सोमवार, 20 अक्तूबर 2014

अँधेरी रात में जब दीप झिलमिलाते हैं, आइये आज से शुरू करते हैं दीपावली तरही मुशायरा ।

सुबीर संवाद सेवा पर तरही का आयोजन हमेशा से एक उत्‍सव की तरह रहा है । जब ये आयोजन पिछले एक डेढ़ साल से कुछ कम हुए तो ऐसा लगा कि कहीं कुछ छूट रहा है । सीहोर के कवि स्‍व. मोहन राय की कविता की पंक्तियां याद आती रहीं '' कोई गीत नहीं है उपजता, कुछ छूट रहा है'' । बहुत सहमे हुए क़दमों से जब दीपावली की तरही की भूमिका बांधी तो मन में कई तरह के विचार थे । लेकिन जिस प्रकार से सबने आकर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई और उसके बाद ग़ज़लें भेजीं उससे, लगा कि नहीं जब जागो तभी सवेरा वाली बात ग़लत नहीं है । एक बहुत मन को छू जाने वाली बात नीरज जी की ग़ज़ल के साथ आई ''ये करिश्मा सुबीर संवाद सेवा है जिसकी बदौलत कोई छह महीने के बाद ये ग़ज़ल हुई है'' । बस यही तो वो आत्‍मीयता है वो सूत्र है जो हम सबको जोड़े हुए है । ये आत्‍मीयता बनी रहे बस यही कामना है ।

deepawali

deepawali (16)

अँधेरी रात में जब दीप झिलमिलाते हैं

deepawali 

आइये आज से शुरू करते हैं दीपावली के त्‍योहार के अवसर पर यह विशेष तरही आयोजन। झिलमिलाना एक विशेष गुण है जो कि जगमगाने से कुछ अलग होता है । दीपको के संदर्भ में तीन प्रयोग आते हैं झिलमिलाना, जगमगाना और टिमटिमाना। यही प्रयोग सितारों के संदर्भ में भी प्रयुक्‍त होते हैं । सितारों के संदर्भ में जगमगाना प्रयोग नहीं होता । जगमगाना एक प्रकार से समृद्धि का, एश्‍वर्य का और कुछ मायनों में दंभ का भी प्रतीक होता है जबकि झिलमिलाना स्‍वाभिमान का प्रतीक होता है। सूर्य जगमगाता है, सितारे झिलमिलाते हैं या टिमटिमाते हैं। जो कुछ है उसे पूरी शिद्दत के साथ प्रदर्शित करने का गुण झिलमिलाना होता है । जगमगाने की क्रिया में खुद्दारी, स्‍वाभिमान नहीं होता जबकि झिलमिलाने में होता है । इस मिसरे में झिलमिलाना काफी सोच समझ कर रखा गया है । और अच्‍छा लगा ये जानकर कि उसका सभी रचनाकारों ने बहुत ध्‍यान रखा ।

deepawali (4)

