सोमवार, 16 जुलाई 2012

उसकी पायल की छन-छन ये कहती रही कितनी बातें हैं जो अनकही हैं प्रिये, आइये आज सुनते हैं आदरणीया इस्मत ज़ैदी 'शेफा' जी से उनकी सुंदर ग़ज़ल ।

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प्रीत की अल्‍पनाएं सजी हैं प्रिये 

तरही को लेकर पहले तो कम उत्‍साह देखने को मिला था लेकिन जैसे जैसे तरही आगे बढ़ने लगी तो ग़ज़लें आनी शुरू हो गईं । हम लोग अभी भी बचपन में ही जीते हैं । बचपन में मास्‍साब जब कोई काम करने को कहते थे तो हम इस बात की प्रतीक्षा करते थे कि हमारा कोई दोस्‍त पहले उस काम को शुरू करे फिर उसके बाद हम करें । कहते हैं बचपन आपके साथ पूरी उम्र चलता है । आपकी पसंद, नापसंद, आपकी आदतें सब कुछ वही रहती हैं जो बचपन में होती हैं । खैर अब चूंकि बहुत सारी गज़ल़ें मिल गई हैं इसलिये अगले अंक से एक साथ दो शायरों को लेना होगा नहीं तो मुशायरा बहुत लम्‍बा खिंच जायेगा ।

आज हम सुनने जा रहे हैं आदरणीया इस्‍मत ज़ैदी 'शेफा' जी से उनकी एक बहुत ही सुंदर ग़ज़ल । इस बार की तरही में सबसे बड़ा आकर्षण ये था कि जब इस मिसरे पर नारी क़लम चलेगी तो क्‍या भाव आयेंगे । पिछली पोस्‍ट में भी परिधि जी ने बहुत सुंदर ग़ज़ल कही थी और इस्‍मत दीदी की क़लम से तो सुंदर ग़ज़ल निकलनी ही थी । तो आइये सुनते हैं इस्‍मत दीदी से उनकी ये ग़ज़ल ।

ismat zaidi didi

आदरणीया इस्‍मत ज़ैदी 'शेफा'

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''तेरे सन्देश ले कर न आया कोई, द्वार  पर सूनी  आँखें  लगी  हैं  प्रिये''

ग़ज़ल  

भाव  रूपी घटाएँ घिरी हैं प्रिये 
और गीतों की कलियाँ खिली हैं प्रिये

तेरे सन्देश ले कर न आया कोई
द्वार  पर सूनी  आँखें  लगी  हैं  प्रिये

उसकी  पायल की छन-छन ये कहती रही
कितनी बातें हैं जो अनकही हैं प्रिये

आओ रोली के रंगों से  जीवन रंगें
"प्रीत की अल्पनाएँ सजी हैं प्रिये"

गर्म धरती  के दुःख बूँद ने हर लिए
भाप बन कर व्यथाएँ उड़ी हैं प्रिये

तेरे आने से  अंगनाईयां जी उठें
कल्पनाओं की झांझर बजी हैं प्रिये

रब का दरबार है ध्यान में मग्न हूँ
आस की बातियाँ जल रही हैं प्रिये

अहा क्‍या शेर निकाले हैं  ।उसकी पायल की छन छन ये कहती रही कितनी बातें हैं जो अनकही हैं प्रिये, इसमें पायल की छन छन से अनकही बातों का जो संबंध जोड़ा है वो बहुत सुंदर बना है । गर्म धरती के दुख का शेर बहुत दूर तक जाने वाला शेर है । रब के दरबार का क्‍या कहा जाये, इस एक शेर को पढ़ कर मानो समूचा पूजा घर आंखों के सामने तैर गया । और उस पर आस की बातियों का जलना । रब के दरबार में आस की बातियों का जलना शेर को गहरे अर्थ दे रहा है । और तेरे संदेश वाला शेर निर्दोष वाक्‍य का एक उत्‍तम उदाहरण है पूरा शेर सुंदर वाक्‍य में ढल रहा है । बहुत सुंदर ग़ज़ल आनंद ही आनंद । वाह वाह वाह ।

दो दिन बाद पवित्र रमजा़न का महीना शुरू हो रहा है, साथ में पवित्र श्रावण मास तो चल ही रहा है । उसके बाद पन्‍द्रह दिनों के अंतर से रक्षाबंधन और ईद के त्‍यौहार आयेंगे । सभी को शुभकामनाएं । 

44 टिप्‍पणियां:

  1. गर्म धरती के दुख बूँद ने हर लिये,
    भाप बन कर व्यथाएं उड़ी हैं प्रिये।

    सुंदर शेर दीदी...

