की राजधानी से देश की राजधानी में हो चुका है । सुना है कि दूल्‍हे राजा स्‍वयं स्‍टेशन पर पहुंचे थे स्‍वागत के लिये । खैर सुना तो बहुत कुछ है । तो जैसा कि तरही की भूमिका में कहा गया था कि ये तरही प्रकाश और माला के लिये है । और अब जब माला का आगमन दिल्‍ली में हो चुका है तो ये तरही अब और रंग के साथ आगे जारी रहेगी । जैसा कि हम पहले से जानते हैं कि प्रकाश और माला की शादी में बहुत बड़ा योगदान ब्‍लाग जगत का है । कंचन सिंह चौहान और रंजना सिंह जी ने अपने अपने तरफ के दो रिश्‍तेदारों को जीवन साथी बना दिया  । मुझे लगता है कि ब्‍लाग परिवार भी अब धीरे धीरे एक पूरे परिवार के रूप में विकसित होता जा रहा है । खैर हमारे बीच का एक मोस्‍ट वांटेड बैचलर अब लिस्‍ट से हटा दिया गया है । अब वो नमक, तेल और गैस का भाव याद करने वाली पुरुष जमात में आ चुका है । और इसका एहसास हो भी चुका है उसे क्‍योंकि माला के आगमन की तैयारी में मकान बदलने की बहुत मशक्‍कत हुई । मेरी अपनी व्‍यक्तिगत इस धारणा है कि ''संन्‍यास धर्म का पालन आसान है किन्‍तु गृहस्‍थ धर्म का पालन बहुत मुश्किल है ।'' मेरा मन गौतम बुद्ध को कभी क्षमा नहीं करता जिन्‍होंने अपनी जिम्‍मेदारी ( पत्‍नी ) को रात में सोता छोड़ कर सत्‍य की तलाश की । खैर आज दर्शन शास्‍त्र को छोड़ते हैं और चलते हैं प्रणय शास्‍त्र की ओर ।

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प्रीत की अल्‍पनाएं सजी हैं प्रिये

prakash arsh

प्रकाश अर्श

तो आज प्रकाश की ग़ज़ल की बारी है । दुनिया में प्रतिभाएं दो प्रकार की होती हैं, पहली वो जो जन्‍मजात होती हैं, दूसरी वो जो अपनी जिद से बनती हैं । प्रकाश का प्रकरण दूसरे टाइप का है । प्रकाश अपनी जिद से शायर बना है । जब प्रकाश शुरू में मुझसे जुड़ा था तो मैं सोचता था कि ये कैसे लिख पायेगा । किन्‍तु उसने केवल अपनी जिद से लय पकड़ ली । आज वो जिस प्रकार के शेर कह रहा है वो उसकी जिद का ही परिणाम है । आज की ग़ज़ल में भी प्रकाश ने बहुत सुंदर शेर निकाले हैं ( धर्मेंद्र सिंह सज्‍जन से क्षमा याचना सहित, हमारे यहां शेर निकाले हैं ऐसा ही कहा जाता है, सारा साहित्‍य हमारे मन के गह्वर में ही कहीं छुपा है और प्रयास करके उसे हमें ही निकालना होता है । विचार हमारे ही अंदर हैं बाहर नहीं हैं । कहानी, कविता, ग़ज़ल सब कुछ हमारे ही अंदर है । मेरे विचार में इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि शायर ग़ज़ल कही है कि जगह ग़ज़ल लिखी है कह रहा है । अरे भाई अच्‍छी ग़ज़ल होनी चाहिये अब उसके साथ आप लिखी कहो या कही कहो क्‍या फर्क पड़ता है । मेरा तो मानना है कि धर्म के नियमों का हर 100 साल बाद, जीवन शैली के नियमों का हर 50 साल बाद और साहित्‍य के नियमों का हर 25 साल बाद आकलन होना चाहिये और ये निर्णय लिया जाना चाहिये कि इन नियमों में क्‍या हटाने योग्‍य है और क्‍या नया बढ़ाने योग्‍य है । याद रखें कि सारे नियम तोड़ कर चलने वाला दुष्‍यंत सबसे ज्‍यादा कोट किया जाने वाला हिंदी ग़ज़लकार है 'लीक लीक गाड़ी चले लीके चले कपूत, ये तीनों तिरछे चलें शायर, शेर, सपूत। ) अरे बात लम्‍बी हो गई । तो आइये सुनते हैं प्रकाश की ग़ज़ल ।

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फूल आने लगे हैं चमेली में अब,  तेरे आने से ऐसी ख़ुशी है प्रिये !!

