सोमवार, 30 जुलाई 2012

आज एक ही शायर के दो रूप देखते हैं, दो ग़जल़ें एक ही शायर की । भोपाल के श्रीतिलकराज कपूर जी से आज सुनते हैं उनकी दो ग़ज़लें ।

बीतता हुआ श्रावण मास खूब मेहरबान हो गया है । इतना मेहरबान कि मेरे जिले की चार तहसीलें पानी में डूबी हुई हैं । सीहोर में गंगा की सहायक नदी पार्वती और नर्मदा दो प्रमुख नदियां हैं । सीहोर से केवल चालीस किलोमीटर पर स्थित कस्‍बा आष्‍टा शनिवार को  पन्‍द्रह ये बीस फीट पानी में डूब गया था । यही हालत अन्‍य तीन स्‍थानों की भी है । हैरत की बात ये है कि मौसम का रंग क्‍या अजीब होता है, सीहोर के पश्चिम में केवल चालीस किलोमीटर पर आष्‍टा है जहां बाढ़ ने कहर ढा दिया है, उत्‍तर में केवल बीस किलोमीटर पर इछावर में भी यही स्थिति है लेकिन सीहोर में पानी नहीं गिर रहा है । बाकी स्‍थानों पर तीन दिन से लगातार पानी गिर रहा है, कोई मौसम विज्ञानी ही बता पाये कि ऐसा क्‍यों होता है कि मेरा घर छोड़ के कुल शहर पे बरसात हुई ।

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प्रीत की अल्‍पनाएं सजी हैं प्रिये

आज तरही में हम सुनने जा रहे हैं श्री तिलक राज जी कपूर की दो ग़ज़लें । पहली एक वचन में है और दूसरी बहुवचन में । पहली ग़जल़ में उन्‍होंने सोलह श्रंगारों को आधार बना कर खूब प्रयोग किये हैं । बहुत खूब बन पड़ी है ये ग़ज़ल ।

Tilak Raj Kapoor

श्री तिलक राज जी कपूर
श्रंगार रस पर मुसल्सछल ग़ज़ल की बात उठते ही मुझे सोम ठाकुर जी से 80 के दशक में हुई एक मुलाकात याद आई जिसमें उन्हों ने कहा था कि श्रंगार तलवार की धार की तरह होता है। जरा सा चूके कि रचना अश्लील हो जाती है। उस समय तक श्रंगार पर मैनें एक गीत भर लिखा था जिसपर उनका आशीर्वाद प्राप्त  हुआ और सराहना मिली। सोम ठाकुर जी की वह बात निरंतर एक दबाव निर्मित करती रही है प्रस्तु्त ग़जलें कहते समय।
दो प्रयास किये हैं; एक हबुवचन में तथा एक एकवचन में। श्रंगार रस में मुसल्सल ग़ज़ल होने के कारण रस-निरंतरता के साथ विषय-निरंतरता ने एक और चुनौती प्रस्तुंत की विषय चयन की। प्रस्तुत ग़ज़ल बस इस प्रयास के लिये निर्धारित प्रयोग हैं। जहॉं बहुवचन की ग़ज़ल में एक घटनाक्रम की निरंतरता है वहीं एकवचन में कही ग़ज़ल दुल्हन के सोलह श्रंगारों का महत्व  बताती हुई और सोलह श्रंगार के बारे में एक अन्य वैब-साईट पर दिये गये विवरण पर आधारित है।

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रूप-श्रंगार की छवि नयी है प्रिये
देख श्रंगार सोलह कही है प्रिये।

