गुरुवार, 28 जनवरी 2010

ये कैसे भंवर में फँसी जिंदगानी, न पूछो वजह क्यूँ कदम डगमगाए । समापन की तरफ बढ़ रहे तरही मुशायरे में आज सुनिये अभिनव चतुर्वेदी, प्रकाश अर्श और वीनस केसरी को ।

तरही मुशायरे को लेकर इस बार काफी व्‍यस्‍तता हो गई है और ऐसा लग रहा है कि अगली बार से इसका कुछ फार्मेट तय करना होगा कि किस प्रकार से इतन सारे कवियों को लगाया जाये । लोगों में उत्‍साह है और सब इस मुशायरे को अपना समझ रहे हैं । ये ही बड़ी बात है । वैसे भी ये ब्‍लाग तो आप सबका है, मैं तो केवल आप सब की तरफ से इसका संचालन कर रहा हूं । खैर आगामी अंक तो वैसे भी होली का होगा । उसमें तो वैसे भी रौनक होती है । सो उसके लिये तो विशेष तैयारी करनी ही होगी । हां ये ज़रूर बताना चाहता हूं कि 20 फरवरी को संभावित कार्यक्रम है शिवना प्रकाशन का । श्री राकेश खंडेलवाल जी से तारीख कन्‍फर्म होना बाकी है । कार्यक्रम में आने की तैयारी करके रखिये सब ।

तरही में आज पाठशाला के विद्यार्थियों का दिन है । एक बात मैं कंचन और गौतम से ज़रूर कहना चाहूंगा कि ये प्रकाश की ग़ज़लों में इन दिनों सौंदर्य बोध इतना उच्‍च स्‍तर पर कैसे पहुंचा हुआ है इस बात का ज़रूर पता लगाया जाये । वीनस ने काफिये को अपने हिसाब से परिवर्तित कर दिया है, विद्यार्थियों को इस बात की इजाज़त नहीं होती कि वे कोई पतली गली पकड़ें । अभिनव तो हमेशा की ही तरह सदाबहार शेर के साथ उपस्थित है । तीनों को सुना जाये ।

venus

वीनस केसरी

अभी भी समय है अगर चेत जाएँ
हवा पेड़ पानी औ धरती बचाएँ

अगर मुफ्त मिलता है तो क्या जरूरी
की चुल्लू पियें और लोटा बहाएँ

न बहला है दिल जब किसी और जिद से
तो फिर से गजल को ही ओढें बिछाएँ

नया साल जीवन को खुशियों से भर दे
ह्रदय से सभी को है शुभकामनाएँ

किसे है खबर कल, क़यामत का दिन हो
चलो आज के दिन हंसें मुस्कुराएँ

सुनहरी हंसी की तरह तेरी यादें
अगर छू के देखू कहीं डर न जाएँ

रुमाली बदन, संगेमरमर निगाहें
किसे याद रक्खें किसे भूल जाएँ

कहीं रूह "वीनस" बगावत न कर दे
चलो जिस्म को फिर से सपने दिखाएँ

हूं अच्‍छे शेर निकाले हैं रुमाली बदन संगमरमर निगाहें, किसे है ख़बर कल क़यामत का दिन हो । अच्‍छे शेर निकाले हैं भाई । बहुत ही उम्‍दा, और इन शेरों के कारण ही काफिया बदलने की ग़लती को क्षमा किया जाता है ।

prakash arsh

प्रकाश अर्श

हवाओं में खुशबू ये घुल के बताए
वो खिड़की से जब भी दुपट्टा उडाए

मचलना बहकना शरम जैसी बातें
ये होती हैं जब मेरी बाँहों में आए

उनीदी सी आँखों से सुब्ह को जब भी
मेरी जान कहके मेरी जां ले जाए

अजब बात होती है मयखाने में भी
जो सब को संभाले वो खुद लडखडाए


वो शोखी नज़र की अदाएं बला की
न पूछो वजह क्यूँ कदम डगमगाए

वो हसरत से जब भी मुझे देखती है
मुझे शर्म आए मुझे शर्म आए

नजाकत जो उसकी अगर देखनी हो
मेरे नाम से कहदो मुझको बुलाए

शरारत वो आँखों से करती है जब भी
मेरी जान जाए मेरी जान जाए

मुझे जब बुला ना सके भीड़ में तो
छमाछम वो पायल बजा कर सुनाए

उम्मीदों में बस साल दर साल गुजरे
न जाने नया साल क्या गुल खिलाए

मैं पहले ही कह चुका हूं कि प्रकाश की इस पूरी ग़ज़ल पर कोई कमेंट नहीं करूंगा । अकबर साहब का शेर है इश्‍क को दिल में जगह दे अकबर, इल्‍म से शायरी नहीं आती ।  तो मुझे लगता है कि प्रकाश ने उस शेर को गांठ बांध कर रख लिया है । मुझे जब बुला ना सके भीड़ में तो और मतला दोनों ही सुंदर बनाए हैं । सुना दीदी कंचन, सुनो भैया गौतम, कहीं हाथ से अपना छोरा न जाए ।