तू नहीं है तो हर पल सदी है प्रिये
तेरे बिन क्या कोई ज़िन्दगी है प्रिये 

रंग सारे धनक के ले आया  हूँ मैं
प्रीत की अल्पना तब सजी है प्रिये

फूल आने लगे हैं चमेली में अब
तेरे आने से ऐसी ख़ुशी है प्रिये 

तुझको पढ़ते हुए सोचता हूँ यही
तू पुरानी मेरी डायरी है प्रिये
 

अपने किस्से सुनहरे लिखे जाएंगे
वर्ण मैं हूँ औ तू वर्तनी है प्रिये 

तुझसे रिश्तों की पूंजी बची रह गई
बन के आई तू जब से कडी़ है प्रिये
 

घर को घर सा बनाना क्या आसान था
ये हुनर ही तो कारीगरी है प्रिये

मैं समन्दर हूँ खारा हूँ ठहरा हुआ
मीठी, कलकल तू  बहती नदी है प्रिये

तेरी पहली छुअन ने गज़ब ये किया
स्याह रातों मे अब रौशनी है प्रिये 

सारे संसार में बांट दे रौशनी
चाँद से चाँदनी कह रही है प्रिये
 

याद की पैरहन थी उधड़ने लगी
प्रीत की डोर से टाँक दी है प्रिये

बेलिबासी के रिश्ते ठहरते कहाँ
ये तो अच्छा है तू ओढनी है प्रिये
 

उम्र भर ख़ाब मे जिसको देखा किया
तू वही, हां वही, बस वही है प्रिये

शराबी  नाम की एक फिल्‍म आई थी जिसमें अमिताभ शायरी करने के शौकीन रहते हैं और उनके उस्‍ताद होते हैं ओमप्रकाश जी । ओमप्रकाश जी पूरी फिल्‍म में यही कहते हैं कि पहले इश्‍क करो, शायरी में खुद ही जान आ जायेगी । तो आज की ये ग़ज़ल बता रही है कि ओमप्रकाश जी कितना सही कहते थे । उसी फिल्‍म में एक अनोखा मतला था जिसमें दोनों मिसरों में केवल एक अक्षर भिन्‍न था बाकी पूरा मिसरा एक समान था

'जिगर का दर्द ऊपर से हीं मालूम होता है ?

जिगर का दर्द ऊपर से हीं मालूम होता है ।

खैर तो आज की ग़ज़ल के बारे में मैं क्‍या कहूं । बच्‍चे ने माला के स्‍वागत में क्‍या क्‍या तो तैयारियां की हैं कहां कहां से क्‍या क्‍या उठा के लाया है । धनक, चमेली, डायरी, चांदनी और जाने क्‍या क्‍या । तेरी पहली छुअन का ग़ज़ब कमाल का है । घर को घर सा बनाने वाला शेर तो अब क्‍या कहूं, देखिये बच्‍चे को गौतम जैसे अनुभवियों ने बता रखा है कि बेलन और चिमटे से बचना हो तो ऐसी बातें करते रहना चाहिये । ये स्‍वीकारोक्ति भी अच्‍छी है कि मैं समंदर हूं खारा भी हूं अच्‍छी बात है सुखी गृहस्‍थ जीवन के लिये भी ये कहते रहना अच्‍छी बात है । बहुत अच्‍छी ग़ज़ल है । बच्‍चा गृहस्‍थ का मूल मंत्र जान गया है 'प्रशंसा करते रहो, सुखी रहो' । ये मंत्र जानने में लोगों को बरसों लग जाते हैं ।