dharmendra kumar

धर्मेन्द्र कुमार सिंह

अँधेरी रात की फ़ाक़ाकशी मिटाते हैं
फ़सल छतों पे उजाले की हम उगाते हैं

लड़ाइये न इन्हें आँधियों से बेमतलब
जला के दिल को दिये रोशनी लुटाते हैं

उजाले साथ ही चलते हैं रात भर उनके
जो बनके चाँद अँधेरों के पास जाते हैं

किसी विजय या पराजय से है ये बात बड़ी
उजाले आज सभी को गले लगाते हैं

अँधेरा काँपने लगता है रोशनी छूकर
अँधेरी रात में जब दीप झिलमिलाते हैं

प्रकाश कम है कहीं दीप ही न बुझ जाए
चलो ख़याल की बाती जरा बढ़ाते हैं

क्‍या बात है सभी शेर एक से बढ़कर एक हैं । सबसे बेहतरीन प्रयोग गिरह के शेर का मिसरा उला है । यही वो सोच है जिसको लेकर ऊपर संकेत दिया गया है । जगमगाने वालों से कोई नहीं कांपता लेकिन झिलमिलाने वालों से कांपते हैं सब । मतला भी बहुत अच्‍छा है । अंधेरी रात की फाकाकशी.... खूब प्रयोग है भई । आखिरी शेर भी खूब बन पड़ा है । ख़याल की बाती ज़रा बढ़ाने की बात कई कई संदर्भों की ओर संकेत देती है । चांद बनके अंधेरों के पास जोन का प्रयोग भी खूब है । बहुत ही सुंदर ग़ज़ल है । वाह वाह वाह ।

deepawali (4)

digambar

दिगंबर नासवा


पुराने प्यार की वो दास्ताँ सुनाते हैं
मेरी दराज़ के कुछ ख़त जो गुनगुनाते हैं 

चलो के मिल के करें हम भी अपने दिल रोशन
अँधेरी रात में जब दीप झिलमिलाते हैं

तुम्हारे आने की हलचल सी थी हवाओं में
तभी तो बाग़ के ये फूल खिलखिलाते हैं

झुकी झुकी सी निगाहें हैं पूछती अकसर
ये किसके ख्वाब मुझे रात भर जगाते हैं

कभी न प्यार में रिश्तों को आजमाना तुम
के आजमाने से रिश्ते भी टूट जाते हैं 

कई बार ऐसा होता है कि एक मिसरे पर ही सब कुछ कुर्बान कर देने को मन करता है । जैसे कि ये मिसरा 'ये किसके ख्‍़वाब मुझे रात भर जगाते हैं ' । बहुत ही सुंदर मिसरा है । कई बार जाने हुए के बारे में कहने से ज्‍यादा सुंदर होता है अनजाने के बारे में कहना । गिरह का शेर अलग तरीके से बना है । सामान्‍य प्रयोग के बदले कुछ अलग किया गया है । मिसरे के 'जब' श‍ब्‍द को केन्‍द्र में कर दिया गया । बहुत ही सुंदर। पूरी ग़ज़ल बहुत ही कमाल बनी है । वाह वाह वाह।

deepawali (4)

girish pankaj

गिरीश पंकज

लगे है जैसे कोई गीत गुनगुनाते हैं
अंधेरी रात में जब दीप झिलमिलाते हैं

अन्धेरा हमको डराता रहा ये माना पर
चराग़ हाथ में हो गर तो मुस्कराते हैं

हमेशा अपने लिए जीना कोई जीना है
चलो के चल के ज़रा रौशनी लुटाते हैं

किसी भी दर पे  अँधेरा फटक नहीं सकता
समझ के अपना ही घर दीप हम जलाते हैं

सुना है हमने यही के अँधेरे हैं ज़ालिम 
मगर ये सच है उजालों से खौफ खाते हैं 

अगर हो साथ में दीपक तो डर नहीं लगता
चले हैं शान से औ रास्ता बनाते हैं

पूरी की पूरी ग़ज़ल अँधेरे और उजाले के संघर्ष की ग़ज़ल है । तमसो मा ज्‍योर्तिगमय  के सूत्र वाक्‍य पर लिखी हुई है । मगर ये सच है उजालों से खौफ खाते हैं में बहुत दूर की बात कही है । हर अंधेरा उजाले से डरता है । क्‍योंकि प्रकाश उसका समापन कर देगा। ठीक वैसे ही जैसे प्रतिभाहीन लोग प्रतिभावानों से डरते हैं। मतले में ही बहुत सुंदर तरीके से गिरह बांध दी है । झिलमिलाने को गीत के गुनगुनाने के साथ प्रयोग कर बहुत सुंदर तरीके से बात कही गई है। बहुत सुंदर ग़ज़ल वाह वाह वाह।

deepawali (4)

deepawali (16)

deepawali 

बहुत ही सुंदर शुरुआत हुई है तरही मुशायरे की । अब आप सब की बारी है दाद देने की । ज़रा खुल कर खिल कर दाद दीजिए । दाद देने से उत्‍साह में और आनंद आता है । तो आज के इन तीन शायरों की रचनाओं का आनंद लीजिए तालियां बजाइये वाह वाह कीजिए। कल कुछ और शायरों के साथ मिलते हैं ।