KaviAbhinav_Philadelhia-eKavyaPath

अभिनव शुक्‍ल

उगे स्वप्न में जब उड़ानों के साए,

परिंदे नें पिंजरे में पर फड़फाड़ाए,

है इस पार लोहा, है उस पार हिम्मत,

न ये जीत पाए, न वो हार पाए,

ये कैसे भंवर में फँसी जिंदगानी,

रहा भी न जाए, बहा भी न जाए,

मोहब्बत मोहब्बत मोहब्बत मोहब्बत,

मुझे और कोई न ऐसे बुलाये,

चलो अपनी क्यारी को तैयार कर लें,

न जाने नया साल क्या गुल खिलाये, 

मतला ही ऐसा है कि उसको कई बारे पढ़ते रहो । कई बार । न ये जीत पाये न वो हार पाये बहुत ही सुंदर प्रयोग किया है शेर में । और गिरह तो जबरदस्‍त बांधी गई चलो अपनी क्‍यारी को तैयार करलें । अभिनव के शेरों में एक बात होती है जो मुझे गौतम के शेरों में भी कभी कभी मिलती है, और वो ये कि बात को अलग तरीके से कहना ।

कई लोगों का कहना है कि हर बार के तरही को लेकर एक छोटी सी पुस्‍तक भी प्रकाशित की जाये जैसी कि देश की कुछ तरही चलाने वाली संस्‍थाएं करती हैं । किन्‍तु पुस्‍तक के प्रकाशन को लेकर समस्‍या आप सब जानते हैं । फिर भी देखते हैं यदि भविष्‍य में संभव हो सका तो । चलिये आज तो इन का आनंद लें । दाद देते रहें । 

33 टिप्‍पणियां:

  1. सुबीर जी आज की गज़लों ने तो बहुत मुश्किल मे डाल दिया है खास कर अर्श की गज़ल ने उस ने जिस नज़ाकत के शेर लिखे हैं उस नज़ाकत के शब्द मेरे पास नहीं चलो कुछ देर बाद ढूँढ कर आती हूँ कहीं से तभी कुछ लिखूँगी।---- आती हूँ

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  2. वीनस केसरी ने क्या उम्दा उम्दा संदेश दिया है:

    अगर मुफ्त मिलता है तो क्या जरुरी
    की चुल्लू पियें और लोटा बहायें...


    प्रकाश अर्श जी तो खैर...ऐसी उम्दा बात वो ही कह सकते हैं:

    अजब बात होती है मयखाने में भी
    जो सब को संभाले वो खुद लड़खड़ाये...

    ये दुनिया भी ऐसा ही मयखाना है...कितना सच कहा!!

    अभिनव भाई तो अद्भुत हैं...

    है इस पार लोहा, है उस पार हिम्मत
    न ये जीत पाये, न वो हार पाए...


    आज तो मुशायरे में बहुत आनन्द आ गया!! सब एक से बढ़ कर एक उम्दा युवा गज़लें. वाह!!

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  3. अभी तो समय है चलो चेत ...
    किसे है खबर कल कयामत का दिन हो...


    वो शोखी नजर......

    नज़ाकत जो उसकी.......

    शरारत वो करती है...

    छमाछम वो पायल....


    और भाई अभिनव, आप अभिनव हैं या शायरी का अनुभव।


    बढ़ी बेकरारी तो दिल ने कहा है

    कोई आ के दिल की ही ग़ज़लें सुनाये

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  4. pankaj ji ,namaskar ,
    venus ji ki ghazal ke ye do sher ghazal ki jaan hain
    abhi bhi ........
    kise hai khabar ........
    bahut sundar
    arsh ji ka sher
    ummeedon...........
    aur abhinav ji ka
    uge swapn...............
    bhi bahut achchhe hain teenon shayeron ko badhai

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  5. आज सोच ही रहा था की शायद अर्श जी और वीनस आयेंगे...

    क्या शुरुवात की है...

    अभी भी समय है अगर चेत जाएँ
    हवा पेड़ पानी औ धरती बचाएँ

    अगर मुफ्त मिलता है तो क्या जरूरी
    की चुल्लू पियें और लोटा बहाएँ


    और

    रुमाली बदन, संगेमरमर निगाहें
    किसे याद रक्खें किसे भूल जाएँ

    मान गए वीनस आप खिलाड़ी हो.


    प्रकाश अर्श जी का इंतज़ार भी ख़त्म हुआ...
    वो हसरत से जब भी मुझे देखती है
    मुझे शर्म आए मुझे शर्म आए

    नजाकत जो उसकी अगर देखनी हो
    मेरे नाम से कहदो मुझको बुलाए
    ये क्या कह दिया जनाब आपने... बहुत सुन्दर

    उम्मीदों में बस साल दर साल गुजरे..
    तरही ग़ज़ल खूब कही आपने.

    हमारे अभिनव शुक्‍ल जी तो सिद्धस्त शायर हैं.

    उगे स्वप्न में जब उड़ानों के साए
    परिंदे नें पिंजरे में पर फड़फाड़ाए

    है इस पार लोहा, है उस पार हिम्मत
    न ये जीत पाए, न वो हार पाए


    वाह क्या फरमाते हैं आप.


