गुरुवार, 30 अक्तूबर 2014

दीपावली से जुड़े हुए महापर्व छठ पर्व पे सूर्य को प्रात: का अर्घ्‍य देकर सुनते हैं दो रचनाएं। एक हजल और एक सजल ।

हजल और सजल ? ये क्‍या हो रहा है । इसल में हजल तो हजल होती है । उसके बारे में तो बताने की आवश्‍यकता नहीं है । लेकिन एक सजल भी होती है । सजल वो जो भावनाओं के, प्रेम के जल से परिपूरित होती है । और उस सजल कलश से हम उन सब अपनों को अर्घ्‍य देते हैं जिनसे हम प्रेम करते हैं नेह करते हैं । चूंकि ये रचना प्रेम के जल से परिपूरित होती है इसलिए इसे सजल कहा जाएगा। जीवन में इस जल का बहुत महत्‍व भी है और शायद आज की तारीख में बहुत आवश्‍यकता भी है । तो आज एक हजल श्री मन्‍सूर अली हाशमी जी की और एक सजल श्री राकेश खण्‍डेलवाल जी की। चूँकि भभ्‍भड़ कवि भौंचक्‍के के आने के लिए कुछ भूमिका भी तो बनानी है इसलिए हाशमी जी की हजल का होना तो बनता ही बनता है। और ये सजल जो है ये राकेश जी ने कल की पोस्‍ट में टिप्‍पणी के रूप में की थी, मैंने उसे वहां से डिलिटिया दिया और उसे यहां के लिए सुरक्षित कर लिया । हो सकता है कि डिलिटियाने के पूर्व कुछ लोगों ने उसे वहां पढ़ लिया हो। तो वही है । एक राज की बात बताऊं इस बार के मिसरे में हजल की ज़बरदस्‍त संभावना थी। मैं सोच रहा था कि कुछ और आएंगी लेकिन एक ही आई । तो आइये सुनते हैं सजल और हजल।

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अँधेरी रात में जब दीप झिलमिलाते हैं

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राकेश खंडेलवाल जी

गज़ल के शेर ये तब होंठ आ सजाते हैं
‘तिलक’ लगाये जो ‘नीरजजी’ मुस्कुराते हैं

गज़ब की सोच लिये लोकगीत की धुन पर
कई हैं झोंके जो ‘सौरभ’ से गुनगुनाते हैं

है ‘शार्दुला’ की छुअन जो नई खदानों से
तराशे खुद को कई हीरे निकले आते हैं

‘द्विजेन्द्र  द्विज’ ने कहा क्या  न जाने कानों में
के ‘नास्वां जी दिगम्बर’ जो खिलखिलाते हैं

कहा ‘मुकेश’ से कल ये ‘गिरीश’-‘पंकज’ ने
तमाम शे’र ये ‘नुस्रत’ से रब की आते हैं

हुये कलामशुदा हैं ‘भरोल’ कुछ ऐसे
‘सुबीर’ देख के फूले नहीं समाते हैं

‘शिफ़ा’ के हाथ की मेंहदी के देख कर बूटे
“सुबीर सेवा” पे ‘डिम्पल’ सँवर के आते हैं

‘सुधा’ बरसती है ‘लावण्य’ निखरा आता है
बड़ी ‘सुलभ’ता से अशआर कहे जाते हैं

हुआ है ‘दानी’ भी ‘शाहिद’ ये ‘हाशमी’ ने कहा
‘नवीन’ क्या है ये ‘सज्जन’ समझ न पाते हैं

किरण से चमके हैं ‘पंकज’ पे कण तुहिन के या
“अंधेरी रात में ये दीप झिलमिलाते हैं”
 

और ये शे'र पूरी सुबीर संवाद सेवा की ओर से राकेश खंडेलवाल जी को । इसे राकेश जी ने नहीं लिखा बल्कि भभ्‍भड़ कवि भौंचक्‍के ने लिखा है ।

खड़े ही रहते हैं ‘भभ्भड़ कवि भी भौंचक्के’ 
मधुर सा गीत जो ‘खंडेलवाल’ गाते हैं

क्‍या कोई नाम छूटा है  ? नहीं छूटा है। सब के सब आ गये हैं। क्‍या बात है पूरी की पूरी दीपावली तरही के रचनाकारों के नाम शामिल हो गए हैं । कहीं कोई भी नहीं छूटा । ये राकेश जी का ही कमाल है, वो शायद सोचते भी गीतों में ही हैं । उनके विचार भी छंदों के ही रूप में आते हैं । सुबीर संवाद सेवा के आयोजन दरअसल पारिवारिक आयोजन होते हैं। यहां हम मिलते हैं उत्‍सव मनाते हैं और आनंद लेते हैं। और ये जो सजल है ये उसी आनंद में कुछ बढ़ोतरी कर रही है ।