45 टिप्‍पणियां:

  1. सुबीर भाई, आप कमाल करते है .मेरा यह अनुभव है कि वैसे तो एक भी शेर कई बार संभव नहीं होता मगर तरही मिसरा मिल जाये तो कुछ शेर जाने कहाँ से उतर आते है. आपको धन्यवाद कि आपने लिखवा लिया कुछ. मगर हम जैसे अनाड़ियों की तो ये कोशिश ही है. खैर, जैसी भी है उजाले के पक्ष में खड़ी है. सबको शुभदीपावली

    उत्तर देंहटाएं
  2. शब्द-संप्रेषण की नैसर्गिक उपलब्धि रचनाएँ होती हैं, जिनका होना, विशेषकर किसी रचनाकार के लिए, सात्विक पर्व से गुजरने की तरह हुआ करता है. यही भाव यदि समूहवाची हो तो इसकी आवृति सर्वसमाही हुआ करती है. ऐसे में, ’झिलमिलाना’, ’जगमगाना’, ’टिमटिमाना’ जैसे शब्दों के बीच का भाविक अंतर पूरी सकारात्मक तार्किकता के साथ सामने आने लगे, शब्दार्थ पर विमर्श का माहौल बने, तो कोई आयोजन मात्र सामुहिक पर्व नहीं रह जाता, बल्कि त्यौहार हो जाता है. कहना न होगा हम भरतवंशी उत्सवधर्मी हैं, त्यौहारप्रिय हैं.

    तीन ग़ज़लकार.. तीन उत्कृष्ट रचनाएँ ! आयोजन का आत्मीय आरम्भ ! मन बस जगरमगर हो गया, आदरणीय पंकज भाईजी. दिवाली आज से शुरु हो गयी.

    धर्मेन्द्र जी की ग़ज़लों की एक अलग ही शैली है. यह उन भूमिपुत्रों की शैली हुआ करती है जिनका मन-प्राण भौतिक उपलब्धियों के बाद भी माटी की भीनी-सोंधी गंध से आप्लावित रहा करता है. माटी की महक से भरा रचनाकार ही आत्मीयजनों की ’छतों पर उजालों की फ़सल उगाने’ की बात कर सकता है. उसे मालूम होता है कि ’अँधेरों से त्रस्त के लिए चाँद हो जाना’ उसके व्यक्तित्व को कैसी ऊँचाइयाँ दे सकता है. आखिरी शेर में ’ख़याल की बाती को बढ़ाना’ अभिभूत कर रहा है.
    कुल मिला कर श्री गणेश के काबिल इस ग़ज़ल के लिए आदरणीय धर्मेन्द्रजी को हार्दिक बधाइयाँ.

    आदरणीय दिगम्बरजी के हृदय में भावनाएँ पूरी धार में बहा करती हैं. इस ग़ज़ल के कई शेर मेरे कहे की ताक़ीद कर रहे हैं. ’आने की हलचल’ या ’झुकी निग़ाहों’ का ख़्वाबों के होने को लेकर ’अक्सर’ पूछना, ये ऐसे ख़यालात हैं जो शेरों में ढल कर रोमांच पैदा करते हैं. कहना न होगा, ये गुदगुदाते-से हुए हैं. प्रेम का अत्यंत गहन रूप उभर कर आया है.
    हृदय से बधाइयाँ आदरणीय दिगम्बर भाईजी.

