बुधवार, 22 फ़रवरी 2012

समीर लाल जी और तपन दुबे : सुबह हो या दोपहर हो या भले ही शाम हो, गीत कोयल गुन-गुनाती है अभी तक गाँव मैं

सुकवि रमेश हठीला स्‍मृति तरही मुशायरा

16-20

इक पुराना पेड़ बाकी है अभी तक गाँव में 
कुछ पुराने पेड़ बाकी हैं अभी तक गाँव में

आज केवल कुछ सूचनाएं ।पहली तो ये  कि होली के तरही को लेकर अब आप अधिकतम 4 मार्च तक अपनी रचनाएं भेज सकते हैं । हालांकि आज ही एक रचना मिली है और जबरदस्‍त रचना है । होली का मूड बन गया है उस रचना से । तो अपनी रचनाएं 4 मार्च के पहले भेज दें ।  मिसरा-ए-तरह तो आपको पता ही है ''कोई जूते लगाता है, कोई चप्‍पल जमाता है''  बहर : बहरे हजज 1222'1222'1222'1222 रदीफ - है, काफिया – आ ।

दूसरी सूचना ये कि श्री नीरज जी को सुकवि रमेश हठीला सम्‍मान की जो घोषणा की गई है वो सम्‍मान समारोह मई के महीने में आयोजित किया जायेगा । उसीमें सम्‍मान के साथ साथ सुकवि मोहन राय स्‍मृति पुरस्‍कार भी दिया जायेगा । यह पुरस्‍कार है इसलिये यह किसी युवा को दिया जायेगा ।  तो आइये आज सुनते हैं श्री समीर लाल जी और तपन दुबे की रचनाएं ।

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श्री समीर लाल समीर जी

समीर जी इस ब्‍लाग की प्रक्रिया से पहले दिन से ही जुड़े हुए हैं । इस ब्‍लाग से मुझे कई नाम मिले उनमें से एक नाम समीर जी का दिया हुआ है 'मास्‍साब' । ठेठ मध्‍यप्रदेशिया नाम । समीर जी के गद्य जितना रोचक होते हैं उतनी ही उनकी कविताएं आनंद देती हैं । गंभीर बातों को सहजता से कह देना उनकी विशेषता है । तो आइये सुनते हैं उनकी ये शानदार ग़ज़ल ।

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शुक्र है के वो निशानी है अभी तक गाँव में
इक पुराना पेड़ बाकी है अभी तक गाँव में

गाड़ी,बंगला,शान-ओ-शौकत माना के हासिल नहीं
पर बड़ों की हर निशानी है अभी तक गाँव में

सुबह हो या दोपहर हो या भले ही शाम हो
साफ़ - सुथरी वायु बहती है अभी तक गाँव में

शहर की राहों पे जा के सारे बेटे खो गये  
राह तकती माँ अभागी  है  अभी तक गाँव में

सादगी ही सादगी है जिस तरफ भी देखिए
सादगी  की  आबदारी  है  अभी  तक गाँव  में

साथ  मेरे  जाते  तो  ए काश तुम भी देखते
निष्कपट सी जिंदगानी है अभी तक गाँव में

छोड़ कर  जा तो रहा है ए ` समीर ` इतना तो जान
रोटी - सब्ज़ी , दाना - पानी है अभी तक गाँव में

आबदारी - चमक
सबसे पहले तो बात की जाये मकते की ही । मकता बहुत ही प्रभावी बन पड़ा है । इस मकते में नास्‍टेल्जिया नहीं है बल्कि हकीकत है । सादगी की आबदारी का शेर भी बहुत सुंदर बना है । विशेषकर ये कहना कि सादगी ही सादगी है जिस तरफ भी देखिये । और फिर राह तकती मां का चित्र बहुत सुंदर बन पड़ा है समीर जी की ही पुस्‍तक बिखरे मोती की एक कविता जो उन्‍होंने मां को समर्पित की थी वो याद आ गई । बहुत सुंदर बहुत सुंदर । खूब ।

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तपन दुबे
तपन पहली बार मुशायरे में शिरकत कर रहे हैं सो उनकी बात उनकी ही ज़बानी सुन ली जाये ।

