बुधवार, 25 जनवरी 2012

दिगम्‍बर नासवा और निर्मला कपिला जी कह रहे हैं -क्या किया इतने दिनों तक दूर रह के गाँव से, घूमती ये रूह रहती है अभी तक गाँव मे

सुकव‍ि रमेश हठीला स्‍मृति तरही मुशायरा

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इक पुराना पेड़ बाकी है अभी तक गाँव में
कुछ पुराने पेड़ बाकी हैं अभी तक गाँव में

कड़ाके की ठंड और  उस पर रह रह कर बारिश हो जाना । मौसम जितना खराब हो सकता है उतना हो रहा है । ऐसे समय में जब भी हठीला जी को फोन लगाता था तो एक ही उत्‍तर मिलता था 'दबे पड़ें हैं भैया अपन तो रजाई में, अभी नहीं निकलने वाले अपन' । मगर जैसे ही कहो कि बसंत पंचमी के कार्यक्रम की तैयारी करनी है, तो दस मिनिट में ही तैयार होकर आ जाते । शायद यही समर्पण था जो उनको समय के साथ क़दम मिला कर चलने की ताक़त देता रहा । वे गुनगुनाते रहे 'मैं हूं बंजारा बादल भटकता हुआ, प्‍यासी धरती दिखी तो बरस जाऊंगा' । तो आइये उसी बंजारे बादल की स्‍मृति में आज सुनते हैं दिगम्‍बर नासवा और निर्मला कपिला जी को ।

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दिगम्‍बर नासवा

इनकी ग़ज़लों में आजकल बहुत सुंदर प्रतीक आ रहे हैं । सबसे अच्‍छी बात ये है कि जितनी सुंदर छंदमुक्‍त कविताएं होती हैं उतनी ही खूबसूरत ग़ज़लें भी इन दिनों आ रही हैं । कभी कभी तो ये भी तय करना मुश्किल होता है कि ग़ज़लें ज्‍यादा सुंदर हैं या कविताएं । खैर आइये सुनते हैं ये ग़ज़ल ।

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इक पुराना पेड़ बाकी है अभी तक गाँव में
हाँ वही मेरी निशानी है अभी तक गाँव में

खंडहरों में हो गई तब्दील लेकिन क्या हुवा
इक हवेली तो हमारी है अभी तक गाँव में

रोज आटा गूंथ के सब्जी चढ़ा देती है वो
और तेरी राह तकती है अभी तक गाँव में

चाय तुलसी की, पराठे, मूफली गरमा गरम
धूप सर्दी की बुलाती है अभी तक गाँव में

याद है घुँघरू का बजना रात के चोथे पहर
भूत की क्या वो कहानी है अभी तक गाँव में

क्या किया इतने दिनों तक दूर रह के गाँव से
दास्‍तां अपनी तो ठहरी है अभी तक गाँव में

गीत ऐसे कह गए हैं कुछ हठीला जी यहाँ
रुत सुहानी गुनगुनाती है अभी तक गाँव में

पिछले अंक में राणा ने इखत्‍तर का जोरदार प्रयोग किया था तो आज यहां 'मूफली' का उतना ही सुंदर प्रयोग है । हठीला जी होते तो मूफली पर आनंद लेते । याद है घुंघरू का बजना रात के चौथे पहर ये शेर एकदम से हाथ पकड़ कर स्‍मृतियों के गलियारों में खींच कर ले जा रहा है । और खंडहरों में तब्‍दील हवेली ने तो मानो उस याद को ताजा कर दिया जिसके चलते गांव में इस मिसरे ने जन्‍म लिया था । और हठीला जी को समर्पित शेर तो खूब बन पड़ा है ।  वाह वाह वाह ।

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निर्मला कपिला जी
एक शब्‍द है 'जिजीविषा' मुझे लगता है कि निर्मला दी उस शब्‍द की पर्यायवाची हैं । मुश्किलों से जूझती हैं और हौसले के साथ फिर मैदान में आ जाती हैं । पिछले दिनों काफी बीमारी व्‍याधाओं से लड़ती रहीं, लेकिन खेल भावना के साथ तरही ग़ज़ल लेकर मैदान में आ गईं । शायद निर्मला दी जैसे लोगों के लिये ही कहा जाता है कि 'खेल जीता या हारा उससे कुछ फर्क नहीं पड़ता, फर्क इस बात से पड़ता है कि खेल को खेला कैसे गया । आइये सुनते हैं ये सुंदर ग़ज़ल ।