    सुना है हमने यही के अँधेरे हैं ज़ालिम
    मगर ये सच है उजालों से ख़ौफ़ खाते हैं

    वाह !
    आदरणीय गिरीश पंकजजी की ग़ज़ल उनकी सर्वसमाही सोच को शाब्दिक कर रही है. हर शेर में सबके लिए उल्लास, सबके लिए विकास, सर्वे भवन्तु सुखिनः जैसे अत्युच्च भावों का सुन्दर समायोजन हुआ है !
    हृदय से बधाइयाँ आदरणीय, पंकज भाईजी.

    पूरे परिवार को दीपावली की अनेकानेक शुभकामनाएँ.. .
    सादर

    -सौरभ पाण्डेय, नैनी, इलाहाबाद

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. विस्‍तार से की गई समीक्षा के लिए तालियां । सौरभ जी दाद देने का तरीका कोई आपसे सीखे ।

      हटाएं
    2. बहुत बहुत शुक्रिया सौरभ जी, स्नेह यूँ ही बना रहे

      हटाएं
    3. सौरभ जी जैसा विस्तार देते हैं अपनी बात को वो हर किसी के बस में नहीं होता ... शब्दों से परे बस आभार ही व्यक्त कर सकता हूँ ... बहुत बहुत शुक्रिया ....

      हटाएं
  3. आदरणीय पंकज जी, दीपावली की अनन्त शुभकामनाएं
    आग़ाज़ कितना शानदार हुआहै...वाह वाह वाह
    धर्मेंद्र कुमार सिंह जी की पूरी ग़ज़ल उम्दा है...मतला तो दिल को छूने वाला है.
    दि़गम्बर नासवा जी के कलाम के बारे में कुछ कहना आसान नहीं है...बहुत अच्छे शेर हुए हैं..गिरह का अंदाज़ वाह वाह की हदों से बहुत आगे है.
    गिरीश पंकज जी को पहले भी पढ़ने का मौका मिला है...इस ग़ज़ल के लिए उन्हें बधाई...
    और इस आयोजन के लिए पंकज जी तो मुबारकबाद के हक़दार हैं ही.

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. तह-ए-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ शाहिद साहब

      हटाएं
    2. बहुत बहुत शुक्रिया शाहिद जी ....

      हटाएं
  4. तरही की धमाके दार शुरुआत हुई है. तीनो गज़लें बहुत खूब कही हैं. "अँधेरी रात की फाकाकशी.." क्या मतला है. वाह!. "लड़ाइए न इन्हें आँधियों से बेमतलब" बहुत बढ़िया शेर हुआ है. पूरी की पूरी ग़ज़ल बहुत बढ़िया. धर्मेन्द्र जी को हार्दिक बधाई. दिगंबर जी की ग़ज़ल भी बहुत पसंद आई. "की आजमाने से रिश्ते भी टूट जाते हैं.." वाह. बहुत उम्दा.. गिरीश जी ने बहुत बढ़िया शेर कहे हैं. "हमेशा अपने लिए जीना कोई जीना है" ख़ास तौर पर पसंद आया. बहुत खूबसूरत. हार्दिक बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  5. तरही की बेहतरीन शुरुआत के लिये आज के तीनों गजल कारों को मुबारकबाद व धन्यवाद।आदरणीय गिरीश जी का ये शे'र सुना है यही'---उजालों से खौफ खाते हैं--कमाल का लगा।

    उत्तर देंहटाएं
  6. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति मंगलवार के - चर्चा मंच पर ।।

    उत्तर देंहटाएं
  7. झिलमिलाने,जगमगाने, टिमटिमाने की व्याख्या अद्भुत है। लड़ाइये न इन्हें आँधियों से बेमतलब.......।वाह। दिये की परिभाषा व सार्थकता बता दी गई। तुम्हारे आने की हलचल सी थी हवाओं में.......हमेशा अपने लिए जीना कोई जीना है ......बहुत खूबसूरत शेर, तीनों बेहतरीन गजलें। धर्मेंद्र जी, दिगम्बर जी,गिरीश जी को बहुत बहुत बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  8. प्रभु ,झिलमिलाने, जगमगाने और टिमटिमाने के बीच जो महीन सी रेखा है उसका आपने बहुत विस्तार से वर्णन किया है। हम जैसे अल्प ज्ञानी के लिए ये जानकारी बहुत महत्त्व रखती है।