आपके ब्लॉग में चल रहे तरही मुशायरे में मैं भी शिरकत करना चाहता हूँ . अभी गजल के व्याकरण से जरा अनजान हूँ. आपके पुराने लेख गजल के बारे में पड़ कर बहुत कुछ सिखने को मिला हैं . मैं बहुत छोटी उम्र लगभग ११-१२ वर्ष की उम्र से ही थोड़ी बहुत पंक्तिया लिख लेता था पर १२ साल बाद आज जब में २४ वर्ष का हो गया हूँ तब मुझे पहली बार आपके द्वारा गजल के व्याकरण के बारे में पता चला. में आपके गजल के लेख को अच्छी तरह से पड़ रहा हूँ और कोशिश करुगा की जल्द से जल्द अच्छी गजल आपके अन्य विधार्थियों की तरह लिखू. पंकज जी मुझे ये मलाल होता है की मैने इंजीनियरिंग भोपाल से करी अगर तब में आप से मिल लेता तो शायद आज में बहुत कुछ सिख जाता. और १ और बात पंकज जी सिर्फ आप के इस ब्लॉग के कारण जिस शायरी को वक्त ने मुझसे छीन लिया था, उसे में वापस से जीवित कर पाया हूँ. और लगभग ३-४ साल बाद आज मैने कुछ लिखा है. बहुत सकूँ मिला है लिख कर. ऐसा लगा है जैसे बरसो से बंद परिंदे को खुला आसमान मिल गया हो ।

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इक पुराना पेड़ बाकी है अभी तक गाँव में
गीत कोयल गुन-गुनाती है अभी तक गाँव में

शहर में तो सिर्फ कम्‍प्यूटर ही  कम्‍प्‍यूटर हैं बस  
पर कलम काग़ज़  सियाही है अभी तक गाँव में

बिजली, पानी और सड़कें , शहर में सुविधाएं सब 
राह कच्‍ची धूल उड़ाती है अभी तक गाँव में

अब तो नाना जी को गुजरे साल कितने हो गए
किन्‍तु नानी है कि रहती है अभी तक गाँव में

शहर में आकर यही महसूस होता है "तपन"
हर ख़ुशी ज्‍यों जिंदगी की है अभी तक गाँव में

हूं पहली बार को ध्‍यान में रखा जाये तो बहुत अच्‍छी ग़ज़ल कही है । नाना और नानी का शेर बहुत ही सुंदर बन पड़ा है और उतना ही मार्मिक भी है । शहर में कम्‍प्‍यूटर और गांव में कलम काग़ज़ सियाही के माध्‍यम से बहुत सहजता के साथ इशारा कर दिया है गांव और शहर की मानसिकता पर ।  सड़कों और गांव की राहों वाला शेर भी प्रभावी है । बहुत सुंदर वाह वाह वाह ।

तो आनंद लीजिये दोनों सुंदर ग़ज़लों का मिलते हैं अगले अंक में कुछ और रचनाकारों के साथ ।

17 टिप्‍पणियां:

  1. वाह. क्या बात है. समीर जी ने बहुत खूब शेर कहे हैं. 'साफ़ सुथरी वायु बहती है अभी तक गाँव में..', 'सादगी की आबदारी!' वाह. मकता भी बहुत खूब कहा है.
    तपन ने भी खूब गज़ल कही है. पहली बार में ही ऐसी गज़ल. कमाल कर दिया है. सभी शेर पसंद आये. दोनों शायरों को बहुत बहुत बधाई.

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  2. शहर की राहों पे जाके सारे बेटे खो गए

    राह तकती माँ अभागी है अभी तक गाँव में

    आह !

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  3. समीर लाल जी के लेखन के बारे में क्या कहूँ? उनका गध्य और पध्य दोनों विशेष होता है. मन की भावनाओं को शब्दों से उकेरने का हुनर उन्हें खूब आता है. "गाडी बंगला शान-ओ-शौकत...", शहर की राहों पे...", सादगी ही सादगी..." , जैसे शेर कहना सिर्फ और सिर्फ समीर जी जैसे सिद्ध हस्त शायर के बस की ही बात है. जिंदाबाद समीर जी ढेरों बधाइयाँ स्वीकारें.

    तपन जी को पढने का पहला मौका मिला उन्हें पढने से ये ज़ाहिर होता है के उनमें सीखने की कितनी ललक है. इस ग़ज़ल में उन्होंने बहुत भावपूर्ण शेर कहें हैं. "शहर में तो...", अब तो नाना जी को..." जैसे शेर इस बात की गवाही दे रहे हैं के तपन जी का भविष ग़ज़ल की दुनिया में बहुत उज्जवल होगा...हमारी और से उन्हें ढेरों शुभकामनाएं.

