मंगलवार, 14 फ़रवरी 2012

शार्दूला नोगजा जी और रविकांत पांडेय के साथ आइये प्रेम की ये चतुर्दशी मनाएं- कौन कहता है मेरा अपना वहां कोई नहीं, इक हठीली धुन तुम्हारी है अभी तक गाँव में

सुकवि रमेश हठीला स्‍मृति तरही मुशायरा

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इक पुराना पेड़ बाकी है अभी तक गांव में
कुछ पुराने पेड़ बाकी हैं अभी तक गांव में

आज प्रेम की चतुर्दशी है । देशज में कहें तो प्रेम चौदस । प्रेम किसको नहीं चाहिये । ईश्‍वर ने ये सृष्टि प्रेम से ही तो रचाई है । किन्‍तु हमने ही उस प्रेम के स्‍थान पर घृणा का सृजन कर दिया । घृणा को ईश्‍वर ने नहीं बनाया । वो इन्‍सान की बनाई हुई है । किन्‍तु फिर ये भी कि क्‍या प्रेम के लिये केवल एक ही दिन । क्‍या केवल 14 फरवरी को ही प्रेम किया जाये । और क्‍या केवल एक लड़की एक लड़के से ही प्रेम करे या एक लड़का एक लड़की से ही प्रेम करे । फिर परिवार जनों से, दोस्‍तों से, और उन सबसे जिन्‍हें हम जानते तक नहीं, क्‍या उन सबसे प्रेम नहीं किया जाये । बात केवल वही है कि भारतीय परंपरा में प्रेम के लिये कोई खास दिन नहीं है क्‍योंकि हम मानते हैं कि प्रेम के लिये तो पूरी उम्र छोटी पड़ती है फिर केवल एक दिन में कैसे हो सकता है । हम मानते हैं कि प्रेम तो जीवन भर करते रहने का नाम है । जिस दिन हम प्रेम करना बंद कर देते हैं उस दिन हमारी मेंटल डेथ हो जाती है । उसके बाद हम केवल और केवल विरचुअल लाइफ जीते हैं । आभासी जिंदगी । जिंदगी है तो प्रेम है, प्रेम है तो जिंदगी है । और इस बात को बहुत पहले आई फिल्‍म सौदागर के गीत 'हर हंसी चीज का मैं तलबगार हूं ' में बहुत अच्‍छे से व्‍यक्‍त किया था । नदी, पेड़ परबत, झरने, तितलियां, चिडि़यां, फूल, सब तो हमारे वेलेण्‍टाइन हैं, हम प्रेम तो सबसे करते हैं ।

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खैर फिर भी परंपरा है कि एक दिन भी प्रेम को लेकर सजग रहो तो ठीक है मैं भी आपको प्रेम की चतुर्दशी की शुभकामनाएं देता हूं और ये कि आप सबका मेरे प्रति प्रेम इसी प्रकार बना रहे, मैं आज जो हूं, जहां हूं इस प्रेम के ही कारण हूं । आइये प्रेम चतुर्दशी पर सुनते हैं दो गीतकारों की ग़ज़लें ।

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शार्दूला नोगजा जी

शार दी से मेरी अभी कुट्टी चल रही है । और ये कुट्टी मैंने ही की हुई है । अभी मेरी नाराजगी खत्‍म होने की कोई सूरत नहीं दिखाई पड़ती है । शार दी के गीतों में चंदन की सुगंध और चांदनी की ठंडक होती है । जाहिर सी बात है कि ऐसे में ग़ज़ल तो होगी ही सुंदर । कल कवि सम्‍मेलन में कवि श्री विष्‍णु सक्‍सेना ने कहा कि पंकज भाई ग़ज़ल में ग़ज़ब की सोच होती है और गीतों में विलक्षण सौंदर्य होता है यदि इन दोनों का मेल हो जाये तो आनंद ही आ जाये । शार दी की ग़ज़लें दरअसल इसी मेल का उदाहरण होती हैं ।