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इक पुराना पेड बाकी है अभी तक गाँव में
जिस पे चिडिया गीत गाती है अभी तक गाँव में

जब से अपना गाँव  छोड़ा सो न पाई चैन से
गोद दादी की बुलाती है अभी तक गाँव में

बदरिया बरसी, धरा झूमी, पवन महकी चले
सूँघ लो सोंधी सी माटी है अभी तक गाँव में

साथ जिसके खेलती गुडिया, पटोले वो सखी
छुट्टियों मे मिलने आती है अभी तक गाँव में

आँख से आँसू टपक जायें किसी को याद कर
यूं  विरह कोयल सुनाती है अभी तक गाँव में

भेज बेटे को शहर मे धन कमाने के लिये
माँ अकेली रोज रोती है अभी तक गाँव में

खूब बदला हो जमाना आज शहरों मे भले
पर बहू घूँघट में रहती है अभी तक गाँव में

सादगी, ईमानदारी आपके अंदर है तो
आपकी पहचान होती है अभी तक गाँव में

चाहती हूँ आखिरी मैं साँस लूँ जाकर वहां
घूमती ये रूह रहती है अभी तक गाँव में

वाह सुंदर शेर कहे हैं । आंख से आंसू टपक जाएं किसी को याद कर,  उफ क्‍या हांटिंग शेर है, एकदम रोंगटे खड़े कर देने वाला शेर । चाहती हूं आखिरी मैं सांस लूं जाकर वहां, पीड़ा का शेर है ये । पीड़ा जो हम सबके अंदर है । किसी दार्शनिक ने कहा है कि आपके अंदर गांव का बचपन नहीं ठहरा होता, वास्‍तव में वो समय ठहरा होता है । साथ जिसके खेलती गुडि़या पटोले, ये शेर भी वैसा ही है । वाह वाह वाह ।

तो आनंद लेते रहिये दोनों रचनाकारों की सुंदर ग़ज़लों का और देते रहिये दाद । अगले अंक में मिलते हैं दो और रचनाकारों के साथ ।

33 टिप्‍पणियां:

  1. दोनों ही रचनायें, अत्यन्त सुन्दर..

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  2. नासवा जी को पढ़ना हमेशा ही सुखकर होता है ,,बड़ी आसानी से वो अपने भावों को क़लमबंद कर देते हैं ,
    क्या किया इतने दिनों तक ............

    अपनी मिट्टी से जुड़ा ये शेर सभी को कुछ एहसास दिलाने में कामयाब है
    बहुत खूब !!
    ***********
    निर्मला दी तो स्वयं में एक संस्था हैं ,,हमेशा कुछ सिखा जाती हैं हमें
    चाहती हूँ आख़री...........
    यूँ तो ग़ज़ल ही अच्छी है लेकिन ये शेर तो मन में घर कर गया ,,क्या बात है !!

    दोनों ख़ूबसूरत ग़ज़लों के रचनाकारों को बहुत बहुत बधाई
    और पंकज को इस आयोजन को सफलतापूर्वक आगे बढ़ाने की बधाई और शुभकामनाएं

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  3. सिंपली माइंड ब्लोइंग
    दिल गार्डेन गार्डेन हो गया इन दोनों ग़ज़लों को पढ़ कर
    मुशायरा अपने परवान पर है सुबीर जी
    आप के प्रयासों के लिये एक बार फिर से साधुवाद

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  4. वाकई दोनों गज़लों में दिगंबर जी और निर्मला जी ने कमाल के शेर कहे हैं..
    दिगम्बर जी के "चाय तुलसी की, परांठे..", "याद है घुंघरू का बजना", "क्या किया इतने दिनों तक.." बहुत बढ़िया लगे.
    निर्मला जी की गज़ल में स्ट्रांग नोस्टेलजिया के भाव हैं. बहुत बढ़िया शेर हैं "जब से अपना गाँव छोड़ा..", "भेज बेटे को शहर..","खूब बदला हो जमाना आज शहरों में भला..","चाहती हूँ आखिरी मैं सांस लूं.." लाजवाब!
    दिगंबर जी और निर्मला जी को बहुत बहुत बधाई.