    एक पुराने फ़िल्मी गीत में नायिका कहती है " तुम आये तो आया मुझे याद - गली में आज चाँद निकला " इसीतरह सुबीर संवाद सेवा की साज सज्जा देख कर याद आया की दिवाली आ गयी। वो दिवाली जिसका समय से इंतज़ार था।

    तरही का दिलकश अंदाज़ में आगाज़ हुआ है भाई धर्मेन्द्र कुमार सिंह साहब की बेजोड़ ग़ज़ल से। "अँधेरी रात की फाकाकशी" जैसे अद्भुत मिसरे से "ख्याल की बाती "जैसे खूबसूरत मिसरे तक पहुँचती पूरी ग़ज़ल कमाल की है। "अँधेरा कांपने लगता है" जैसे मिसरे ने सोने पे सुहागे का काम किया है। वाह धर्मेन्द्र भाई वाह -जियो।

    इस ब्लॉग की हर तरही के स्थाई स्तम्भ भाई दिगंबर नासवा जी अपने पूर्व परिचित रंग में रंगे नज़र आये हैं। उनकी ग़ज़लें नज़्में और कवितायें पढ़ कर कोई भी जान सकता है कि उनके प्रशंषकों की कतार इतनी लम्बी क्यों है ? सीधी सरल जबान में आसानी से बड़ी बात कह देना उनकी खासियत है। "ये किसके ख्वाब ---" जैसे बेमिसाल शेर एक बार पढ़ने से ही आपके साथ हो लेते हैं , पीछा ही नहीं नहीं छोड़ते। दिगंबर भाई मेरी दिली दाद कबूलें।

    ज़िन्दगी जीने के अलग रंग समेटे गिरीश जी की ग़ज़ल हमें बहुत से सन्देश देती है। हर अशआर में उन्होंने अंधेरों पर उजालों की विजय जिक्र बहुत ही अच्छे और असरदार तरीके से किया है। उनके विचारों की परिपक्वता उनकी ग़ज़ल के हर शेर में दिखाई देती है। मैं तालियां बजा कर उनका अभिवादन कर रहा हूँ।

    अंत में आपका शुक्रिया आपने फिर से अपने प्रयास से इस मंच को चमचमाया है।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. इस हौसला अफ़जाई के लिए तह-ए-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ नीरज जी

      हटाएं
    2. जैसे गुरुदेव से ग़ज़ल की तकनिकी की बारीकियां सीख रहा हूँ वहीं आपसे कहने का अंदाज़ और रवानगी सीख रहा हूँ नीरज जी ...
      तहे दिल से शुक्रगुजार ...

      हटाएं
  9. शानदार आगाज हुआ है - दिवाली तरही का.
    धर्मेन्द्र जी, दिगंबर जी, और गिरीश जी आप सभी को बहुत बहुत बधाई !!
    अँधेरा कांपने लगता है,,,,
    के आजमाने से रिश्ते भी टूट जाते हैं,,,
    समझ के अपना ही घर दीप हम जलाते हैं ,,,
    तीनो ग़ज़ल ने क्या खूब रौशनी बिखेरी है.

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. बहुत बहुत धन्यवाद सुलभ साहब

      हटाएं
    2. शुक्रिया सुलभ जी ... दिवाली की तरही सच में कमाल होती है हर बार ...

