सोमवार, 18 जनवरी 2010

हंसी दर्द में लाज़मी तो है लेकिन, कोई तो चिराग़े मोहब्बत जलाये तरही मुशायरे में आज सुनिये दो नयी प्रविष्टियां मुस्‍तफा माहिर पंतनगरी और इस्मत ज़ैदी 'शेफ़ा' को ।

तरही मुशायरा नये साल की एक बेहतरीन शुरूआत रही है । और जैसा कि हर सप्‍ताह किया जा रहा है । इस बार भी वही कि सप्‍ताह का पहला अंक नयी प्रविष्टियों का, दूसरा अंक पाठशाला के छात्रों का और तीसरा शनिवारीय अंक विशेष आमंत्रित खंड के रूप में । इस प्रकार सप्‍ताह में छ: प्रविष्टियां हो जाएंगीं । हो सकता है कि पाठशाला के विद्यार्थियों वाले खंड में तीन प्रविष्टियां लेनी पड़ें । क्‍योंकि अभी भी काफी नाम बाकी हैं और इच्‍छा ये है कि जनवरी में ही समापन हो जाये मुशायरे का । ताकि अगले माह से होली की तैयारियां प्रारंभ की जा सकें । बीस जनवरी को वसंत पंचमी है । ज्ञान की देवी सरस्‍वती का प्राकट्य दिवस है वो । उस दिन शिवना प्रकाशन विशेष आयोजन करता है । हो सकता है उस दिन परसों  यहां भी कुछ विशेष हो  ।

रविवार को सुबह कुछ कवि मित्रों का सीहोर आगमन हुआ । डॉ. कुमार विश्‍वास, श्री शशिकांत यादव और कुलदीप दुबे सीहोर पहुंचे । डॉ. कुमार विश्‍वास से कविता को लेकर कई सारी बातें हुईं । विस्‍तृत विवरण समाचारों वाले ब्‍लाग तथा शिवना प्रकाशन के ब्‍लाग पर पढ़ने को मिल जायेगा । यहां तो कुवल कुछ चित्र, वो भी इसलिये कि आज के दोनों ही शायरों के चित्र उपलब्‍ध नहीं हैं ।

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चलिये अब प्रारंभ करते हैं आज का तरही मुशायरा । आज की जुगलबंदी में दोनों ही शायर हमारे लिये नये हैं हालंकि शायरी के मान से देखें तो दोनों ही काफी स्‍थापित शायर हैं । परिचय भी दोनों का कुछ विशेष उपलब्‍ध नहीं है और ना ही चित्र । किन्‍तु वही बात है ना कि कवि की सबसे बड़ी पहचान तो उसकी कविता ही होती है । जब कविता स्‍वयं ही परिचय हो तो किसी और परिचय की ज़ुरूरत ही क्‍या है । चलिये तो आज सुनते हैं श्री मुस्‍तफा माहिर पंतनगरी को और मोहतरमा इस्‍मत ज़ैदी शेफ़ा जी को । चित्रों की समस्‍या को इनके ही शेरों से संबंधित चित्र लगा कर पूरा किया है 

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मुस्‍तफा माहिर पंतनगरी

शायद आप मुझे नहीं पहचानते हों किन्‍तु मैं अंकित सफर का न केवल बचपन का मित्र हूं बल्कि शायर बंधु भी हूं । अंकित हमेशा  आपके बारे में बात करता है । उसीने मुझे नये साल का मिसरा दिया जिस पर ये ग़ज़ल लिख कर आपको भेज रहा हूं ।

न उस पार पहुंचे न इस पार आए

बहुत से सफीने समंदर ने खाए

मिली सच की तालीम बचपन से मुझको

कोई किस तरह मेरी नीवें हिलाए

हंसी दर्द में लाज़मी तो है लेकिन

ये तहज़ीब भी आते आते ही आए

मुहब्‍बत के हर ज़ख्‍़म में जिंदगी है

दवा मिल सके ना कभी मौत आए

सफ़र के अंधेरे में कुछ लोग थे जो

मुझे रोशनी की तरह याद आए

हंसी दर्द में लाज़मी तो है लेकिन ये तहज़ीब भी आते आते ही आए । मुस्‍तफा भाई बहुत ऊंची बात कह गये हो इस शेर में । वाह वाह । मुझे रोशनी की तरह याद आए । कमाल के शेर निकाले हैं । बहुत ही उम्‍दा तरीके से बड़े ही सलीके से शेर बनाये हैं । मानो किसी ने रूमाल पर बूटे काढ़े हों । मज़ा आ गया ।