49 टिप्‍पणियां:

  1. फोटो में प्रेम धुन बजाते अर्श भाई ने बहुत खूब शेर निकाले हैं.
    "तुझको पढ़ते हुए सोचता हूँ यही.............." लाजवाब शेर और सानी में डायरी काफिया उफ्फ्फ.........समां बाँध दिया है.
    "घर को घर सा बनाना क्या आसान था..............", वाह जी वाह, जियो अर्श भाई, गृहस्थ जीवन का सार बता रहे हो.
    "मैं समन्दर हूँ खारा हूँ ठहरा हुआ..............", बेहतरीन शेर.
    "तेरी पहली छुअन ने गज़ब ये किया....................." आहा...... क्या कहें, क्या न कहें? बेहद उम्दा शेर

    आज आपके शेरों की "प्रकाशमाला" से ये ब्लॉग चमक उठा है, दिल्ली तो कल से ही जगमगा रही है.

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  2. ओमप्रकाश जी शराबी फिल्म में सही कहते थे...
    लाजवाब शेर कहे हैं. जानलेवा गज़ल है. कमाल के शेर. जितनी भी तारीफ़ करें कम होगी. वाह! प्रकाश को बहुत बहुत बधाई.

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  3. खारा समन्दर और मीठी नदी का विरोधाभास बड़ा प्रीतिकर है। पहली छुअन तो ग़ज़ब है ही, वधू को रिश्तों को बांधने वाली कड़ी कहना मन खुश कर गया। कुल मिलाकर बड़ी संतुलित ग़ज़ल है। बधाई प्रकाशजी और माला जी को।

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  4. देखो भाई प्रकाश, तुमने ग़ज़ल तो खूबसूरत कही ताज़ा अऩभवों के साथ लेकिन यही शेर जब तीस साल बाद कहोगे तो कैसे होंगे इसका उदाहरण बस तीन आश'आर में:

    तीस साल बाद
    साथ तू हो तो हर पल सदी है प्रिये
    तेरे बिन चैन से कट रही है प्रिये।

    मायके तुम गयीं तो नये रंग हैं
    प्रीत की अल्‍पना सज गयी है प्रिये।

    बीच सरसों के जैसे महिष हो खड़ी
    पीत साड़ी में ऐसे फ़बी है प्रिये।

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    1. तिलक जी इस प्रकार की एक मुकम्‍मल ग़ज़ल भी एक शायर ने भेजी है जो जल्‍द ही आप यहां देख पाएंगे ।

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    2. मज़ा आयेगा हास्‍य का श्रंगारिक रूप देखने में। एक हास्‍य-नाटिका जैसा आनंद रहेगा।

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    3. कुछ कुछ तो मैं भी समझ रहा हूँ !

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    4. तिलक जी बच्‍चे को अभी से समझ जाने दो, नहीं तो आपकी और मेरी तरह सिर की खेती बेलनों से उड़वा के समझेगा ।

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  5. किसी रात के ग्यारह, साढ़े ग्यारह बजे इस ग़ज़ल के शुरुआती शेर सुने थे और बात वही मन में आई थी, जो गुरू जी ने कही " थ्योरी और प्रैक्टिकल" में जो अंतर होता है, वो ये है, मूर्तरूप...

    उस दिन जब सुनी तब जो खुशी हुई, अजीब सा आह्लाद... वही, बिलकुल वैसा ही...! मन में एक अलग सी तरंग उसके जीवन में खुशी आने की।

    किसी भी रचना के भले लगने का करण ये होता है कि आप स्वयं को उससे जोड़ लेते हैं, लगता है कि अरे ये तो मेरे ही भा हैं।

    लेकिन अर्श जैसे कुछ लोग मेरे लिये वो हैं, जिनकी रचनाएं पढ़ने के बाद मैं उस मनःस्थिति को महसूस कर लेती हूँ जिसमे ये लिखी गई होगी.. और ये महसूस करने कि उसने कितने सारे खुशी के पल चुटकियों से उठा उठा कर ये ग़ज़ल पूरी की होगी, ये वो ही समझ सकता है, जिसने किसी के जीवन की सारी खुशियाँ माँगी हों और अपने सामने उस खुशी से सराबोर होते उस शख्स को पा रहा हो..