Tree of Love

देहरी पग की सवाली  है अभी तक गाँव में
मटकुरी लटकी अटारी  है अभी तक गाँव में
               

गोपियाँ कब मान पाईं, कृष्ण मथुराधीश हैं
श्याम वृन्दावन-बिहारी है अभी तक गाँव में

सर उठा, सब ग़म उठा, सरगम उठा के जी गए
इक हठीली  धुन तुम्हारी है अभी तक गाँव में

बाढ़ के पग रुक गए, तूफ़ान का सिर झुक गया
इक पुराना पेड़ बाक़ी है अभी तक गाँव में

खेलती है  दोपहर कब्बा, पचीटे, रस्सियाँ
लोरियाँ रजनी सुनाती है अभी तक गाँव में

लील लेता है नगर मासूमियत, इंसानियत
आचरण सर्वोपकारी है अभी तक गाँव में

बात क्या तुम कर रही हो गाँव सच ऐसे कहाँ
दुःख, जहालत, बेलदारी  है अभी तक गाँव में

बाप-दादा ने लिया पर क़र्ज़ के चुकता नहीं
दानवी सी देनदारी है अभी तक गाँव में

अनमनी सी ट्यूबवैलें  और बिजली लापता
सूखती खेती-पथारी है अभी तक गाँव में
  
गोपियां कब मान पाईं कृष्‍ण मथुराधीश हैं, श्‍याम वृन्‍दावन विहारी है अभी तक गांव में, इस शेर को जिस दिन पढ़ा था उस दिन स्‍तबध सा रह गया था । कुछ समझ नहीं आ रहा था क्‍या लिखूं । यूं जैसे कि कोई सन्निपात सा हो गया हो । ये वो शेर है जिसकी विवेचना को मर्मज्ञ पूरे पूरे दिन कर सकता है । ये आनंद का शेर है ये पीर का शेर है ये आध्‍यात्‍म का शेर है । इस शेर को समझने के लिये कृष्‍ण को नहीं गोपियों को समझना होगा । इस मिसरे में कृष्‍ण के लिये 'हैं' और श्‍याम के लिये 'है' का जिस सलीक़े से प्रयोग किया गया है उसे सुन कर यूं लगता है कि एक ही शेर कहने में शायद पूरे प्राण झौंक दिये गये हैं । शुतुरगुरबा का दोष तो तब बने जब एक ही व्‍यक्ति के लिये कभी ''है'' तो कभी ''हैं'' प्रयोग किया जा रहा हो, लेकिन गोपियों का श्‍याम और मथुराधीश कृष्‍ण दोनों एक हैं कब, ये तो दो अलग अलग शख्‍सीयत हैं । मुझे नहीं मालूम बाकी के शेर ग़ज़ल के क्‍या हैं । मैं उनकी बात नहीं करना चाहता हूं, वो आप करें । मैं किसी और शेर की बात करके इस एक शेर का आनंद कम नहीं करना चाहता । वाह वाह वाह ।  

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रविकांत पांडेय

रवि भी मूल रूप से गीतकार है । रवि की ग़ज़लों में भी गीतों का ही शिल्‍प और बिम्‍ब होते हैं । ये होता ही है । क्‍योंकि हम मूल रूप से किसी एक विधा के सिद्धहस्‍त होते हैं । और हम उस विधा से जुड़ी किसी अन्‍य विधा में भी यदि काम करते हैं तो भी हमारी रचनाओं में मूल विधा की झलक मिलती ही है । तो रवि की ग़ज़लें भी गीतों और ग़ज़लों की संकर नस्‍ल है । आइये सुनते हैं ये सुंदर ग़ज़ल ।

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ढोलकों की थाप न्यारी है अभी तक गांव में
यानि हंसती ज़िंदगानी है अभी तक गांव में

कौन कहता है मेरा अपना वहां कोई नहीं
इक पुराना पेड़ बाकी है अभी तक गांव में

मैं पतंग उड़ती शहर के आसमां में शान से
पर बंधी यूं डोर मेरी है अभी तक गांव में

शहर में तुमको मिलेंगे कागजों के फ़ूल बस
रिश्तों में पर रातरानी है अभी तक गांव में

वो छलकती बूंद जल की, भीगती धानी चुनर
वो नदी, पनघट, वो गगरी है अभी तक गांव में

शहर में तो सूखकर नाला हुआ है ये मगर
प्यार के दरिया में पानी है अभी तक गांव में

कोई पागल सरफ़िरा था, सबसे से जिसको प्रेम था
मेरे पीछे ये कहानी है अभी तक गांव में