      हटाएं
  10. मंच पर पुनः रंग भरने के लिए सुबीर सर को बहुत बहुत बधाई !
    आप सभी को दिवाली की अग्रिम शुभमानायें !!
    - सुलभ

    उत्तर देंहटाएं
  11. आज का दिन मेरे लिए बड़ा विशेष रहा। पहली बात तो ये हुई कि दिगंबर जी और गिरीश जी जैसे रचनाकारों के साथ मंच साझा करने का सौभाग्य मिला। दूसरी बात ये कि आज जाकर ज्ञानपीठ के दफ़्तर से "ये वो सहर तो नहीं" और "ईस्ट इंडिया कंपनी" ले आया। ये दोनों पुस्तकें पढ़ने की बहुत दिनों से इच्छा थी। तीसरी बात ये कि आज ललित जी (कविता कोश के संस्थापक) से तीन वर्ष बाद मुलाकात हुई और लंबी बातचीत हुई। तो इस तरह आज का दिन मेरे लिए विशेष रहा।

    सुबीर जी का तह-ए-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ कि उन्होंने दिगंबर जी और गिरीश जी जैसे रचनाकारों के साथ स्थान दिया। ग़ज़ल के बारे में जो कुछ थोड़ा सा जानता हूँ उसमें से अधिकांश इस सुबीर संवाद सेवा परिवार और सुबीर जी की ही देन है। सुबीर जी से बहुत कुछ सीखा है और बहुत कुछ अभी सीखना है।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. धर्मेन्द्र जी ... आपका नहीं ये मेरा सौभाग्य है ... आपकी बहुमुखी प्रतिभा से कौन वाकिफ नहीं है .... मिटटी से जुड़े शेर कहते हैं आप ... शब्द-भण्डार और शब्दों के उचित प्रयोग में आपकी गजलों का कोई सानी नहीं है ... आपको बधाई इस लाजवाब ग़ज़ल की ...

      हटाएं
  12. मतले में "सुनाते" और "गुनगुनाते" काफिये लेकर जब व्यंजन "न" को हर्फ़-ए-रवी मान लिया लिया गया है. तो इस सूरत में बकिया क्वाफी को क्योंकर ख़ारिज न माना जाये दिगंबर साहिब ?

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. योगराज भाई ,तकनिकी रूप से आपका नुक्ता -ए -नज़र सही है ।लेकिन " अच्छा है दिल के पास रहे पासबाने अक्ल ,लेकिन कभी कभी इसे तनहा भी छोड़िये " वाली बात मानते हुए ग़ज़ल का लुत्फ़ लेते हैं।

      हटाएं
    2. योगराज जी आपका आभार आपने पैनी नज़र से इस बारीकी को देखा ... यही खासियत है इस गुरुकुल की ... यहाँ हर कोई विद्यार्थी होते हुए भी गुरु सामान ही रहता है ...

      हटाएं
  13. //अँधेरी रात की फाकाकशी मिटाते हैं
    फसल छतों पे उजालों की हम उगाते हैं //

    वाह !! यह मतला बहुत साल नहीं भूलने वाला भाई धर्मेन्द्र कुमार सिंह जी.

    उत्तर देंहटाएं
  14. आज की खूबसूरत ग़ज़लें जीवंत प्रमाण हैं कि हम सब ने इस ब्‍लॉग पर क्‍या पाया है।
    रदीफ़ काफि़या के निर्वाह से बह्र के निर्वाह के रास्‍ते होते हुए शेर में व्‍याकरण का समुचित ध्‍यान रखते हुए अपनी बात कहने की इस विधा को समझना सरल नहीं होता लेकिन बहुत खूबसूरती से ये रास्‍ता सभी ने तय किया और जो दृश्‍य प्रस्‍तुत किये वह मुझे लगता है कि कक्षा में भौतिक उपस्थिति से भी प्राप्‍त करना कठिन ही होता लेकिन इस ब्‍लॉग पर वर्चुअल उपस्थिति भौतिक उपस्थिति पर भारी पड़ गयी।
    उपर सौरभ जी और नीरज जी ने प्रस्‍तुत ग़ज़लों पर जो समीक्षा प्रस्‍तुत की उसके साथ बस आनंद ले रहा हूँ।

    उत्तर देंहटाएं
  15. बहुत ही खूबसूरत ग़ज़लेँ! मन खुश हो गया पढ़ के! आप सब को दीप पर्व की शुभकामनाएं! अशआर दर अशआर टिप्पणी कल लिखूंगी.