    तो अभी बहुत सारे आह्लाद में, ग़ज़ल पर कुछ कहना संभव नही हो पा रहा, फिर आती हूँ, इस खूबसूरत ग़ज़ल पर अपनी बात कहने..

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  6. उत्तर
    1. आपको यहाँ देखना ही ख़ुद को सम्मानित करने जैसा है ! बहुत स्वागत है इस ब्लोग पर आपका ! और ग़ज़ल पसन्द करने के लिये ख़ासतौर से शुक्रिया !

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  7. जब संज्ञा ही बदल जाये तो तो भाव किस तरह बदलते हैं इसका भान तो कइयों को होता है किन्तु उसका संप्रेषण संवेदनशील ही कर पाते हैं. भाई अर्श ने बहुत कुछ समेटा है अपनी प्रस्तुत ग़ज़ल में.
    मौसम आये तो चमेली खिलती ही है, किन्तु उसके खिलने का भान होना ही संज्ञा परिवर्तन है.
    अपनी प्राकृतिक कठोरता और खारेपन को स्वरयुक्त करना और उसे परिपूरक नदी से अनुप्राणित होने का भान होना ही संज्ञा परिवर्तन है.
    संज्ञा-परिवर्तन के पश्चात कहे गये इन अश’आर के लिये हार्दिक बधाई.
    बहुत कुछ कहा हुआ है, किन्तु इससे कहीं अधिक इंगित है. प्रत्येक इंगित पर पुनः बधाई.
    हार्दिक शुभकामनाएँ.

    --सौरभ पाण्डेय, नैनी, इलाहाबाद (उप्र)

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    1. बहुत शुक्रिया सौरभ जी ....

      सादर्

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  8. एक एक शे’र पर ढेर ढेर दाद है। क्या ग़ज़ल कही है। कई बार पढ़ी। इस ग़ज़ल से जीवन की शुरुआत शानदार है। कहते हैं कि अच्छी शुरुआत मतलब आधा काम फतह। जीवन का मूल मंत्र आपने पा लिया। जो शादीशुदा पुरुष कितने बेलन खाने के बाद सीखते हैं वो आपने झटपट सीख लिया। भविष्य के लिए ढेर सारी शुभकामनाएँ।

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  9. ईश्वर करे इस ग़ज़ल के काफ़िए कभी खत्म न हों और ये ग़ज़ल बढ़ते बढ़ते जिंदगी का कभी खत्म न होने वाला कसीदा बन जाए।

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  10. भाई शेर तो शेर है। अपनी मर्जी़ से निकला तो जरा तन कर चलता है, निकाला गया तो महफिल देखकर।
    मेरा तो मानना है कि कोई विचार या भाव आने पर शेर का प्राथमिक ढॉंचा जो बनता है उसे तराशना तो पड़ता ही है इसलिये शेर का सौन्‍दर्य तो तभी निखरकर सामने आता है जब जब शायर उसपर मेहनत करता है अब इसे आप ये भी कह सकते हैं कि अब जो रूप निकला वो देखने लायक है या यूँ भी कह सकते हैं कि 'क्‍या रूप निकाला है'। बहुत कम शेर होते हैं जो प्रस्‍फुटन स्‍तर ही ऐसे लगें कि उनपर मेहनत करना निरर्थक लगे। सजाना-सँवारना,दोष दूर करना आदि चलता ही रहता है। मेरा अनुभव तो यह रहा है कि कई बार रदीफ़ काफि़या देखकर शेर का मूल भाव भी पैदा करना पड़ता है।
    कुछ शेर यकायक हो जाते हैं, लेकिन ज्‍यादहतर पैदा करने ही पड़ते हैं।

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  11. अपने किस्से सुनहरे लिखे जायेंगे
    वर्ण मैं हूँ औ तू वर्तनी है प्रिये

    एक शेर में अथाह गहराई और अनगिनत संभावनायें लपेट ली हैं . प्रकाश को अनन्य शुभकामनायें

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    1. बहुत शुक्रिया आ. राकेश जी , आपकी नज़र के सामने नतमस्तक हूँ !