शहर में तो सूखकर नाला हुआ है ये मगर, बहुत गहरी बात को सरलता से कह दिया गया है । सचमुच शहर में आकर प्‍यार का दरिया जाने कैसे यूं ही सूख जाता है । इतना कूड़ा करकट जमा हो जाता है कि बस । और वेलेण्‍टाइन डे की भावनाओं को व्‍यक्‍त करता आख्रिरी शेर कोई पागल सिरफिरा था सबसे जिसको प्रेम था , खूब कहा है ये । गिरह का शेर भी बहुत ही सुंदर बना है मेरा अपना कोई होना मन को गहरे छू रहा है । वो छलकती बूंद जल की में सुंदर शब्‍द चित्र है । पूरा का पूरा दृश्‍य सामने आ रहा है । सुंदर ग़ज़ल । वाह वाह वाह ।

तो आनंद लीजिये दोनों ग़ज़लों का दाद देते रहिये और मिलते हैं अगले अंक में कुछ और रचनाकारों के साथ ।

29 टिप्‍पणियां:

  1. वाह! प्रेम-चतुर्दसी पर ब्लौग की ये गुलाबी-गुलाबी छटा...अहा!

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  2. लाजबाब , खासकर शार्दूला जी की गजल का तो क्या कहना, एक-एक शब्द जैसे मानो खुद बोल रहा हो, बहुत सुन्दर !

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  3. शार्दूला दी की ग़ज़ल की प्रतीक्षा कर रहा था बेताबी से| मतला और पहला शेर जितना अनूठा है उतना ही एक दूसरे के पूरक भी.... जैसे मतले के छुपे बिंबों का एक्सटेंशन एकदम से खुल के आ गया अपने पूरे अवतार में पहले शेर में| सचमुच मथुराधीश और वृंदावन बिहारी की अलग अलग छवि कितनी सहजता से शेर में आकार बैठ गई है| दूसरे शेर की भी बनावट मोहित करने वाली है...सर उठा, सरगम उठा | दीदी, लव यू !!!!

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  4. रवि मियाँ वैसे तो जाने कहाँ गुमशुदा से रहते हैं, और तरही मुशायरे में अचानक से निकाल आ जाते हैं चौंकाते हुये| गिरह अलग सा है और मैं पतंग उड़ती शहर के आसमां वाला शेर गजब का है|

    आखिरी शेर का अंदाज़ भी खूब निराला है|

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  5. शार्दूला जी की ग़ज़ल पढ़ कर मेरा भी वोही हाल हुआ जो आपका हुआ है...बिहारी है अभी तक गाँव में...वाह...पूरी शायरी हो गयी...बात कहातम...अब क्या पढना बाकी रहा...मंजिल मिल गयी जैसे इस तरही को...वाह..लाजवाब जैसे शब्द कितने बौने लगने लगे हैं...क्या कहूँ शार्दूला जी बस वाह वाह वाह कर रहा हूँ...आपने जो गिरह बाँधी है...वो तो बस उफ़ यूँ माँ है...गज़ब...

    रवि की ग़ज़लें और कवितायेँ हमेशा कुछ नया लिए होती हैं इस बार भी प्यार को नाले और दरिया में प्रस्तुत कर गाँव और शहर की बात पूरी कर दी...सारी की सारी ग़ज़ल अद्भुत है...वाह...ये तरही तो ऐसा आनंद दे रही है जिसे और कहीं पाना संभव नहीं...

    प्रेम पर दिया गया आपका मत मेरे मत से शतप्रतिशत मिलता है...प्रेम तो अनंत है उसे एक दिन में क्या बांधना...
    नीरज

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  6. वाह वाह वाह वाह..
    गजब की ग़ज़लें!
    शार्दुला जी ने एक ही शेर से मुशायरा लूट लिया. 'गोपियाँ कब मान पाईं, कृष्ण मथुराधीश हैं/श्याम वृन्दावन बिहारी हैं अभी तक गाँव में..' क्या कहने. निशब्द कर दिया इस शेर ने. सभी शेर बेहद खूबसूरत हैं लेकिन इस शेर की बात ही कुछ और है. शार्दुला जी को बहुत बहुत बधाई.

    रविकांत जी ने भी क्या शेर कहे हैं. आहा.
    क्या कमाल की गिरह लगाई है.'प्यार के दरिया में पानी है अभी तक गाँव में..' क्या मिसरा और शेर कहा है. वाह. 'शह्र में तुमको मिलेंगे कागजों के फूल बस..','वो नदी पनघट वो गगरी है अभी तक गाँव में.' बहुत ही खूबसूरत गज़ल है. बहुत बहुत बधाई.