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इस्मत ज़ैदी 'शेफ़ा'

मैं इस्मत ज़ैदी हूँ ,'शेफ़ा' मेरा तख़ल्लुस है,मेरा कोई ख़ास ता'आरुफ़ नहीं है अभी शाएरी और ज़बान ओ बयान की दर्सगाह में दाख़िल होने की कोशिश कर रही हूँ .एक ग़ज़ल हाज़िर ए ख़िदमत है अगर पसंद आए तो हौसला अफज़ाई होगी . मैं ८ सालों से गोवा में मुक़ीम हूँ ,लेकिन मेरा आबाई वतन कजगांव (जौनपुर) है  .

ग़ज़ल

कदूरत का गहरा अँधेरा मिटाए

कोई तो चिराग़े मोहब्बत जलाये

पहेली सुलझती नहीं ज़िन्दगी की

रुला कर हंसाये, हंसा कर रुलाये

वो नन्हे लबों पर अधूरा तबस्सुम

मेरे दिल की दुनिया में हलचल मचाये

जो अगयार हैं उन से कैसी शिकायत?

जब अपने ही भाई हुए हों पराये

हरासाँ हैं इंसानियत के वो दुश्मन

" जाने नया साल क्या गुल खिलाये "

वो किलकारियां ले गया इक धमाका

तड़पती है माँ किसको झूला झुलाए

वतन से बहुत दूर बेचैन दिल को

'शेफ़ा' यादे माज़ी सुकूँ बख्श जाए

मतले में ही क्‍या खूब कामना की है । आज जो सबसे बड़ी ज़ुरूरत है कि कोई चिराग़े मोहब्‍बत जलाए और कदूरत का तम मिटा दे । और मकता भी बहुत सुंदर है । पूरी की पूरी ग़ज़ल ही ताज़गी से भरी है । रुला कर हंसाए हंसा कर रुलाए या तड़पती है मां किसको झूला झुलाए । बहुत ही सुंदर ग़ज़ल है । और जब अगले अंक में पाठशाला के विद्यार्थियों की बारी आनी है तो उसके पहले ये एक सबक की तरह है कि शेर कैसे निकाले जाते हैं ।

आनंद लीजिये दोनों मुकम्‍मल शायरों की खूबसूरत ग़ज़लों का और आनंद लेते रहिये दाद देते रहिये । अगले अंक में हम मिलते हैं सरस्‍वती पूजन के लिये क्‍योंकि अगला अंक होगा वसंत पंचमी का अंक जिसमें होंगें पाठशाला के शायर अपने तेवरों के साथ ।

25 टिप्‍पणियां:

  1. मुस्तफा साहब का हर शेर मुझे बहुत पसंद आया. वाह! वाह! बधाई हो, बहुत ही प्यारे ख्याल हैं !
    शेफा जी का माँ वाला शेर बेहतरीन लगा और अधूरा तब्बसुम वाला भी खूब है!
    बधाई दोनों शायरों को!
    सुबीर भैया, बहुत ही खुशी की बात है कि आप जैसे सुखनवर मौजूद हैं आज की दुनिया में ... आपके साहित्य प्रेम, मेहनत, लगन और निर्मल प्रेम की जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है !
    तो मेजर साहब, अंकित, कंचन, नीरज जी, रवि जी, आपके सारे प्यारे-प्यारे शागिर्द और प्यारी-प्यारी दीदियों की तरफ से :
    3 cheers for subeer bhaiya...
    Hip hip hurray !
    Hip hip hurray !!
    Hip hip hurray !!!
    :)

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  2. दोनों ही गजलें...वाह क्या कहना!! आनन्द आ गया!!


    डॉ कुमार वहाँ पहुँचे हैं..तीन रोज पहले ही तो उनसे बात हो रही थी काफी लम्बी.

    बढ़िया है. उनके कार्यक्रम की रिकार्डिंग हुई हो तो सुनवाईयेगा.

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  3. subeer ji,bahut bahut shukriya ,
    mustafa mahir sahab ki poori ghazal hi achchhi hai lekin ye sher
    'hansi dard men lazmi to hai lekin
    ye tahzeeb bhi aate aate hi aye
    meri nazar men haasile ghazal hai,bahut khoob mahir sahab.mubarak ho .

