शनिवार, 4 जुलाई 2009

गरज कर झूम कर बादल उठे हैं आ भी जाओ तुम ( बरसाती ग़ज़ल) । एक अजूबा हमारे शहर में हुआ बरसात एक बूंद भी नहीं हुई लेकिन नदी में जबरदस्‍त बाढ़ आ गई ।

बरसात, एक ऐसी ऋतु जो हर कवि, लेखक, शायर की सबसे पसंदीदा ऋतु होती है । जब उमड़ घुमड़ के काले मेघ आसमान पर छाते हैं तो ऐसा लगता है मानो आसमान धरती को प्रेम करने के लिये झुका जा रहा है । बहुत पहले एक वर्षा गीत लिखा था अब पूरा तो याद नहीं लेकिन कुछ पंक्तियां इस प्रकार थीं ''मत कहो इसे घन गर्जन है, ये नभ का प्रणय निवेदन है'' ''चपला है या वरमाला है, अंबर ने जिसे उछाला है'' वर्षा मंगल काव्‍य गोष्टियों में इसको बहुत पसंद किया जाता था । अब तो लगभग विस्‍मृत सा हो गया है ये गीत शायद पुरानी किसी डायरी में हो मिला तो पूरा सुनाने की कभी कोशिश करूंगा ।

बरसात के गीत- बरसात को लेकर कई सारे गीत बने हैं । कुछ तो ऐसे हैं कि जो वर्षा का पूरा चित्र सामने ले आते हैं । मेरी कई सारी जो इच्‍छाएं अधूरी हैं उनमें एक ये भी है कि कभी किसी वर्षा से घिरे पहाड़ी जंगल में रात बिताऊं और रात भर वर्षा की ध्‍वनियां सुनूं । वर्षा जो सबसे बड़ी संगीतकार है ।  फिलहाल तो ये गीत सुनाने की इच्‍छा हो रही है जो फिल्‍म परख का है और जिसे लता जी ने ऐसे गाया है कि यूं लगता है मानो सामने बरसात हो ही रही हो । मेरे पसंदीदा वर्षा गीत में  बरसन लागीं सावन बुंदिया-बेगम अख्‍तर, रिमझिम गिरे सावन- लताजी तथा किशोर जी, नाच रे मयूरा नाच रे मयूरा-मन्‍नादा, सावन की रिमझिम में -मन्‍ना दा, बादल तो आये लहरा के छाये-लताजी, अंबुआ तले डोला रख दे मुसाफिर-सुधा मल्‍होत्रा, उमड़ घुमड़ के आई घटा-दो आंखें बारह हाथ, हरियाला सावन ढोल बजाता-दो बीघा जमीन, बादल यूं गरजता है-बेताब, रिमझिम के तराने लेकर आई-काला बाजार, लगी आज सावन की- चांदनी,   और कई कई गीत हैं । कभी अलग से हम इन गीतों की बात करेंगें । फिलहाल तो ये गीत सुनें ।
बरसात का चमत्‍कार-बरसात का ही एक अनोखा चमत्‍कार सीहोर में हुआ । शहर से होकर बहने वाली छोटी सी नदी सीवन पिछले पांच महीनों से बिल्‍कुल ही सूखी पड़ी थी । कल भी दोपहर तक वही हालत थी कि लोग पानी बरसने की उम्‍मीद लगाये बैठे थे । बच्‍चे उसी प्रकार सूखी नदी में खेल रहे थे जैसे खेलते हैं । कि अचानक चमत्‍कार हुआ अचानक देखते ही देखते नदी उफन पड़ी और इस प्रकार की बात की बात में बाढ़ जैसा दृष्‍य हो गया । लोग हैरान थे कि आसमान खाली है कहीं कोई बारिश नहीं है फिर ये बाढ़ कहां से आ गई । पूरा शहर नदी के किनारे एकत्र हो गया । पता चला कि ऊपर कहीं पहाड़ी इलाके में जोरदार बारिश हुई है जो नदी का जल संग्रहण क्षेत्र है । वहीं का पानी ये आ रहा है । इसे कहते हैं प्रकृति का चमत्‍कार इधर सर पर सूरज चमक रहा था । लोग पानी को तरस रहे थै और उधर सूखी नदी में अचानक ही बाढ़ आ गई ।

