सोमवार, 16 जनवरी 2012

वृक्ष जिनकी छांह थी ममता भरे आँचल सरीखी वृक्ष जिनके बाजुओं से बचपनों ने बात सीखी, गीतकार को श्रद्धांजलि देने के लिये श्री राकेश खंडेलवाल जी के गीत से बेहतर और क्‍या होगा ।

स्‍व. रमेश हठीला स्‍मृति तरही मुशायरा

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कुछ पुराने पेड़ बाकी हैं अभी तक गांव में

इक पुराना पेड़ बाक़ी है अभी तक गांव में

बहुत पीड़ादायी होता है उस व्‍यक्ति की स्‍मृति में आयोजन करना जो कल तक आपके साथ था जो कल तक आपके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा था । अचानक ही उसे स्‍वर्गीय कह दिया जाये तो मन मानता ही नहीं है  । श्री हठीला जी को तो अभी तक सीहोर शहर स्‍वर्गीय  मान ही नहीं रहा है । कारण ये कि मृत्‍यु से तीन माह पहले हैदराबाद चले गये और फिर किसी भी रूप में सीहोर लौटे ही नहीं । न शरीर और पार्थिव शरीर । शहर मानो अभी भी उनकी प्रतीक्षा कर रहा है कि वे अभी हैदराबाद से लौट कर आएंगे और अपने पेटेंट वाक्‍य ' जै रामजी की साब' के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज करवा देंगें । मगर समय जानता है कि अब कोई नहीं है । हठीला जी भी अब समय के पृष्‍ठों पर दर्ज हो गये हैं । अब केवल स्‍मृति शेष है ।

खैर बातें तो बातें हैं उनका क्‍या । तो चलिये शुरू करते हैं आज से ये तरही मुशायरा । जब एक गीतकार की स्‍मृति में आयोजन हो तो शुरूआत के लिये गीतकार से अच्‍छा नाम क्‍या हो सकता है । और गीतकार की बात चले तो श्री राकेश खंडेलवाल जी से अच्‍छा नाम क्‍या हो सकता है । पिछले साल जब राकेश जी सीहोर आये थे तो हठीला जी हैदराबाद में थे और उस दिन वापस सीहोर आने के लिये छटपटा रहे थे । मगर नहीं आ पाये । तो आज श्री राकेश खंडेलवाल जी द्वारा रचे गये इस सुंदर गीत के साथ ही हम शुभारंभ करते हैं हठीला जी की स्‍मृति में आयोजित मुशायरे का । एक ज़रूरी घोषणा है जो जल्‍द ही कर दी जायेगी ।

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कुछ पुराने पेड़ बाकी हों अभी उस गांव में

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श्री राकेश खंडेलवाल जी

हो गया जब एक दिन सहसा मेरा यह मन अकेला
कोई बीता पल लगा देने मुझे उस  पार हेला
दूर छूटे चिह्न पग के फूल बन खिलने लगे तो
सो गये थे वर्ष बीते एक पल को फिर जगे तो
मन हुआ आतुर बुलाऊँ पास मैं फ़िर वो दुपहरी
जो कटी मन्दिर उगे कुछ पीपलों की छांव में
आ चुका है वक्त चाहे दूर फिर भी आस बोले
कुछ पुराने पेड़ बाक़ी हों अभी उस गांव में

वह जहाँ कंचे ढुलक हँसते गली के मोड़ पर थे
वह जहाँ उड़ती पतंगें थीं हवा में होड़ कर के
गिल्लियाँ उछ्ला करीं हर दिन जहाँ पर सांझ ढलते
और उजड़े मन्दिरों में भी जहाँ थे दीप जलते
वह जहाँ मुन्डेर पर उगती रही थी पन्चमी आ
पाहुने बन कर उतरते पंछियों  की कांव में
चाहता मन तय करे फ़िर सिन्धु की गहराईयों को
कुछ पुराने पेड़ बाकी हों अभी उस गांव में