रस्म भर की नहीं ये 'अंगूठी' तो इक
प्यानर विश्वास की बानगी है प्रिये।

माँग 'सिन्दूर' की लालिमा यूँ लगे
ज्यूँ  क्षितिज रेख इसमें भरी है प्रिये।

हो रवि ज्यूँ  सलोना उदय काल में 
तेरे माथे ये बिंदी सजी है प्रिये।

दो कटारें नयन की हैं 'काजल' भरीं
रूप लावण्य से तू ढली है प्रिये।

इस करीने से तुझ पर लगी है 'हिना'
प्रीत की अल्पना ज्यूँ सजी है प्रिये।

वेणियों में गुँथी मोगरे की कली
और 'गजरे' में खुश्बू बसी है प्रिये।

हो गुलाबों पे तारों की चादर बिछी
'लाल जोड़े' में तू यूँ सजी है प्रिये।

'कर्णफूलों' के ये केश बंधन कहें
अप्सरा स्वर्ग से आ गयी है प्रिये।

बाजुओं को कसे 'बन्द बाजू' के हैं
स्वर्ण आभूषणों से लदी है प्रिये।

'मॉंग-टीका' बना पथ-प्रदर्शक तेरा
राह दिखलायेगा जो सही है प्रिये।

सात फेरे लिये अग्नि पावन के तब
पार्वती मान में 'नथ' मिली है प्रिये।

आज से तुम पिया से वचनबद्ध हो
'मंगलम्-सूत्र' आशय यही है प्रिये।

आज दूरी पिया घर की 'बिछिया' पहन
बस विदा की घड़ी तक बची है प्रिये।

मातु सी सास देती बहू को बड़ी
पुश्त-दर-पुश्त 'कंगन' वही है प्रिये।

इक 'कमरबन्द ' में चाबियॉं सौंपकर
सास दुल्हन को घर सौंपती है प्रिये।

एक संदेश दे 'पायलों' की झनक
घर पिया के तू जबसे बसी है प्रिये।

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जब से नज़रें हमारी मिली हैं प्रिये।
धड़कनें साथ चलने लगी हैं प्रिये।

हैं अधर मौन पर बात नयना करें
क्यूँ परिंदों से हम अजनबी हैं प्रिये।

भाव भटका किये, शब्द मिलते नहीं
फ़ाड़ दीं चिट्ठियॉं जो लिखी हैं प्रिये।

बादलों में छुपी हैं हवाओं में हैं
प्रेम पाती तुझे जो लिखी हैं प्रिये।

इश्क औ मुश्क छुपना न मुमकिन हुआ
पर्त जितनी भी थीं खुल गयी हैं प्रिये।

कुछ इशारे हुए ऑंख ही ऑंख में
यार करने लगे दिल्लगी हैं प्रिये।

चुन लिया संगिनी एक को, शेष अब
सिर्फ़ इतिहास की संगिनी हैं प्रिये।

मुद्रिकायें बदलने में शामिल हैं सब
अब न बाधक न बाधा बची हैं प्रिये।

अब हमारा मिलन दूर लगता नहीं
छिड़ रही हर तरफ़ रागिनी हैं प्रिये।

हाथ पैरों सजी ये हिना यूँ लगे
प्रीत की अल्पनायें सजी हैं प्रिये।

भोर की लालिमा मॉंग में सज गयी
संदली पॉंव बिछिया चढ़ी हैं प्रिये।

आज स्वागत तुम्हारा पिया द्वार पर
भोर की रश्मियॉं कर रही हैं प्रिये।

कुछ पहर दूर है एक होने का पल
धड़कनों को बढ़ाती घड़ी हैं प्रिये।

सॉंझ से ही धड़कने लगा है ये दिल
कल्प नाओं की लहरें उठी हैं प्रिये।

एक कोने में सिमटी सी सकुचाई सी
भाव औ भंगिमायें नई हैं प्रिये।

नैन जादू भरे कनखियों से चलें
दो कटारी लगें जादुई हैं प्रिये।

दें निमंत्रण लरजते हुए ये अधर
थाम लो, धड़कनें थम रही हैं प्रिये।

देखिये क्या जतन, काम करता है अब
देह अंगार सी तप रही हैं प्रिये

ये प्रहर रात्रि का आज कर दें अमर
फिर न आयें ये ऐसी घड़ी हैं प्रिये।

भोर अलसा रही है मिलन रात्रि की
देह मादक उनींदी हुई हैं प्रिये।

रात काटी है फूलों भरी सेज पर
तेरी अंगड़ाईयॉं कह रही हैं प्रिये।

दाहिने पॉंव की पैंजनी है कहॉं
बात सखियॉं यही पूछती हैं प्रिये।

दोनों ग़ज़लें बहुत सुंदर बन पड़ी हैं । एक वचन में सोल श्रंगारों को जिस प्रकार से ग़ज़ल में ढाला है वो प्रयास अनोखा है । कुछ शेर बहुत सुंदर बने हैं मंगलम् सूत्र का आशय हो या कि कमरबंद में घर सौंपना दोनों ही प्रयोग मन को छू लेने वाले हैं । भारतीय परंपराओं को बहुत सुंदरता के साथ वर्णित कर रहे हैं । कुछ ऐसा ही सुंदर शेर पुश्‍त दर पुश्‍त चलते कंगनों का बन पड़ा है । पीढ़ी दर पीढ़ी चलती परंपराओं को मनो स्‍वर दे दिया है । बहुवचन की तरही भी सुंदर बनी है चुन लिया एक को में मानों तिलक जी ने हम सब की व्‍यथा को ही शेर में ढाल दिया है । इतिहास की संगिनियों का हुजूम सब के जीवन में होता है । मुद्रिकाएं बदलने में शामिल हैं सब में बाधक और बाधा का प्रयोग खूब है । बहुत सुंदर । आनंदम । वाह वाह वाह ।

