मंगलवार, 21 जुलाई 2009

रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से : स्‍व. ओम व्‍यास स्‍मृति तरही मुशायरे में अब बारी है अभिनव शुक्‍ला और डॉ. मोहम्‍म्‍द आज़म की । और कल का सूर्य ग्रहण ।

कल पूर्ण सूर्य ग्रहण है, एक अद्भुत खगोलीय घटना । जो कि जीवन में एक ही बार होती है । इस बार का सूर्य ग्रहण हमारे सीहोर के लिये खास है क्‍योंकि इस बार सूर्य ग्रहण की ये पट्टी हमारे जिले के ठीक ऊपर से होकर निकल रही है । इसका मतलब ये है कि हमारा शहर और जिला दोनों ही पूर्ण सूर्य ग्रहण का आनंद उठायेंगें । हां ये अलग बात है कि बादल खलनायक बन सकते हैं । यदि सब कुछ ठीक रहा तो कल आपको पूर्ण सूर्य ग्रहण के चित्र तथा वीडियो दिखाये जायेंगें । हां एक अनुरोध है बहुत मेहनत से इस ग्रहण पर एक शोध पत्र तैयार किया है समय निकाल कर उसे मेरे समाचारों के ब्‍लाग कुछ खबरें कुछ बातें पर जाकर जरूर पढ़ें या फिर विकीपीडिया पर जाकर देखें । और पूर्ण सूर्यग्रहण को कहां देखा जाये उसके लिये यहां जाकर देखें । आप देखेंगें तो मुझे ऐसा लगेगा कि मेरी मेहनत सफल हो गई है । बहुत मेहनत से ये शोध पत्र तैयार किया है मैंने ।

स्‍व. ओम व्‍यास स्‍मृति तरही मुशायरा इस बार का तरही मुशायरा बहुत ही जबरदस्‍त जा रहा है । पहली बार ऐसा हो रहा है कि कोई भी शायर बेबहर नहीं हो रहा है और पूरी तरह से जमे हुए शेर कह रहा है । रविकांत और वीनस ने पिछले अंक में राहुल द्रविड़ और सौरव गांगुली की तरह बेटिंग की थी । रविकांत वैसे भी राहुल द्रविड़ की ही तरह कूल कूल हैं । और वीनस का स्‍वभाव भी गांगुली से मिलता है । सचिन कौन है ये अगले अंक में ज्ञात होगा । इस बार हम हर अंक में एक गीत या ग़ज़ल सुनते हैं जो कि उसी बहर पर होता है । इस बार भी एक ग़ज़ल सुनिये ये ग़ज़ल जनाब सैयद फज़लुल हसन 'हसरत मोहानी' साहब  की है । इसमें वैसे तो मतले के साथ बीस से भी जियादह शेर हैं किन्‍तु फिल्‍म निकाह में इसमें से कुछ चुनिंदा लिये गये थे । यहां फिल्‍म निकाह की ग़ज़ल नही दी जा रही है बल्कि परम आदरणीय श्री गुलाम अली साहब द्वारा गाई गई मूल ग़ज़ल है जो लगभग 11 मिनिट की है सुनें और आनंद लें । मुझे ये लगता है कि निकाह में जो शेर लिये गये थो वो इस ग़ज़ल के सबसे कमजोर शेर थे । विशेषकर इस ग़ज़ल का कंगन घुमाने वाला शेर तो जबरदस्‍त है ।

 

डाउनलोड के लिंक

http://www.archive.org/details/ChupkeChupkeRaatDin 

http://www.divshare.com/flash/playlist?myId=7950577-c3b

तरही मुशायरा

अभिनव शुक्‍ला :- अभिनव पूर्व में ग़ज़ल की कक्षाओं के नियमित विद्यार्थी हुआ करते थे लेकिन कुछ ग़मे दौरां और कुछ ग़मे जानां के कारण अभी व्‍यस्‍त हैं । ये बहुत अच्‍छे कवि हैं । आवाज़ बहुत ही मधुर है कविताएं भी बहुत बढि़या तरीके से गाते हैं । अभिनव कुछ दिनों पूर्व एक सुंदर बेटे अथर्व के पिता बने हैं । अथर्व नाम रखने से ही पता चलता है कि अभिनव परदेस जाकर भी किस प्रकार से देश से जुड़े हैं । फिलहाल सिएटल में कार्यरत हैं । संवदेनाओं से भरपूर कविताएं लिखते हैं । आइये सुनें इनकी ग़ज़ल

