शनिवार, 1 अगस्त 2009

रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से, स्‍व. ओम व्‍यास स्‍मृति तरही मुशायरे का समापन आज करते हैं दो उस्‍ताद शायरों श्री नीरज गोस्‍वामी तथा आदरणीय देवी नागरानी जी की ग़ज़लों से ।

इस बार का तरही मुशायरा कई मायनों में बहुत ही अच्‍छा रहा है । कई बहुत ही अच्‍छी ग़ज़लें सुनने को मिली  । इच्‍छा है कि एक आन लाइन काव्‍य पाठ इन सारी ग़ज़लों को लेकर हो । जीटाक पर आडियो कान्‍फ्रेंसिंग की सुविधा नहीं है अन्‍यथा एक अच्‍छा प्रयोग हो सकता है । खैर कोशिश करेंगें कि कुछ कर सकें । इस बार का तरही मुशायरा प्रारंभ हुआ था एक कविता से । हिंदी की शीर्ष कथा कार आदरणीय सुधा ओम ढींगरा जी की एक बहुत ही सुंदर कविता के साथ । कहते हैं ने अच्‍छी शुरुआत का मतलब होता है आधी सफलता । इस बार के मुशायरे को बहुत ही अच्‍छी शुरुआत देकर आदरणीय सुधा दीदी ने आने कवियों के लिये एक बहुत ही अच्‍छा रास्‍ता बना दिया था । मेरे लिये तो व्‍यक्तिगत रूप से ये मुशायरा इसलिये भी महत्‍वपूर्ण रहा कि इसमें मुझे सुधा दीदी जैसी स्‍नेहिल बहन मिलीं । वो भी रक्षा बंधन वाले सावन के महीने में । अब इस मुशायरे का समापन भी उतने ही धमाकेदार तरीके से होना चाहिये जितना कि आगाज हुआ था । सो हम आज इस मुशायरे का समापन कर रहे हैं । दो उस्‍ताद शायरों की ग़ज़लों के साथ । आदरणीय श्री नीरज गोस्‍वामी जी तथा आदरणीय देवी नागरानी जी  का नाम ब्‍लाग जगत तथा साहित्‍य जगत दोनों के लिये ही अपरिचित नहीं है । ये हमारी खुशकिस्‍मती है कि इस बार सुधा दीदी, नीरज जी तथा देवी नागरानी जी जैसी शख्‍सियतों ने तरही के लिये कलम चलाई । मुशायरा तो बस इसी कारण सफल है कि ये तीनों इसमें शामिल हुए ।

बहरे रमल :- इस बार हमने तरही के लिये बहरे रमल मुसमन महजूफ को लिया है । बहरे रमल के बारे में हम ये तो जानते  ही हैं कि ये 2122 फाएलातुन  के स्‍थाई वाली बहर है । इस बहर में कई अच्‍छी मुजाहिफ बहरें हैं । जिनमें से एक तो हम पिछले अंक में देख ही चुके हैं । आज एक और की बात करते हैं । बरहे रमल मुसमन मशकूल । ये भी बहरे रमल की ही एक मुजाहिफ बहर है । जिसमें स्‍थाई रुक्‍न फाएलातुन  के साथ एक और रुक्‍न होता है फाएलातु । मतलब ये है कि मुख्‍य रुक्‍न में केवल एक ही लघु मात्रा की कमी की गई है । फाएलातुन  में से अंत की एक लघु मात्रा हटा कर एक नया रुक्‍न बनाया गया है फाएलातु । अंत का   नहीं है । 2122 यहां पर 2121  हो गया है । ये ही पिछले बार हुआ था वहां भी एक मात्रा हटाई गई थी । वहा पर फाएलातुन  के फा  में सक एक लघु की कमी कर दी गई थी और उसे   कर दिया गया था और रुक्‍न बना था फएलातुन उसका नाम वहां था मखबून। यहां पर ये जो नया रुक्‍न बनाया गया है फाएलातु  इसका नाम है मशकूल । बहरे रमल मुसमन मशकूल  में स्‍थाई रुक्‍न फाएलातुन  तथा फाएलातु  का दोहराव है । 2121-2122-2121-2122 फाएलातु-फाएलातुन-फाएलातु-फाएलातुन । अब ये थोड़ा मुश्किल होता है कि किसी मिसरे को जिसमें दीर्घ को गिरा कर लघु बनाया गया है उसमें कैसे पहचानें कि बहर 2122-2122-2122-2122 है या 2121-2122-2121-2122 । तो उसके लिये हमें पूरी ग़ज़ल को देखना होता है । तब पकड़ में आता है कि कौन सी बहर है । उस्‍ताद लोग इसीलिये किसी ग़ज़ल की बहर बताने के लिये एक से जियादह शेर उस ग़ज़ल के पढ़ते हैं ।