    - सुलभ

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  6. युवा जोश से छलछलाती-फड़कती ग़ज़लें पढ़ कर आनंद आ गया. नए खून को पढना बहुत आनंद कारी अनुभव है. कुछ नया करने का जूनून कई बार इनसे हैरत अंगेज़ शेर कहलवा देता है.
    वीनस ने इस बार तरही के काफिये को अपने तरीके से बदल जरूर दिया लेकिन उसके चुल्लू और लोटे वाले शेर की बदौलत उसकी ये खता सजा की नहीं बल्कि ईनाम की हकदार है.
    अर्श लगता है प्यार में आकंठ डूबे हैं...इश्वर उनकी मनोकामना पूरी करे. सारी ग़ज़ल प्यार की चाशनी में डूबी हुई है .
    अभिनव ने मतले से मकते तक के सफ़र में हजारों गुल खिला दिए हैं.
    तीनो के लिए ढेरों दाद...
    इस बार की तरही वाकई किताब की शक्ल में आने लायक है.
    नीरज

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  7. पकज जी, आदाब
    वीनस जी की पूरी ग़ज़ल शानदार रही
    मक़ता ...कहीं रूह......लाजवाब
    ये अर्श जी के अश'आर पर खामोशी क्यों?
    जनाब, बसंत आया है, तो अपना असर दिखायेगा ही
    अभिनव जी, उड़े....से लेकर क्यारी तक ...मुबारकबाद

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  8. प्रणाम गुरु जी,
    इस बार तो तरही ने ग़ज़ब ढा रखा है..................
    @ वीनस, तुम दिए हुए मिसरे पे ग़ज़ल क्यों नहीं लिखी भाई, मैं तो तुम्हारी गलती माफ़ नहीं करूँगा अरे जब दूसरों की गलतियाँ बताने वाला ख़ुद ऐसी गलती करेगा तो क्या होगा?
    चलो अब तुम्हारी इस ग़ज़ल पे आते हैं
    मतला अच्छा सन्देश दे रहा है, अगला शेर "अगर मुफ्त मिलता है............." अच्छा बना है, "सुनहरी हंसी................" बहुत उम्दा लिखा है, "रुमाली बदन................" अरे वाह लफ़्ज़ों को बहुत अच्छे से पिरोया है मज़ा आ गया
    "कहीं रूह...........", मकते ने इस ग़ज़ल को और खूबसूरत बना दिया है.
    @ अर्श भाई, तुम तो निशाने पे आ गए हो, वैसे इतना अच्छा लिखोगे तो ऐसा ही होगा,
    पूरी ग़ज़ल मोहब्बत की चाशनी में डूबी हुई है अब ये बताओ ये गुड की है या शक्कर की,
    हर शेर महक उत्ता है, किस किस की तारीफ करूं, क्या तुम्हे तुम्हारी ग़ज़ल मिल गयी क्या?
    @ अभिनव जी,
    वाह क्या मतला है, जितनी बार गुनगुनाओ उतना कम है,
    "है इस पार लोहा...................." और "ये कैसे ........." के बारे में कुछ कह के भी कुछ नहीं कह पाउँगा
    अभिनव जी आपने आज का दिन क़ुबूल कर दिया

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  9. @अर्श,
    तेरा जादू चल गयाssssssss....क्या शेर निकाले हो, अरे वाह! वाह!! जीयो प्रकाश मियां, जियो!!! मतले से लेकर आखिरी शेर तक{गिरह की बात नहीं कर रहा मैं} बस आह-उफ़्फ़्फ़-हाय वाली बात है। हम्म्म्म...गुरुदेव का इशारा सही है। कुछ तो बात है। पुस्तक-मेले में मिलोगे क्या?
    "मुझे शर्म आये मुझे शर्म आये" या फिर "मेरी जान जाये मेरी जान जाये"...ये अंदाजे-बयां इतना प्यारा लगा कि पूछो मत। ये बात को रिपीट करने से दोनों ही अशआर पूरी ग़ज़ल में अलग से खड़े नजर आ रहे हैं...god bless you Boy! और अशआरों की बात करने अलग से आऊंगा।

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  10. teeno hi fankar zabardast hain aur kis kis sher ki tarif ki jaye .........seedhe dil mein utar rahe hain.........ek alag hi jazbe ko liye hain teeno hi............behtreen, lajawaab.

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  11. गुरु जी हमारी अवधी में एक शब्द होता है घाघ औड़ ये वही होता है जो आप ने अपनी कहानी घुग्घू में कहना चाहा था....! तो अर्श के विषय में बस इतना ही कहूँगी। आप चिंता ना करें....! मैने ऐसे भाइयों पर रिसर्च कंप्लीट की है। समझ में सब आता है मेरे और आ भी रहा है।

    मगर जब कोई राज ए दिल यूँ छुपाए
    तो किस हक से उससे भला पूछा जाये


    हा हा हा हा

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  12. @वीनस
    कायदे से ये तो तरही है ही नहीं है...फिर भी अशआरों पे कुछ कहा जा सकता है। दूसरे शेर का भाव और प्रस्तुति की ढ़ंग बहुत ही जबरदस्त है॥ तीसरे शेर ने दुष्यंत की याद दिला दी..."मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूं/वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूं" की तर्ज पर। निगाहों के साथ संगमरर का विशेषण...क्या बात है। मजा आ गया वीनस!

    मक्ते ने किंतु तरही को लेकर सारी शिकायतें दूर कर दी है। इस एक मक्ते के लिये तो गुरुजी से सिफारिश की जा सकती है कि तुम्हारे सात खून माफ हों...

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  13. मैं सोच रहा था अर्श जी कहाँ हैं ..... वीनस जी कहाँ हैं ..... अब पता चला दोनो क्यों मसरूफ़ है ..... वीनस जी तो अपने काम में पर अर्श जी ...... आपने सही कहा ...... इश्क, प्रेम, बसंत अपना जादू दिखा रहा है ......