    नीरज

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  4. समीर लाल जी ने बहुत खूब शेर कहे हैं, "शहर की राहों पे जा के सा..........", "सादगी ही सादगी है जिस तरफ .........", और मक्ता भी अच्छा गढ़ा है. बधाई स्वीकार करें.
    एक और युवा दस्तक दे चुका है, वाह इससे बेहतर बात और क्या हो सकती है. तपन की बातों और जज्बे को देख कर ख़ुशी मेहसू ह रही है और इनकी इस पंक्ति से बहुत उम्मीद बंध रही है "जैसे बरसो से बंद परिंदे को खुला आसमान मिल गया हो । "
    तपन ने अच्छे शेर कहे हैं, खासतौर पे "शहर में तो सिर्फ कम्‍प्यूटर ही कम्‍प्‍यूटर हैं बस............." वाह वा. मक्ता बहुत करीने से गढ़ा है "...हर ख़ुशी ज्‍यों जिंदगी की है अभी तक गाँव में" वाह वाह ढेरों बधाइयाँ

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  5. हज़ल लिखना बहुत टेढ़ी खीर है, देखिये कहाँ तक कामयाब हो पाता हूँ. गुरुदेव ये 'मास्‍साब' सिर्फ ठेठ मध्‍यप्रदेशिया नाम न होके हर जगह चलता है. हम तो खूब चलाते थे, :) :)

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  6. क्या बात है ... समीर भाई का तो जवाब नहीं ... साफ़ सुथरी वायु ... सच है शहरों में तो बस जहरीला धुंवा ही बाकी रह गया है ... गाडी बंगला शानो शौकत ... कितनी सादगी से कह दिया है सच है बड़ों की निशानी अभी तक गावह में मिलती है ... शहर की राहों पे जा के ... ये शेर तो सीधे दिल में उतरता है ... बहुत लाजवाब समीर भाई ..

    तपन जी ने भी बहुत किया है अपने शेरों से ... मतले से लेकह्र मकते तक .. हर शेर चौंका रहा है .. शहर में तो सिर्फ कंप्यूटर ... गज़ब का शेर है ... अब तो नाना जी को गुज़रे साल कितने हो गए ... लगता है जैसे गाँव को जिया है इस शेर में ... फिर आखिर में शहर में आकार यही महसूस होता है तपन ... बेमिसाल शेर है ...
    तरही का कमाल जादू चड के बोलने लगा है ...

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  7. समीर भाई, समीर भाई, इस होली पर भूल न जाना, पिछली बार तो खूब सैर की थी बाईक की।
    गॉंव की ताजी वायु, शह्र में पेट में घुसकर दूषित हो जाती है इससे आप अच्‍छी तरह वाकिफ़ हैं। भाई बहुत दर्दभरी बात कह दी शह्र की शहजादियों में खो गये बेटे सभी, राह तकती ...। मानता हूँ कि सादगी की आबदारी है अभी तक गॉंव में। गॉंव की निष्‍कपट जि़न्‍दगी में वो सब है जो सुकून भरे जीवन के लिये चाहिये।
    बधाई भाई बधाई।
    तपन जी आप अपने को भले ही नया कहें लेकिन राह कच्‍ची धूल उड़ाती में आपने अलिफ़-वस्‍ल का जो उपयो किया है वह उस्‍तादाना है।
    बधाई।

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  8. साथ मेरे जाते तो ए काश तुम भी देखते
    निष्कपट सी जिंदगानी है अभी तक गाँव में... वाह!

    दोनों ही गजलें सुन्दर हैं.... समीर सर को पढ़ के तो आनंद ही गया...
    सादर.

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  9. गाँव अभी तक याद रहा है,
    टूटा सा संवाद रहा है।

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  10. DONON GHAZALE PYAREE HAIN. AUR APNE SAMEERJI KA ZAVAAB NAHEEN...

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  11. बहुत ही खूबसूरत ग़ज़लें कही हैं दोनों ही शायरों ने। समीर जी तो हमेशा अच्छी ग़ज़लें कहते हैं ये भी अपवाद नहीं है। मत्ले से मक्ते तक हर शे’र लाजवाब कहा है और सादगी वाला शे’र तो कहर ढा रहा है। बहुत बहुत बधाई समीर जी को।

    पहली ग़ज़ल के हिसाब तो तपन जी ने वाकई बहुत खूबसूरत ग़ज़ल कही है। भविष्य में इनसे और भी ज्यादा उम्मीद रहेगी। शहर में कम्प्यूटर वाला शे’र तो गजब का है। बिजली पानी.., नाना जी वाले भी शेर शानदार हैं। बहुत बहुत बधाई तपन जी को।

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  12. बहुत खूब..
    शीर्षक में मैं टंकित हो गया है।

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  13. गुरूवर,

    समीर जी ने गाँव की जिस सादगी की बात की है, वही तो है जो आज भी लोगों को खींच के ले आती है वरना एकबार जो गया वो कभी लौटा है कभी?