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  4. माशा अल्लाह ग़ज़ब के शायर हैं ये आज की पीढ़ी के नुमाईंदे...हम जैसे उम्र दराज़ लोग भी इनसे बहुत कुछ सीख सकते हैं...शेर कहने का सलीका और हुस्न कमाल का है और ये अहसास ही नहीं होता की हम किसी नामी गरामी शायर को नहीं पढ़ रहे...आपने सही कहा रूमाल पर बूटों की तरह काढ़े हुए शेर हैं ग़ज़ल में..." हंसी दर्द में लाज़मी..." और "मुझे रौशनी कीतरह याद आये " कहकर जनाब मुस्तफा साहब ने और " कदूरत का गहरा अँधेरा..."रुला कर हंसाये हंसा कर रुलाये" कहकर इस्मत जैदी साहिबा ने हमें उनके हुनर का कायल कर दिया है.
    ये दोनों शायर भी , आपके तरही मुशायरे की तरह,एक दिन बुलंदियों पर पहुंचेंगे देख लेना.

    कुमार विश्वाश साहित्य जगत में जाने माने नाम हैं और उनकी कविताओं ने खासा प्रभावित किया है मुझे...उनकी एक किताब भी मेरे पास है...ऐसे काव्य मर्मज्ञों के साथ क्या बात हुई उसका भी थोडा ब्यौरा दें तो हम भी कृतार्थ हो लें

    नीरज

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  5. पंकज जी आदाब
    मुस्तुफा माहिर साहब के सभी अश'आर पसंद आये
    ये शेर बहुत अच्छा लगा-
    सफर के अंधेरे में कुछ लोग थे जो
    मुझे रोशनी की तरह याद आए
    और इस्मत साहिबा ने क्या खूब शेर कहे हैं
    मतला, और ये शेर
    पहेली सुलझती नहीं ज़िन्दगी की.....
    ...वो नन्हे लबों पर.....
    आपका आयोजन सफल रहा
    'उमीद से दुगना'
    शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

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  6. मुस्तफा जी और शेफा जी सुनने के बाद सोच रहा हूँ...
    वाह कितने नए अशआर हैं..

    मिली सच की तालिम....
    सफ़र के अँधेरे में....

    और पहेली सुलझती नहीं जिंदगी की....

    बहुत सुन्दर... ढेरो बधाई आप दोनों को..

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  7. पंकज भाई से सहमत हूँ कि ब्‍लॉंग के लिये बेशक नये हों ग़ज़लगोई में नये नहीं हैं दोनों। मुझे ग़ज़ल कहने में सबसे कठिन काम लगता है गैर-मुरद्दफ ग़ज़ल कहना और दोंनो ने इसे बखूबी निभाया है, न केवल निभाया है अच्‍छे शेर दिये हैं।

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  8. प्रणाम गुरु जी,
    तरही की हर ग़ज़ल लाजवाब आ रही है,
    @ इस्मत जैदी जी को एक खूबसूरत ग़ज़ल के लिए मुबारकबाद. वाकई मतला और मक्ता बहुत अच्छा बने है, जो शेर मुझे बेहद पसंद आये वो हैं,
    "वो नन्हे लबों पर................"
    "वो किलकारियां ........."
    @ मुस्तफा माहिर, अब जब इन्होने मेरा नाम ले ही लिया है तो अब मेरा फ़र्ज़ बनता है की इनके बारे में जो अधूरी जानकारियां है उन्हें पूरी करदूं.
    मुस्तफा साहेब का जन्म २ नवम्बर १९८४ को पंतनगर, उत्तराखंड में हुआ है, इनका अपना ब्लॉग http://shayermustfamahir.blogspot.com/ है.
    अब राज़ की बात, मुस्तफा साहेब और मैं एक अच्छे दोस्त होने के साथ, पंतनगर में अड़ोसी पडोसी भी है.
    मुस्तफा साहेब बहुत अच्छे शेर निकले हैं आपने, दिल खुश हो गया.
    मतला और हर शेर अच्छा है, किसी एक की तारीफ करूं तो ज्यादती होगी. मगर जो ग़ज़ल के नेत्र हैं वो तो "हंसी दर्द में लाजिमी तो है..........", ये शेर ज़रा देर में समझा मगर जब समझा तो जबान से हटने का नाम नहीं ले रहा.
    आज के दोनों शायरों को तह-ए-दिल से बधाई.