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  5. आज की दोनों ग़ज़लें उसी बहाव में लेकिन एक विशेष अंतर्धार लिये हुए हैं. दिगम्बर नासवाजी को छंदमुक्त कहते भी पढ़ा है और अभी उनकी ग़ज़लों से रू-ब-रू हो रहा हूँ. प्रतिक्रिया में बस एक ही शब्द.. वाह !
    रोज आटा गूंथ के सब्जी चढ़ा देती है वो
    और तेरी राह तकती है अभी तक गाँव में

    इस शे’र को मैं अपने दिल के इतने करीब पा रहा हूँ कि शब्दों में अपनी धड़कनें सुन सकता हूँ.
    या फिर,
    याद है घुँघरू का बजना रात के चौथे पहर
    भूत की क्या वो कहानी है अभी तक गाँव में

    दिगम्बरजी आपने क्या कुछ नहीं पूछ लिया ! अपनी चुहलबजियाँ याद हो आयीं. आँखें नम हो गयीं, साहब !
    यही तो एक शायर की सफलता है.
    चाय तुलसी की, पराठे, मूफली गरम गरम
    धूप सर्दी की बुलाती है अभी तक गाँव में

    बहुत खूब !
    इस ’मूफली’ को वस्तुतः मूफली ही कहना चाहिये. फली जो इस्पेशियली मूं के लिये फले !!
    दिगम्बर नासवाजी को इस उम्दा मेरी हार्दिक बधाइयाँ.

    निर्मला कपिलाजी के प्रति मैं जिस कलमगोई के चलते सम्मान का भाव रखता हूँ, इस ग़ज़ल ने उसमें और इज़ाफ़ा ही किया है. एक-एक शे’र नोस्टेल्जिया की रोशनाई से उकेरा हुआ है, निहायत ही करीने से.
    जब से अपना गाँव छोड़ा सो न पाई चैन से
    गोद दादी की बुलाती है अभी तक गाँव में

    जो सारा कुछ स्मृतियों का नरम-नरम सा हिस्सा बन गया हो उसे कोई कैसे छीन सकता है ! .. वाह !
    इसी धार में बदरिया बरसी, धरा झूमी.. और साथ जिसके खेलती गुड़िया.. शे’र हैं. दिल से बाँधा है आपने आदरणीया.
    और इस शे’र पर तो कुछ भी कहना मुमकिन नहीं बन रहा--
    आँख से आँसू टपक जायें किसी को याद् कर
    यूं विरह कोयल सुनाती है अभी तक गाँव में


    चाहती हूँ आखिरी मैं साँस लूँ..
    आपकी सभी सद्-इच्छाएँ पूर्ण हों आदरणीया.

    आज की दोनों ग़ज़लें हृदय की मुलामियत को थपकियाँ देती ग़ज़लें हैं.

    भाई पंकजजी, आपके सौजन्य से आजकल हम जो कुछ जी रहे हैं उसके लिये हृदय से धन्यवाद.

    सादर
    --सौरभ पाण्डेय, नैनी, इलाहाबद (उप्र)--

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  6. रोज़ आटा गूंथ के...चाय तुलसी की....याद है घुँघरू का बजना...गीत ऐसे कह गए...भाई वाह दिगंबर जी वाह...गदगद कर दिया आपने अपने अशआरों से...कसम से क्या शेर कहते हैं आप...सुभान अल्लाह...सुभान अल्लाह...हम तो भाई आपके पुराने चाहने वालों में से हैं...और आपने कभी एक बार भी अपनी कविताओं या ग़ज़लों से हमें निराश नहीं किया...हर बार चौंकाया ही है...इस बार तो चौकाने में हद ही कर दी...तरही की धार में उन्मुक्त हो कर तैरने का आनंद ले रहे हैं हम तो. जियो भाई जियो.