    उत्तर देंहटाएं
  16. वाह क्या ही खूबसूरत आग़ाज़ हुआ है। लाजवाब।
    ब्लॉग भी झिलमिला रहा है, दीये लड़ियाँ सब ही रौनक में इज़ाफा कर रही हैं।

    गुरुदेव, आप कितनी सहजता से बारीकियाँ समझाते हैं कि बातें घर कर जाती हैं, इस दफे वो झिलमिलाना, जगमगाना और टिमटिमाना के सन्दर्भ में थी।

    अब तरही ग़ज़ल की तरफ रुख करता हूँ, पहली ग़ज़ल ही बेमिसाल है। धर्मेन्द्र जी ने बेहद खूबसूरत शेर कहे हैं।
    "अँधेरी रात की फाकाकशी …… " वाह।
    गिरह भी क्या खूब लगाई है,
    "अँधेरा कांपने लगता है …… " क्या कहने।
    ढेरों मुबारकबाद धर्मेन्द्र जी। तरही मुशायरे के शानदार आग़ाज़ के लिए।

    तरही के दूसरे शायर दिगम्बर जी ने नाज़ुक सी ग़ज़ल कही है।
    मतला बहुत खूब कहा है।
    वाकई ये शेर "झुकी झुकी सी निगाहें .... " और तिस पे मिसरा क्या खूब गढ़ा है,
    "ये किसके ख़ाब मुझे रात भर जगाते हैं।" वाह वाह वाह
    दिगम्बर जी बधाइयाँ।

    गिरीश पंकज जी ने भी अच्छे शेर कहे हैं।
    मतला अपने अलग ही रंग में झिलमिला रहा है।
    बधाइयाँ गिरीश जी।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. अंकित जी आपका आभार ग़ज़ल को सराहने का ....

      हटाएं
    2. बहुत बहुत शुक्रिया अंकित जी

      हटाएं
  17. मेरी रचना के लिए जितने मित्रो ने बधाइयां दी है, उन सभी चाहने वालो का तहेदिल से शुक्रिया . शुभ दीपावली

    उत्तर देंहटाएं
  18. आभाएर तो दरअसल गुरुदेव का इस कड़ी को दुबारा शुरू करने के लिए वो भी खुशियों और दीपों के पर्व वाले समय से ...
    हर बार कुछ न कुछ नया सीखने के ललक ले कर विद्यार्थी आते हैं और इस बार भी हमेशा की तरह न सिर्फ ग़ज़ल की तकनिकी बल्कि शब्दों की बारीकी को भी बाखूबी समझा दिया है .... आशा है ये सिलसिला जो इस दिवाली से शुरू हुआ है ऐसे ही चलता रहेगा ... तरही का ये सुहाना सफ़र यूँ ही चलता रहे ... गुरुकुल के सभी सदस्यों को दीपावली की बधाई ...

    उत्तर देंहटाएं
  19. दीपावली के मुशायरे की इतनी ख़ूबसूरत शुरुआत!
    भाई धर्मेन्द्र जी खूबसूरत ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई। ज़िन्दाबाद ग़ज़ल।
    भाई दिगम्बर नासवा और भाई गिरीश पंकज जी ग़ज़लें भी बेहद सुन्दर लगीं।
    बड़े भाई साहबान सौरभ पाण्डेय , नीरज गोस्वामी , तथा तिलक राज कपूर
    इस सुन्दर पोस्ट बहुत सुन्दर टिप्पणियाँ दे चुके हैं।
    सबको हार्दिक बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. हौसला अफ़जाई का शुक्रिया द्विजेन्द्र जी