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  9. पहली बार दोनो शयरों को पढ़ा है .......... लग रहा है जैसे पके हुवे आम की तरह ........ ग़ज़ब के शेर कहे हैं ......... मुस्तफ़ा साहब का शेर ......... सफ़र के अंधेरे में ...... और ज़ैदी साहब का ......... वो किल्कारियाँ ले गया इक धमाका ...... सच में धमाका मचा दिया इन दोनो शयरों ने ........

    गुरुदेव एक सुझाव है तरही की सब ग़ज़लों को मिला कर पूरी किताब क्यों ना छपवाई जाय ........ एक बारी में कम से कम १०-१५ ग़ज़लें तो आती ही हैं ....... पिछले और आने वाले कुछ तरही मुशायरॉं को मिला कर अगर आप पुस्तक निकालें तो कैसा रहेगा .........

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  10. DONO GAZALKARON KO UNKEE BEHTREEN
    GAZALON KE LIYE MAIN BADHAAEE DETA
    HOON.SUBEER JEE ,AAP TO HEERON
    ( HEROES ) KO DHOONDH KAR LAATE
    HAIN.

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  11. दोनों शायर लाजवाब. कमाल की गज़लें. बेहतरीन शेर.मुस्तफ़ा साब और इस्मत साहिबा आप दोनों को बहुत-बहुत बधाई. सभी शेर उम्दा हैं इसलिये किसी एक को उद्धृत करना अगले के साथ नाइंसाफ़ी होगी.
    सुबीर साहब, जहां तक मेरा ज्ञान है, तो उसके अनुसार तरही में दिये गये मिसरे का इस्तेमाल ज़रूरी होता है, लेकिन मुस्तफ़ा साहब का उक्त मिसरे वाला शेर मुझे मिला नहीं शायद चूक गया हो, ऐसा ही है न सुबीर साहब?

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  12. सुबीर जी दोनो ने तो और भी कमाल कर दिया । आज बैठा नहीं जा रहा इस लिये शेर कोट नहीं कर रही क्यों की मुझे सभी शेर कोट करने पडेंगे मुझे दोनो के सभी शेर कमाल के लगे दिल छू गये
    इस्मत जैदी और शफा जी को बहुत बहुत बधाई। अगर आ सकी तो कल फिर आती हूँ एक बार ये गज़लें पढ कर मन नहीं भरा शुभकामनायें

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  13. क्माल की ग़ज़लें। हर शेर लाजवाब। मज़ा आ गया।

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  14. कुमार जी के सीहोर आने के विषय में पढ़ना अच्छा लगा।

    मुस्तफा जी का मतला ही बहुत सुंदर है और फिर उनका हर शेर सुंदर लगा।

    इस्मत जी मँजी हुई शायरा लगीं। इनके विषय में हम जैसे लोग शायद कुछ कहने काबिल नही हैं। उर्दू के शब्दों का सटीक प्रयोग करके जिस तरह उन्होने शेर निकाले हैं, वो वाक़ई हम जैसे लोगो के लिये सीखने वाली बात है।

    बसंत पंचमी की गज़ल की प्रतीक्षा रहेगी।

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  15. गज़ब के शायर निकले मुस्तफा साहब
    पहली की ग़ज़ल में चारों खाने चित्त कर दिया
    अँधेरे के सफ़र के साथी उजाले की तरह याद आना आहा
    इस्मत जी की ग़ज़लें तो मन को भीतर से छूती है

    दोनों शायर लाजवाब. कमाल की गज़लें

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  16. दोनों ग़ज़लें बेहद खूबसूरत हैं...हर एक शे'र में बहुत गहरी बातें छिपी हुई हैं...

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  17. मेरे गुणी अनुज पंकज भाई :)

    अब भाई संबोधन नहीं करती तो
    कुछ अजीब स लगता है ~~
    मेरी आदत ऐसी ही है......
    दोनों शायरों ने कमाल के शेरों से
    गज़लें सजायीं हैं ...
    " सफर के अंधेरे में कुछ लोग थे जो
    मुझे रोशनी की तरह याद आए "
    वो नन्हे लबों पर
    "वो किलकारियां ..वाह !! वाह !!



    कल के मुशायरे की प्रविष्टी में शार्दूला जी की पंक्तियाँ बड़ी ही नाज़ुक सी लगीं

    फिर उनका कथा वांचन --
    दिल को छू गया ...आप के

    सम्मान व स्नेह के लिए आभार कहना ,
    महज औपचारिकता होगी

    हमेशा , ऐसा ही स्नेह
    बनाए रखियेगा
    तरही मुशायरे के आयोजन के लिए
    आपको जितनी बधाई दी जाए ,

    कम है .........
    हम आनंद सागर में ,
    स्वर्गीय आनंद उठा रहे हैं .....