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Mansoor ali Hashmi

मन्सूर अली हाशमी

ढली है उम्र,  मगर अब भी वो लजाते हैं
वो 'फेसबुक' पे भी पहने नक़ाब आते हैं।

है प्यार मैके से लेकिन वो कम ही जाते है 
बस अपनी मम्मी को जब-तब यहीं बुलाते हैं।

वो करवा चौथ को कुछ इस तरह मनाते हैं
न खाते ख़ुद है,  न हमको ही वो खिलाते हैं।

उन्हें भी लत लगी अब फेसबुक पे जाने की
सुहानी रात में हमको परे हटाते हैं  !

कभी वो 'चकड़ी' पकड़ती तो हम 'चगाते' थे
अब अपनी-अपनी पतंगें  अलग उड़ाते हैं। 

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जीवन में हर रस का अपना महत्‍व है । और हास्‍य का तो विशेष तौर पर महत्‍व है। हजल विशुद्ध हास्‍य की रचनाएं होती हैं। क्‍योंकि व्‍यंग्‍य तो सामान्‍य रूप से ग़ज़लों में ही होता है। हजल गुदगुदाती है आनंद देती है। वैसे इस हजल में एक शेर ऐसा भी है जो हजल से हट कर है । आखिरी शेर दूसरे अर्थ में देखा जाए तो मन को गहरे तक छू जाता है और पलकों की कोरों को भिगो भी देता है। वरना हँसने के लिए तो करवा चौथ और फेसबुक है ही। ग़नीमत है अभी इस प्रकार की करवा चौथ पूरे देश में नहीं हुई है। अंतिम शेर का आनंद लेने में जिन लोगों को देशज शब्‍दों के कारण दिक्‍कत  आ रही हो तो उनके लिए ये कि पतंग दो लोग मिलकर उड़ाते हैं। एक धागे चरखी ( चकड़ी और चड़खी भी कहते हैं जिसे बोली में) पकड़ता है और दूसरा पतंग उड़ाता है, धागा  छोड़ता है ( चगाता है ) । आनंद लीजिए इस शेर का और मुस्‍कुराते रहिए।

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भभ्‍भड़ कवि भौंचक्‍के इस समय सचमुच में भौंचक्‍के हैं। कुछ सूझ नहीं रहा है कि अपनी इज्‍जत ( इज्‍़ज़त नहीं इज्‍जत) कैसे बचाई जाए। खैर कुछ न कुछ तो सूरत निकलेगी ही अभी तो देव उठनी ग्‍यारस में तीन दिन हैं बीच में संडे है तो कुछ न कुछ तो होगा। तो आज की दोनों रचनाओं का आनंद लीजिए और दाद देते रहिए।

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10 टिप्‍पणियां:

  1. छठ के घाट से लौटा हूँ.. पुनः उपस्थित होता हूँ..

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  2. जनाब मन्सूर अली हाशमी साहब की ’हज़ल’ पर ढेरों बधाइयाँ.
    आपका आखिरी शेर जिस कमाल हुआ है, उसी भाव से हम इसे स्वीकार रहे हैं. अब अपनी-अपनी पतंगें अलग उड़ाते हैं.. .. निश्शब्द हूँ, आदरणीय.
    माहौल बनाने के लिए दिल की गहराइयों से शुक्रिया.

    और अपनी प्रेरणा से क्या कह सकता हूँ, सिवा आपके कहे से अभिभूत होने के ? अस्फुट शब्दों में बस इतना ही -

    हम आत्मीय ’सजल’ पर निसार जाते हैं
    कृतज्ञ हूँ कि ग़ज़लकार भाव पाते हैं
    बहुत है शुक्रिया खण्डेलवाल जी ’राकेश’
    हमारे जैसे सभी लोग सिर झुकाते हैं..

    इस मंच ने रचाधर्मियों को अगूत इज़्ज़त दी है..
    सादर

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  3. जिस अंदाज़ से तथाकथिक सजल को आदरणीय राकेश जी ने रचा है वो सिर्फ और सिर्फ उनके ही बस की बात है। इतनी आत्मीयता से सब का जिक्र करना कोईउनसे सीखे। ये ब्लॉग सिर्फ एक ब्लॉग ही नहीं एक परिवार है जिसमें सब एक दूसरे से प्यार भी करते हैं और एक दूसरे का आदर भी। राकेश जी की सजल ने भाव विभोर कर दिया।

    मंसूर भाई लाजवाब ज़िंदादिल इंसान हैं और ये जिन्दा दिली उनके कलाम में भी देखीजा सकती है। गुदगुदाती हुई उनकी हज़ल अचानक आखरी शेर में यु टर्न ले लेती है और आज के हालात को बयाँ करती है जिसमें हर इंसान तन्हा है। ज़िंदाबाद मंसूर भाई ज़िंदाबाद।