चलिये आज तो हम अपनी ही बहर रमल मुसमन महजूफ  का ये गीत सुनते हैं । गीत मेरे सर्वकालिक पसंदीदा गीतों में हैं । क्‍योंकि उसमें मेरे पसंदीदा सब लोग हैं लता जी हैं, किशोर दा हैं, गुलजार साहब हैं, पंचम दा हैं । इस गीत को मैंने आधार बना कर एक कहानी लिखी थी  दो आंसू तेरे दो आंसू मेरे ।  कहानी के नायक नायिका एक दूसरे से बहुत प्रेम करते हैं और सोचते हैं कि जब उनकी शादी हो जायेगी तो वे बरसात में लांग ड्राइव पर जायेंगें गाड़ी में पूरे समय ये ही गीत बजेगा । शादी नहीं हो पाती और बरसों बाद कहीं से लौट रहे नायक की गाड़ी में नायिका लिफ्ट लेती है । बरसात बाहर हो रही है अंदर यही गीत बज रहा है  । गाड़ी में अंधेरा है  नायक ने अपना चेहरा छुपा रखा है । किन्‍तु जब गीत एक बार बंद होने के बाद फिर से दुबारा बजना प्रारंभ होता है तो........। खैर कहानी बाद में आज गीत  ।

डाउनलोड लिंक http://www.divshare.com/download/8043317-feb

श्री नीरज गोस्‍वामी जी :  नीरज जी इन दिनों मिष्‍टी के पास छुट्टियों का आनंद ले रहे हैं । नीरज जी के बारे में कुछ कहने के लिये मेरे पास शब्‍दों का टोटा पड़ने लगता है । नीरज जी से जब भी बात होती है तो एक अतिरिक्‍त उर्जा मिलती है । वे बहुत ही सकारात्‍मक रूप से सोचते हैं । उस्‍ताद शायर तो वे ही हैं । उनकी ग़ज़लें धमाके की तरह से आती है । नीरज जी की सबसे बड़ी विशेषता है कि वे बहुत ही विनम्र हैं ।  ईश्‍वर ने चाहा तो बहुत जल्‍द ही उनके दर्शन का सौभाग्‍य मिल सकता है । नीरज जी की ग़ज़लों की सबसे बड़ी विशेषता है उनकी ग़जलों में आने वाले आम बोल चाल के शब्‍द । वे आम आदमी के लिये लिखते हैं । नीरज जी के बारे में जानने के लिये यहां और यहां पर जा कर देख सकते हैं।  चलिये उनकी ग़ज़ल का आनंद लीजिये ।

