बुधवार, 29 जुलाई 2009

आज समीर लाल जी का जन्‍मदिन है, उनको ढेरों शुभकामनाएं और स्‍व. ओम व्‍यास स्‍मृति तरही मुशायरे में आज सुनिये मेजर संजय चतुर्वेदी और राही ग्‍वालियरी जी को ।

इस बार का तरही मुशायरा हर बार से अलग हो रहा है । अलग इस मायने में कि इस बार बहुत ही अच्‍छी रचनाएं मिल रही हैं । उस्‍तादों की बारी इस बार भी नहीं आ पा रही है क्‍योंकि इस बार संजय चतुर्वेदी जी और राही ग्‍वालियरी जी आ रहे हैं अपनी रचनाओं के साथ । इस बार का मुशायरा स्‍व. ओम व्‍यास जी को समर्पित है इसलिये ही शायद इतनी अच्‍छी रचनाएं  आ रही हैं । एक से बढ़ कर एक रचनाएं आ रही हैं । मेरे विचार में इस बार सबसे जियादह मुश्किल उस व्‍यक्ति की होनी है जिसको इस बार के हासिले मुशायरा शेर का चयन करने का दायित्‍व निर्वाह करना होगा । अपनी बताऊं तो सच कहूं अगर कोई मुझे ये दायित्‍व इतनी सुंदर ग़ज़लों में से छांटने को दे तो मैं तो छोड़ के भाग ही जाऊं । बहुत अच्‍छी रचनाएं आई हैं । अब हम अगली बार जब बहर पर काम करेंगें तो और मजा आना चाहिये ।

अनुरोध- आधारशिला जुलाई 2009 अंक में कहानी महुआ घटवारिन पढ़ें और बताएं आपको कैसी लगी  ।

बधाई  हो बधाई जन्‍मदिन की आपको -

आज समीर लाल जी का जन्‍मदिन है । समीर जी हम सब के चहेते हैं । एक बार सीहोर भी आ चुके हैं और एक कवि सम्‍मेलन में काव्‍य पाठ कर चुके हैं । लोग अब भी उनका काव्‍य पाठ याद करते हैं । इसी साल उनकी एक पुस्‍तक बिखरे मोती शिवना प्रकाशन से प्रकाशित होकर आई है । समीर जी का एक बिल्‍कुल ही अलग रूप उस पुस्‍तक में हैं । दरअसल में समीर जी अचानक ही चौंकाने वाली रचनाएं लिखते हैं । जैसे ये देखिये

कोई अब ऐसा नहीं, हो मेरा हमराज
वह दरवाजा खो गया, जिस पर लौटूँ आज

याद लिए कट जायेगा, जीवन थोड़ा पास
मन पागल कब मानता, पाले रखता आस

राहों को तकते नयन, बन्द हुए किस रोज 
माँ के आँचल के लिये, रीती मेरी खोज

कितने संवेदनशील दोहे हैं ऐसा लगता है कवि ने हर दोहा आंसुओं को सियाही बना कर लिखा है । समीर जी के अंदर एक गहन संवेदनशील कवि है । आज उनका जन्‍म दिन है उनको हम सब की ओर से शुभकामनाएं । इस बार तरही में उनकी ग़ज़ल नहीं मिली है अन्‍यथा उनकी ग़ज़ल आज लगाई जाती  । समीर जी के व्‍यक्तित्‍व को जितना मैंने जाना उस हिसाब से ये गीत उनको आज जन्‍मदिन पर उपहार स्‍वरूप । इस की पंक्तियां बिल्‍कुल उनके व्‍यक्तित्‍व के लिये ही बनी हैं । अनुरोध है कि पूरे गीत को सुनते समय, हर अंतरे को सुनते समय समीर जी का व्‍यक्तित्‍व दिमाग में रखें और बतायें कि मैंने गीत सही चयन किया कि नहीं । हर किसी के लिये जीने वाले व्‍यक्ति के लिये यही गीत हो सकता है सुनिये ये गीत :-