      हटाएं
  20. पोस्ट कल ही पढ़ ली थी, लेकिन चलता फिरता कमेंट इस पोस्ट पर बनता नहीं था और तुरंत विस्तृत कमेंट डाला नहीं जा सकता था। कारण यह कि सुविधाएं ही कहीं ना कहीं रचनाशीलता को कम कर रही हैं। हाथ में २४ घंटे जो नेट की सुविधा और लोगों से कनेक्ट रहने का सुख है, वह कम से कम मुझे तो परेशान ही कर रहा है। चूँकि मेरी इच्छा शक्ति इतनी मजबूत भी नहीं कि दिन के कुछ समय निर्धारित कर लूँ इस काम के लिये। मोबाइल पर लाबी टिप्पणी देना मुश्किल तो होता ही है थोड़ी देर में आँखें बोझिल हो कर सर दर्द भी शुरू करा देती हैं। ऐसे में मेरे साथ जो हो रहा है वो यह है कि सूचनाएँ तो खूब इकट्ठा हो गयी हैं, लेकिन रचनाशीलता खतम हो गयी है।

    कारण जो भी हो मुझे तो यह भी भूल गया कि कभी गीतों और ग़ज़लों से मेरा कोई साबिका था।

    जब खुद अंधेरे में रहो तो लगता हैं पूरी दुनियाँ अँधेरी है। लेकिन यहाँ की जगर मगर देख के पता चला कि असली ज़ज़्बा वो है जो यहाँ दिख रहा है? कितने कितने दिनों बाद मिले एक आह्वान से सब इक्ट्ठा हो गये यहाँ अपना सर्वोत्कृष्ट ले कर।

    धर्मेन्द्र जी की ग़ज़ल पढ़ कर कितनी बार वाह निकली याद नहीं। हर शेर पर वाह। मतले से ले कर आखिरी शेर तक क्या मजाल कि कोई दाद दिये बिना निकल जाये।

    गुरू जी आप ने एक बार कहा था कि अगर मतला अच्छा बन जाता है तो समझो कि आधी जंग तो जीत ली। तो आधी जंग तो इन्होने दो पंक्तियों मे ही झीट ली थी "अँधेरी रात की फाकाकशी..." फाकाकशी शब्द क्या खूब लग रहा है इस मतले में।

    और फिर एक एक कर सारे शेर। "लड़ाइये न इन्हे आँधियों से बेमतलब..." वाऽऽह क्या शेर है। मिसरा उला सुन कर ही वाह वाह कहने लगता है मन। फिर "किसी विजय से, पराजय से..." यह शेर भी क्या खूब बात कही है धर्मेन्द्र जी ! बहुत खूब। और फिर अंतिम शेर "चलो खयाल की बाती ज़रा बढ़ाते हैं।" बहुत अच्छे । सामने होती तो पाँच मिनट तो ताली बजाती ही।

    दिगम्बर नासवा जी का मतला बहुत अच्छा बना है। गिरीश पंकज जी की ग़ज़ल भी बहुत अच्छी बनी

    तो बधाइयाँ आप सबको और शुभकामनाएं।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. तह-ए-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ कंचन दी। स्नेह बना रहे

      हटाएं
  21. आदरणीय सर प्रथम बार आप के ब्लौग पर आया हूं। महान रचनाकारों की रचनाएं पड़कर मन प्रसन्न हुआ और टिप्पणी के माध्यम से सभी रचनाकारों की चर्चा पढ़कर आत्मा भी त्रिप्त हो गयी।

    उत्तर देंहटाएं
  22. Bahut sunder prastuti..dhanteras va deewali ki hardik shubhkamnaayein aapko !!

    उत्तर देंहटाएं
  23. गज़ब एक से बढ़ कर एक। सब को बधाई।

    उत्तर देंहटाएं