 

KaviAbhinav_Philadelhia-eKavyaPath

हम ये कहते हैं मना लेंगे उन्हें हम प्यार से,
और वो करते हमें आदाब भी तलवार से,

नींद आती है बहुत पर सो नहीं पाते हैं हम,
रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से,

ये न पूछो क्या हुआ, कैसे हुआ, किसने किया,
बात छोटी सी थी पर उसने कही विस्तार से,

आम लोगों की समस्या एक हो तो कुछ कहें,
आ ही जाती हैं हजारों चीटियाँ दीवार से,

सिर्फ दीवारों की मज़बूती से घर बचता नहीं,
हो अगर मज़बूत तो मज़बूत हो आधार से.

वाह वाह वाह सारे शेर जबरदस्‍त हैं ।ये न पूछो क्‍या हुआ कैसे हुआ किसने किया वाह मजा ही आ गया इसमें तो गिरह भी बहुत अच्‍छी बांधी है । मतले मे तो एक विशेष प्रकार का आनंद है ये आनंद उर्दू के पारंपरिक शायरों में काफी मिलता है । वाह वाह अथर्व के पप्‍पा  मजा ला दिया आपने तो ।

डॉ. मोहम्‍मद आज़म : मेरे बहुत अच्‍छे मित्र और उतने ही अच्‍छे शायर हैं । अलीगढ़ मुस्‍लिम विवि से आपने यूनानी पद्धति से चिकित्‍सा में डिग्री हासिल की है और अभी सीहोर के शासकीय अस्‍पताल में पदस्‍थ हैं । खुले विचारों के धनी डॉ आजम बहुत डूब कर ग़ज़लें लिखतें है और इनकी ग़ज़लें उर्दू की सभी प्रमुख पत्र पत्रिकाओं में छपती रहती हैं । खूब मुशायरों में शिरकत करते हैं । एक और विशेषता ये है कि ये हिंदी के भी जबरदस्‍त हिमायती हैं । हिंदी में भी ग़ज़लें और कविताएं खूब लिखते हैं । मंच के बेहतरीन संचालक हैं । ये जब भी संचालन के दौरान मुझे ग़ज़ल पढ़ने आमंत्रित करते हैं तो कहते हैं कि अब मैं एक जेनुइन साहित्‍यकार  को बुला रहा हूं । इन दिनों भोपाल में मुशायरों में धूम मचाये हुए हैं । पूर्व में स्‍थानीय चैनल पर समाचार भी पढ़ते रहे हैं । जिन लोगों को वसंत पंचमी का आनलाइन कवि सम्‍मेलन याद हो तो उसमें इन्‍होंने ही मंच संचालन किया था । अब ये हमारे तरही में नियमित आयेंगें । चलिये इनकी ग़ज़ल सुनें

azam ji

मस्‍अले वह भी सुलझ जाते ख़ुलूसो प्‍यार से
जिन को सुलझाने चले हो तेग़ से तलवार से

एक दूजे से हैं दोनों इसलिये बेज़ार से
तुम भी हो तलवार से और हम भी हैं तलवार से

आजकल हम ऊब कर इस मतलबी संसार से
कर रहे हैं गुफ्तगू गूंगे दरो दीवार से

चांद को आग़ोश में लाना पड़ेगा क्‍या हमें
दिल बहलता ही नहीं अब दूर के दीदार से

जानी दुश्‍मन भी जिसे सुनकर हुए हैं शर्मसार
ज़ख्‍़मे दिल ऐसे मिले हैं एक जिगरी यार से

तेरी फ़ुर्क़त ने मिरे चेहरे से छीनी है चमक
सब हैं कहते दिख रहे हो आजकल बीमार से

हां में हां सबकी मिला कर हो गए हैं पस्‍ता क़द
क़द बढ़ाना है हमें अब जुर्रअते इन्‍कार से

मिलने जुलने में भी है सूदोज़यां का ही ख़याल
रिश्‍ते नाते हो गये हैं आजकल व्‍यापार से

जेब में पैसे नहीं और जिंस भी सस्‍ती नहीं
हम भला लाते भी क्‍या 'आज़म' सजे बाज़ार से

(जिंस -अनाज)