तरही मुशायरा-तरही मुशायरे को लेकर इस बार काफी उत्‍साह लोगों ने दिखाया है और काफी लोगों की ग़ज़लें मिल चुकी हैं । इस बार की ग़ज़लें सचमुच ऐसी हैं कि सुनने में आनंद आ जायेगा । मेरी इच्‍छा तो ये थी कि सभी की ग़ज़लें उन्‍हीं की आवाज में लगाता किन्‍तु बात वही है कि सबके पास रिकार्डिंग की सुविधा जाने हो या न हो । चलिये ऐसा करेंगें कि इस बार एक वर्षा मंगल काव्‍य गोष्‍ठी करेंगें जिसमें कि सभी की आवाज में ही कविताये होंगीं । फिलहाल तो बात तरही मुशायरे की जिसको लेकर कई सारी रचनाएं तो आ गई हैं और अभी भी आ रही हैं । मेरा विचार है कि 7 जुलाई को तरही मुशायरे का आयोजन प्रारंभ करने का । अपने सभी ज्ञात अज्ञात गुरुओं और उस्‍तादों को गुरू पूर्णिमा के अवसर पर अपनी और से समर्पित करते हुए ये तरही मुशायरे का आयोजन करने की इच्‍छा है । ज्ञात अज्ञात इसलिये क्‍योंकि कई सारे ऐसे हैं जिन्‍होंने मुझे हाथ पकड़ कर सिखाया तो कई ऐसे हैं जिनसे बहुत कुछ सीखा कभी मिला नहीं । उन सबको मेरी और से एक भावांजलि होगा इस बार का तरही मुशायरा । तो 7 जुलाई गुरू पूर्णिमा को हम प्रारंभ करते हैं मिसरे ' रात भर आवाज देता है कोई उस पार से' जिस पर कई अच्‍छी रचनायें हैं । और हां अगला मुशायरा केवल बहर पर होगा जिसमें कोई मिसरा नहीं दिया जायेगा केवल बहर दी जायेगी जिस पर लिखना होगा । और उसमें कम से कम एक शेर बरसात पर, एक सावन पर और एक बहन पर या राखी पर रखना होगा । बहर क्‍या होगी वो जल्‍द ही ।

एक बहुत पुरानी ग़ज़ल-  बरसात से याद आया कि जब लिखना सीख रहा था । उस समय उस्‍ताद लोग कहते थे कि इस पर लिखो उस पर लिखो । कभी दीपावली आ जाती थी तो आदेश होता था कि दीवाली की गोष्ठियां होनी है दीवाली पर लिखो कभी होली तो कभी कुछ और । ऐसे ही कभी किसी वर्षा मंगल में जाना था सो उस्‍ताद का आदेश हुआ कि बरसात पर ग़ज़ल लिख कर लाना । वो दौर था जब ग़ज़ल का ककहरा सीख ही रहे थे । खैर जैसे तैसे लिख कर ले गये । कुछ शेर पसंद भी किये गये । आज बरसों बाद वो ग़ज़ल कहीं से निकली तो यहां प्रस्‍तुत कर रहा हूं । ग़ज़ल जस की तस है जैसी उस समय लिखी थी वैसी ही । कुछ परिवर्तन करके उसका टटकापन समाप्‍त नहीं करना चाहता । जहां जो कमियां हैं वे भी वैसी ही हैं जो लगभग पन्‍द्रह साल पहले की उस गोष्‍ठी के समय थीं । एक और ग़ज़ल भी निकली है जो रक्षाबंधन पर हुई एक बहनों की गोष्‍ठी के लिये लिखी थी । उसे बाद में दैनिक भास्‍कर ने भी छापा । वो कभी बाद में आज तो ये बरसाती ग़ज़ल । आज माड़साब पकड़ में आये हैं एक पुरानी ग़ज़ल देकर सो इसमें खूब छांटिये दोष बहर के कहन के, मात्राओं के, उच्‍चारण के और खबर लीजिये माड़साब की । चूंकि पन्‍द्रह साल पुरानी ग़ज़ल है अत: दोष तो होंगें ही ।

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गरज कर झूम कर बादल उठे हैं ,आ भी जाओ तुम ।
तुम्हारी राह में मौसम बिछे हैं ,आ भी जाओ तुम ॥

कहीं पर बात हम तुम में ,कोई ठहरी हुई सी है ।
शुरू करने हमें कुछ सिलसिले हैं ,आ भी जाओ तुम ॥

जहां पर ख्वाब कोई हमने तुमने ,मिल के रोपा था ।
वहीं उस मोड़ पर ही हम खड़े हैं , आ भी जाओ तुम ॥

जहां तक देखिये नज़रों की हद तक ,सिर्फ बारिश है ।
फुहारों के दुपट्टे से उड़े हैं , आ भी जाओ तुम ॥

बुझा है चांद का कंदील अब तो बस अंधेरा है ।
सितारों के भी सब दीपक बुझे हैं , आ भी जाओ तुम ॥

लगे है यूं के ज्यों पाज़ेब खनकाई  है ये तुमने ।
छमाछम छम छमाछम सुर बजे हैं ,आ भी जाओ तुम॥

अंधेरी रात है ,बरसात है ,और उफ़ ये तनहाई ।
सबर के जाम अब मुंह तक भरे हैं ,आ भी जाओ तुम ॥