    सभी ने कमाल के शेर कहे हैं ..........
    अभी भी समय है अगर चैत जाएँ या अगर मुफ़्त मिलता है ...... वीनस जी के शेर में प्राकृति और दर्शन की गहरी समझ नज़र आती है .....
    और प्रकाश जी ........ कौन से शेर क ज़िक्र करूँ ...... हवाओं में खुश्बू, मचलना बहकना, उनीदी से आँखें, वो शोखी नज़र की, वो हसरत से जब भी ........... अब एक हो तो ज़िक्र करूँ ......... जैसे माहॉल में प्रेम, चाहत की खुश्बू फैल गयी हो ..... अर्श साहब ...... तीर पार निकल चुका है ..... परिचय तो करा दो तीर चलाने वाले से ........
    अभिनव जी ने भी बहुत लाजवाब शेर निकाले हैं ....... है इस पार हिम्मत ...... बहुत बेहतरीन शेर है ..... कमाल के शेयर हैं अभिनव जी .........

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  15. @अभिनव भाई को सलाम,
    तस्वीर बहुत प्यारी आयी है? पिता वाल रोल कैसा चल रहा ह्है?

    मतला तो अभी तक के सारे मतलों पर भारी है सर जी इस मुशायरे में। क्या लिखे हो!!! करोड़ों दाद कबूल करें!!!दूसरा शेर भी "लोहे" के बिम्ब को लेकर अनूठा बना है।..और गिरह पे "गुल" के साथ ’क्यारी" को जोड़ना...अहा! बहुत खूब!!!

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  16. तरही को लेकर पुस्तक निकालने वाला आइडिया जबरदस्त है, गुरुदेव!

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  17. और अब सबकी बातें...! चूँकि मैँ अकेली बहन हूँ इन सब की और घर चलाने के लिये हमेशा महिलाओं को ही इधर उधर से मैनेज करना पड़ता है। तो मुझे वीनस का पक्ष लेना ही होगा। वो इलाहाबाद में थर्माकोल मॉडल बनाते हुए थोड़ा कंफ्यूज हो गया होगा शायद वरना पिछली बार दीपावली वाली तरही में तो जब अनुस्वार वाले को कठिन कहके चुनाव की छूट दी गई थी तो क्यों वो भला उसे चुनता।

    बाद बाकी आप देख ही रहे हैं कि कितने खूबसूरत शेर निकाले हैं उसने। मुझे तो कोई भी कमजोर शेर लगा ही नही। अंकित तुम्हे क्षमा नही कर रहा तो क्या हुआ मैं तुम्हारी तरफ से खड़ी हूँ वीनस..! तुमने गलती तो की है। मगर शेर बहुत खूबसूरत निकाले हैं। हाँ बस एक कष्ट इस बात का है कि अगर हासिल ए मुशायरा इस बार चुना जाये तो तुम्हारी इतनी खूबसूरत गज़ल को चयनकर्ता को ना चाहते हुए भी हटाना पड़ेगा....! कोई बात नही इंसान गलतियों से ही सीखता है

    लेकिन सिर्फ अर्श ही क्यों बात तो वीनस पर भी वही लागू होती है गुरु जी। कभी कहीं पढ़ा था कि इन्होने स्वयं को महिलाओं से कोसो दूर रहने वाला हनुमान का भक्त बनाया था। तो ये सुनहरी हँसी और रुमाली बदन.... ये कहाँ से आये..?? हम तो कंफ्युजिया गये हैं इन अनुजों को देख कर।

    अब अर्श ....तरही ही नही इसकी पिछली सारी गज़लें बता रही हैं कि अर्श का अंदाज ए बयाँ दिन ओ दिन निखर रहा है। हर शेर खूबसूरत है कहीं से कोई कमी नही।
    किस किस का नाम लें भला, किस किस को दाद दें (इस शेर के असल शायर क्षमा करें।)

    और अभिनव जी के बारे में आप स्वयं कह चुके हैं। हम भला क्या कहेंगे। मगर मतले की प्रशंसा किये बिना रहा नही जा रहा।

    सभी को शुभकामना...!

    अर्श और वीनस को शुभाशीष...!

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  18. क्या बात है पंकज भाई। ग़ज़ल पढ़कर तो मज़ा आ गया। पढ़ा तो कई बार है मगर आज एक गज़ल खींच लाई...सभी को आपको बहुत-बहुत बधाई। अभिनव भाई आपको बहुत-बहुत शुक्रिया...बहुत अच्छा लगा पढ़कर।

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  19. आज तरही मुशायरे में युवा रचनाकारों के जज़्बात पढ़कर मेरे मन में जो भाव
    मुस्कराहट के साथ आये उन्हें भाई नीरज जी ने बखूबी बयाँ कीये हैं ...
    अत : उनके लिखे को मेरी प्रतिध्वनि मान लीजियेगा
    और बड़ी होने के नए सभी होनहार रचनाकारों को भाई श्री अभिनव जी अर्श भाई व वीनस भाई को
    मेरे स स्नेह आशिष भेज रही हूँ ..और आपको बधाई , बढ़िया बिलकुल आत्मीय संचालन के लिए
    - लावण्या

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  20. भाई वाह, वीनस जी का मक्ता क्या बढ़िया बात कह रहा है. गुरूजी का यदि इतना स्नेह वीनस जी को मिलता है तो वे इसके पात्र भी हैं. "चलो जिस्म को फिर से सपने दिखाएं". "अर्श" बाबू नें तो ग़दर ही ढा दिया है, "वो खुद लडखडाये", क्या बात है. गौतम जी नें बिलकुल सही कहा है कि, "मुझे शर्म आये" और "मेरी जान जाए" नें अलग ही रंग भर दिए हैं शेरों में. हम तो भाई इस इश्टाइल की नक़ल करने की कोशिश करेंगे अगली तरही में :).