    भभ्भड़ कवि यूँ ही नर्वस हो रहे हैं अब उन्होंने हर बार कालजयी रचना रचने का ठेका थोड़े ही लिया है कभी कभी अति साधारण रचना भी असाधारण असर छोड़ने में कामयाब होती है। वैसे भी भभ्भड़ कवि उस बात को लेकर चिंतित हैं जो किसी ने उन्हें दी ही नहीं अरे वो ही 'इज्जत'जिसके लुटने का डर उन्हें सता रहा है , आज तक सभी ने उन्हें प्यार दिया है और वो हमेशा उन्हें मिलता रहेगा ये ससुरी "इज्जत" कहाँ से बीच में आ गयी।

    भभ्भड़ कवि महाराज आप तो पधारो म्हारे देस। बिंदास।

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  4. पंकज भाई फिकिर नहीं करने का; क्‍या। ऐसा बयान भी दिया जा सकता है, देने में क्‍या हर्ज है। अपने को पता है कि ऐसा होने की नौबत आ ही नहीं सकती। मेरा नाम जोकर जब बनी थी तब नहीं चली; आज कहते हैं कि ऑस्‍कर लायक थी। भभ्‍भड़ भाई की ग़ज़ल किसी को समझ नहीं आई तो उसे कहेंगे बीस साल बाद आकर पढ़ना, जब समझ आ जायेगी तब ये ग़ज़ल भी समझ आ जायेगी। फिकिर नॉट- आप तो आओ जी बॉकी नीरज जी देख लेंगे।
    राकेश जी की ग़ज़ल में आपको भी शामिल कर ही लिया गया है। अब निडर पोस्‍ट करने का; क्‍या।
    मंसूर अली हाशमी साहब; वक्‍त रहते ये शरारतें कर लीं होती तो उस उम्र में यह सब नहीं कहना पड़ता (या यह कहें कि कहने की हिम्‍मत शेष न रही होती) बहरहाल दीवाली में जेब कटने का जो ग़म हुआ होगा वह इस बेग़म ग़ज़ल ने दूर कर दिया होगा पढ़ने/ सुनने वालों का।

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  5. बहुत सुंदर हजल हाशमी जी की ...

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  6. क्या कहने इस हजल के ... हँसे बिना रुका नहीं जा रहा ... जनाब मंसूर अली जी ने समा बाँध दिया ... इस मुशायरे को और भी ऊंचा उठा दिया ... अंतिम शेर केवल शेर ही नहीं ... पूरी पीड़ी के बदलाव को बयान कर रहा है जिसको हम अपनी आँखों से सामने देख रहे हैं ...

    राकेश जी की कलम जब खुलती है तो जैसे झरने अपने आप ही फूटने लगते हैं ... ऐसा कलाम कहना किसी दुसरे के बस में नहीं था ... हर किसी को साथ ले लिया उन्होंने तो ...

    अब बस इंतज़ार है हो हर दिल अज़ीज़ कवि राज दा ....

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  7. सुबीर जी, सौरभ जी, नीरज जी, तिलकराज जी, नीरजकुमार नीर एवं दिगमबर नासवा जी, हज़ल से आप लोग 'गुदगुदे' तो मैं भी आप लोगों से दाद पा कर 'गदगद' हूँ. धन्यवाद.

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    1. ढली है उम्र फिर भी "लाईनें" लगाते हैं
      इसीलिये तो हुज़ूर आनलाईन आते हैं
      जनाब हाशमी आकर हज़ल सुनाते हैं
      गुदगुदा हमको जनाब कहकहे लगाते हैं
      हमें तो इन्तज़ार रहता है हमेशा ही
      तिलकजी देखें कहाँ अब के चूक पाते हैं
      लिखा जो आपको भाया तो शुक्रिया यारो
      हम बन्दगी में सदा सर को खम ही पाते हैं

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  8. शुक्रिया खण्डेलवाल जी.....
    "ये हम के खोल के बस रख दिया हैं दिल अपना
    लिहाफ औढ़े, कईं मित्र फुसफुसाते है ! "

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  9. अरे ये पोस्ट तो छूट ही गई थी। :)

    राकेश जी के बारे में क्या कहूँ। वो स्वप्न में भी गीत और ग़ज़ल कह सकते हैं। उनके दिमाग़ की तंत्रिकाएँ आपस में जिस तरह से जुड़ी हुई हैं वो सैकड़ों वर्षों में किसी एक के साथ होता है।

    मन्सूर साहब को इस हास्य ग़ज़ल के लिए तह-ए-दिल से मुबारकबाद।

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