वाह वाह वाह कमाल के श्‍ोर निकाले हैं । विशेष कर  हां में हां सबकी मिलाकर हो गये थे पस्‍ता क़द ( बोने), क़द बढ़ाना है हमें अब जुर्रअते इनकार से ( इनकार करने की जुर्रत ) ।  ये शेर बहुत कुछ कह रहा है । चांद को आग़ोश में लाने वाला शेर भी बहुत जबरदस्‍त है । तालियां तालियां तालियां ।

सूचना 1 :-  अगला अंक बहुत खास होने वाला है जिसमे एक जोड़ी आ रही है । जोड़ी है भाई और बहन की जोड़ी । रक्षा बंधन के पूर्व बहन के जन्‍म दिवस के खास मौके पर ये फौजी भाई और अनुवादक बहन की जोड़ी अपनी अपनी ग़ज़लें प्रस्‍तुत करेगें । भाई यदि अपनी बहन को कोई शेर तरही में बढ़ा कर देना चाहता हो तो कल तक दे दें । ये अंक 24 जुलाई को आयेगा । और ये अंक प्‍यारी बहना को समर्पित रहेगा ।

सूचना 2 :-  उसके बाद के अंक में भी एक खास बात है कि उसमें भी एक उस्‍ताद शायर और एक उस्‍ताद शायरा की जुगलबंदी देखने को मिलेगी । तो इन दोनों अंकों की प्रतीक्षा करें ।

रविवार को सीहोर के पास के घने जंगलों में पिकनिक मनाई झरनों में नहाने का आनंद लिया और नदी में तैरने का । जम कर हो हरी बारिश में घने जंगलों में पगडंडी पर मोटर बाइक चलाने का अपना ही आनंद है । सीहोर से 50 किलोमीटर दूर है कालियादेव । ये वो स्‍थान है जहां पर बाज बहादुर ने रूपमती को देखा था । आजकल यहां पर पितृमोक्ष अमावस्‍या को भूतों का मेला लगता है । सुंदर पहाड़ी सीप नदी जब झूम कर पत्‍थरों से गिरती है तो आनंद ही आ जाता है । पहाड़, नदी, जंगल, झरने यदि ईश्‍वर ने नहीं बनाये होते तो होता ही क्‍या जीवन में ।  देखिये कुछ चित्र ।

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12 टिप्‍पणियां:

  1. तरही मुशायरा यकीनन खूब से खूबतर होता जा रहा है...और साथ में गुलाम अली साहेब की ग़ज़ल...वाह ग़ज़ब ढा रही है...दोनों ही शायरों ने जान दाल दी है अपनी अपनी ग़ज़ल में.

    अभिनव जी का ये शेर:
    आम लोगों की समस्या एक हो तो कुछ कहें
    आ ही जाती हैं हजारों चीटियाँ दीवार से
    बहुत खूब है और नया पन लिए हुए हैं.

    आज़म साहेब तो माने हुए ग़ज़लकार हैं इसलिए उनकी ग़ज़ल तो शानदार होनी ही थी. क्या शेर कहें उन्होंने...वाह...एक आध हो तो कोट करूँ पूरी की पूरी ग़ज़ल ही गुनगुनाने लायक है :
    "हाँ में हाँ सबकी मिला कर...." वाला शेर मैं अपने साथ लिए जा रहा हूँ.

    आपने जो नयनाभिराम चित्र प्रस्तुत किये हैं उनको देख कर समझ में आ रहा है की आप खोपोली आने में क्यूँ हिचकिचा रहे हैं...जब गंगा घर में हो तो नल के नीचे कौन नहाने जाता है .

    अगली दो पोस्ट का बेताबी से इन्तेज़ार रहेगा.

    अब आपकी खगोलीय घटना वाली पोस्ट पढने जा रहा हूँ.
    नीरज

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  2. व्यास स्मृति तरही मुशायरे का चौथा अंक भी पिछले तीन अंकों की तरह धमाकेदार रहा...और बोनस में मिली गुरूजी की ये तस्वीरें,,,आहहा...इस रूप की तो कभी कल्पना ही नहीं की...पहले उस बुलेट वाली तस्वीर ने और अब इन मस्त...खास कर पत्तों लिये तस्वीर बड़ी दिलचस्प लगी।
    अभिनव जी के दर्शन हुए अहोभाग्य...मतला खूब लगा..और बात छोटी सी थी वाला मिस्रा जबरदस्त बना है।
    आज़म साब की ग़ज़ल के तो क्या कहने! सारे शेर एक-पर-एक...