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  7. वाह, क्या नज़ारा है आज पेज का !
    ..फिर छिड़ी बात फूलों की .. .
    भाईजी, आपकी बातों से पूरी तरह से इत्तफ़ाक रखता हूँ, प्रेम दिवस-विशेष का मोहताज़ नहीं, न दिवस-विशेष से बन्ध कर रहे. खैर, मन-मस्तिष्क के आकाश में जब व्यावसायिकता की अबीर उड़ रही हो तो हर कुछ बिकता और उलझता है, प्रेम भी.
    आपके कहे पर मेरा सादर प्रणाम.

    मुशायरे की ग़ज़लों पर शर्दुलाजी की सांगोपांग प्रतिक्रियाएँ पढ़ता रहा हूँ और अपके भाव-पक्ष पर मुग्ध होता रहा हूँ. आज तो स्वयं आपकी गज़ल सामने है. और मैं भावपक्ष पर अवाक् हूँ.
    मतले से ही आपने ग़ज़ल के अश’आर के ताव का इशारा दे दिया है. वाह !
    गोपियाँ कब मान पाईं.. . इस शे’र पर सारा लिखा कुर्बान हो सकता है. प्रेम की यह उच्च अवस्था जिस ढंग से उकेरी गयी है इस पर कहने को नहीं, हृदय से महसूस करने की बात है.
    प्रकृति के कोमल स्वरूप को नरम-नरम भाव ही निरख-परख सकते हैं. शार्दुलाजी की छुअन अनायास होती हुई भी संयमी है.
    जहाँ गिरह के शे’र में अदम्य विश्वास उभर कर आ रहा है तो बात क्या तुम कर रही हो.. जिस तरीके सचाई का बयान कर रही है वह हृदय की गहराइयों में कचोटता-सा लगता है.
    किस एक शे’र की कहूँ ? आखिरी शे’र की सपाटबयानी पूरे गाँव का आईना है.
    आज की ग़ज़ल ने मुग्ध कर दिया, सादर बधाइयाँ.

    ****

    भाई रविकांत को प्रत्यक्ष सुनने का भी मौका मिला है. और सही कहूँ तो रविकांतजी की गंभीरता आश्वस्त करती है.
    ढोलकों की थाप को हंसती ज़िन्दग़ी का पर्याय बहुत ही करीने से कहा गया है. बहुत ही सुन्दर !
    इस शे’र की ज़मीन और उड़ान दोनों पर हृदय से बधाई कह रहा हूँ -
    मैं पतंग उड़ती शहर के आसमां में शान से
    पर बंधी यूं डोर मेरी है अभी तक गाँव में

    यहाँ न शहर के प्रति नकार न गाँव के प्रति आह. सबकुछ संतुलित-संयमित. रविभाई बहुत-बहुत बधाई.
    गिरह के शे’र और आखिरी शे’र दोनों के बेलौसपन पर हृदय से साधुवाद.

    दोनों शायरों को साथ प्रस्तुत करने के लिये सादर धन्यवाद, पंकजभाईजी.

    सादर
    --सौरभ पाण्डेय, नैनी, इलाहाबाद (उप्र)--

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  8. कभी कभी एक अकेला शे’र पूरी ग़ज़ल से बड़ा हो जाता है। जैसे प्रेम के चरमोत्कर्ष का एक पल सारे जीवन से बड़ा हो जाता है। शार्दूला जी का वृंदावन बिहारी वाला शे’र कुछ ऐसा ही है। नमन इस शे’र को और बधाई इस शानदार ग़ज़ल के लिए।

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  9. रविकांत जी की ग़ज़ल बहुत सुंदर है। एक से बढ़कर एक शे’र कहे हैं उन्होंने। शहर में... वाला शे’र वाकई आज की सच्चाई बयान करता है। बधाई उन्हें इस शानदार ग़ज़ल के लिए।

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  10. देहरी पग की सवाली की तड़प, गोपियॉं कब मान पाईं की अर्न्‍तकथा के बाद एक अनकही श्रद्धॉंजलि हठीला जी को और फिर गिरह का विस्‍म्‍यकारी शेर जिसमें पुरने पेड़ ने संघर्ष की इन्तिहा पार की से होते हुए मक्‍ते तक आते-आते ग़ज़ल बहुत कुद कह गयी। उम्‍दा।
    रविकॉंत की ग़ज़ल कह र‍ही है कि अभी तक गॉंव में ही मन पूरी तरह बसा हुआ है।
    खूबसूरत।

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  11. आज सुबह जब मेल बॉक्स खुला तो सबसे पहले तरही की ये सुन्दर पन्ना खुला
    और बस मन मस्तिष्क पर छा गया. आचार्य जी के वक्तव्य पढने के बाद कुछ कहते नहीं बना.