पेड़ वे जिनके तले चौपाल लग जाती निरन्तर
और फिर दरवेश के किस्से निखरते थे संवर कर
चंग पर आल्हा बजाता एक रसिया मग्न होकर
दूसरा था सुर मिलाता राग में आवाज़ बो कर
और वे पगडंडियां कच्ची जिन्हें पग चूमते थे
दौड़ते नजरें बचा कर हार पी कर दाँव में
शेष है संभावना कुछ तो रहा हो बिना बदले
कुछ पुराने पेड़ बाक़ी हों अभी उस गांव में

वृक्ष जिनकी छांह  थी ममता भरे आँचल सरीखी
वृक्ष जिनके बाजुओं से बचपनों ने बात सीखी
वे कि बदले वक्त की परछाई से बदले नहीं थे
और जिनको कर रखें सीमित,कहीं गमले नहीं थे
वे कि जिनकी थपकियाँ उमड़ी हुई हर पीर हरती
ज़िंदगी सान्निध्य में जिनके सदा ही थी संवरती
है समाहित गंध जिनकी धड़कनों, हर सांस में
हाँ  पुराने पेड़ शाश्वत ही रहेंगे गाँव में
वे पुराने पेड़ हर युग में रहेंगे गांव में

स्‍मृति पटल पर अंकित रेखाचित्रों को गीत में ढाल देना और वो भी इतने सुंदर गीत में ढाल देना ये राकेश जी जैसा समर्थ गीतकार ही कर सकता है । चंग पर आल्हा बजाता एक रसिया मग्न होकर दूसरा था सुर मिलाता राग में आवाज़ बो कर, ऐसा लगता है कि यादों के सुनहरे पन्‍ने हौले हौले से खुल रहे हैं और उनमें से झांक रहा है वो जो अतीत है । सुंदर गीत । खूब शुरूआत हुई है मुशायरे की ।

तो आनंद लीजिये गीत का । और देते रहिये दाद ।

32 टिप्‍पणियां:

  1. राकेश जी के इस गीत की तारीफ़ करना सूर्य को दीपक दिखाना होगा। बहुत ही सुंदर गीत है। शुभारंभ के लिए इससे बेहतर पोस्ट हो ही नहीं सकती थी।

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  2. बहुत शानदार, अलग अदाज से प्रस्तुत की गई रचना ! हठीला जी को मेरी विनम्र श्रद्धांजली !

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  3. वृक्ष वह बसा हमारे गाँव,
    वहीं थी सबकी परिचित छाँव,
    वृहद था, आज नहीं है,
    सुहृद था, आज नहीं है।

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  4. इंतज़ार की घड़ियाँ समाप्त हुईं. मुशायरे का आगाज़ हमेशा ही की तरह ज़ोरदार अंदाज़ में हुआ है. वाकई शुरुआत में राकेश जी के गीत से बेहतर क्या होगा.
    राकेश जी ने शब्दों के माध्यम से जो चित्र खींचा है अद्भुत है. मंत्रमुग्ध हूँ.
    "जिंदगी सान्निध्य में जिनके सदा ही थी संवारती.. वे पुराने पेड़ हर युग में रहेंगे गाँव में.." लाजवाब.

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  5. उफ्फ्फ...क्या कहूँ...स्तब्ध हूँ...एक एक शब्द दिल में उतर गया है...प्रशंशा के लिए हर बार की तरह वाक्य ढूंढें नहीं मिल रहे...राकेश जी की कलम का एक और चमत्कार सामने है...अद्भुत...विस्मय होता है कैसे कोई ऐसे गीत लिख सकता है...माँ सरस्वती का ऐसा आशीर्वाद हर किसी की किस्मत में नहीं होता...तरही का आरम्भ विलक्षण है...इसकी अभूतपूर्व सफलता निश्चित है.

    नीरज

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  6. आदरणीय राकेश जी के गीत, गीत मात्र न हो कर एक युग का अनमोल दस्तावेज है.
    बहुत सुन्दर! मन भावुक हो चला , याद बहुत कुछ आ रहे हैं.
    एक गीतकार की स्मृति में यह मुशायरा बहुत जानदार होने वाला है.
    हठीला जी को पुनः: श्रद्धांजलि !!