40 टिप्‍पणियां:

  1. दोनों गज़लें मनभावन,पर तुलना करने से "बहु वचन वाली ग़ज़ल " मुझे ज़ियादा अच्छी लगी। साथ ही ये भी कहना चाहूंगा कि अशआर की इतनी ज़ियादा संख्या ग़ज़ल के हुस्न को अक्सर कमज़ोर कर देती है।

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    1. मैं इस पर पूर्णत: सहमत हूँ कि ग़ज़ल का सौन्‍दर्य उसकी लघुता में ही रहता है, 5-7 शेर के आगे महफि़ल बोर होने लगती है और उस दृष्टि से मुझे स्‍वये इन दो रचनाओं को ग़ज़ल कहने में संकोच है; मैं इन्‍हें प्रयोग कहना अधिक ठीक समझता हूँ, जो कि ये वास्‍तव में हैं। एक प्रयोग दुल्‍हन के सोलह श्रंगार प्रस्‍तुत करने का है तो दूसरा एक घअनाक्रम को। इसी प्रयास में मैनें यह भी जाना कि मूल सोलह श्रंगार व दुल्‍हन के सोलह श्रंगार में आंशिक अंतर होता है।

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  2. तिलकभाईसाहब ने इंगितों को वास्तविकता का रूप दिया है. अश’आर एकवचन के मिसरे में हों या बहुवचन में आपका कौशल्य सप्रमाण है.
    सादर

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    1. मैंनें अपनी पहली ऑनलाईन तरही इसी ब्‍लॉग पर कही थी, फिर पंकज भाई की पाठशाला के पाठ भी पढ़े। तेरा तुझको अर्पण। ब्‍लॉग जगत से जो कुछ मिला वही लौटाने का प्रयास भर है।
      मैं उन सभी का आभारी हूँ जो प्रोत्‍साहित करते रहते हैं, कमी इंगित कर सुधार की दिशा देते हैं।

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  3. तिलक जी बस कमाल हैं.. दो ग़ज़लें, दोनों कमाल, इत्ते सारे शेर और सब एक से बढ़ कर एक. गजब के शेर कहे हैं. तिलक जी को बहुत बहुत बधाई.

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    1. आपकी पीढ़ी उर्जा दिये रहती है, वरना दिल तो कहता है कि:
      दौड़ता ही जा रहा है दो घड़ी विश्राम कर
      लोग तुझको याद रक्‍खें एक ऐसा काम कर।

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    1. शुक्रिया, शिव। लफ़ज़ों की महिमा तो भाई अपरंपार है।
      लफ़्ज़ ही मरहम कभी तो बाण होते लफ़्ज़ हैं
      हो कोई भाषा सभी के प्राण होते लफ़्ज़ हैं।

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  5. सुन्दर सुन्दर...अति सुन्दर...

    सादर
    अनु

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  6. प्रभाव को विस्‍तार देती पंकज भाई की प्रस्‍तावना, प्रोत्‍साहन और प्रासंगिक चित्र-चयन के लिये विशेष रूप से आभारी हूँ।

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  7. एकवचन के चौथे शेर में बाद में आंशिक सुधार किया था। आरंभ यूँ है 'सूर्य हो ज्‍यूँ सलोना उदय काल में'।

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  8. तिलक जी बहुत निराले शायर हैं...लाखों में एक...सबसे बढ़िया बात ये है के वो जितने अच्छे शायर हैं उस से भी अच्छे और प्यारे इंसान हैं और जैसी प्रतिभा उनमें है वैसी इश्वर हर किसी को नहीं देता...आसपास की चीजों पर उनकी पकड़ ग़ज़ब की है...मैंने कई बार देखा है जिस शेर पर माथापच्ची करने के बाद मैं उनकी शरण में मदद के लिए जाता हूँ वो उसे चुटकी में कह देते हैं....ये दोनों ग़ज़लें मेरी उनके बारे में व्यक्त की गयी धारणा की पुष्टि करती हैं...