    निर्मला जी के हौसले की जितनी तारीफ़ की जाय कम है. गज़ब का ज़ज्बा है हमारी इस बहन में. जिस उम्र में लोग अपनी लेखनी को विश्राम दे कर हरिनाम जपने लगते हैं उस उम्र में ग़ज़ल सीख कर ऐसे कमाल के शेर एक बार नहीं लगातार कहना किसी अजूबे से कम नहीं. "गुडिया पटोले खास तौर पर पटोले शब्द बरसों बाद पढ़ा सुना...बचपन की यादें ताज़ा हो गयीं..."गोद दादी की बुलाती..." अहाहा हा मुझे सच में अपनी दादी याद आ गयी जिनकी गोद में मैं बरसों पला..."आँख से आंसू टपक जाय..." शेर कहने के लिए पत्थर का कलेजा चाहिए, डबडबाई आँखों से ऐसे शेर नहीं कहे जा सकते..."भेज बेटे को..." शेर में उन्होंने न जाने ऐसी कितनी माओं की पीड़ा को शब्द दिए जिनके बेटे कमाने शहर गए और लौट कर नहीं आये...निर्मला जी आपके फन की जितनी तारीफ़ की जय कम ही पड़ेगी...

    इस तरही में अपन तो तर गए...

    नीरज

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  7. शानदार गजलों के लिए नासवा जी और निर्मला जी को हार्दिक बधाई !

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  8. ये मेरी ही टिप्पणी स्पैम में क्यूँ जाती है? कहीं तिलक राज कपूर साहब की कल कही हुई बात में सच्चाई तो नहीं ?

    नीरज

    उत्तर देंहटाएं
  9. जैसे जैसे आगे बढ़ता जा रहा है यह मुशायरा और ऊँचाइयाँ प्राप्त करता जा रहा है। क्या शे’र कहे हैं दिगंबर नासवा जी और निर्मला जी ने।
    ये शे’र हो....
    रोज आटा गूंथ के सब्जी चढ़ा देती है वो
    और तेरी राह तकती है अभी तक गाँव में
    या ये हो....
    याद है घुँघरू का बजना रात के चौथे पहर
    भूत की क्या वो कहानी है अभी तक गाँव में
    या....
    चाय तुलसी की, पराठे, मूफली गरम गरम
    धूप सर्दी की बुलाती है अभी तक गाँव में
    छूते ही अपने जादू से गाँव में पहुँचा देते हैं। सभी शे’र बहुत अच्छे हैं। बहुत बहुत बधाई दिगंबर नासवा जी को।

    अपनी दादी से तो मेरा भी बहुत लगाव है इसलिए भैया हम तो मर मिटे इस शे’र पर...
    जब से अपना गाँव छोड़ा सो न पाई चैन से
    गोद दादी की बुलाती है अभी तक गाँव में
    और इस शे’र के तो क्या कहने...
    आँख से आँसू टपक जायें किसी को याद् कर
    यूं विरह कोयल सुनाती है अभी तक गाँव में
    बाकी के शे’र भी बहुत शानदार हैं, यहाँ कोट करने का यह मतलब नहीं कि कोई शेर कमजोर है। बहुत बहुत बधाई निर्मला जी को इस शानदार ग़ज़ल के लिए।

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  10. नि:शब्द कर दिया ..शब्द नहीं है तारीफ़ के लिए ..नासवा जी और निर्मला जी को हार्दिक बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  11. गुरूवर,

    दिगम्बर जी के लिए जितना भी अभी तक टिप्पणियों में कहा गया है उससे कहीं ज्यादा असरदार अश’आर कहें हैं।
    रोज आटा गूंथ के सब्जी चढ़ा देती है वो
    और तेरी राह तकती है अभी तक गाँव में

    कुछ ऐसा लगा जैसे किसीने अभी छोंका लगाया हो धांस से आँसू बह निकले हों। लाजवाब......