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  7. राकेश जी की अंतर्मन को झकझोर देनेवाली अतुलनीय काव्य-कला को मेरा भी नमन !

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  8. मुशायरे की बेहतरीन शुरुआत इसकी कामयाबी की भूमिका लिख रही है.आ.खंडेलवाल जी के गीत के बारे में क्या कहा जाए..............सिवा इसके......कि जी चाहता है उनके हाथ चूम लें.

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  9. जिस आत्मीयता से ये मुशायरा शुरू हो रहा है इसकी सफलता का अंदाज़ लगाना आसान नहीं है ...इतना भावुक कर देने वाला ... दिल को छू लेने वाला गीत बस राकेश जी के ही बस की बात है ... हर शब्द मन को भारी और आँखों को नम कर रहा है ...

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  10. गुरुदेव कुछ टिप्पणियाँ नज़र नहीं आ रही हैं .. शायद आपको स्पैम में जा कर प्रकाशित करना होगा ...

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  11. स्मृति और गेयता के मुग्धकारी मेल से निस्सृत इस मधुर गीत के लिये आदरणीय राकेश खंडेलवालजी को सादर बधाइयाँ.

    सम्पूर्ण गीत यों अधरों पर बिछा जा रहा है. किन्तु, प्रस्तुत पंक्तियों पर हृदय बस झूम जा रहा है. कवि के शब्दों में कहूँ तो आवाज़ बोता हुआ -
    वृक्ष जिनकी छांह थी ममता भरे आँचल सरीखी
    वृक्ष जिनके बाजुओं से बचपनों ने बात सीखी
    वे कि बदले वक्त की परछाई से बदले नहीं थे
    और जिनको कर रखें सीमित, कहीं गमले नहीं थे
    वाह.. वाह !! .. अद्भुत !!!

    --सौरभ पाण्डेय, नैनी, इलाहाबाद (उप्र)--

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  12. आदरणीय हठीला जी को मेरी विनम्र श्रद्धांजली

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  13. आदरणीय राकेश जी से मुशायरे का आरंभ यानि गुण दही से यात्रा आरंभ...... और यात्रा का शुभ होना तय....

    इसके बाद उनकी लेखनी पर कुछ कहनी पाना शायद उन्ही की लेखनी से संभव हो.....

    "सब उपमा कवि रहे उधारी, केहि पट धरौं विदेह कुमारी"

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  14. आदरणीय राकेश जी शब्दों से जो एक अनोखा चित्र खींचते हैं, वो बहुत सहज, सरल, आकर्षक और भावमई होता है. बाकी तो कंचन दीदी ने शत प्रतिशत सही बात कह ही दी है कि आदरणीय राकेश जी से मुशायरे का आरंभ यानि गुण दही से यात्रा आरंभ...... और यात्रा का शुभ होना तय मानिए.

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  15. शेर में तो दो पंक्तियों में कह कर बाहर हो लेते हैं लेकिन गीत में भाव विशेष को निरंतर बॉंधे रखने का दुरूह कार्य राकेश भाई जैसे गीतकार ही कर सकते हैं।
    बहुत-बहुत बधाई इस खूबसूरत गीत पर।

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  16. भला भैया.... इंतज़ार खत्म तो हुआ.... शुरुआत धमाकेदार हुई है एक अति विशिष्ट रचना से .... आगाज़ से ही पूरी यात्रा का अंदाजा लग रहा है...

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  17. हर एक पंक्ति में भाव जिस आह्लादकारी ढंग से उमड़ घुमड़ कर आते हैं कि बस...