Neeraj1

मुस्कुरा कर डालिए तो इक नज़र बस प्यार से

नर्म पड़ते देखिये दुश्मन सभी खूंखार से

तौल बाजू, कूद जाओ इस चढ़े दरिया में तुम

क्या खड़े हो यार तट पर ताकते लाचार से

वक्त मत जाया कभी करना पलटने में उसे 

गर नहीं मिलता जो चाहा आपको सरकार से

नाम तो लेता नहीं मेरा मगर लगता है ये

रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से

फायदा ही हो हमेशा गर ये ही है सोच तो

दूर रहने में भला है, आपका व्यापार से

फूल तितली रंग खुशबू जल हवा धरती गगन

सब दिया रब ने नहीं पर हम झुके आभार से

जो दिया था आपने, लौटा रहा है ये वही

किसलिए फिर कर रहे इतना गिला संसार से

दूर से भी दूर है वो पास से भी पास है

आप पर हैं आप करते याद किस अधिकार से

जब तलक है पास कीमत का पता चलता नहीं

आप उनसे पूछिए जो दूर हैं परिवार से

ज़िन्दगी में यूँ सभी से ही मिली खुशियाँ मगर

जो बिताये साथ तेरे दिन थे वो त्यौहार से

वाह वाह वाह । मेरे विचार से फूल, तितली, रंग, खुश्‍बू, जल, हवा, धरती, गगन  ये किसी उस्‍ताद के ही बस का मिसरा है । केवल संज्ञा ही संज्ञा । बहुत बढि़या । तिस पर गिरह तो जानलेवा है । नाम तो लेता नहीं मेरा मगर लगता है ये  । उफ किस कदर का कन्‍ट्रास पैदा किया है । मौन हूं इस ग़ज़ल पर ।

आदरणीय देवी नागरानी जी : देवी नागरानी जी ग़ज़ल विधा की एक बहुत ही सशक्‍त हस्‍ताक्षर हैं । आपके दो ग़ज़ल संग्रह चरागे दिल और दिल से दिल तक   आ चुके हैं । आपका सिंधी ग़ज़लों का भी संग्रह आ चुका है । आपकी ग़ज़लें मानवीय संवेदनाओं से भरी होती हैं । आपका एक ग़ज़ल संग्रह चरागे दिल बहुत ही लोकप्रिय हुआ है जिसमें कई रंगों की ग़ज़लें हैं । कई सारे पुरस्‍कार आपको प्राप्‍त हुए हैं । साथ ही वे मुशायरों आद‍ि में भी खूब लोकप्रिय शायरा हैं । आपके बारे में और जानने के लिये यहां पर जाकर ज्ञात कर सकते हैं । ये हमारा सौभाग्‍य है कि इस बार हमारे मुशायरे का आगाज़ एक शीर्ष साहित्यिक हस्‍ती आदरणीया सुधा दीदी के साथ हुआ और समापन भी हो रहा है एक और शीर्ष  हस्‍ती आदरणीय देवी नागरानी जी  की ग़ज़ल के साथ । और क्‍या चाहिये अब हमें ।

Devi_nangrani

बंद कर दें वार करना अब ज़ुबां की धार से

दोस्ती की आओ सीखें हम अदा गुल-ख़ार से

अपनी मर्ज़ी से कहाँ कोई है टूटा आज तक

होता है लाचार आदम बेबसी की मार से

बोझ उठाकर झुक गया है अब वो बूढ़ा पेड़ भी

रखते हैं उम्मीद कितनी बूढ़े़ उस आधार से

नज़रे-आतिश बस्तियों में कोहरा है छा गया

सॉफ कुछ शायद दिखेगा धुंध के उस पार से

मन की भाषा बोलके-सुनके बिताई उम्र यूँ

याद अमल का पाठ कर लें आओ गीता-सार से

क्या है लेना क्या है देना दर्द से किसको भला

कर लिया ग़म से निबह भी दर्द के इसरार से

बेख़बर खुद से सभी हैं, कौन किसकी ले खबर

सुर्ख़ियों की शोखियां झाँकें हैं हर अख़बार से

वाह वाह वाह । आनंद आ गया । अपनी मर्जी से कहां कोई   है  टूटा आज तक  उस्‍तादाना रंग में रंगी हुई है पूरी ग़ज़ल । हर शेर अपनी कहानी आप कह रहा है । मजा आ गया समापन में । जैसा आगाज़ हुआ था वैसा ही अंजाम हुआ है ।

सभी का आभार जिन्‍होंने तरहीं के लिये ग़ज़लें भेजीं और इसको सफल बनाया । अगली आर हम मिसरे परे काम नहीं करेंगें बल्कि बहर पर काम करेंगें । कुछ लोगों का सुझाव है कि इसमें एक दिक्‍कत ये है कि यदि किसी के पास उस बहर पर पूर्व से ही कुछ तैयार होगा तो वो वही भेज देगा । खैर उसका भी हल ये है कि बहर ही खूब ढ़ूंढ कर निकाली जायेगी । आप लोग क्‍या कहते हैं बहर पर काम करें या मिसरे पर । बताइये ।

10 टिप्‍पणियां:

  1. मुशायरे का अंजाम भी इतना ही खूबसूरत है जितना आगाज़ था.................... दोनों गज़लें और दोनों शाएर कमाल, धुरंधर है अपने फन के......... आपको भी बहुत बहुत बधाई सफल आयोजन के लिए.............