http://www.divshare.com/download/8015470-368 

http://www.archive.org/details/BolIkTareJhanJhan

समूचे ब्‍लाग जगत और ग़ज़ल की पाठशाला की ओर से जन्‍मदिन की शुभकामनाएं

 samee sam2 cake-flowers

श्री समीर लाल जी के बचपन के जन्‍मदिन का चित्र बड़ी मुश्किल से मिला है ।

स्‍व. ओम व्‍यास स्‍मृति तरही मुशायरा

तो आज हमारे साथ दो और शायर हैं जो कि अपनी रचनाओं के साथ आये हैं । दोनों ने ही भागते भागत अगले स्‍टेशन पर ट्रेन पकड़ी है । और इनके ट्रेन पकड़ने के कारण हमारे दोनों ही उस्‍ताद शायरों के लिये अब अगले स्‍टेशन तक का इंतजार रहा है । क्‍योंकि अब वे ही शेष हैं । इस बार हमने बहरे रमल मुसमन महजूफ को लिया है । एक राज की बात आपको बताऊं बहरे रमल की एक बहर जो सबसे जियादह काम में आती है और जिस पर काफी काम हुआ है वो है बहरे रमल मुसमन मखबून मुसक्‍कन ।  फाएलातुन-फएलातुन-फएलातुन-फालुन । मदन मोहन साहब ने इस बहर को काफी उपयोग किया है । हुस्‍न हाजिर है मुहब्‍बत की सजा पाने को, रस्‍मे उल्‍फत को निभाएं तो निभाएं कैसे, रंग और नूर की बारात किसे पेश करूं आदि आदि । इसमें लिखने में एक बड़ी परेशानी आती है कि आपको एक साथ दो स्‍थानों पर दो लघु मात्राओं की व्‍यवस्‍था करनी होती है । लघु मात्राएं जो कि स्‍वतंत्र हों । इसमें आखिरी रुक्‍न 112 या 22 कुछ भी हो सकता है । किन्‍तु फएलातनु  में जो दो लघु हैं फए  उसकी व्‍यवस्‍था कुछ कठिन होती है । अक्‍सर यहीं पर लोग मार खा जाते हैं । ग़ज़ल गायकों की ये बहुत ही पसंदीदा बहर है । लताजी और जगजीत जी के सजदा में चार पांच ग़ज़लें इसी बहर पर थीं । इस बहर पर काम करना मतलब लघु और दीर्घ की सटीक पहचान होना । सीखने के लिये सबसे बेहतरीन बहर । एक बात का ध्‍यान रखें कि रमल मुसमन महजूफ और मुसमन मखबून मुसक्‍कन में अंतर करने के लिये आखिरी रुक्‍न को देखना होता है । जैसे हुस्‍न हाजिर है मुहब्‍बत की सजा पा यहां तक तो आप इसे फाएलातुन-फाएलातुन-फाएलातुन 2122-2122-2122  भी कर सकते हैं ओर फाएलातुन-फएलातनु-फएलातुन 2122-1122-1122  भी । उसमें जो है  और  की आ रहा है उसे आप 2 भी कर सकते हैं और 1 भी । लेकिन यदि अंतिम रुक्‍न 212 है तो ये दोनों मात्राएं (है और की ) 2 में गिनी जाएंगी । यदि अंतिम रुक्‍न 112 या 22 है तो दोनों मात्राएं ( है और की) 1 में ही गिनी जाएंगीं । जैसे यदि पाने को  की जगह पर पाने यहां  होता तो इसका वजन 2122-2122-2122-212 हो जाता हुस्‍न हाजिर है मुहब्‍बत की सजा पाने यहां