    इस रस वर्षा से भाव विभोर हूँ

    गीत को हठीला साब की स्मृतियों से जोड़ कर पढ़ा तो आनंद अपने चरम को छू गया

    एक गीतकार को दूसरे गीतकार की इस भावभीनी श्रधांजलि ने बहुत देर तक तो मूक कर दिया था

    हठीला साब को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि

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  18. गीत सम्राट खन्डेलवाल जी के बारे में कहना कुछ भी मुमकीन नहीं ! जिस प्रावह में उनके द्वारा लिखे गीत बहते हैं उनका एक अलग ही अन्नद है! विषय के मुताबिक़ जिस गंवई शब्दों का इस्तेमाल उन्होनें की है वो इस गीत को और करिश्माई बना रहे हैं ! एक शब्द का प्रयोग किया है " आल्हा " जिसके बारे मे हम जैसे सोच भी नही सकते, कि आल्हा जैसे शब्द को भी गीतों मे इस्तेमाल किया जा सकता है! यही सारी चीजें हैं जो खंडेलवाल जी अन्य लोगों से बहुत दूर और बहुत दूर करती है !
    तरही का आग़ाज़ इससे बेहतर और कुछ नहीं हो सकता था ! गुरु साहब को नमन फिर से !

    अर्श

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  19. अपनी सुविधा से लिए, चर्चा के दो वार।
    चर्चा मंच सजाउँगा, मंगल और बुधवार।।
    घूम-घूमकर देखिए, अपना चर्चा मंच
    लिंक आपका है यहीं, कोई नहीं प्रपंच।।
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  20. " वो जहाँ कंचे ढुलक हँसते गली के मोड़ पर थे
    ...और उजड़े मंदिरों में भी जहाँ थे दीप जलते...
    चाहता मन तय करे....

    चंग पे आल्हा बजाता एक रसिया मग्न हो कर
    दूसरा था सुर मिलाता राग में आवाज़ बो कर...
    और वे पगडण्डियाँ कच्ची जिन्हें पग चूमते थे...

    वृक्ष जिनकी बाजुओं से बचपनों ने बात सीखी
    वे कि बदले वक्त की परछाईं से बदले नहीं थे
    और जिनको कर रखें सीमित कहीं गमले नहीं थे
    वे कि जिनकी थपकियाँ उमड़ी हुई हर पीर हरतीं ...."

    आदरणीय गुरुजी के इस अतिसुन्दर गीत से परम आदरणीय हठीला जी के स्मृति विशेषांक का आग़ाज़
    हुआ; इससे शुभ और क्या हो सकता है!
    ये गीत है कि भावना और सौंदर्य का विस्फोट!
    सब अतिसुन्दर! मन से, आँख बंद कर के गाने लायक...जीवन के सत्य का वर्णन!
    उपरोक्त पंक्तियाँ तो विलक्षण हैं ही ... और जो कुछ नहीं लिखा उसे भी बार बार गाया.

    "वे कि बदले वक्त की परछाईं से बदले नहीं थे
    और जिनको कर रखें सीमित कहीं गमले नहीं थे" ---- अनुपम श्रद्दांजलि !
    सादर शार्दुला

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  21. बहुत ख़ूबसूरत आग़ाज़ हुआ है तरही का
    "वे कि जिनकी थपकियाँ उमड़ी हुई हर पीर हरतीं
    ज़िंदगी सानिद्ध्य में जिन के सदा ही थी सँवरती"

    बेहतरीन गीत !!
    राकेश जी को बधाई !!

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  22. मेरी प्रथम टिपण्णीं कहाँ गई ? खैर...

    गीत सम्राट खंडेलवाल जी के गीतों के बारे मे कुछ भी कहना, मुम्किन नहीं है ! जिस तरह से ये शब्दों के द्वारा गीत को बंधे रखते हैं, और जिस तरह से ये गंवई शब्दों का प्रयोग अपने गीतों में उनके माँग के हिसाब से रखते हैं, पूरी तरह से मौलिकता लिये होती हैं ! अब यहाँ ही आल्हा शब्द को जिस खुबसूरती से इन्होने प्रयोग किया है वो अपने आप में आन्न्द का विषय है ! जिसके बरे में सोच भी नही सकते ! गुरु साहब को दी गई श्रधांजलि नमन के योग्य है !