    निर्मला जी, के लिए भी जो कुछ कहा गया है वो बिल्कुल अपने ब्लॉग "वीर बहुटी" की तरह ही अपने हिस्से की जंग लड़ती हैं और जीतती भी हैं।
    इस शे’र ने बहुत कुछ याद दिला दिया :-

    जब से अपना गाँव छॊड़ा सो न पाई चैन से
    गोद दादी की बुलाती है अभी तक गाँव में

    तरही की इन उँची पेंगों को देखके मुझे तो खड़े होने का भी साहस नही हो रहा है.....

    सादर,

    मुकेश कुमार तिवारी

    उत्तर देंहटाएं
  12. चाय तुलसी की, परॉंठे...का खिंचाव, याद है घुँघुरू......., का रोंगटे खड़े करने वाला भाव, क्‍या किया ..... का पराजय भाव......... और अंत में हठीला जी का स्‍मरण; दिगम्‍बर भाई, बहुत संदर भाव हैं, बधाई।

    निर्मला जी की ग़ज़ल स्‍पष्‍ट करती है कि अहसास शेर को कैसे रूप देता है। दादी से लेकर गुडि़या पटोले तक के साथ-साथ कोयल के विरह गीत और मॉं का अकेले रोना तक एक भाव-इनद्रधनुष है विभिन्‍न छटायें लिये हुए।

    उत्तर देंहटाएं
  13. वाह-वाह! बहुत ख़ूब
    ग़ज़लों में बहुत ही ख़ूबसूरत और अनूठे भावों और अन्दाज़े-बयाँ के लिए दिगम्बर नासवा जी को तथा निर्मला दी को बधाई ।
    हठीला जी स्मृति को समर्पित नासवा जी का शेर बहुत खूब लगा। निर्मला दी ने जो नॉस्टेल्जिया अपने अशआर में बुना है बहुत
    हाँट करने वाला है बचपन का एक एक पल याद दिलाने वाला ।
    कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन......!!!!!!

    उत्तर देंहटाएं
  14. Shandar dono gajalon ko sundar dhang se prastuti karne ke liye aapka aabhar!

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  15. क्या किया इतने दिनों तक दूर रह के गाँव से
    दास्तां अपनी तो ठहरी है अभी तक गाँव में

    गीत ऐसे कह गए हैं कुछ हठीला जी यहाँ
    रुत सुहानी गुनगुनाती है अभी तक गाँव में
    --दिगम्बर नासवा

    जब से अपना गाँव छोड़ा सो न पाई चैन से
    गोद दादी की बुलाती है अभी तक गाँव में

    भेज बेटे को शहर में धन कमाने के लिये
    माँ अकेली रोज़ रोती है अभी तक गाँव में

    चाहती हूँ आखिरी में साँस लूँ जाकर वहाँ
    घूमती ये रूह रहती है अभी तक गाँव में
    --निर्मला कपिला
    दोनों शायरों की ग़ज़लें उम्दा हैं,और उपरोक्त शेर तो बहुत ही असरदार हैं ! मुझे खुशी है कि हमारे हिमाचल की शायरा निर्मला कपिला जी इतनी अच्छी गज़ल कहती हैं !

    उत्तर देंहटाएं
  16. गणतंत्र दिवस की बहुत बधाईयाँ सभी को सबसे पहले !
    आज की इन दोनों ग़ज़लों ने जैसे धमाल मचा दिया है , दिगम्बर जी के छ्न्द मुक्त कविताओं का तो मैं पहले से ही प्रशंसक रहा हूँ और ग़ज़लों का अलग से , आज की ग़ज़ल मे भी उन्होने कमाल किया है... खंडहरों मे और रोज़ आटा.. इन दोनों शे'रों ने इन्हे एक अलग उँचाई बक्शी है ... बेहद खुब्सूरत शे'र कहे हैं ... बहुत बधाई...

    निर्मला माँ के लिये क्या कहूँ... जिजीविषा की ये पर्यायवाची हैं, आप सही कह रहे हैं की इनकी तबीयत बहुत ही ख़राब थी.. मगर इसके बावज़ूद इन्होने ग़ज़ल कही और क्या ग़ज़ब की ग़ज़ल कही इन्होनें... जब से अपना गाँव छोड़ा , आँख के आँसू... खूब बदला.. सादगी,,, चाहती... क्या खूब शे'र कहे हैं इन्होनें... बहुत बधाई..