    शार्दूला दीदी, इस बार आपकी टिप्पणियाँ आश्वस्त कर रही थी की वे आप बहुत ज्यादा व्यस्त नहीं है सो आपकी ग़ज़ल समग्र ग़ज़ल का इंतज़ार था आज पूरा मौका मिला रसास्वादन का. इसलिए सबसे पहले आभार प्रकट करता हूँ.

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  12. रविकांत जी ने क्या संगीत मय चित्र प्रस्तुत किया है अपने अशआरों में. गिरह तो बहुत ख़ास है.

    -
    सुलभ (मेरी आई.डी. में तकनिकी समस्या आ रही है)

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  13. शार्दूला दी की ग़ज़ल पढ़ कर अचानक ही अशोक साहिल जी का एक शेर याह हो आया ...

    लबों से चूमकर आखों से पट्टी खोल देती है
    मुहब्बत करते करते ज़िंदगी सच बोल देती है

    खेलती है दोपहर कब्बा, पचीटे, रस्सियाँ...
    गोपियाँ कब मान पाईं, ....
    जैसे शेर कहते कहते अचानक
    दुःख, जहालत, बेलदारी है अभी तक गाँव में
    दानवी सी देनदारी है अभी तक गाँव में
    जैसे शेर कहना,

    उम्दा ग़ज़ल के लिए ढेरो बधाई


    गोपियाँ कब मान पाईं, ....
    इस शेर के लिए पुनः बधाई
    लाजवाब शेर है

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  14. तो रवि की ग़ज़लें भी गीतों और ग़ज़लों की संकर नस्‍ल है ।

    :))))


    वो छलकती बूंद जल की, भीगती धानी चुनर
    वो नदी, पनघट, वो गगरी है अभी तक गांव में

    शहर में तो सूखकर नाला हुआ है ये मगर
    प्यार के दरिया में पानी है अभी तक गांव में

    कोई पागल सरफ़िरा था, सबसे जिसको प्रेम था
    मेरे पीछे ये कहानी है अभी तक गांव में

    शहर में बैठ कर गाँव की ग़ज़ल लिखना और गाँव का इतना बारीक चित्रण करना,, भाई वाह

    ढेरो बधाई स्वीकारें

    कोई पागल सरफ़िरा था...

    यह शेर विशेष है
    पुनः बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  15. प्रेम चौदस की विशेष साज-सज्जा मनमोहक है

    सुबीर संवाद सेवा परिवार में सभी को प्रेम चौदस की हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं

    उत्तर देंहटाएं
  16. गुरूवर,

    सबसे पहले तो इस अबड़े ही आकर्षक नामकरण के लिए क्या कहुँ स्वयं ही विस्मत हूँ " प्रेम चतुर्दशी " । यदि ऐसा ही रहा तो किसी दिन दैनिक पांचाग (हिन्दू कैलेण्डर) भी इस तिथी को छाप बैठेंगे "प्रेम चतुर्दशी" और हमारी परांपराओं को ढोने की रीतियाँ कोई उपवास न करा लें किसी से। फिर तो पंडित, कथा, व्रत, उपवास, उद्यापन और न जाने क्या क्या.....।

    शार्दुला जी की एक बहुत बड़ी विशेषता है कि वो देशज शब्दों को बहुत ही खूबसूरती से इस्तेमाल करती हैं किसी कोलाज की तरह लेकिन खासियत यह है कि इस कोलाज से देसी गंध भी आती है।

    बड़ी खूबसूरत बात कही है।
    ----------
    रविकाँत जी ने तो अपने एक ही अश’आर में जैसे लूट लिया हो :-

    शहर में तो सूखकर नाला हुआ है ये मगर
    प्यार के दरिया में पानी है अभी तक गाँव में

    बड़ा सधा हुआ कहन है।

    सादर,

    मुकेश कुमार तिवारी

    उत्तर देंहटाएं
  17. आपका ब्लॉग आज इतना खूबसूरत लग रहा है के क्या कहूँ...नज़रें ही नहीं हट रहीं...चश्म-ऐ-बद्दूर....