    अर्श

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  23. उत्तराखंड की ये भीगी हुई रात और ये छोटा सा शहर पहाड़ पे....सर्दी की इक ठिठुरती रात...जहाँ लैपटॉप का मेरा स्क्रीन देता है मुझे सात समंदर पार से चल कर आई सौगात इस मधूर गीत की...हठीला जी के अट्टहास को मानो पूर्णतया जीवंत करती हुई....और अचानक से जैसे पूरे वजूद में मैं गरमी का अहसास पाने लगता हूँ|

    कहाँ कहाँ से हम किस किस तरह से जुड़ जाते हैं कुछ अनजाने रिश्तों से...अवाक सा मैं जैसे आत्म-सात करना चाहता हूँ विधाता के इस खेल को|

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  24. सार्थक पोस्ट. मेरी विनम्र श्रद्धांजलि

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  25. गुरुवर,

    श्री राकेश जी के इस अद्व्तीय गीत से अच्छा आग़ाज हो ही नही सकता था।

    " वे कि जिनकी थपकियाँ उमड़ी हुई हर पीर हरती
    जिन्दगी सानिध्य में जिनके सदा ही थी संवरती
    है समाहित गंध जिनकी धड़कनों, हर साँस में
    हाँ पुराने पेड़ शाश्वत ही रहेंगे गाँव में
    वे पुराने पेड़ हर युग में रहेंगे गाँव में "

    तरही बहुत अच्छी रहेगी यह इस शानदार आग़ाज से ही पता चलता है।

    रमेश हठीला जी को विनम्र श्रृद्धाँजलि के साथ....

    सादर,

    मुकेश कुमार तिवारी

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  26. मान्य हठीलाजी से पहली बार जब फोन पर बातें हुईं तो ऐसा लगा ही नहीं कि उनसे पहली बार बात हो रही है. दो मिनट में ही आत्मीयता के जो भाव उनकी ओर से बहे वे बर्सों की घणिष्ठता के पश्चात ही सम्भव हो पाते हैं. मान्य हठीलाजी और नारायनजी से बात करना सदैव प्रेरणादायक रहा.

    मान्य पंकजजी को साधुवाद कि उन्होंने हठीलाजी से अटूट परिचय कराया .


    पंकजजी से किये वादे के अनुसार हर बार यही कोशिश रही और रहेगी कि तरही के मिसरे को माँ शारदा के आशीर्वाद से रँग कर गीत की माला में पिरो कर प्रस्तुत कर सकूँ. सफ़लता और असफ़लता का निर्णय आप सभी पर है.

    कार्यजनित व्यस्तताओं के रहते संभव नहीं हो पाता कि प्रत्येक रचना पर टिप्पणी कर सकूँ लेकिन पढ़ता सभी रचनायें हूँ. आदरणीय तिलकजी, इस्मतजी,नीरजजी के साथ साथ अंकित,प्रकाश,वीनस,गौतम धर्मेन्द्र,रवि और नवीनजी की रचनायें सुलभ के साथ साथ दांतो तले उंगली दबा लेने को विवश करती हैं.

    आप सभी के साथ मान्य पंकजजी को सादर नमन इस दीप को प्रज्ज्वलित रखने के लिये.

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  27. सबसे पहले हठीला जी को विनम्र श्रद्धांजलि | राकेश भाई के गीत ने मुग्ध कर दिया | अद्भुत प्रतिभा को नमन |

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  28. हठीला जी को विनम्र श्रद्धाँजली। उन्हें देखा नही लेकिन लगता है जैसे बहुत करीब से जानती हूँ। राकेश जी का गीत बहुत अच्छा लगा। इस से कम श्रद्धाँजली हो भी क्या सकती है। शुभकामनायें।

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  29. अद्भुत!,अनिर्वचनीय! यह गीत नहीं टाइम मशीन है जिसने अतीत की भूली-बिसरी गलियों मे ले जाकर खड़ा कर दिया है।

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  30. sसुन्दर गीत के साथ सच्ची श्रधाँजली\ शुभ. का.

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