खैर आज तो हम अपनी बहरे मुसमन महजूफ  की ही बात करते हैं और सुनते हैं आदरणीय जोश मलीहाबादी साहब  की लिखी और ग़ज़ल सम्राट श्री जगजीत सिंह साहब   की गाई ये कहकशां एल्‍बम की ग़ज़ल ।

http://www.archive.org/details/KiskoAatiHaiMasihaai 

http://www.divshare.com/download/8015680-cd9  

तिलक राज कपूर जी उर्फ राही ग्‍वालियरी जी :- तिलक जी के बारे में उतना ही जानता हूं जितना उनके मेल से ज्ञात हुआ है । किन्‍तु मेरे लिये वे सम्‍माननीय हैं क्‍योंकि उनके नाम में मेरी ससुराल का नाम ग्‍वालियर आता है और ससुराल से जुड़ी हर चीज का सम्‍मान करना हर पुरुष का परम धर्म है  । उनका मेल :-एक आकस्मिक संयोग, कुछ हिन्‍दी सामग्री की तलाश में मुझे आज आपके पोर्टल पर ले आया । वर्ष 1982 से 1985 की अवधि में मेरी आगर-मालवा की पदस्‍थापना में कुछ ऐसा संयोग बना कि कुछ कविगण और कुछ शायरो ने मुझे कविता और अशआर लिखने की लत लगादी जो आगर छोड़ते ही छूट गयी । एक हसरत जो दिल में आज भी बनी हुई है वह शायरी के गुर सीखने की है । बहुत कोशिश की मगर ऐसा कोई संदर्भ न मिला जो मार्ग प्रशस्‍त कर सकता । कोशिश में ही कमी रही होगी । बहरहाल आपके पोर्टल ने कोशिश को फिर जिन्‍दा कर दिया है । मैं भोपाल में रहता हूँ और तमाम व्‍यस्‍तताओं के बीच भी फिरसे पुराने शौक को जिन्‍दा करना चाहूँगा ।

tilak raj

सारी खबरें छानकर, इस माह के अखबार से,
सोचता हूँ क्‍या मिला, हमको नई सरकार से ।

पार लहरों के कराता था कभी पतवार से,
आज डर लगता है उसके हाथ की तलवार से ।

आपने जीता है दिलको प्‍यार से, मनुहार से,
जो सिकंदर कर न पाया तीर से, तलवार से ।

सुब्‍ह से हर शाम तक हर बात की कीमत लगी,
अब तो रिश्‍ते भी हमें लगने लगे व्‍यापार से ।

एक सन्‍नाटा बसा है पर मुझे लगता है क्‍यूँ,
रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से ।

शहर् की सड़कों से मेरे गॉंव की गलियॉं भली,
जो भी मिलता था, वो मिलता था बहुत ही प्‍यार से ।

खेल जो खेला था मैंने, किसलिये जीता नहीं,
सीखने की कोशिशें करता रहा मैं हार से ।

ये सहज रिश्‍ता है जिसकी कोई भी कीमत नहीं,
दोस्‍ती, ऐ दोस्‍तों मिलती नहीं बाज़ार से ।

कोई शिकवा, या शिकायत के बिना हम खुश रहे,
कोई उम्‍मीदें नहीं रक्‍खीं कभी संसार से ।

हमने माना आपमें डसने की फितरत ना रही,
रोकता है कौन लेकिन आपको फुफकार से ।

आप कहते हैं कि ‘राही’ आजकल चुपचाप है,
बात तन्‍हाई में क्‍या करता दरो-दीवार से ।

वाह वाह वाह क्‍या बात है साहब आपने तो गजब के शेर निकाले हैं । मतला, मकता और गिरह वाला शेर तीनों ही जबरदस्‍त हैं । तिस पर हमने माना आपमें डसने की, पार लहरों के ये शेर भी खूब हैं ।