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    1. पहली टिप्पणी तुम्हारी देखकर बहुत बहुत अच्छा लगा
      ख़ूब ख़ुश रहो !!

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    2. कंचन इस शेर पर मैं कुछ लम्‍बी बात लिखना चाह रहा था लेकिन शब्‍द ही नहीं मिले सो बस उतना ही लिख कर रह गया । गूढ़ार्थ से भरा शेर है ।

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    3. गूँगे के गुण वाली अभिव्यक्ति में इस से अधिक क्या लिखा जा सकता था गुरू जी !!

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  2. भाव रूपी घटाओं का प्रभाव कि ऐसे शेर खिल उठे। लाजवाब। पिय के संदेश का इंतज़ार काश मेघदूत ही पूरा कर देते। पायलें छनछनाती हुई बहुत कुछ कह जाती हैं लेकिन हर छनछन का संदेश पहुँचता बस उसीको है जिसके लिये होता है फिर भी कितना कुछ अनकहा-अनसुना रह जाता है। मक्‍ते तक पहुँचते-पहुँचते ग़ज़ल वहॉं है जहॉं कहने वाला पुरुष है अथवा महिला ये गौण हो जाता है, रह जाता है बस एक नि:शब्‍द संवाद जिसमें गोरी कौन है और प्रिय कौन यह भेद करना निरर्थक हो जाता है; और शायद यही पड़ाव है जहॉं कभी न कभी हर शायर पहुँचना चाहता है।
    इस्‍मत आपा को दिली बधाई।

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    1. तिलक जी ,
      आप की टिप्पणी और हौसलाअफ़्ज़ाई के लिये तह ए दिल से शुक्रगुज़ार हूँ

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  3. इस्मत इस्मत ही है...उस जैसा कोई नहीं...जब शेर कहती हैं तो फूल झरते हैं...अब इस ग़ज़ल के लिए क्या कहूँ? अपनी इस छोटी गुनी बहन के लिए हमेशा दुआ में हाथ उठाए रखता हूँ...मुझे तुम पर फक्र है इस्मत...बेजोड़ ग़ज़ल कही है...

    नीरज

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    1. नीरज भैया ,मेरा उत्तर ग़ायब हो गया :(
      मैं आप की तारीफ़ के भरोसे पर अपनी टूटी-फूटी ग़ज़ल लेकर हाज़िर हो जाती हूँ
      कि आप तो अपनी बहन का दिल रख ही लेंगे :)

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  4. बहुत सुन्दर...............
    कल्पनाओं की झांझर बज उठी...

    सादर
    अनु

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  5. इस्मत जी बहुत लंबा इंतज़ार करवाती हैं अपने ब्लॉग पे ... कम लिखती हैं ... पर जितना भी लिखती हैं बहुत प्रभावी और भाव और शिल्प में पगा लिखती हैं ... प्रेम की इस नदी में (जो गुरुदेव के ब्लॉग पे बह रही है आजकल) प्रतीक्षा और अंतरंग प्रेम का भाव लिए शेरों की आहुति दी है इस्मत जी ने और हर शेर की अग्नि अपना अलग रंग ले के नया आकाश छू रही है ...

    तेरे सन्देश ले के न आया कोई .. अंतस की पीड़ा बयान कर रहा है ...
    उनकी पायल की छन छन ये कहती रही ... ये तो कमाल का शेर है ... सीधे दिल में उतर जाता है ...
    गर्म धरती के दुःख ... प्रेम और समर्पण की पृष्ठभूमि ऐसे शेर ही तैयार करते होंगे ...