    नीरज

    उत्तर देंहटाएं
  18. Shardula Nogja jee ke takreeban sabhee sher aur Ravikant Pandey jee ka pahla doosra, chautha aur panchvaa sher achhe asardaar lage.

    उत्तर देंहटाएं
  19. आज कई पोस्ट देखी तो टाइप करके हाथ थक गये बाकी कल। रवि कान्त और शर्दूला जी की गज़लेओं पर कल टिप्पणी करूँगी। धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  20. आज कई पोस्ट देखी तो टाइप करके हाथ थक गये बाकी कल। रवि कान्त और शर्दूला जी की गज़लेओं पर कल टिप्पणी करूँगी। धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  21. ब्लोग की अनुपम छटा और आज की ग़ज़लें अहा और फिर प्रेम चतुर्दशी तीनों को मिलाकर जो घोल तैयार हो वो सुबीर सुंवाद और यहाँ की तरही है!
    शार दी जिस तरह से टिप्पणीयों मे स्नेह देती हैं, और हर शे'र पर बारिक़ नज़र रखती हैं उस्के अनुसार आज की ग़ज़ल है जिसमें सारी चिज़ें हैं!
    देहरी पग की सवाली... जैसे मतले मे मटकुरी और अटारी की बातें इस बात की ज़मानत हैं की इस रदीफ के लिये ही यह मतला पैदा हुआ है! दी जिस तरह से देशज शब्द का इस्तेमाल करती हैं अपनी ग़ज़लों और गीतों वो तब और सुख देता है जब वो उस्की मह्सुसीयत को बिल्कुल उसी तरह से तारी करे!
    और गोपियों वाला शे'र तो अद्भूत है ही, बात यही है की इस्के लिये आप भी उतने ही जिम्मेदार हैं जिस रदीफ के लिये इस शे'र को लिखा गया है उसे देने मे भी आप्को मसक्क्त करनी हुई होगी ! और दी का यह शे'र कालजई हो गया!
    रूह के प्रेम से जुडता शे'र सर उठा सब ग़म उठा है! इस शे'र को बगैर मह्सूस किये नही लिखा जा सक्ता !
    और आत्मविश्वास से लबरेज शे'र है जिसपर गिरह लगाई गई है!
    गाँव के खेल की बात करता यह शे'र कब्बा पचीटे और रस्सियाँ बेहद खुब्सूरत शे'र है यह!
    लील लेता है नगर मासूमियत ...और अदब की बात इस अहद में इसी तरह से की जा सकती है!
    और गाँव का एक रूप जिसे सभी जानते हैं मगर किसी ने हिम्मत नही की कहने की और क्या खुबसूरत गिरह से बान्ध दिया है देनदारी से!
    मैं जब तरही लिख रहा था तब यही बातें लिखना चाहता था, जिसके लिये बेचैन था और लिख न पाया ! बहुत शुक्रिया दी इस चेहरे को भी सामने रखने के लिये!
    और एक बार फिर पथारी कफिये ने स्तब्ध कर दिया मुझे! उफ्फ्फ क्या ग़ज़ल कही आपने! सादर दी!
    रवीकांत जी वाक़ई गायब रह्ते है, इधर लिखते भी कम है,तक़रीबन ना के बराबर, अपने रीदम में नही लग रहे, जितनी इनकी क्षमता है उससे कहीं कमतर ये ग़ज़ल है,गिरह बहुत अच्छा है, पतंग वाला शे'र भी गज़ब का है, कुल मिलाकर यही कहूंगा की लौट आवो रवी भाई, अपने पूराने तेवर में!