मेजर संजय चतुर्वेदी :  मेजर साहब पिछली बार जब तरही में आये थे तो कैप्‍टन थे किन्‍तु अब मेजर होकर आये हैं । ये अलग बात है कि ग़ज़ल की पाठशाला के बंदे बिना मिठाई के किसी भी खुशखबर को खुशखबर नहीं मानते हैं ।संजय जी बहुत ही बेहतरीन शायर हैं । इनका एक संग्रह चांद पर चांदनी नहीं होती  शिवना प्रकाशन से प्रकाशनाधीन है । संजय जी हिंदी के बेहतरीन प्रयोग करते हैं । फिलहाल देहरादून में पदस्‍थ हैं और गौतम के मित्र हैं ।

sanjay

माँ से छत, रिश्तों से चौखट और हद है प्यार से

ईंट गारे से नहीं बनता है घर, परिवार से

आदमी-कुदरत के रिश्ते जब जुडे बाज़ार से

क्यँ चरक लुकमान भी लगते हैं कुछ बीमार से

आपके अहसास की कीमत नहीं कुछ भी यहाँ

गमज़दा हों फिर भी हँस कर बोलिये सरकार से

जब सियाही बन क़लम में ख़ून दिल का आ गया

लफ्ज़ लोहा ले रहे हैं देखिये तलवार से

रौशनी के डर से छुप कर तीरगी के प्यार में

रात भर आवाज देता है कोई उस पार से

हो भले ही खून में डूबी हुई हर इक खबर

चाय में चीनी मिलाते हैं मियाँ अखबार से

क्या जरूरत है हमें हीरे की या तकनीक की

हम तो शीशा काटते हैं रौशनी की धार से

वाह वाह वाह मजा ही आ गया है । बहुत ही सुंदर गिरह बांधी है । कई कई शेर जबरदस्‍त बन पड़े हैं । विशेषकर मतले में घर की परिभाषा बहुत ही सुंदर है । शीशा काटने वाला शेर बहुत बढि़या बना है । मेजर साहब प्रमोशन की मिठाई खिलाइये ।

चलिये तो आनंद लीजिये इन ग़ज़लों का और मुझे आज्ञा दीजिये । मिलते हैं अगले अंक में दोनो उस्‍ताद शायरों के साथ ।

 

21 टिप्‍पणियां:

  1. समीर लाल जी को जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई

    regards

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  2. बधाई..बधाई..आदरणीय समीर जी को कोटिशः बधाई..!

    तिलक राज कपूर जी का हर शेर क्या खूब रहा...! गिरह क्या कूब बाँधी है ..! अब अगर ये हमारे गुरुकुल में आ गये हैं तो हम लोगों की तो छुट्टी समझो..! जब इन्हे अभी सीखना है तो ये हाल हैं, कहीं सीख गये तो क्या होगा ....!!!!!!!!!

    मेजर चतु्र्वेदी जी ने भी बहुत खूब शेर दिये..! मतला विशेष रूप से भाया।

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  3. ढेरों शुभकामनाएं समीरजी के लिये आज उनके जन्मदिन पर।

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  4. समीर लाल जी को जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई

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  5. समीर जी को जनम दिन की बहुत बहुत बधाई................
    और आज की ग़ज़लें जो एक से बढ़ कर एक हैं.............मेजर संजय को बहुत बहुत बहूत बधाई................ शानदार ग़ज़ल और लजवाब शेर हैं उनके............तिलक राज जी ने भी हर शेर में कमाल किया है..........पढ़ कर लगता है शायर लोगों की सोच कहाँ कहाँ तक जाती है........... आम भाषा और रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी से ग़ज़ल की पैनी धार निकाल कर रख देते हैं............ सुभान अल्ला ................ और प्रणाम आपको जो इतना कुछ निकलवाने का होंसला रखते हैं नये नये कवियों से, फिर उनको साधते भी हैं...........

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  6. समीर जी को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं.