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    1. दिगम्बर जी
      बहुत बहुत धन्यवाद !
      आप की टिप्पणियाँ रचनाकार को प्रेरित करती हैं

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  6. सुन्दर भाव मोतियों से सज्जित प्रेममयी पंक्तिया कितने अर्थपूर्ण शेरों में ढलकर आज की ग़ज़ल में उतर आये हैं.
    इस्मत दीदी जी के फ़न की मैं कैसे क्या तारीफ़ करूँ, उनका तरही में आना हम सब के लिए एक सौगात है.
    गीतों की कलियाँ.... द्वार पर सूनी आँखें... पायल की छन छन के साथ सुन्दर गिरह.
    भाप बन कर व्यथाएं उडी हैं प्रिय.... इस बेमिसाल कहन में मिसरा उला कितना सामयिक और यथार्थपूर्ण है.
    कल्पनाओं की झांझर.... क्या शब्द सौन्दर्य है.

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  7. सुलभ ,बहुत बहुत शुक्रिया
    हमेशा ख़ुश रहो

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  8. इस्मत दीदी की कलम से निकली इस खूबसूरत ग़ज़ल के क्या कहने. ये शेर ख़ास तौर पे पसंद आये,

    "तेरे सन्देश ले कर न आया कोई..........." वाह वा
    "गर्म धरती के दुःख बूँद ने हर लिए..........", लाजवाब कहन और बेमिसाल शेर.
    "रब का दरबार है ध्यान में मग्न हूँ.....", वाह वा

    इतने शानदार अशआर से नवाज़ने के लिए शुक्रिया दीदी.

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    1. अंकित जब तुम लोग प्रशंसा के शब्द कह्ते हो तो धन्यवाद कहने के बजाय केवल दुआएं देने का मन करता है इसलिये ढेर सारी दुआएं

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  9. बहुत ही खूबसूरत शे’र हुए हैं। निकाले हैं नहीं कहूँगा क्योंकि इतने खूबसूरत शे’र निकाले नहीं जाते, हो जाते हैं। बहुत बहुत बधाई इस्मत दी को।

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    1. आप ने बिल्कुल सही बात कही धर्मेन्द्र जी शेर कहे जाते हैं निकाले नहीं जाते
      शुक्रिया

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  10. तेरे आने से अंगनाईयां जी उठें
    कल्पनाओं की झांझर बजी हैं प्रिये

    रब का दरबार है ध्यान में मग्न हूँ
    आस की बातियाँ जल रही हैं प्रिये.... इस्मत जैदी - खुद एक ग़ज़ल सी , दिल से बोल निकलते हैं . मैं आवाज़ भी ढूंढ रही थी

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया रश्मि
      तुम तारीफ़ भी बहुत मन से करती हो तुम से सीखना है ये कला :)

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  11. इस्मत आपा, आपकी ग़ज़ल की प्रतीक्षा थी.
    सही है, भाव और संवेदना संप्रेषण के क्रम में एक विन्दु के पश्चात् प्रिय का होना मात्र तोषकारक होता है, सापेक्ष हों अथवा निर्पेक्ष. उसकी पायल की छन-छन .. इस तथ्य को स्वर देता प्रतीत होता है. या फिर, तेरे आने से आने से अंगनाइयाँ जी उठें.. वाह !
    गर्म धरती के दुःख बूँद ने हर लिये.. . इस अभिनव सोच के लिये आपके प्रति नत हूँ.

    सादर शुभकामनाएँ
    --सौरभ पाण्डेय, नैनी, इलाहाबाद (उप्र)

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    1. आप का भाषा ज्ञान प्रशंसनीय है सौरभ जी
      मेरा भाषा ज्ञान तो बस सामान्य सा ही है इसलिये धन्यवाद के लिये उचित शब्द नहीं ढूंढ पाई
      केवल धन्यवाद ही कह पाऊंगी

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    2. आपने जो मान दिया है आपा, मैं अभिभूत हूँ.
      सादर

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  12. गर्म धरती के दुख बूंद ने हर लिये,
    भाप बन कर व्यथाएं उड़ी हैं प्रिये.
    क्या बात है...
    सभी शेर काबिलेदाद..इस्मत, तुम्हें तो कोई भी तरह दी जाये, इतना खूबसूरत अंजाम सामने होता है कि मैं दांतों में उगली दबा लेती हूं कई बार. समझ में ही नहीं आता कि इतना सुन्दर तुम कैसे लिख लेती हो?