    सभी मेहमानों को बधाई,
    शुभकामनाएं व स्नेह,

    - लावण्या

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  18. Dono hi gazal lajawaab hain,sabhi ke sabhi sher seedhe dil me utar gaye...

    Bahut bahut bahut hi aanand aaya padhkar....

    ishwar se prarthna hai dono shayaron ke kalam yun hi chalte rahen aur parwaan chadhen..

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  19. मुस्तफा माहिर पंतनगरी साहब और इस्मत ज़ैदी 'शेफ़ा' साहिबा को इन ख़ूबसूरत ग़ज़लों के लिए बधाई. दोनों ग़ज़लों के आशा'र लाजवाब हैं.

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  20. मुस्तफा माहिर साहब और शेफा जी दोनों की बेहतरीन गजले पढ़कर आनंदित हो गए,हर एक शेर में उस्तादी झलकती है.कमाल का लिखा है....अब सोच रहा हूँ कि अब ये मुशायरा न जाने क्या नया गुल खिलाएगा...बधाई दोनों को और गुरुदेव आपका आभार !

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  21. फोटो बहुत सुंदर लग रही है गुरूदेव। विस्तृत विवरण भी अपेक्षित है। और इस बार तो लगता है कई सारी उपलब्धियों के लिये जानी जायेगी। मुस्तफ़ा साहब और इस्मत जैदी को पढ़ तो पहली बार रहा हूं लेकिन पढ़कर ये समझ सकता हूं कि ये पुराने खिलाड़ी हैं इस क्षेत्र के। दोनों का हुनर लाजवाब है। दोनों के कई शेरों ने प्रभावित किया।

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  22. आह! दो और शायरों का धमाल...तरही मुशायरा अपने पूरे उफ़ान पर।

    मुस्तफा साब का "हंसी दर्द में लाजमी" वाले शेर की जितनी तारीफ़ की जाये कम है।

    इस्मत जी को पढ़ना सुखद आश्चर्य लगा....एकदम मंजे हुये शायर की तरह शेर बुने हैं उन्होंने और अंकित की बातों से पता चलता है कि कितने यंग हैं अभी वो। "वो नन्हें लबों पर" वाला शेर तो उफ़्फ़्फ़्फ़...वो किलकारियां वाला शेर भी यूं तो खूब बना है, किंतु उसे पहली बार पढ़ने पर लग रहा है कि जैसे किलकारियां ही है जो धमाके ले गयी जबकि शायर कहना चाहता है कि धमाकों ने किलकारियां छीन ली है....
    इस्मत साब का वो कदूरत का गहरा अंधेरा वाले शेर पर भी खूब-खूब सारी दाद।

    कुमार विश्वास वाली रपट पढ़ता हूं जाकर...

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  23. इन दो नायाब नागिनों के बारे कही गयी मेरी लम्बी सी टिपण्णी कहाँ गयी गुरु देव...
    उफ्फफ्फ्फ़...
    कमाल के दोनों ने शे'र कहे हैं जल्दी में हूँ कुछ खास नहीं कह पाउँगा इस कमाल की तरही वाली पोस्ट पर फिर से आता हूँ .....


    आपका
    अर्श

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  24. परसों तबीयत की वजह से जल्दी मे चली गयी थी क्यों कि ये उस्तादाना गज़लें कई बार पढना चाहती थी। सीखना जो है इन से । मुस्तफा जी का मतला ही पूरी गज़ल पर भारी है
    और शेर
    मिली सच की तालीम -------
    हंसी दर्द्मे लाजमी-------
    मुहब्बत के हर ------
    मुझे लगता है कि पूरी गज़ल ही कोट करनी पडेगी । उन्हें इस नायाब गज़ल के लिये बधाई
    शफा जी ने तो दिल ही लूट लिया है मतला क्या पूरी गज़ल ही दाद मांम्गती है
    वो नन्हें लवों पर ----
    वो किलकारियां ले गया-------
    जो अंगियार हैं-----
    सभी शेर गज़ब के हैं शफा जी को बधाई
    आपका धन्यवाद और आशीर्वाद सब को बसंत पंचमी की शुभकामनायें

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  25. वोह किकारियां ले गया धमाका
    तड़पती माँ किसको झुला झुलाए.'
    दी को छु गया . इस्मत जी आप कहती रहें इसी तरह, मेरी तरफ से दोनों शेरों को मुबारकबाद

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