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  7. समीर जी को बहुत बहुत बधाई
    मेजर साहिब की गज़ल ने तो समय बान्ध दिया
    माँ से छत, रिश्तों से चौखट और हद है प्यार से
    ईँट गारे से नहीं बनता है घर परिवार से
    लाजवाब
    जब सियाही बन कलम मे खून दिल तक आ गया
    लफ्ज़ लोहा ले रहे हैं देखिये तलवार से् बहुत सुन्दए गज़ल है मेजर सहिब को बहुत बहुत मुबारक
    तिलकराज जी की गज़ल भी बहुत पसँद आयी
    सुबह से शाम तक हर वक्त की कीमत लगी
    अब तो रिश्ते भी हमे लगने लगे व्यापार से
    क्या खूब कहा है और सुन्दर गीत सुनवाने के लिये आपका बहुत बहुत धन्यवाद मुशायरा लाजवाब रहा

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  8. समीर जी को जन्मदिन के उपल्क्ष्य में हार्दिक शुभकामनाऎं!!

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  9. मैं इतना जरूर जानता हूं, आज समीर भाई के बराबर हिन्दी ब्लागिंग में कुछ ही कद है, जो शीर्ष पर टिके हुए हैं। इतनी लोकप्रियता ब्लागिंग में अमिताभ बच्चन की भी नही है, जितनी समीर भाई ने कमाई है। ये सिर्फ समीरभाई का ही कमाल है कि आपको जो पसन्द नही करते वो भी आपसे मौहब्बत करते है। किसी का जन्मदिन हो, और सभी मुख्य ब्लाॅगर आप पर पोस्टे देने में जुटे हो, ऐसा कहां देखा गया है। ये सब समीर भाई का जादू हैं। हिन्दी में एक हजार में से सौ ब्लागर समीर भाई पर पोस्ट जरूर लिखते है।
    बहुत पहले हमने भी ये महान काम किया था।
    जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं के साथ

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  10. इस असीम स्नेह, बधाई एवं शुभकामनाओं के लिए हृदय से आभार.

    आपने मुझे इस दिवस विशेष पर याद रखा, मैं कृतज्ञ हुआ.

    समस्त शुभकामनाऐं.

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  11. समीर जी को बहुत बहुत बधाई।कल ही उनके शहर जबलपुर को छूकर लौटा हूं।

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  12. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  13. Sameerji

    Janm din ki aneko badhaian aur shubhkamnayein. AApki lekhni aapki pehchaan bani hai, jiske liye bhi aapko daad ho.

    Devi nangrani

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  14. जै हो समीर लाल
    तुम जियो सात सौ साल
    मेरी तरफ से १२० किलो बधाई
    स्वीकारो मेरे भाई

    राही जी ने बड़ी खूबसूरत ग़ज़ल कही
    गजब-गजब के हवाले
    बेहतरीन शेर निकाले

    मेजर संजय को पढ़कर भी मज़ा आया

    वाह-वाह सुबीर जी
    आपका आभार
    कि दो बेहतरीन रचनाकारों से मिलवाया

    वाह साब वाह

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  15. सरकार समीर को जन्म-दिन की खूब सारी बधाईयां...विलंब से ही सही।

    इस बार तो वाकई गुरूवर, एक-से-एक लाजवाब ग़ज़ल अयी हैं...
    राही साब ने कयामत ही बरपा दी अपने शेरों से....उफ़्फ़्फ़!

    और संजय तो अपना हीरा है, हीरा...जितना कमाल का लिखता है छोड़े ने उतनी ही लाजवाब आवाज भी पायी है...

    दोनों शायरों को उनकी बेमिसाल ग़ज़लों के लिये बधाई....

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  16. गुरु देव सादर प्रणाम.,

    समीर लाल जी को पहले भी जन्म दिन की बधाई दे चुका फिर से दे रहा हूँ...
    समीर जी का ये शे'र मैं हमेशा ही गुनगुनाता रहता हूँ और सोचता रहता हूँ उनके गंभीर मिजाज के बारे में...

    फ़ैल कर के सो सकूँ इतनी जगह मिलती नहीं
    ठण्ड का बस नाम लेकर मैं सिकुड़ता रह गया ..

    क्या बारीक बात कही है इन्होने कमाल है ये तो ...

    वाकई गुरु देव तरही अपने जवानी पे चल रही है... एक से बढ़कर एक उम्दा शायार...