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  21. वीनस जी, प्रकाश जी एवं अभिनव जी की ग़ज़लें बहुत प्रभावित कर रही हैं...तीनो ने एक से बढ़कर एक शे'र निकालें हैं किसको सबसे अच्छा कहूँ समझ नहीं आ रहा...

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  22. आज की इस ग़ज़लों में विचार, अभिव्यक्ति शैली-शिल्प और संप्रेषण के अनेक नूतन क्षितिज उद्घाटित हो रहे हैं।

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  23. .
    .
    .
    कहीं गहरे डूब कर क्या खूबसूरत गजल लिखी है अर्श जी ने...और हमें भी डुबा दिया।

    उत्तर देंहटाएं
  24. गुरुदेव प्रणाम,
    अब इससे शानदार कोई मुशायरा भला क्या होगा..तीन बेहतरीन गजलें...तीन निराले अंदाज..आनंद आ गया.
    वीनस भाई की गलती मैं न तो बता सकता हूँ नहीं ऐसा करने का अधिकारी हूँ..हाँ यह जानता हूँ वीनस सच्चे दिल से गजल के इल्म को हासिल करना चाहते है...और उन्हें अपनी तो क्या दूसरों की गजल में भी गलती बर्दाश्त नहीं होती...उनके और गौतम भाई के प्रयासों से ही मैं एक साधारण सी रचना को न केवल गजल का रूप दे सका बल्कि गजल के अहम सबक को भी सीख सका हूँ...तरही के दायरे से बाहर जा कर सोचे तो एक गजल के रूप में बेहद शानदार रचना है...

    रुमाली बदन, संगेमरमर निगाहें
    किसे याद रक्खें किसे भूल जाएँ

    मुझे तो उनकी गजल के सभी शेर अद्भुत लगे..
    आपने गलती क्षमा कर दी तो हम तालियों के लिए उठ खड़े हुए है...वाह!वाह!!वाह!!!


    @अर्श भाई!

    मेरे नाम राशि हो पर कद बहुत ऊंचा बना लिया है...अब इतनी शानदार और ऐतिहासिक गजल योहीं तो लिखी नहीं जाती ...अब राज खोल ही दो..हा!हा!!:)
    अब मैं तो सोचता हूँ कि 'नरो वा कुंजरो वा'की तरह आपकी गजल को ख़ास मौको पर 'प्रकाश की गजल' के रूप में पेश कर दूं तो कापी राईट का उल्लंघन भी नहीं होगा और हम भी छा जाएंगे...अब मियां इतनी शानदार गजल लिखोगे तो पायरेसी तो होगी ही!:)

    मचलना बहकना शरम जैसी बातें
    ये होती है जब मेरी बाँहों में आये

    गुदगुदाती है भीतर तक..बस बार बार दोहराता हूँ,

    उनींदी सी आँखों से सुब्ह को जब भी
    मेरी जान कह के मेरी जां ले जाए

    अब क्या दिल को छू लेने वाली बात कह डाली है एक शानदार और अलग अंदाज में..

    मुझे शर्म आये मुझे शर्म आये

    और

    मेरी जान जाए मेरी जान जाए

    अब जान निकालोगे क्या अर्श भाई...वाह!वाह!...वाह!वाह!

    गुरुदेव आपने अकबर साहब को सही कोट किया है...इश्क को दिल में जगह दे अकबर इल्म से शायरी नहीं आती...
    यह इल्म की नहीं दिल की शायरी है...

    अभिनव साहब का मतला और मक्ता दोनों शानदार है...क्यारी और गुल की शानदार जोड़ बनाया है..
    न ये जीत पाए न वो हार पाए,

    और

    रहा भी न जाए बहा भी न जाए

    ने समां बाँध दिया है..बहुत परिपक्व और गहरे अर्थो को अभिव्यक्त करती शायरी है..

    आज की पोस्ट शानदार रही..
    बधाई और आभार.!

    उत्तर देंहटाएं
  25. नजाकत जो उसकी अगर देखनी हो
    मेरे नाम से कह दो मुझको बुलाये

    अर्श भाई मुझे ये शेर बहुत बहुत पसंद आया, मुझे शर्म आए मुझे शर्म आए, मेरी जान जाये मेरी जान जाये.. का प्रयोग भी बहुत पसंद आया पूरी गजल पर वसंतागमन की महक है १४ फरवरी भी आ रही है मौक़ा बढ़िया है खुल कर एलान करने का दिन है बात समझ रहे हैं ना ???