    अर्श

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  22. रविकांत जी, गिरह के शेर में पेड़ को 'मेरा कोई अपना' कहना बहुत लुभावना लगा.
    मैं पतंग उड़ती शहर के आसमा में शान से/ पर बंधी यूँ डोर मेरी... ये सुन के बच्चों को रूट्स और विंग्स देने वाली बात याद आ गई! बहुत ही सुन्दर रूपक का इस्तेमाल!
    शहर में तुमको मिलेंगे...कसा हुआ मिसरा...प्यारी बात!
    वो छलकती बूँद जल की भीगती धानी चुनर...बहुत ही सुन्दर मिसरा फ़िर से! एकदम ग्राफिक!
    शहर में तो सूख कर नाला.... कितना सुन्दर, सार्थक, सम्पूर्ण शेर!
    मुझे मक्ता बहुत ही पसंद आया "क्या सूफियान बात है...वाह! यही होना चाहिए..."प्रेम जब अनंत हो गया रोम रोम संत हो गया!" वाली बात....यही सही शेर है प्रेम चतुर्दशी का ...सुबीर भैया की पारखी निगाह को सलाम!
    ===
    आप सब ने जो मुक्त हृदय से इस लेखन को मान दिया और उत्साह वर्धन किया है उसके लिए आप सब की ऋणी हूँ.
    "श्याम वृन्दावन-बिहारी " वाला शेर माधव का है, सो सब यश-अपयश उन्हीं को अर्पण है.
    ये सुबीर भैया का नेह और आग्रह ही है जो मुझसे ग़ज़ल लिखवा लेता है! उनकी कुट्टी भी सिर माथे है :)
    आप सब के स्नेह से अभिभूत... सादर शार्दुला

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  23. शार्दूला दीदी जो शब्दों का व्यूह रचती है, पढने वाला उसे भेद नहीं पता है, बस वहीँ फंस के रह जाता है.
    ये बानगी मतले से लेकर आखिरी शेर तक देखी जा सकती है.
    "गोपियाँ कब मान पाईं, कृष्ण मथुराधीश हैं......................", अद्भुत, अद्भुत अद्भुत. कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं हूँ.
    "बाढ़ के पग रुक गए, तूफ़ान का सिर झुक गया.............", वाह वा
    "खेलती है दोपहर कब्बा, पचीटे, रस्सियाँ................", लाजवाब
    "अनमनी सी ट्यूबवैलें और बिजली लापता...............", सटीक चित्रण, कौन कहता है कि रंगों से चित्र बनाये जा सकते हैं, शब्द भी उसकी बराबरी कर ही लेते हैं, बशर्ते वो किसी हुनरमंद के हाथों में हों, और यहाँ पे शार्दूला दीदी की कलम से निकलें हैं.
    पूरी ग़ज़ल आनंदाई है. बधाई स्वीकारें

    रवि भाई, की ग़ज़लें हर बार अपने अलग दायरें बनती हैं, सबसे अलग और सबसे अनूठे. उनके गीतों के शिल्‍प और बिम्‍ब जब ग़ज़ल के शेरों में आते हैं तो अलग ही छटा निखर उठती है.
    "ढोलकों की थाप न्यारी है अभी तक गांव में ..........", क्या खूब मिसरा गढ़ा है.
    गिरह भी लाजवाब बाँधी है, "कौन कहता है मेरा अपना वहां कोई नहीं ............." वाह वा
    "मैं पतंग उड़ती शहर के आसमां में शान से .................", ये बात तकरीबन हर कोई अपने शेरों में ला रहा है, मगर आपका अंदाज़ ये लगने ही नहीं दे रहा कि ये कहा गया है. अद्भुत कहन.
    "शहर में तुमको मिलेंगे कागजों के फ़ूल बस .......", वाह वा
    "वो छलकती बूंद जल की, भीगती धानी चुनर .............", उफफ्फ्फ्फ़
    हासिल-ए-ग़ज़ल शेर तो ये है. "शहर में तो सूखकर नाला हुआ है ये मगर .........................", वाह वाह वाह
    मज़ा आ गया. ढेरों बधाइयाँ

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  24. गोपियाँ कब मान पाईं .....
    क्या बात है शार्दुला जी !!
    सर उठा ,सब ग़म उठा........
    इतनी ज़बर्दस्त लय है किक्या कहूं इसे पढ़ा नहीं जा रहा है बल्कि ये मिसरा शीतल , निर्मल सरिता की धार की तरह रवानी लिये हुए है ,बहुत ख़ूब !!
    बहुत उम्दा गिरह लगाई है आप ने
    और जिन symbols का इस्तेमाल किया है आप ने ग़ज़ल में वो क़ाबिल ए तारीफ़ है
    बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं
    ********
    ख़ूबसूरत ग़ज़ल है रवि जी ख़ास तौर पर ये शेर
    कौन कहता है ......
    बहुत ख़ूब !!
    और
    आख़री दोनों अश’आर तो पूरी ग़ज़ल की जान हैं
    शुभकामनाएं और बहुत सारी बधाइयाँ