    सोलह श्रृंगार पर कहीं उनकी ग़ज़ल कमाल की है...मांग के सिन्दूर की कल्पना क्षितिज रेखा से करना, लाल जोड़े पर तारों की चादर की कल्पना , नथ के साथ पार्वती का जिक्र अद्भुत है .

    दूसरी ग़ज़ल के "भाव भटका किये..." "कुछ इशारे हुए..." " अब न बाधक न बाधा..."" नैन जादू भरे...""दाहिने पाँव की..." जैसे शेर पढ़ कर हम तो लट्टू हो गए उनकी प्रतिभा पर....
    जियो तिलक भाई जियो...

    नीरज

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    1. आपकी संगत का असर है, अपन तो बस अंगुली पकड़ पहलवान हैं। कुछ मित्रों को शायद ये नया लग रहा हो तो समझा देता हूँ। जब किसी पहलवान की अंगुली पकड़ कर कोई पिद्दा चलता है तो पहलवान साहब को मिलने वाले हर सलाम को वो अपने लिये सलाम मानता है।
      आपकी अंगुली पकड़े-पकड़े ऐसे ही कुछ सलाम इस पहलवान को भी मिल जाते हैं।

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    2. जो अखाड़े बाज़ हैं उन्हें मालूम है पिद्दा कौन है और पहलवान कौन...आप तो वैसे भी माशा अल्लाह पहलवान लगते हैं...ये आप की महानता है के खुद को पिद्दा बता रहे हैं...मैंने जो धोबी पछाड़ दांव सीखे हैं वो सब आपकी कृपा से ही तो सीखें है...अमाँ पेलवान कभी सच भी बोल दिया करो...यूँ खामखाँ क्यूँ चने के झाड पे चढ़ा रिये हो... हम के रए हैं वां से गिर गए तो इस उम्र में हमारी हड्डी टूट गयी तो जुड़ेगी भी नहीं...

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    3. चलिये ये भेद ही रहने दिया जाये। इसी में दोनों की खैरियत है।

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  9. अगर प्रोड्क्ट किसी ख़ास मक़्सद को लेकर बनाया जाए तो चाहे कुछ हो वो मोनोटोनस नही हो सकता .... और यही बात आ. तिलक जी की इन दोनों ग़ज़लों में है, आप पढेंगे ही पढेंगे दोनों ग़ज़ल को और हर शे'र बारिक़ से ताकी जो कहा जा रहा है कितना है ! वाह बेहद ख़ुबसूरती से लिखी गई दोनों ग़ज़ल है ! और क्या ख़ूब कही गई है ! सोलह श्रृंगार वाली ग़ज़ल ने क़हर बरपा रखा है !
    प्रयोग मुझे हमेशा से अच्छे लगते हैं गज़लों में जो उसके स्वाद को बनाये रखने में सहायक होते हैं !
    उपर नीरज जी ने सही कहा है तिलक जी जितने अच्छे शाईर हैं उतने अच्छे इन्सान भी सीहोर जाते हुये भोपाल में उनसे मुलाक़ात हुई थी..
    फिर से बहुत बधाई इन दोनों ग़ज़लों के लिये !

    अर्श

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    1. तिलक राज जी की दोनों ग़ज़लें श्रृंगार रस से सराबोर होकर ताजगी लाने और आनंदित करने वाली हैं ! पहली गज़ल का पांचवा और छठा शेर तथा दुसरी गज़ल का मतला ,दूसरा ,तीसरा ,नवां और पन्द्रहवां शेर खासतौर पर पसंद आये !

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    2. नौजवान पीढ़ी के ताज़ा-ताज़ा अनुभवों के बीच मेरी पीढ़ी की खुराफ़ात हैं ये दोनों ग़ज़ल।
      आभारी हूँ आपका।

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    3. भाई तिलकजी

      इन सुन्दर गज़लों को पढ़ने के बाद तो मैं यही कह सकता हूँ कि नीरजजी के साथ साथ एक नाम और जोड़ लें. आपकी विवरणात्मक सौन्दर्यपूर्ण कल्पनाशीलता की परछाईम हमें भी उपलब्ध हो सके.
      ढेरों दाद स्वीकारें

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    4. राकेश भाई साहब, हृदय से आभारी हूँ। स्‍नेह बनाये रखें। प्रेरणा देते रहें।

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  10. बहुत अच्छा लिखा तिलक भाईसा ! सोलह श्रृंगार को पढ़ना तो कब का छोड़ चुके थे। फिर से आपने पढ़ा दिया ।

    और दूसरी ग़ज़ल में पल पल बदलते भाव...!!