    अर्श

    उत्तर देंहटाएं
  17. बढिया रचनाएं।

    गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं....

    जय हिंद... वंदे मातरम्।

    उत्तर देंहटाएं
  18. दिगम्बर नासवा जी ने लाजवाब शब्दों और भावों के साथ सुकवि हठीला जी को श्रद्धांजलि दी है।
    और यह ‘मूफली’ शब्द तो हमारे प्रदेश में भी प्रयुक होता है यथावत । बचपन से रिश्ता कायम रखे हुए यह शब्द इस शेर को और भी नास्टेल्जिक बना रहा है ।
    अपने शेरों निर्मला दी ने जो नास्टेल्जिया रचा है, बहुत हाँटिंग है । यह पीड़ा सबकी पीड़ा है । बधाई नासवा जी और निर्मला दी !

    उत्तर देंहटाएं
  19. भाई हों तो ऐसे! मुझे नास्वा जी के साथ स्थान दे कर मेरा जो मान बढाया उसके लिये धन्यवाद। मेरे उत्साहवर्द्धन के लिये भी सभी का धन्यवाद।अजकल लिखने का क्रम बहुत कम हो गया है---पता नही क्यों शायद सेहत की वजह से निराश सी हो गयी थी लेकिन आज फिर से नया उत्साह लेकर जा रही हूँ।
    नास्वा जी की गज़ल हो या कविता दिल की गहराइयों मे डूब कर लिखते हैं मै तो हमेशा सोचने पर मजबूर हो जाते4ए हूँ-------
    खन्दहरों मे हो गयी----
    चाय तुलसी की---- वाकई तुलसी वाली चाय पीने का मन हो आया\ शहरों मे हर जगह कहाँ मिलती है तुलसी
    याद है घुंघरू का बजना---- बचपन के भूत प्रेतों के किस्से अभी तक जहन मे हैं। लाजवाब गज़ल नास्वा जी को बधाई। सुबीर जी को ढेरों आशीश जो मुझे आगे बढने की प्रेरन देते हैं खुश रहो मेरे भाई।

    उत्तर देंहटाएं
  20. दिगम्बर नासवा जी ने लाजवाब शब्दों और भावों के साथ सुकवि हठीला जी को श्रद्धांजलि दी है।
    और यह ‘मूफली’ शब्द तो हमारे प्रदेश में भी प्रयुक होता है यथावत । बचपन से रिश्ता कायम रखे हुए यह शब्द इस शेर को और भी नास्टेल्जिक बना रहा है ।
    अपने शेरों निर्मला दी ने जो नास्टेल्जिया रचा है, बहुत हाँटिंग है । यह पीड़ा सबकी पीड़ा है । बधाई नासवा जी और निर्मला दी !