कहीं झींगुर की चिकमिक है ,कहीं बारिश की छम छम है ।
सभी सुर आज आपस में  मिले हैं  ,आ भी जाओ तुम ॥

अंधेरा है भले बाहर ,मगर घर में उजाला है ।
तुम्हारी याद के दीपक जले हैं ,आ भी जाओ तुम॥

भिगो कर हाथ बारिश में, मुझे छूती हैं आ आकर ।
हवाऐं  आज पागल सी फिरे हैं , आ भी जाओ तुम ॥

अभी कल तक तो बंजर था ,मगर अब आके देखो तो।
यहां पर हसरतों के गुल खिले हैं ,आ भी जाओ तुम ॥

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14 टिप्‍पणियां:

  1. हमें ग़ज़ल की समझ नहीं है , भावों की समझ है और भावों से ये ग़ज़ल ओतप्रोत है | बहुत अच्छे |

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  2. लगे है यूँ की ज्यूँ पाजेब खनकाई है ये तुमने
    छमाछम छम छमाछम सुर बजे है, आ भी जाओ तुम

    वाह गुरु देव वाह...इस शेर से मुझे एक मशहूर शेर याद आ गया:

    गुनगुनाती हुई गिरती हैं फलक से बूँदें
    कोई बदली तेरी पाजेब से टकराई है

    तरही मुशायरे में शिरकत करने की ख्वाईश लगता है मसरूफियत दिल में ही रहने देगी.

    आप को बारिश इतनी पसंद है और यहाँ हम बारिश में बैठे आपको याद कर रहे हैं...पहाड़ जंगल बारिश एकांत सब कुछ तो है यहाँ...
    "आयीये बारिशों का मौसम है....."

    नीरज

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  3. गुरु देव सादर प्रणाम,
    कल जब आपसे कविताओं गीतों मुक्तक छंद इत्यादी के बारे में बातें हुई तो ऐसा महसूस हुआ के एक एक उदाहर मिल जाते बतौर तो आनंद आजाता मगर आज देखिये ये वर्षा गीत उदाहरन मिल ही गया और पूरा आनंद में मैं सराबोर हो गया ...

    आपकी पसंदीदा गीतों में मुझे भी लता दी और किशोर दा का गया ये गीत रिमझिम गिरे सावन बहोत पसंद है जब भी बारिश हो तो ये गीत मुख पे बरबस ही गुनगुनाने लगता है ....
    आपने जो गीत सुनाने को लगाया है किसी टेक्नीकल कारण वस् नहीं सुन रहा हूँ दुःख हो रहा है...

    और आपकी ये १५ साल पुरानी ग़ज़ल के क्या कहने बहोत ही अनूठी है और ऐसी की नवेली दुल्हन ही पूरी तरह से सजी हुई, जो हर कदम पे संभल के चल रही है के कहीं कोई गलती ना धुंध ले ... कितनी तःजिबियत से कही है आपने बारिश के लिए ये ग़ज़ल , मानो ऐसा की नवेली दुल्हन बारिश में घर के आँगन में अपने से बडो से छुप छुप के भीगना चाहती है....नहीं भीग पा रही तो अपने कमरे में जा रही है और उसके खिदकिओं से हाथ बाहर निकल के बारिश की कुछ बुँदे अपने हथेलिओं में चुन रही है...
    और तब ये शे'र अगर कही जाए तो कितना मजा आएगा...

    भिगोकर हाथ बारिश में मुझे छूती है आ आकर ,
    हवाएं आज पागल सी फिरे है ,आभी जावो तुम...

    कितनी मासूमियत लिए है ये ग़ज़ल जो बारिश के सभी रंगों के समाहित किये हुए है...

    तरही में सभी को पढने के लिए दिल आतुर है .....
    गुरु पूर्णिमा के लिए आज ही मैं मुबारक बाद देता हूँ और अपने गुरु जी का सादर चरण स्पर्श करता हूँ...


    आपका
    अर्श

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  4. वाह वाह वाह सुबीर साहब, कितनी ही बेहतरीन बात यह बरसाती ग़ज़ल कह रही है अहा अहा ! और तारीफ़ पर जो अर्श भाई कह रहे हैं हमारी जानिब से उन बातों की तस्लीमो-तस्दीक समझिएगा । काश, के आप हमारे भी उस्ताद हुआ करते जैसे नीरजजी, अर्शजी और समीरलाल जी के हैं। खै़र चलिए कोई और निस्बत ही सही। बरसात से ज़्यादा ग़ज़ल भिगो गई। बहुत बेहतर बहुत बेहतर।

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  5. प्रणाम कर रहा हूँ.

    कुछ कारणवश रिकार्डिंग सुन नहीं पा रहा हूँ अभी. कल घर पहुँच कर प्रयास करुँगा.