    मतलब कि दोनो थीम ही चुनना कठिन और नया था, फिर उस पर ग़ज़ल तैयार करना.... खूब

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    1. स्‍त्री से श्रंगार जुड़ा ह़आ है और दुल्‍हन उसका एक विशेष रूप है। दुनिया की शायद ही कोई संस्‍कृति हो जिसमें दुल्‍हन का श्रंगार न होता हो। हमारी संस्‍कृति में सब कुछ संख्‍याओं में ही निर्धारित है और उसमें सोलह का एक अलग ही महत्‍व है। इस सोलह श्रंगार को साहित्‍य में स्‍थान मिलना ही चाहिये। तरही में वो अवसर मिल गया तो ध्‍यान में आई बात 'मत चूकै चौहान'। अवसर भुना लिया।

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  11. एक बात और

    हो रवि ज्यों सलौना उदय काल में---पढ़कर कालेज के दिनों में सुना एक शेर याद आ गया

    तुमने तो आज बिन्दी को इस तरह लगाया है
    लगता है चाँद में से चाँद निकल आया है

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    1. कालेज के दिन तो बड़ी शराफ़त से कट गये थे मेरे।
      हॉं बाद में जरूर एक गर्ल्‍स कालेज के सामने खड़े होकर एक शेर कहा था कि:
      चॉंद फ़क्‍त मेरे चेहरे पर, शेष चॉंद से चेहरे हैं
      यहॉं से गायब हैं जो ज़ुल्‍फ़ें, वहॉं उन्‍हीं के पहरे हैं।

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    2. वाह क्या ही ग़ज़ब की मनभावन ग़ज़ल है, सच में इन बारिशों के मौसम में यह गीत सलोने, अलफाज पुराने या ड़ाए...तिलक जी बहुत बहुत बधाई। सुबीर जी की पाठशाला का कमाल भी देख लिया। मैंने शुरूवाली कक्षा में दाखिला नहीं ली थी, काश वो दिन फिर लौट आए!!!
      देवी नागरानी

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    3. आभारी हूँ हृदय से।
      सुबीर जी की पाठशाला की चाबी गुरूजी के बजाय विद्यार्थियों के पास रहती है। चाहे जब खोल लें और कोई भी पाठ पढ़ लें- लेकिन ये संदेश उनके लिये है जो ग़ज़ल सीखना चाहते हैं; आप तो स्‍वयं ही सशक्‍त हस्‍ताक्षर हैं ग़ज़ल में।
      मैंने तो आप से बहुत कुछ प्राप्‍त किया है।
      स्‍नेह बनाये रखें।

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  12. तिलक जी ,बहुत बहुत बधाई हो
    दो ग़ज़लें और दोनों अलग अलग मेज़ाज की !!
    कमाल के प्रयोग हैं जनाब !!

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  13. कल बिजली चली गयी इस लिये भाई साहिब की गज़ल देख नही पाई। नही तो और कहीं जाऊँ य न मगर अपने भाई के घर सब से पहले जरूर आती हूँ।ये इतना कुछ इस लिये कह रही हूँ कि कमेन्ट क्या करूँ यही समझ नही आ रहा। बस हर शेर 2--2 3--3 बा पढा--- पढे जा रही हूँ और हैरान हो रही हूँ--2 -2 गज़लें और वो भी कमाल? वाह भाई साहिब मै सच मे खडे हो कर आपको सलाम कर रही हूँ। चांम्द की बिन्दी वाला शेर कई जगह पढ्क़ा लेकिन जो खूबसूरती और सादगी इस शेर मे तिलक भाई साहिब ने कही है वो कमाल है_
    दाहिने पाँव की पैंजनी---- बहुत गहरे अर्थ लिये है ये शेर
    भोर की लक़लिमा---
    कर्ण फूल'गुलाब तीका क्या क्या अलंकार नही हैं इन गज़लों मे । दुलहन सी सजी गज़लों के लिये भाई साहिब को बधाई।

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    1. आपकी स्‍नेहासिक्‍त टिप्‍पणी से अभिभूत हूँ।

      एक ही शेर ऐसा असर कर गया
      लोग हँसते रहे, मेरा दिल भर गया।

      शेर की संप्रेषणीयता, ग्राह्यता पर भी निर्भर करती है। न जाने किस तक क्‍या बात पहुँचे।