    और तपन का यह कहना कि वो भोपाल से इंजिनियरिंग करके तो गया लेकिन आपसे मिलके यह अफ्सोस तो मुझे भी सालता है न जाने कितनी बार भोपाल के लिए सीहोर के बारास्ता गुजरा हूँ और उन दिनों जैसे वक्त इफरात था शायद आपसे मिल लेता तो कुछ सीखता भी।

    अब रोटी बड़ी बनाने के चक्कर में जिन्दगी छोटी कर रहे हैं हम।

    बहुत सधी हुई गज़लें, शानदार।

    सादर,

    मुकेश कुमार तिवारी

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  14. दोनों ग़ज़लें अच्छी हैं. समीर जी की ग़ज़ल में नोस्टेल्जिया बहुत उभर कर सामने आ रहा है. और तपन का खैरमकदम तो हैं ही अच्छी ग़ज़ल के लिए उनको धन्यवाद भी है.

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  15. नीरज जी को पुनः बधाई
    सुकवि मोहन राय स्मृति पुरूस्कार की जानकारी प् कर अच्छा लगा

    खुद से जूतों चप्पलों वाली जंग शुरू हो गई है देखता हूँ और जीतता है

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    समीर लाल जी की तरही ग़ज़ल एक पीड़ा, एक कसक की सुन्दर अभिव्यक्ति है,
    दूर विदेश में रह कर घर को शिद्दत से याद किया है और अपने भाव को ग़ज़ल में खूबसूरती से पिरोया है

    हार्दिक बधाई

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    तपन के लिए यह पहला तरही मुशायरा है और इन्होने पहली ग़ज़ल से ही झंडे गाड़ दिए

    सारे शेर उम्दा भाव और प्रस्तुति से लबरेज़
    दूसरे तीसरे और चौथे शेर के लिए अलग से बधाई

    और इस भावाभिव्यक्ति के तो कहने ही क्या ...
    ऐसा लगा है जैसे बरसो से बंद परिंदे को खुला आसमान मिल गया हो ।

    जियो भाई

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  16. जिस आसानी से समीरभाईजी ने अश’आर कहे हैं यह उनकी सतत संलग्नता और संवेदनशीलता के कारण ही संभव हो पाया होगा.
    बड़ों की हर निशानी के गाँव में अभी भी विद्यमान होने का ज़िक़्र कर समीरजी ने बहुत ऊँची बात कही है जिसके आगे शहर की समस्त विलासी वस्तुएँ उथली ही हैं, आधारहीन.
    मक्ते की कहन को मेरा अनुमोदन.
    दिल को खुश हो गया.

    **********

    भाई तपन साहित्य के लिहाज से प्रतिभावान तो हैं ही, सांस्कारिक भी लगे, जोकि आज के नेट पर मौज़ूद साहित्यकारों में बड़ी तेज़ी से समाप्त होता गुण है. लेकिन यह भी उतना ही सही है कि जिन नव-हस्ताक्षरों में यह गुण विद्यमान है, वे छिपे नहीं रह रहे हैं. जिस तेज़ी से ऐसों की कहन और शिल्प-विधा आदि में सुधार होता है, वह स्थापितों के लिये भी प्रसन्न्तादायी आश्चर्य का विषय हुआ करता है.
    ग़ज़ल के अश’आर ताज़े हैं और मक्ते का तो कहना ही क्या, बहुत उम्मीद बनी है आपसे आने वाले समय के लिये.
    तपनजी को हार्दिक शुभकामनाएँ.

    **********

    नीरज भाईजी को सुकवि मोहन राय स्मृति पुरस्कार हेतु नामित होने पर सादर बधाइयाँ.

    सादर
    --सौरभ पाण्डेय, नैनी, इलाहाबाद (उप्र)--

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  17. स्वागत है तपन का....बेहतरीन गज़ल के साथ.

    आप सबके स्नेह का बहुत आभार.

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