    बरसाती गज़ल पूर्णतः भिगोने में सक्षम रही. कमियों की बात उस्ताद जानें, हम तो मौज में आ गये पढ़कर ही.

    गुरुपूर्णिमा पर आपका हार्दिक अभिनन्दन एवं नमन!!

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  6. भाई आपकी रिकार्डिंग का बक्सा तो खोखला है,इसलिए मधुर संगीत से वंचित रह गये। रचना आपकी सुन्दर लगी। पर सभी सुर जब आपस में मिले है - वाह क्या धुन बनी होगी।

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  7. गुरु देव सादर प्रणाम
    रिकार्डिंग तो सुन नहीं पाये हम पर आपकी gazal poori rimjhim से bhari है maza aa गया पढ़कर. गुरुपूर्णिमा पर आपका अभिनन्दन है. तरही में सभी को पढने की इंतज़ार है ........... agli बार आप bahr bataayen तो किसी भी gazal का एक sher jaroor bataayen ............ हम तो अभी तक maatraaon को seekh नहीं paaye .........

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  8. लीजिये हम तो आये थे पिछले पोस्ट का जवाब ढूंढ़ कर....और यहाँ बोनस में एक और पोस्ट और गुरूदेव की एक नायाब ग़ज़ल मिल गयी।
    अहा! एक लाजवाब रदीफ़ वाली और वो भी पंद्रह साल पुरानी(बाप रे!} ....कौन कमबख्त इसमें गलतियां निकालने की सोचे!!!
    यूं ही हमें अनुग्रहित करते रहिये गुरूवर अपनी गज़ाल से यदा-कदा!
    सूखे नाले में आये पानी का वर्णन रोचक रहा।
    तरही के लिये मन मचल रहा है।
    पिछले पोस्ट वाली बहर पे एक गीत मिला तो सोचा आपको बताऊँ, कहीं आप कह दो कि छात्र लोग सबक पर ध्यान नहीं रखते।
    ओ दूर के मुसाफिर चंदा जरा बता दे, मेरा कसूर क्या है ये फैसला सुना दे
    ठीक है ना गुरूदेव?
    इसी बहर पर अपना एक मतला और एक शेर भी पेश कर देता हूँ:-
    तू दौड़ता है बन कर मेरा लहू नसों में
    तेरे वजूद से ही, हूँ मैं भी फ़लसफ़ों में
    रिश्ता है क्या तेरा मेरी नींद से न जाने
    तू जो गया तो गुजरे हर रात करवटों में

    ....एक-दो उदाहरण और बताईये सर?

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  9. गुरु जी प्रणाम
    पोस्ट कल पढ़ ली थी मगर कई प्रयास के बाद भी एक लम्बी टिप्पडी पोस्ट नहीं कर पाया :?(
    कमेन्ट बॉक्स ही नहीं खुल रहा था पता नहीं क्या कारण था .........

    पोस्ट पढने के तुंरत बाद जो भाव मेरे मन में ठ वो बता पाना तो अब मेरे लिए मुमकिन नहीं है
    बस यही कास सकता हूँ की आपकी ७ तारिख की पोस्ट का बेसब्री से इंतज़ार है
    बरसात का इंतज़ार तो इलाहाबाद भी बहुत बेसब्रीसे कर रहा है
    बरसात की गजल सुन्दर है, पढ़ कर पता चलता है आप जो पन्द्रह साल पहले लिख रहे ठ उस स्तर का तो हम सोच भी नहीं पा रहे

    गाना न कल सुन प् रहे ठ न आज :(

    वीनस केसरी

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  10. गुरूजी, वर्षा गीत को ढूंढिये ना, बड़ा प्यारा है। और आपने जो गीत सुनने के लिये लगाया है, उसमें कोई दिक्कत आ रही है, गीत की जगह सिर्फ़ blank space दीख रहा है। ओहो! बरसाती गज़ल तो कमाल का है बस एक गुज़ारिश और है इसे अपनी आवाज में सुनाते तो और ज्यादा प्रभावी होता। इसकी मादकता थोड़ी और बढ़ जाती। कुल मिलाकर ये कि आज की पोस्ट कई बार पढ़ने लायक है।

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  11. आपकी गज़ल को दा दूँ ये ज़ुर्रत कर नही पा रही। बस ये कह सकती हूँ कि आप को गुरु बनाना हमेशा गर्व देता है।
    तरही की प्रतीक्षा रहेगी कल। और ये जो बहर पर शेर लिखने का विचार है बहुत उम्दा है।

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  12. ग़ज़ल की बारीकियाँ नहीं जानती, मैं तो बस रचना का आन्नद लेने वालों में हूँ. ग़ज़ल बहुत अच्छी लगी.
    बधाई!

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