    तिलक राज जी ने जिस तरह से गिरह लगाई है उस्ताद कहूँ तो कम ही होगा इनको... और बस उसके ऊपर के शे'र सुबह से .... वाला बहोत ही खुबसूरत अश'आर निकाले हैं इन्होने हर शे'र बे-मिशाल है ....

    मेजर साब के क्या कहने वाह जी वाह ...
    माँ से छत रिश्तों से चौखट और हद है प्यार से ....इस शे'र पे खड़े होकर दाद देता हूँ ... क्या गज़ब की बात कही है इन्होने ....और गिरह सुभानाल्लाह ... बहोत बहोत बधाई इनको हर शे'र पे ...

    अगले अंक का बेशब्री से इंतज़ार कर रहा हूँ प्रभु...


    आपका
    अर्श

    उत्तर देंहटाएं
  17. गुरु जी प्रणाम
    २१२२ ११२२ ११२२ ११२ में गजल लिखना तो मेरे लिए वाकई टेढी खीर हैं आखिर उस्तादों का काम उस्ताद ही कर सकते हैं :)

    तिलक राज जी का ये कहना की "एक हसरत बनी हुई है गजल की बारी की सीखने की "
    और इतनी सुन्दर गजल मुशायरे में पेश करना एक दूसरी बात को खुद काटना है

    गुरु जी आप ही बताइये जो हम इतने दिन सीख कर नहीं कह पा रहे वो तिलक जी अगर बिन सीखे लिख रहे है और क्या khoob लिख रहे है तो और कुछ कहने को क्या रह जाता है ???
    आपकी गजल का मक्ता तो, क्या कहे, केवल वाह वाह ही कह सकते हैं


    मेजर साहब की गजल का मतला इतना बेजोड़ है की क्या कहें
    और आख़री में मक्ता भी उतना ही खूबसूरत लिखा गया है

    venus kesari

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  18. ... तिलक जी और संजय जी की अभिव्यक्तियाँ बेहद प्रभावशाली हैं, शुक्रिया !!!

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  19. समीर लाल जी को जन्मदिवस की ढेर सारी विलंबित बधाईयां.
    जोश मलीहाबादी साहब की ग़ज़ल श्री जगजीत सिंह की आवाज़ में सुनकर 'ट्रांस' की सी स्थिति हो जाती है.
    राही ग्वालियर जी की ग़ज़ल का जवाब नहीं. हर शेर लाजवाब! और ये शेर तो छा गया :
    एक सन्नाटा बसा है पर मुझे लगता है क्यूँ,
    रात भर आवाज़ देता है कोई उस पर से.
    मेजर संजय चतुर्वेदी जी की ग़ज़ल ने समाँ बांध दिया.
    सुबीर जी का धन्यवाद दिए बिना तो सब कुछ अधूरा सा ही रहेगा.
    सुबीर जी, आपने मदन मोहन जी का ज़िक्र किया है, वे मेरे पसंदीदा संगीतकारों में थे.
    गलत कह गया, पसंदीदा संगीतकारों में "हैं" क्योंकि अच्छे संगीतकार और साहित्यकार शरीर छोड़कर भी अमर कहलाते हैं.

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  20. पंकज जी,
    पहले तो क्षमा प्रार्थी हूँ कि बहुत दिनों बाद हाज़िरी लगवा रही हूँ. कंचन के जन्मदिन की बधाई भी देर से दे रही हूँ. कंचन, हमारे यहाँ कहा जाता है कि जिस दिन जन्मदिन मान लो, मना लो. देर से ही सही बधाई स्वीकार करें. उस दिन सारी पोस्ट पढ़ी और लिखने का सोचा भी. कैसे छूट गया --समझ नहीं आया! बहन भाई की ग़ज़लें बहुत अच्छी लगी.
    समीर जी के जन्म दिन की बधाई! राही जी और संजय जी की गज़लें भी बहुत पसंद आईं.

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