शुक्रवार, 10 अक्तूबर 2014

दीपावली का त्‍यौहार आ गया है और तरही को लेकर अभी भी बहुत काम होना बाकी है ।

ये बात तो सच है कि किसी भी काम को एक बार कुछ विराम देकर फिर से शुरू करना बहुत मुश्किल होता है। असल में एक माइंड सेट होता है जो बिगड़ जाता है । और उस बिगड़े को सुधार पर फिर से पहले की ही तरह करना कुछ कठिन काम होता है । मगर याद आती है नेपोलियन की वो बात जब उसके सामने एक पहाड़ आ गया था तो उसने अपने सैनिकों से कहा था कि समझो कि ये पहाड़ सामने है ही नहीं । तो बस ये कि हमें भी यही समझ के काम करना है कि पहाड़ है ही नहीं। क्‍योंकि फिर से शुरुआत करना एक प्रकार से पहाड़ ही है । और इस पहाड़ पर चढ़ना अभी फिलहाल तो ज़रूरी है। इसलिए भी क्‍योंकि हम सब को मिल कर ही शुरुआत करनी है ।

अंधेरी रात में जब दीप झिलमिलाते हैं

इस बार के मिसरे को लेकर बाद में कई सारे गीत लोगों ने याद दिलाए । जैसे कि कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है और मेरा तो जो भी क़दम है वो तेरी राह में है । या फिर कहां थे आप ज़माने के बाद आए हैं और जगजीत सिंह द्वारा गाई गई ग़जल़ अगर न ज़ोहरा जबीनों के दरमियां गुज़रे तो फिर ये कैसे कटे जिंदगी कहां गुज़रे । तो ये गीत गुनगुना कर भी गजल लिखने का काम किया जा सकता है । जगजीत सिंह जी द्वारा गाई गई ग़ज़ल की धुन तो वैसे भी कमाल है ।

कई बार सोचता हूं कि सुबीर संवाद सेवा के अचानक ठंडा पड़ जाने का कारण क्‍या है । हर बार मैं अपने आप को ही कारण पाता हूं । मैं ही । क्‍योंकि बस ये रहा कि प्राथमिकताएं बदल गईं । और ये कि बस दूरी होती चली गई । हम कई बार ये कहते हैं कि व्‍यस्‍सता हो गई है । असल में व्‍यस्‍तता कुछ नहीं होती होती तो प्राथमिकता ही है । सारी व्‍यस्‍तताओं के बाद भी हम आखिर को भोजन करने का समय तो निकालते ही हैं । क्‍योंकि वो हमारी प्राथमिकता में है । 

इसी बीच हिन्‍दी चेतना का विशेषांक भी सामने आ गया है । ये विशेषांक कथा आलोचना पर केन्द्रित है । विशेषांक पर भी पिछले एक साल से काम चल रहा था । विशेषांक को पढि़ये और अपनी राय दीजिये ।

और हां ग़ज़ल जल्‍दी भेजिए क्‍योंकि बस अब कुछ ही दिन शेष हैं । और ये भी कि कुछ लोगों की ग़ज़लें प्राप्‍त हो चुकी हैं । उनको आभार ।

6 टिप्‍पणियां:

  1. ये बहर एक बार अगर होंठों पर चढ़ जाये तो फिर शेर दर शेर बह निकलते हैं, और आगे की एक आध ग़ज़लें भी फिर इसी बहर में आती हैं। लेकिन अभी तक कुछ लिखा ही नहीं गया है और उस पर आपका ये कहना कि कुछ ग़ज़लें पहुँच भी चुकी हैं, माहौल को प्रेशर कुकर सा बना रहा है।

    इस बहर पर पुराने फिल्मों के कई गीत हैं। ग़ज़लें भी कई हैं, राहत इंदौरी साहब की खूब ग़ज़लें हैं। निदा फ़ाज़ली साहब की ये ग़ज़ल "कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता" भी इसी बहर में है।

    हिंदी चेतना का अंक अभी पढ़ना बाकी है, जल्द ही पढता हूँ। विशेषांक के लिए पूरी टीम को बधाई।

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  2. प्रवाह की आवृति सदैव एक नहीं होती. यह सनातन सत्य है.
    इस बार की दीपावली गुनगुनाती हुई आये, इस शुभ-आशा के साथ हार्दिक शुभकामनाएँ..

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  3. सुबह को आना है, आती है और आयेगी
    ये वज़्म रात हो या दिन हो जगन्मगायेगी
    भले ही सामने अवरोध हजारों आयें
    नये ही गुल य्हाँ तरही ये ला खिलायेगी

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  4. इंसान की फितरत ही कुछ एेसी है कि अपनी सुविधानुसार व्‍यस्‍ततायें और प्राथमिकतायें करते हुए पूरा जीवन गुजार देता है। जो करना हो वो सब करता भी है। इसमें होता यह है कि बहुत अक्‍सर कुछ आकस्मिकता की स्थिति में प्राथमिकता बनता है जिसका परिणाम यह रहता है कि किया तो सब कुछ लेकिन गुणवत्‍ता श्रेष्‍ठ स्‍तर तक नहीं पहुँच स‍की। जो इस से निजात पा लेते हैं वो सामान्‍यतया: गुणात्‍मक श्रेष्‍ठता तक पहुँच जाते हैं। बस इसको ध्‍यान में रखकर प्रयास की आवश्‍यकता है।

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  5. जनम दिन की हार्दिक बधाई ....

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