    अभिनव जी आपकी गजल पढनी शुरू की तो मतला तीन बार पढ़ा फिर पूरी गजल पढी और फिर गुरूजी की बात मतले को दोहराने वाली पढी तो बरबस मुस्कुरा पडा, मकता मुझे विशेष पसंद आया क्यारी शब्द को गुल के साथ जोड़ कर बहुत सुन्दर बात कही आपने और हमने सोचा की ऐसे शेर कहने का सलीका हमें कब आयेगा....दिमाग ने उत्तर दिया १० साल बाद :)



    @ अंकित भाई -- गलती तो गलती है मैं अपनी गलती मानता हूँ, एक और बात पर आपने ध्यान नहीं दिया गजल में ८ शेर है जो ७ या ९ होने चाहिए थे

    @ गौतम जी -- सात खून तो नहीं अगर सात लेट इंट्री माफ़ करवा दें तो ...............................:)

    @ कंचन जी -- कोई कनफूजन नहीं है :) वैसे मैंने पिछले मुशायरे में भाग नहीं लिया था फिर आप वो बात क्यों कह रही हैं :):)

    रुमाली बदन संगेमरमर निगाहें
    किसे याद रखे किसे भूल जाएँ

    ये शेर तो मैंने क्लास १२ के अपने गुरु जी को याद करके लिखा है जो पतले दुबले है और जब घूरते है तो निगाहें एकदम ठंढी होती थी :):) आप कंफ्युजियाइए मत इधर सब ठीक ठाक है आप तो अर्श भाई की तरफ ध्यान लगाइए जहा पक्का कुछ गड़बड़ है


    आप सभी को गजल पसंद आयी और इतनी दाद दी इसके लिए हार्दिक आभार.
    धन्यवाद

    --
    आपका वीनस केसरी

    उत्तर देंहटाएं
  26. आज तरही मुशायरे मे अपनी बदले मतले वाली गजल पढ कर ये टेंशन ख़तम हुई की गुरु जी गजल को मुशायरे में रखेंगे या नहीं
    इस गजल को लिखते समय की अपनी मनःस्थिति के बारे में कुछ बताना चाहता हूँ
    गुरु जी ने जब तरही के लिए मिश्रा दिया तब तो बहुत पसंद आया मगर जब गजल लिखने बैठा तो खटिया खड़ी हो गई,, नए साल को ले कर निगेटिव शेर बन नहीं रहे थे निगेटिव मिसरे से पाजटिव शेर निकालना मेरे बस की बात नहीं है इस लिए कुछ नहीं लिखा और दिन बीतते गए और नए साल पर जब तरही मुशायरा शुरू हुआ तो ""नया साल जीवन में सुख ले के आए"" इस एक मिसरे ने स्वागत किया और मैंने सोचा पिछले तरही में भी गजल नहीं भेज पाया इस बार चाहे जो हो गजल भेजना है
    जल्दी जल्दी इस मिसरे पर गजल लिखने लगा जो पहला शेर लिखा वो था

    नया साल जीवन में सुख ले के आए
    ह्रदय से सभी को है शुभकामनाए

    मगर फिर शुभकामनाए को शुभकामनाएँ किया और यही से सब गड़बड़ झाला शुरू हुआ फिर शेर को बदल कर

    नया साल जीवन को खुशियों से भर दे
    ह्रदय से सभी को है शुभकामनाएँ

    किया और फिर ये शेर निकला

    अगर मुफ्त मिलता है तो क्या जरूरी
    की चुल्लू पियें और लोटा बहाएँ

    मगर ये शेर नसीहत देता हुआ लगा इस लिए इसे हटा कर बाकी के शेर लिखे और जब मतला भी कुछ कुछ ऐसा ही बन गया तो इस शेर को फिर से गजल में जोड़ दिया मुझे क्या पता था की ये शेर ही सब से ज्यादा पसंद किया जाएगा
    इस शेर को जोड़ने के कारण ही गजल में ८ शेर हो गए


    एक बात और कहना चाहता हूँ
    न बहला है दिल जब किसी और जिद से
    तो फिर से गजल को ही ओढें बिछाएँ

    ये शेर मेरे दिल का हाल है पिछले दो महीने से अपनी कलम से दूर था और कहीं भी मन नहीं लगा और फिर से गजल गाँव का रुख किया और इस बात ने इस शेर को जन्म दिया

    आप सभी को गजल पसंद आयी और इतनी दाद दी इसके लिए हार्दिक धन्यवाद
    आपका वीनस केसरी

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  27. सुबीर जी कल से मैं शब्द खोज रही हूँ लेकिन मिले नहीं कक़िसे इन तीनो की तारीफ करूँ। बस तीनो ही लाजवाब हैं और अर्श??? वो तो छुपा रुस्तम है उसकी बहुत गहरा अपने शेरों जैसा ----- । उसके लियेमाँ क्या कह सकती है मगर मन ही मन खुश हो रही हूँ कि चलो ---- तो और अधिक कुछ भी न कहते हुये मैं चलती हूँ बैंड बाजे की तयारी करने । अब देखते जाईये ये नया साल क्या गुल खिलायेगा। तब तक सब ये तीनो लाजवाब गज़लें पढें । इन तीनो बच्चों को बहुत बहुत आशीर्वाद

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  28. सुबीर जी तीसरी बार आ गयी हूँ भला वो माँ क्या करे उसके पाँवों मे तो पर लग गये हैं जब बेटा कहे
    मचलना बहकना शर्म जैसी बातें
    ये होती हैं जब मेरी बाहों मे आये
    हुम्म्म तो बात यहाँ तक आ पहुँची और मैने अभी कोई तैयारी भी नहीं की ये देखिये
    वो शोखी नज़र की अदायें बला की
    मेरी जान कह के मेरी जान ले जाये