    इधर कुछेक वैग्यानिक दलों का जमावड़ा इधर मेरे शहर में भी हो रहा है इस सुर्य-ग्रहण के लिये। अभी आपके शोध को देखने जाता हूँ।

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  3. गुरुदेव प्रणाम
    तरही मुशायरा रोचक और दिलचस्प होता जा रहा है बहुत सारी नयी नयी ग़ज़लें मिल रही हैं और रहस्य भी बढ़ता जा रहा है गुलाम अली साहेब की ग़ज़ल ने तो इस मुशायरे में इन्द्रधनुष के रंग बिखेर दिए हैं.......और दो नो शाएर क्या कमाल अब बोले तो ...........दोनों ही शायरों ने महका दिया है गुलशन..... जान दाल दी है मुशायरे में .........
    अभिनव जी का ये शेर:

    आम लोगों की समस्या एक हो तो कुछ कहें
    आ ही जाती हैं हजारों चीटियाँ दीवार से
    ऐसे लाजवाब प्रसंग डाले हैं की मज़ा आ गया ...........

    आज़म जी तो हैं ही माने हुए ग़ज़लकार ................... तो उनकी ग़ज़ल तो लाजवाब होनी ही है .....क्या शेर कहें हैं उन्होंने...
    "जेब में पैसे नहीं और जींस भी सस्ती नहीं"
    कहर ढा दिया है इस शेर ने.........

    आपके चित्र देख कर आपके आनंद का पता चलता है......... बस अब अगली पोस्ट की प्रतीक्षा है.......... आपकी पोस्ट पर भी जाता हूँ पढने के लिए

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  4. अभी जाकर देखती हूँ आपकी रपट।

    हसरत मोहानी साहब की ये गज़ल इस बार के नया ज्ञानोदय में पूरी निकली है, सोच ही रही थी कभी ब्लॉग पर लगाने को। कंगन वाला शेर मुझे भी बहुत पसंद है।

    अभिनव जी हमेशा से ही बहुत अच्छा लिखते हैं। ऐसा जिसे स्तरीय कहा जा सकता है। सारे शेर उम्दा। आखिरी शेर "सुब्हानअल्लाह"। डॉ० आजम साहब के बारे में आप से जानकर अच्छा लगा। अब इनकी तारीफ में हमारा कुछ कहना "छोटा मुँह, बड़ी बात होगी"

    आप की तसवीरे "चश्म-ए-बद्दूर"

    और फौजी भाई के सिर पर आपने जो तलवार लटका दी है शेर वाली उस पर अपनी माता जी द्वारा सुनाई जाने वाली एक लोककथा याद आ रही है। कथा तो फिर कभी मगर उससे जो लोकोक्ति निकलती है वो है "मार मार बिरहा गवाना" :):) कहाँ फँसा दिया बेचारे वीर जी को गुरु जी। मुझे बहन बनाने की इतनी बड़ी सज़ा ...???? हा हा हा

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  5. गुरु जी को सादर प्रणाम ,
    तरही खूब उंचाईयों पे झूम रही है ... खूब इठला रही है वाह बहोत मजा आरहा है ...अभिनव जी को पहले कहीं और शायद पढ़ चुका हूँ मगर तरही में उनके अंदाज के क्या कहने एक बार फोटो देख कर ऐसा लगा के वो सामने ही खड़े होकर अपनी ग़ज़ल पढ़ रहे हो ... और ये शे'र ,... इसके बारे में क्या कहने...
    ये ना पूछो क्या हुआ कैसे हुआ किस ने किया...
    बात छोटी सी थी पर उसने कही बिस्तार से ....

    क्या खूब शे'र के अंदाज है बहोत ही शायीराना और उस्तादाना शे'र कहे है अभिनव जी ने...बहोत बहोत बधाई इनको ....


    और डा . आजम साहिब को पहली बार पढ़ने का मौका मिल रहा है और ये मुक़द्दस मौका क्या कहने एहसान-ओ-करम है हम पर गुरु देव....
    इनके शे'र के बारे में कुछ भी कहना वाकई ..... इस अदने के बस के बाहर की बात है ...

    इन दोनों उस्ताद शाईर के शे'र से तरही तो फूले नहीं समा रही है ...
    और गुरु बहन कंचन और गौतम भाई के अगले अंक के लिए बेशब्री से इंतज़ार कर रहा हूँ बहन कंचन को मेरे तरफ से अज से ही जन्मदिन की ढेर सारी बधाई और शुभकामनाएं... अलाह मियाँ उन्हें खूब सुख से लाद दे ....