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  14. आ.कपूर साहब का ग़ज़ल की विधा पर जो अधिकार है, उसी से यह मुमकिन हो सका है कि उन्होंने इतने रंग अपनी दोनों ग़ज़लों में बरसाए हैं।आनंद आ गया।हम जैसे नए लोगों को इस महफ़िल में न सिर्फ ग़ज़ल का लुत्फ़ मिलता है बल्कि दानिश्वरों से सीखने की भी हज़ार बाते मिलती हैं।

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    1. बहुत कोशिश करने पर भी नाम याद नहीं आ रहा है नाम, शायद साहिर लुघयानवी साहब का एक शेर है कि:
      दुनिया ने तर्जु़बातो हवादिस की शक्‍ल में
      जो कुछ मुझे दिया है वो लौटा रहा हूँ मैं।
      शायर ऐसा कुछ नहीं कहता जो उसे कहीं न कहीं से मिला न हो।
      तसव्‍वुर, अहसास सब कुछ आस पास ही होता है।
      आभारी हूँ आपकी टिप्‍पणी के लिये।

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    2. इसमें शायद जैसे कोई बात नहीं है जनाब ये साहिर का ही शेर है...:-)

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    3. मैं कभी आपसे मिलूँ और पहचान पाऊँ तो पहचान जरूर दीजिये। इस दुष्‍ट खोपड़ी को अक्‍सर क्‍न्‍फ़्यूज़न हो जाता है नामों के बारे में। इसका एक हल मैनें ये निकाला कि कोई भी थोड़ा बहुत जाना-पीचाना लगे उससे हाल-चाल पूछो, अंतरंगता से बातें करो, गोल-मोल प्रश्‍न करो, गोल-मोल उत्‍तर दो। बिना पहचाने भी वक्‍त कट जायेगा।
      एक बार मुझ जैसे ही एक सज्‍जन टकरा गये। दोनों 15 मिनट तक गपियाते रहे; तभी उनसे मिलने आने वाला सही व्‍यक्ति आ गया और उनको पहचान गया; तब भेद खुला कि मैं जिनसे गपिया रहा था वे सज्‍जन भी मेरी ही स्थिति में गपियाये जा रहे थे जबकि उनका मेरा दूर का भी कोई संबंध नहीं था। बस मिलते जुलते चेहरे का भ्रम हो गया था।

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  15. आदरणीय तिलक जी, प्रणाम आपको और आपके प्रयोग को. ये कुछ ऐसा ही है जो ग़ज़ल के माध्यम से सम्पूर्ण भावाव्यक्ति को एक पृष्ठ पर उकेरने का भागीरथ प्रयास है.
    सोलह श्रृंगार के महत्व को आपने ग़ज़ल में भी संग्रहणीय बना दिया है.
    बहुवचन वाले अशआर भी पूरे प्रवाह में है. ये सब एक यादगार क्षण है. आपकी निष्ठा देखते हुए यही कह सकता हूँ- हैं मिले 'राही' मार्गदर्शक सब यहीं.

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    1. आपका तहे दिल से शुक्रिया।
      तरही एक कसौटी होती है मेरे लिये इसलिये प्रयास में तो कोई कमी नहीं रखता अवनी तरफ़ से लेकिन यह बात भी उतनी ही सत्‍य है कि अच्‍छे शेर बहुत मेहनत मॉंगते हैं। उतना समय तरही को दे पाना कठिन हो जाता है।

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  16. तिलक जी, हमेशा कुछ न कुछ नया प्रयोग करते हैं. इस बार एकवचन में सोलह श्रृंगारों को जबरदस्त गूंथा है, और बहुवचन में भी कमाल ग़ज़ल कही है. दोनों ही ग़ज़लें अच्छी लगी. तहे दिल से मुबारकबाद.

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  17. इतने सारे शे’र और सारे ही कमाल के शे’र तो तिलक जी ही कह सकते हैं। उनकी लेखनी को नमन और इन शानदार ग़ज़लों के लिए बहुत बहुत बधाई

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  18. शेरों का ढेर लगा दया है तिलक राज जी ने और दोनों वचनों में गज़ल की बौछार कर दी ....
    ए कमाल तिलक जी को ही हांसिल है की हर शेर ऐसा लग रहा जैसे नया हो ... हम तो बस आनंद ही ले सकते हैं इस बरसात का ... बहुत खूब ... क्या बात क्या बात ....

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