    मुझे जब बुला न सके भीड मे तो
    छमाछम वो पायल बजा कर सुनाये

    मैं भी कहूँ मेरा बेटा तो इतना शर्मीला है ये सब कैसे हुया ? अब समझ गयी। मगर एक बात की चिन्ता है
    वो हसरत से जब भी मुझे देखती है
    मुझे शर्म आये मुझे शर्म आये

    इसके लिये गौतम जी और कंचन से कहूँगी कि इसे समझायें अब ये शर्म छोड दे और घर बसाये आप ने सही कहा अब बात हाथ मे नही रह गयी लगती मेरी ओर से उसके लिये एक शेर पता नहीं बहर मे है या नहीं मगर इसमे मेरी खुशियाँ और आशीर्वाद जरूर है
    मुझे ख्याल ये गुदगुदाये बहू को
    अभी बेटा घर माँ के लेकर के आये
    वाह क्या कमाल की गज़ल है सुबीर जी सच मे ये एक नायाब हीरा है। कई बार इस गज़ल को पढ कर भी मन नहीं भरा
    वीनस केसरी जी ने भी बहुत अच्छे शेर कहे हैं। उनको पहले भी पढा है हर बार की तरह इस बार भी बहुत अच्छी गज़ल कही है
    अगर मुफ्त मिलता है तो क्या जरूरी
    कि चुल्लू पियें और लोटा बहायें
    न बहला है दिल जब किसी और ज़िद से
    तो फिर से गज़ल को ही ओढें बिछायें। वीनस को भी बहुत बहुत बधाई।
    अभिनव जी को अधिक तो नहीं पढा मगर उनकी ये गज़ल देख कर हर बार पढने की उत्सुकता बनी रहेगी। मतला मुझे बहुत अच्छा लगा और
    ये भंवर मे फसी ज़िन्दगानी
    रहा भी न जाये बहा भी न जाये
    है इस पार लोहा और उस पार हिम्मत
    न ये जीत पाये न वो हार पाये
    शायद ये शेर इस मुशायरे के लिये है तीनों ने अच्छी टक्कर दी है मगर मुझे लगता है अर्श ने बाजी मार ली है। आपको बहुत बहुत बधाीस लाजवाब मुशायरे के लिये।

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  29. प्रणाम गुरु देव ,
    सर्व प्रथम तो सिरे से ख़ारिज के मेरी ज़िंदगी में कोई नया आया है ... मगर हाँ एक बात जरुरर कहूँगा के ... जबतक वो नहीं है ,ग़ज़ल मेरे साथ रहती है ,... आगे का पता नहीं ... :)

    ये आप सभी का प्यार स्नेह और आशीर्वाद ही है के कुछ लायक शे'र कह पाया हूँ इस तरही के मार्फ़त .. जो स्नेह और प्यार मुझे आप सभी से मिला है रिणी हूँ... आप सभी का ..
    हाँ गुरु जी ने हमेशा मुझे कहा है तुम जिस सब्जेक्ट पर लिखते हो दोऊ कर लिखो ... मैं कहता हूँ प्रभु डूब तो जाऊं मगर कुछ है ही नहीं :) :)... सच में है इल्म से शायरी नहीं होती .. :) :)

    मुझे समझ नहीं आया के ऐसे कैसे हुआ मगर हाँ ये सारे ही शे'र सिर्फ दो घंटे में मैंने लिखे हैं वो भी गुरु जी और गुरु भाई बहनों के डंडे और डर से .. गुरु जी ने कहा था के अगर ग़ज़ल नहीं लिख के भेजे तो वो अपने क्लास के सभी लडको से कह के एक एक शे'र मेरे नाम से दाल देंगे .. मैं डर गया और फ़टाफ़ट लिख के गुरु जी को सुपुर्द कर दी ... :)
    ग़ज़ल कामयाब निकली इसका श्रेय गुरु जी जाता है ...

    वीनस को माफ़ी मिल ही जानी चाहिए दिनों बाद लौटा है और अपनी बात सच्चाई से सबके सामने रख दी है उसने ... मगर आईंदा गलती बर्दास्त नहीं की जाएगी .. :)

    अभिनव भाई ने अछि ग़ज़ल कही है मतला खासा पसंद आया मुझे और मक्ता फिर वही जान लेने वाली बात है जिसमे आय हाय होना लाजमी है ...

    ये दोनों मेरे साथ है तो मैं मज्ज्बूत हूँ , गुरु कुल में .. वरना अंकित बहन जी और गौतम भी तो उफ्फ्फ्फफ्फ्फ्फ़ :) :)