    और प्रभु आपकी इन तस्वीरों के बारे में क्या कहूँ ... ये अलौकिक है अगर कहूँ के आज तक ऐसे मौसम से और मस्ती से जो आपने पिकनिक पे किये है उनसे आजतलक महरूम रहा हूँ ... पिकनिक तो आजतक नहीं गया हा हा हा हा .... लेकिन गुरु देव आपने कुछ तस्वीरें छुपा ली हैं... और सोनू जी तो हीरो के माफिक लग रहे है...

    गुरु जी ग़ज़ल गायकी में मैं उस्ताद गुलाम अली साहिब को आपना गुरु मानता हूँ मैं और ये ग़ज़ल उफ्फ्फ्फ्फ़ इसके बारे में क्या कहूँ पता नहीं कितना प्यार है मुझे इस ग़ज़ल से ...
    मगर इस शे'र पे शायाद बहोत कम लोग गौर करते है... और ये दो शे'र महरूम रह जाता है लोगों के प्यार के पूर्ण प्यार से वंचित है ........वक्त-इ-रुखसत अलविदा का लफ्ज का कहने के लिए ...
    वो तेरे सूखे लबों का थरथराना याद है ......
    गज़ब की बात है इसमें...

    और एक और शे'र...
    आगया गर वस्ल की शब् भी कही जिक्रे फिराक ...
    वो तेरा रो रो के भी मुझको रुलाना याद है....
    उफ्फ्फ्फ़ ये अदा क्या बात है ...

    बहोत बहोत बधाई ...आभार

    अर्श

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  6. आपकी हर पोस्ट् पढ कर मन मे एक ही बात सब से पहले आती है कि काश मुझे भी गज़ल लिखनी आती आजम साहिब और अभिनव जी की गज़लेम लाजवाब हैं और गुलाम अलि साहिब जी की ये गज़ल तो जितनी बार सुन लो मन नहीं भरता तस्वीरों ने इस पोस्ट की सुन्दरता और भी बढा दी है इस मुशायरे के लिये बहुत बहुत बधाई और धन्यवाद्

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  7. गुरुदेव
    अब मुझे पता चला कि आपने मेरी गजल मुशायरे में सबसे पहले क्यों रखी.नए नौसिखिये शायरों को मुशायरे में सबसे पहले अपने कलाम पेश करने का मौका देकर उनकी हौसला अफजाई की जाती है.मुशायरा अपने असली रंग में तो नामी गिरामी शायरों के कलामों से बाद में ही आता है.पर इतना आनंद आरहा है कि क्या कहूं.अब तो फौजी भाई और बहन कंचन के जलवे का इन्तजार है.आपने तो मुशायरे को इस तरह से बुना है कि हम तो लेपटॉप के बीमार हो गए है.सूर्य ग्रहण पर आपकी जानकारी प्रभावी थी.जनाब हसरत मोहानी साहब की गजल सुनते सुनते टिप्पणी लिखना आनंददायक कर्म बनगया है.
    अभिनव जी की गजल बहुत सुन्दर लगी.
    ...वो करते हमें आदाब भी तलवार से.
    वाला शेर बहुत अच्छा लगा.
    डॉ मोहम्मद आजम साहब की गजल सारे मुशायरे में अलग से चमकती नजर आई.बहुत खूबसूरत!एक एक शेर बेहतरीन है.
    मस्अले वह भी सुलझ जाते खुलूसो प्यार से...
    चाँद को आगोश में....
    जानी दुश्मन भी....
    हाँ में हाँ सबकी मिलाकर ..
    मिलने जुलने में भी सूदोजयाँ का ख्याल...
    जेब में पैसे नहीं और जिंस भी सस्ती नहीं..
    क्या शेर है..
    मेरी तरफ से लाखों दाद नजर है..

    और पिकनिक की लाजवाब तस्वीरें...वाह वाह !