    उत्तर देंहटाएं
  21. इतनी भावप्रधान गज़लें हैं कि मज़ा ही आ गया, और क्यों न हों, आखिर शायर कौन हैं ! बहुत आभार आप दोनों का निर्मला दी और दिगंबर जी इतने सुन्दर शेर कहने के लिए.
    -----
    "खंडहरों में हो गई तब्दील.... " ये शेर ज़ाती तौर से आपने बहुत करीब लगा मुझे...बहुत सुन्दर!
    "रोज़ आता गूंथ के..."--- बहुत ही सुन्दर इमेज और ये प्रश्न कि कौन...माँ, काकी, बहन,पत्नी, प्रेयसी ...कौन?... ये जो निर्णय छोड़ दिया है पढ़ने वालों पे ...ये मुझे बहुत अच्छा लगा!
    "चाय तुलसी की, ...." -- इसके लिए तो बस वाह! वाह!
    "याद है घुँघरू बजाना ..." ये आपके नाम से याद रह जाएगा कि भूतों का जिक्र ग़ज़ल में पहली बार आपके शेर में पढ़ा था दिगंबर जी! बहुत मुबारकबाद बचपन के इस नटखट पहलू को याद कराने के लिए.
    " क्या किया इतने दिनों तक दूर रह के गाँव से" ये एक पानी कि तरह बहने वाला खूबसूरत और भावुक मिश्रा है.
    मक्ता भी सुन्दर!
    =======
    निर्मल दी, " जब से अपना..." बहुत खूबसूरत शेर.
    " बदरिया बरसी, धरा..." ये इतना गतिमय शेर है कि बिना हाथ हिलाए ओला ही नहीं गया...बहुत प्यारी बात , बहुत प्यारे ढंग से कही है आपने.
    "साथ जिसके खेलती गुडिया..." ये बहुत खूबसूरत मिसरा...ये तो हम महिलाएं ही लिखा सकती हैं... (गिल्ली-डंडा और पतंग के साथ साथ :). आपकी ग़ज़ल में ये बिम्ब पा के बहुत सुखद लगा.
    "आँख से आँसू टपक..." ये भी बहुत खूबसूरत शेर ...कितना अच्छा लिखती हैं आप!
    " भेज बेटे को...." अच्छा मिसरा.
    "चाहती हूँ आखिरी...." ये बहुत ही सशक्त शेर!
    ========
    कुल मिला के मज़ा आ गया आप दोनों को पढ़ के! जय हो!
    निर्मला दी २०१२ में और आगे भी आपका स्वास्थ बहुत अच्छा रहे और आप तन-मन से लिख सकें ! ...सादर शार्दुला

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  22. गुरुदेव आपका बहुत बहुत शुक्रिया मुझे इस तरही में जगह देने का ... शेरों का सागर उमड़ रहा है और हर कोई आनंद ले रहा अहिं इनमें गोते लगा के ...
    आदरणीय निर्मला जी के जीवन से तो मैं अक्सर प्रेरणा लेता हूँ और ये मेर सम्मान है की उनके साथ मेरी गज़ल लगी है आज ....
    हर शेर उनकी गज़ल का बीते हुवे घर, माहोल, परिवेश को याद करा है ... जब से अपना गाँव छोड़ा ... मुझ जैसे परदेसी की तो ये हकीकत है ... और गुडिया पटोले के साथ खेलना ... कोयल के विरह के गीत सुनना ... गाँव की सोंधी खुशबू की याद करा देती है ...
    आखरी वाला शेर ... चाहती हूँ आखिरी में सांस लू जाकर वहाँ ... ये शेर तो बहुत देर तक गूंजता रहा मन में ...
    इस तरही में लगता है जैसे पावन हवन चल रहा हो और शेरों की आहूति और तेज़ और तेज़ करती जाती है अग्नि को .....
    सभी गुरुकुल में पढ़ने वालों का शुक्रिया मेरा होंसला बढाने का ...

    उत्तर देंहटाएं
  23. गुरुदेव आपका बहुत बहुत शुक्रिया मुझे इस तरही में जगह देने का ... शेरों का सागर उमड़ रहा है और हर कोई आनंद ले रहा अहिं इनमें गोते लगा के ...
    आदरणीय निर्मला जी के जीवन से तो मैं अक्सर प्रेरणा लेता हूँ और ये मेर सम्मान है की उनके साथ मेरी गज़ल लगी है आज ....
    हर शेर उनकी गज़ल का बीते हुवे घर, माहोल, परिवेश को याद करा है ... जब से अपना गाँव छोड़ा ... मुझ जैसे परदेसी की तो ये हकीकत है ... और गुडिया पटोले के साथ खेलना ... कोयल के विरह के गीत सुनना ... गाँव की सोंधी खुशबू की याद करा देती है ...
    आखरी वाला शेर ... चाहती हूँ आखिरी में सांस लू जाकर वहाँ ... ये शेर तो बहुत देर तक गूंजता रहा मन में ...
    इस तरही में लगता है जैसे पावन हवन चल रहा हो और शेरों की आहूति और तेज़ और तेज़ करती जाती है अग्नि को .....
    सभी गुरुकुल में पढ़ने वालों का शुक्रिया मेरा होंसला बढाने का ...