    @ बहन जी आपके कहने के मुताबिक़ और बार के धमकियों में आकर ही लिख दी गाल आपको हमेशा ही कहा है के लिखने के लिए एक घंटा काफी होता है मेरे लिए सिर्फ फॉर्मेट बनानी चाहिए .. :) मगर बहन जी ऐसा कुछ नहीं है वेसे अगर कुछ होता है तो सबसे पहले आपको ही बताऊंगा गुरुकुल में ... क्युके कोई आपसे छिनना चाहेगा तब :) फिर रोना नहीं ?
    :)
    @ गौतम भाई जी अमा कुछ नहीं निकल पड़ी .. कुछ हो जाये तो अच्छा हो आपको कह रखा है आप सुनते ही नहीं ... :) क्या करूँ
    @ मुझे गुड ज्यादा पसंद है वही चासनी है ... चलेगा क्या ..?
    @ वीनस १४ फेब मेरे लिए कोई मायने नहीं रखता भाई जब तक कोई नहीं हो .. वरना मैं तो खुले आम कह देता ... हा हा हा ..:) :)
    कुछ तो हैं के मेरी डोली फ़टाफ़ट उठवाने पर हैं अब मैं उनको कुछ कह भी नहीं सकता ... वो मेरे आदरणीय हैं... मैं उनकी बात समझ सकता हूँ .. माँ :) :)
    @ भाई पाखी तुम्हे ग़ज़ल ले जाने की पूरी इज्ज़त से इजाजत है .. इसमें कोई गुनाह नहीं है भाई होने के लिए इतना तो हक़ बनता ही है .. :)
    आप सभी के प्यार का बीमार हमारा दिल है ... :)
    बेहतर लिखने के लिए प्रेरित होता हूँ ...
    गुरु जी के लिए कुछ नहीं कह पा रहा ... और उधर सूना है के रवि भाई की ग़ज़ल को इन्होने अपनी सुमधुर आवाज़ दी है ... जय हो प्रभु की ... :)


    अर्श

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  30. गुरू जी, इस तरही को पुस्तक रूप देने का सुझाव निश्चित ही अच्छा है। कभी संभव हो सका तो इस पर जरूर विचार करें।

    चूंकि वीनस के सारे ही शेर अच्छे निकले हैं, लिहाजा काफ़िये पर माफ़ कर दिया जाये। चुल्लू पीना-लोटा बहाना, रुमाली बदन और जिस्म को सपने दिखाने वाले शेर विशेष पसंद आये।

    अर्श के बारे में मैं भी कुछ न कहूंगा, बस एक शेर याद आ रहा है-
    मेरे चेहरे पे गज़ल लिखती गई
    शेर कहती हुई आंखें तेरी

    अभिनव जी ने सुंदर प्रयोग किया है। पहले तो मतला ही जानलेवा, फ़िर लोहे और हिम्मतवाली बात....वाह क्या शेर है!! बाकी के शेर भी सवा शेर हैं।

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  31. है इस पार लोहा, है उस पार हिम्मत
    न ये जीत पाये, न वो हार पाए..

    सुबीर साहब
    तरही का यह अंक भी महफ़िल लूट ले गया......तीन युवा शायरों को पढना बहुत शानदार अनुभव रहा.........! अर्श , विनीत और अभी को जबरदस्त ग़ज़ल लिखने की ढेरों बधाई .....

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  32. है इस पार लोहा, है उस पार हिम्मत
    न ये जीत पाये, न वो हार पाए..

    सुबीर साहब
    तरही का यह अंक भी महफ़िल लूट ले गया......तीन युवा शायरों को पढना बहुत शानदार अनुभव रहा.........! अर्श , विनीत और अभी को जबरदस्त ग़ज़ल लिखने की ढेरों बधाई .....

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  33. पहले तो बच्चों से माफी कि देर से आ पायी इस बार नेट पे, पर अब आयी हूँ तो आराम से , तबीयत से लिख के ही जाउंगी.
    वीनस जी ने जो बातें पर्यावरण के लिए लिखीं हैं , पढ़ के मज़ा आ गया, तरही में नहीं है ... इस बात का ग़म नहीं :) अपना
    मतला वो किसी भी संस्था को भेज सकते हैं जो पर्यावरण के हित काम करती है. चुल्लू वाले शेर में शायद थोड़ा फेर बदल कर के वो भी सशक्त बन जाए.
    किसे है खबर कल क़यामत... ये शेर बहुत सुंदर लग रहा है...
    रूमाली बदन तो दिख गया, संगेमरमर निगाहें देखने की कोशिश कर रही हूँ... देख नहीं पारही हूँ :) तो उस शेर पे अभी चुप ही हूँ :)
    गुड!
    ============
    अर्श जी, चूंकि आपको chat पे छेड़ चुकी हूँ सो आपको टिप्पणी में बक्श देती हूँ और शायर पे नहीं , शायरी पे concentrate करती हूँ :)
    बस एक बात बिना कहे रहा नहीं जा रहा, तस्वीर भी ज़रा मुस्कुराती हुई होती तो मज़ा आ जाता :)
    सुबीर भैया, ये ग़ज़ल आपको गुलाबी रंग में लिखनी चाहिए थी, पूरी की पूरी :)

    मुझे तो हर शेर बहुत ही रूमानी और cute सा लगा!

    मुझे लगा कि हसरत वाले शेर में "मुझे शर्म आए" के दोहराव के बजाये उसके साथ "मुझे शर्म आए, उसे शर्म आए" हो तो बात complete सी हो जाती :)
    "मेरे नाम से कह दो .... " और "छमाछम वो पायल" तो बहुत ही नाज़ुक मिजाज़ शेर हैं ... ये आपको कसे पता चला अर्श मियाँ , ये तो हम लोगों के राज़ हैं...

    @ कंचन, तुम भारत में हो पता करो!

    पूरे ग़ज़ल से एक पंक्ति याद आ रही है ... बड़ा शर्मीला दिलबर है, चला जाए न शर्मा कर :):)
    =========
    अभिनव जी थोड़े अभिनव हैं ही हमेशा की तरह....
    मुझे उनके पाँचों शेर बहुत ही पसंद आए. उनका लेखन मुझे अधिकतर प्रभावशाली ही लगता है !
    इस पार लोहा वाला बहुत खूब!

    आप सबको शुभकामनायें...

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