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  25. कहा जाता है कि ग़ज़ल माने 'गागर में सागर'.शार्दूला जी की आज की ग़ज़ल से यह उक्ति चरितार्थ हो रही है.दरअसल ग़ज़ल के स्वरुप में यह एक सारगर्भित आलेख है जिसमे गाँव से जुडा रुमान तो है ही,गाँव की तल्ख़ सच्चाईयां भी मौजूद हैं.'कचोट' की एक अंतर्ध्वनि वैसे तो पूरी ग़ज़ल में सुनाई देती है लेकिन पहले छः शेरों में यह जहाँ नौस्टेल्जिया के लिबास मे है वही आखिरी के तीन शेर गाँवों की बदहाली को लेकर मुखातिब हैं.गिरह में गहरी बात की गई है.और बांके बिहारी वाले शेर पर तो मुंह से बेसाख्ता एक ही बोल फूटता है-सुभानाल्लाह.

    शार्दूला जी इस पुरअसर ग़ज़ल के लिए दिली दाद कुबूल फरमाएं.



    रविकांत भाई ने सूक्ष्म बिम्बों के माध्यम से ग़ज़ल बुनी है. उनकी गिरह और पतंग वाला शेर तो लाजवाब है ही लेकिन मुझे जो शेर सबसे प्यारा और अजीज लगा वह है 'शहर में तो सूख कर नाला हुआ है.......' क्या बात है...हैट्स ऑफ ...

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  26. शार्दूला जी की गज़ल मन को मोह रही है ... शुरूआती शेरों से ही जैसे प्रेम की मधुर सुहानी डगर पे चलने लगे ... गोपियाँ कब मान पाई कृष्ण मधुरा धीश को ... या फिर सर उठा सब गम उठा ... इक हठीली धुन तुम्हारी है अभी तक गाँव में ... वाह बार बार अटक जाता हूँ इन शेरों पे ... खेलती है दोपहर कब्बा पचीटे रस्सियाँ ... गज़ब का शेर है ... कहाँ कहाँ से ढूंढ कर शब्द मिकाले हैं गाँव की मिटटी से ... और गिरह का शेर तो जैसे जी रहा है पुराने भागीरथी पेड को .....
    रवि कान्त जी भी अपने अलग अंदाज़ को निभा रहे हैं इस लाजवाब गज़ल में ... गाँव और शहर के अंतर को स्पष्ट करते शेर चाहे ... मैं पतंग उडती शहर ... या फिर शहर में तुमको मिलेंगे ... या फिर ... शहर में तो सूखकर नाला हुवा है ये मगर ... सभी शेर गाँव और शहर का अंतर बयान कर रहे हैं ... वाह रवि कान्त जी वाह ...

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  27. खूब खूब खूब

    दो सिद्धहस्त गीतकारों की ग़जल...

    शार्दूला दी पहली बात तो ये समझनी होगी मुझे कि आप मुझे अच्छी लगती हैं, इसलिये आप का लिक्खा अच्छा लगता है या आप का लिक्खा अच्छा होता है, इसलिये आप अच्छी लगती है या दोनो एक दूसरे के पूरक है इस तरह कि आप अच्छी ही हैं, इसीलिये अच्छा लिख पाती है, सबसे अलग, सबसे जुदा....!

    जिस शेर की तारीफ गुरू जी ने की, उस शेर की सोच पर कुर्बान....ऐसा सोच लेना, ऐसी कल्पना कर लेना ही रोमांचक है, फिर उसे छंद में ढालना.... मेरी अच्छी दीदी... मैं क्या कहूँ अब आपको....!!

    सर उठा, सब ग़म उठा, सरगम उठा के जी गये... वाह..क्या धुन..क्या लय है इस शेर में...!

    बाढ़ के पग रुक गये, तूफान का सिर झुक गया..... क्या बात है....!!

    बात क्या तुम कह रही हो, गाँव सच ऐसे कहाँ.... कड़वा सच दी।

    और रविकांत जी, दूसरे गीतकार....

    "कोई पागल सिरफिरा था, सबसे जिसको प्रेम था,
    मेरे पीछे ये कहानी है अभी तक गाँव में....!"

    बढ़िया...

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