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  24. रोज आटा गूंथ के सब्जी चढ़ा देती है वो
    और तेरी राह तकती है अभी तक गाँव में

    भेज बेटे को शहर मे धन कमाने के लिये
    माँ अकेली रोज रोती है अभी तक गाँव में

    उफ़ ...
    अशआर ने ऐसा मंज़र पेश किया है कि बार बार पढता रहा

    तरही की पाठशाला से बहुत कुछ सीख रहा हूँ
    नासवा जी और निर्मला जी को हार्दिक बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  25. आदर्णीय द्विज जी की टिप्पनी पढ कर मुझे वो वाक्या याद आ गया जब मैन्3ए सोचा कि अब तो गज़ल सीखनी पडेगी\ मुझे जब इन्हों ने अपनी पुस्तक जन गन मन भेजी तो मै उसके बारे मे इनसे कुछ न कह सकी असल मे मुझे गज़ल के बारे मे कुछ भी नही पता था। तब मैने सोचा कि मुझे गज़ल भी सीखनी ही है\ मेरे भाईयों ने मेरी मदद की कुछ न कुछ सीख ही रही हूँ। धन्यवाद द्विज जी।

    उत्तर देंहटाएं
  26. क्या विडम्बना है कि गाँव में होने के कारण गाँव का उत्सव मना रहे इस जलसे से हफ्ते भर दूर रहा. खैर देर से आने से आनंद हरगिज कम नहीं हुआ. दोनों आला ग़ज़लकारों की भावों में डूबी हुई ग़ज़लें मर्मस्पर्शी है.....शुक्रिया और इनायत .....

    उत्तर देंहटाएं
  27. दिगम्बर जी ने बहुत सुन्दर शेर बांधे हैं,
    "चाय तुलसी की, पराठे, मूफली गरमा गरम.......", वाह वा क्या खूब मंज़र कशी की है.
    "याद है घुँघरू का बजना रात के चोथे पहर..............", अद्भुत शेर.
    हठीला जी को समर्पित ये शेर अपनी अलग ही खुशबू बिखेर रहा है,
    "गीत ऐसे कह गए हैं कुछ हठीला जी यहाँ............."
    खूबसूरत शेरों के लिए दिगम्बर जी को ढेरों बधाइयाँ.

    निर्मला कपिला जी जिजीविषा वाकई बहुत कुछ सिखा जाती है,
    "बदरिया बरसी, धरा झूमी, पवन महकी चले ............." अच्छा शेर कहा है.
    "साथ जिसके खेलती गुडिया, पटोले वो सखी........." वाह वा
    "आँख से आँसू टपक जायें किसी को याद कर .........." खूब शेर कहा है.
    बहुत बहुत बधाइयाँ.

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  28. दिगंबर जी ने सही कहा कि खंडहर में तब्दील हो गई तो क्या हम भी एक हवेली के मालिक तो हैं गाँव में.... जिसे देखने वाला कोई नही, जिसकी मरम्मत करनवाने वाला कोई नही....यहाँ एक वर्गफिट जमीन दो हजार रु० और वहाँ सैकड़ों वर्गफिट जमीन कोई देखने वाला नही। ये शेर मुझे अंदर तक छू गया.....

    माँ ने तो ऐसा लिखा कि समझ नही आ रहा किस शेर को सराहूँ... कितनी संवेदना है, कितनी कचोट.... प्रणाम करती हूँ और कुछ न कह सकने की विवशता हेतु क्षमा माँगती हूँ.....

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  29. दिगंबर जी ने सही कहा कि खंडहर में तब्दील हो गई तो क्या हम भी एक हवेली के मालिक तो हैं गाँव में.... जिसे देखने वाला कोई नही, जिसकी मरम्मत करनवाने वाला कोई नही....यहाँ एक वर्गफिट जमीन दो हजार रु० और वहाँ सैकड़ों वर्गफिट जमीन कोई देखने वाला नही। ये शेर मुझे अंदर तक छू गया.....

    माँ ने तो ऐसा लिखा कि समझ नही आ रहा किस शेर को सराहूँ... कितनी संवेदना है, कितनी कचोट.... प्रणाम करती हूँ और कुछ न कह सकने की विवशता हेतु क्षमा माँगती हूँ.....

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