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    1. वंदना तुम्हारे बिना तो मेरा कोई काम पूरा नहीं होता तो तरही मुशायरा कैसे होता :)

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  13. गर्म धरती के दुख बूंद ने हर लिये,
    भाप बन कर व्यथाएं उड़ी हैं प्रिये.
    वाह! गजब की अभिव्यक्ति है, वाह!

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  14. तेरे आने से अंगनाइया जी उठें, कल्पनाओं की झांझर बजी हैं प्रिये, मनभावन शे"र , हलाकि इस शे"र की पहली पंक्ति में ( अंगनाइयां का "ग" बह्र को तोड़ रहा है। बधाई।

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    1. संजय जी आप अंगनाइयां को किस प्रकार रुक्‍न में तोड़ रहे हैं मुझे नहीं पता, लेकिन बहर तो कही सें नहीं टूट रही है । क्‍योंकि ऑंगन पर चंद्रबिंदु होता है और वही स्थिति अँगनाई की भी होती है । अँगनाई का वजन 222 होता है 2122 नहीं होता है । अंग शरीर के हिस्‍सों को कहते हैं जहां अंग होता है जिसमें अङ्ग पढ़ा जाता है । जैसे मेरा नाम पङ्कज है पँकज नहीं है । इस प्रकार यहां पर यदि रुक्‍न किये जाएं तो यूं होंगे ''ते र आ 212- ने स अँग 212- ना इ यॉ 212- जी उ ठें 212'' । यहां ये ज़ुरूर कहा जा सकता है कि फिर तो चंद्रबिंदु होना चाहिये तो उसका उत्‍तर ये है कि यूनिकोड फांट जो लोग रेमिंग्‍टन में उपयोग करते हैं उनके पास चंद्रबिंदु और प्रश्‍नवाचक चिह्न बनाने का कोई तरीका नहीं होता ।

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    2. पंकज विस्तार से समझाने के लिये बहुत बहुत शुक्रिया ,,मैं इतनी अच्च्ही तरह अपनी बात नहीं कह पाती

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    3. हिन्दी भाषा में प्रयुक्त चन्द्रविन्दु और अनुस्वार का अंतर स्पष्ट है. पंकज भाईजी, इस स्पष्टता को पटल पर रखने के लिये सादर साधुवाद.

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  15. बहुत सुन्दर...बहुत अच्छा लगा पढ़ कर.

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  16. इस्मत जी का तो कहीं मुझे नाम भी दिख जाये तो मन खिल उठता है। इनकी गज़ल की तो बात ही क्या है।मुझे लगता है हर पल वो भावनाओं मे किसी नदिया के पानी की तरह बहती ही रहती हैं। क्यों इस्मत सही कहा न क्मैने? ह्क़र एक शेर उमदा।
    गर्म धरती के दुख---- कितने गहरे भाव लिये है ये शेर
    तेरे आने से ------ बहुत खूब
    उर्दू मे तो इस्मत की गज़ल लाजवाब होती ही है लेकिन हिन्दी मे भी गज़ब्! ब्बधाई और शुभकामनायें।

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    1. निर्मला दी आप कोई बात ग़लत कह सकती हैं क्या ??
      आप का आशीर्वाद बना रहे बस

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  17. इस्मत जी ने बहुत ही खूबसूरत गज़ल कही है.. आनंद आ गया. बहुत प्यारे शेर निकाले हैं. बहुत बहुत बधाई.

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  18. "शेर अच्छा-बुरा नहीं होता/शेर होता है या नहीं होता"..और जब एक साथ सात शेर हो जाएँ तो मुंह से सिर्फ वाहवाही निकलती है.क्या अच्छी ग़ज़ल है इस्मत दी.यादगार.कहना न होगा कि इस महफ़िल के बड़ों ने तमाम छोटों लिए मापदंड काफी ऊँचे कर दिए हैं..

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  19. सौरभ शेखर जी ’
    आप उम्र में छोटे ज़रूर हैं लेकिन मुझ से ज्ञान में आप सब छोटों में कोई कम नहीं है
    बहुत बहुत धन्यवाद

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  20. बेहद ख़ूबसूरत ग़ज़ल..
    हर शेर एक से बढ़कर एक है..

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