      सादर

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    2. बहुत बहुत शुक्रिया आ. रकेश जी ..........

      सादर्

      हटाएं
  12. बहुत सुन्दर.............
    दिल से निकली गज़ल.............दूर तलक जायेगी......
    प्रकाश जी और माला जी को अनंत शुभकामनाएं.

    सादर
    अनु

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  13. बात ये थी कि जब प्रकाश ने अपनी ग़ज़ल सुनाई तो वो खुशी हुई जिसमें खुद सदे ज्यादा उसके मन के भाव मन में भरे... रात के अँधेरे में बगल का लैपटॉप आन करके २० मिनट में बिना किसी कैलकुलेशन के जो मन ने प्रकाश का मन बन के कहा, वो खुद को संतुष्ट नही कर पाया, इसलिये भेजा नही।
    मगर यहाँ टिप्पणी में तो कुछ भी लिखा जा सकता है ना ! तो देखो अर्श तुम्हारी तरफ से क्या कहा मैने माला से और हाँ उसे भी दिखा देना..


    खुद उजाला बिछा, क्या करेंगे दिये ?
    "अर्श" आया जमीं पर तेरे ही लिये,
    एक माला गले में पड़े, हो वरण,
    प्रीत की अल्पनाएं सजी हैं प्रिये।

    कितने ही मर्तबा, इन बहारों ने आ,
    एक छोटा नशेमन दिया है उड़ा,
    तुम तो हो प्रीत की किंतु ऐसी हवा,
    जो सलीके से तिनको को देगी सजा।
    कोई इस आस में जा रहा है जिये।
    प्रीत की अल्पनाएं सजी हैं प्रिये।

    जिसने जिसने लिये द्वार अपने भिड़ा,
    उन सभी को मेरा है बहुत शुक्रिया।
    एक भटकन ने तुमसे दिया है मिला,
    और तुमसे मिला, जीत का रास्ता।
    अश्वमेधी विजय अब मेरी है हिये !
    प्रीत की अल्पनाएं सजी हैं प्रिये।

    *उजाला (प्रकाश):) :)

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  14. "रंग सारे धनक के ले आया हूँ मै"
    हम्म्म्म... चौका, बेलन, बेड, सोफा सब लाया गया है... पता नही किस अखबार में पढ़ा था

    फूल आने लगे हैं चमेली अब
    हाँ सच है ये भी, असल में माला के मायके में एक रिश्तेदार मैन्यूर रिसर्च इंस्टीट्यूट में है, वहीं से स्पेशल खाद लाई है वो। किसी भी मौसम में चमेली उगाओ, तेल निकालो और फिर माला से सिर पर रखवाओ.... बाद में माला सायलेंट मोड पर बोले "छँछूदर के सिर पर.... "

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  15. तुझसे रिश्तों की पूँजी बची रह गई

    ये शेर तुमने बहुत ही अच्छा लिखा मेरे भाई। असल में ये बहुत बड़ी हक़ीकत है। हर व्यक्ति की अपनी एक निजी पूँजी होती है, इन रिश्तों की पूँजी और जिस दिन वो एक हमसफर चुनता है उस दिन बहुत सारी खुशी के साथ, एक भय भी आ जाता है कि अब ये पूँजी वैसे ही सँभल पायेगी या नही ??

    सँभलती तब है, जब जितना सम्मान हमारे मन में हो उतना ही जीवन साथी कले भी मन में इस पूँजी के प्रति... मगर हाँ ये पूँजी माला ने भी बनायी होगी और वो तुम्हे भी बचानी होगी।

    ये हुनर ही तो कारीगिरी है प्रिये
    एकदम सच... जो मेरे भाई को नही आती थी...तुमने अपने भाव को बहुत सुंदर शब्द दिये।

    तेरी पहली....