    प्रकाश पाखी

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  8. गुरु जी प्रणाम

    सूर्य ग्रहण का आलेख पढने की उत्सुकता कई दिन से थी अभी पढ़ कर आ रहा हूँ
    इस आलेख के लिए आपने बहुत मेहनत की है

    गुलाम अली साहब की गई दो गजले मेरी प्रिय है
    १. राज की बातें लिखी और ख़त खुला रहने दिया
    २. चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है|, हमको अब तक आशकी का वो जमाना याद है||

    अभी भी सुन रहा हूँ :)


    अभिनव जी ने जिस सरलता के साथ आपके दिए मिसरे में गिरह लगाईं है "माशाल्लाह बहुत खूब"
    आपकी गजल का मतला दूसरा शेर और मक्ता बहुत पसंद आया

    आजम साहब के तो क्या कहने
    उस्ताद लोग की गजल किसे कहते है पढ़ कर जान पाया
    देख लीजिये गुरु जी, पिछली पोस्ट में आप कह रहे थे "वीनस की गजल उस्तादाना है"
    मेरी गजल इस गजल के एक ही शेर के सामने नहीं ठहर सकती
    पूरी गजल "आनंद" "आनंद" "आनंद" है


    इस बार का तरही मुशायरा कई मायनों में अनोखा रहा ओम जी को समर्पित मुशायरे में कई बाते नई रही, इस बार सुधा जी, "पाखी" और आजम जी का नवाग्मन भी हर्ष का विषय है
    अभिनव साहब ने तो पिछले मुशायरे ही वापसी कर ली है

    देख कर अच्चा लगता है की जो प्रयास आपने चंद लोगों के साथ शुरू किया था आज उसकी ख्याति बढ़ती जा रही है
    २४ तारिख को गौतम साहब और रचना जी की गजल पढने का बेसब्री से इंतज़ार है
    ये २४ तारिख २३ के पहले क्यों नहीं आती :)

    इस समय तो मै फोटो देख कर एक ही गाना गा सकता हूँ
    हाय हाय ये मजबूरी , ये मौसम औ ये दूरी
    मेरी दो टकिया की दुकानदारी, और लाखों का सावन जाये
    जिस समय लेखक कवि हरियाली का भरपूर लुत्फ़ उठाते हुए साहित्य साधना में लगे होते हैं मै सुबह से रात १२ बजे ताल दूकान में जुटा रहता हूँ और यही हर साल होता है :(

    आपका वीनस केसरी

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  9. वाह!! अभिनव जी और डॉ आजम ने तो कमाल ही कर दिया और मुशायरे में जान डाल दी. मजा आ गया.

    आज शहर के बाहर हूँ तो सुन नहीं पा रहा हूँ यहाँ.

    अब कुछ देर में आपका सूर्य ग्रहण वाला शोध पत्र पढ़ता हूँ.

    बहुत बधाई..अगली बार इस झरने पर हम भी चलेंगे..सुन्दर जगह दिख रही है. तस्वीरें भी बहुत बढ़िया आई हैं.

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  10. गुरूजी,
    मुशायरा ब्रह्मानंद की अनुभुति करा रहा है. बहुत आनंद आया. कंप्युटर का मानिटर जरा बीमार चल रहा है इसलिये टिप्पणियां कर नहीं पा रहा हूं. पोस्ट पहले ही पढ़ ली थी. अभिनव जी और आजम साहब ने तो समां बांध दिया. आपका शोध-पत्र पढ़ा और कायल हो गया आपकी बहुमुखी प्रतिभा का. इतने सलीके से तैयार किया गया आलेख....काफ़ी रोचक रहा.
    नोट: गुरूदेव, भाई-बहन की शानदार प्रस्तुति के साथ यदि कविवर गोपाल सिंह नेपाली की इसी नाम से प्रसिद्ध कविता की पंक्तियां लगा दें तो बड़ा जमेगा...

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  11. अभिनव ग़ज़ल बहुत बढ़िया कही-

    नींद आती है बहुत पर सो नहीं पाते हैं हम
    रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से

    भाई मेरी तो यह हालत थी तुम्हारी भी हो गई.
    लगता है कि उस पार से, देश से कोई बुलाता रहता है. चींटियों वाला शे'र बहुत अच्छा लगा.

    आज़म जी की ग़ज़ल बहुत खूब-
    चाँद वाला शे'र कमाल कर दिया.

    पंकज जी पिकनिक की तस्वीरें देखते ही पता चला कि स्थान बहुत सुंदर है.
    महफिल का मज़ा ले रही हूँ....

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  12. प्रणाम गुरु जी,
    इस बार का तरही मुशयेरा सफलता की सीडियां चदता ही जा रहा है......
    अभिनव जी का शेर "ये ना पूछो......." वाह क्या कहने और शेर भी बेजोड़ हैं,
    आज़म साहेब ने तो कहर बरपा दिया है, हर एक शेर को खूबसूरती से पिरोया है. मतले के क्या कहने, और अन्य शेर तो दहाड़ रहे हैं.

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