    याद की पैरहन थी उधड़ने लगी
    और
    ये तो अच्छा है तू ओढ़नी है प्रिये !

    बहुत बहुत बहुत अच्छा लिखा तुमने। बहुत शुभकामनाएं, तुम्हे, तुम्हारे संगिनी को और तुम्हारी लेखनी को... सब दिन दिन बढ़ें

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  16. मनोहारी भावपूर्ण प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...

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    उत्तर
    1. बहुत बहुत शुक्रिया चतुर्वेदी जी !

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  17. गज़ल के लिये तो सब ने बहुत कुछ कह दिया वैसे भी अर्श की गज़ल पर मेरे जैसे नासमझ क्या कह सकते हैं मi तो तस्वीर देख कर ही खुश हो रही हूँ और दोनो को ढेरों आशीर्वाद दे रही हूँ। भगवान दोनो के जीवन मे भरपूर खुशियाँ लाये।और जल्दी ही अगले मुशायरे की तयारी के लिये तयार रहें--- सुबीर भाई आप त्5ओ समझ ही गये होंगे।

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  18. इश्वर ने जितनी सुन्दर ये जोड़ी बनाई है अर्श ने उतनी ही सुन्दर ये ग़ज़ल रच डाली है...प्रेम की मधुरिमा में लिपटी इस ग़ज़ल का एक एक शब्द कुछ कहा अनकहा बयां कर रहा ही...वाह अर्श वाह...इश्वर तुम दोनों की इस जोड़ी को हमेशा मुस्कुराते खिलखिलाते हुए बनाये रक्खे...आमीन


    नीरज

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    1. बहुत शुक्रिया के साथ आमीन नीरज जी !

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  19. प्रकाश भाई की इस गज़ल मे उनके व्यक्तित्व का जो अंदाज समाया हुआ है फलस्वरुप जो शेर निकले वो बस छा गए...
    हर एक शेर ख़ूबसूरत अहसास से लबरेज है.
    !!!!!!!!!!

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  20. क्या बात है अर्श !!
    सब ने जितना कुछ लिख दिया है वो सब ही तो सच है
    वही सब मुझे भी कहना है ,,,!!

    तुम दोनों ख़ूब ख़ुश रहो !!

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  21. अब हम क्या कहें...

    काश कि शब्द साथ देते , तो हम भी हृदयोद्गार उड़ेल यहाँ रख पाते...

    ढेरों आशीष...

    ये संवेदनाएं , यह रचनाशीलता सदा अक्षुण रहे, उर्ध्वगामी रहे...

    अनंत शुभकामनाएं..

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    1. :) aapako to shukriya bhee nahi kah sakta didimaa....(love you kahna chahta hun)

      saadar.

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  22. प्रकाश भाई क्या अच्छी ग़ज़ल हुई है..बिलकुल सप्राण..और हो भी क्यों नहीं.ग़ज़ल के सारे शेर जी कर कहे गए हैं..हार्दिक बधाई आपको और इस ग़ज़ल की प्रेरणा स्रोत भाभी जी को..

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  23. प्रकाश जी का हर शेर दिल से निकला है ... किसी की खातिर निकला है ... तो प्रेम में पगा ... नेह की चासनी में डूबा तो होना ही है ... हिना रंग लाती है घिसने के बाद ... प्रकाश जी की शायरी भी अब रंग लाएगी ...
    किसी एक शेर को कोट नहीं करूँगा प्रकाश जी नहीं तो दूसरे की तौहीन होगी ... प्रेम बराबर बांटा है हर किसी शेर में आपने ... आपकी केटेगरी बदल गई यस खुशी की बात है ... गज़ल के साथ साथ इन टिप्पणियों का मज़ा भी अपना अलग है ... यादगार हैं ये पल आपके और हम सबके लिए भी ... बधाई ...

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया दिगम्बर जी !

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