    मैं तो अगली बार गुरु जी मिसरे की ही कामना करूँगा क्योंकि बहर अभी भी पूरी तरह समझ नहीं आ पायी क्या करें ...........बाकी जैसी संतों की राय होगी ...... सर माथे

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  2. main ghazal ke vyakaran mein kamjor hoon bas lines achhi lag jaati hain to ghazal achhi lag jati hai...

    aapke saare kalkaar bahut prtibhavaan hai aur kamaal ka likhte hain..

    aapko badhai..

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  3. guru ji pranaam

    aaj maine neeraj ji ke saath sameer ji ko padhne ki aahsaa ki thee devi nagranee ji ka mushyre me aagman hamare liye saubhagy ki aur fkr ki baat hai

    neeraj ji kee lekhnee ke kaaayal to ham pahle se hi hai

    guru ji maine to aapse pahle hi nivedan kiya hai ki mujh nausikhiye ko bhee dhyaan me rakhte huye bahar saral deejiyega


    ek lambee tippadee taaip ki jo dilit ho gai:(
    2 baj raha hai is liye hindi me taaip nahee kar raha, asuvidha ke liye chmaa kariyega

    venus kesari

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  4. प्रणाम गुरु जी,
    "दो आंसू तेरे दो आंसू मेरे" पूरी कहानी सुनने की ख्वाहिश है............
    नीरज जी की आवाज़ में जो जादू है वो ही पागल कर देता है, मुलाक़ात तो कहर ले आएगी.
    नीरज जी का अंदाज़-ए-बयां इतना खूबसूरत है की हर लफ्ज़ ग़ज़ल में अपनी मौजूदगी का एहसास कराता है. मतले के क्या कहने, गिरह बहुत अच्छी बाधी है, और "जब तलक पास है ............." शेर तो मेरे लिए ही लिख दिया है. ग़ज़ल को अंजाम देता शेर "ज़िन्दगी में यु सभी...." के क्या कहने. बहुत ही उम्दा ग़ज़ल है.
    आदरणीय देवी नागरानी जी का तरही मुशायेरे का हिस्सा बनना बहुत ही गर्व की बात है, ग़ज़ल का कोई जवाब नहीं, कुछ कहना सूरज को दिया दिखने के समान है. हर शेर इतना बढ़िया तराशा है, जो केवल एक उस्ताद ही कर सकता है.
    गुरु जी, तरही मुशायेरे के सफल आयोजन के लिए बधाईयाँ, ख़ुद को इसका एक छोटा सा हिस्सा होने पे फक्र होता है.

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  5. जब आपने उस्ताद शायर और शायरा की जोड़ी उतारने की बात कही थी, तभी मैं समझ गई थी कि ये नीरज जी और देवी नागरानी ही हैं।
    नीरज जी के आखिरी दो शेर बहुत अच्छे लगे।
    इस बार बहुत सुंदर गज़ले आईं तरही में और सबने बड़े मन से भाग लिया।
    वैसे तो जो भी सबकी राय हो वो सिर माथे पर, मगर बहर पर काम करना बुरा नही लग रहा मुझे। अगर पहले से लिखा हुआ भी होगा तो क्या। लिखा तो अपना ही होगा..! बाकि सबकी मरजी।

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  6. गुरुदेव,
    बहुत दिनों से सरकारी कार्यो में व्यस्त होने से आपकी दो पोस्ट पढने से वंचित रहा ..आज भी बहुत थोडा समय मिला है..पर आदरणीय नीरज साहब की जादूगरी देख मजबूर हुआ हूँ टिप्पणी लिखने के लिए..भागते भागते...!अब उनकी रचना पर कुछ कहने के लिए तो बहुत छोटा हूँ..पर उनकी शायरी की शैली से कोई भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता ...अभी उनकी ताजा गजल उनके ब्लॉग पर पढ़ी तो बड़े भाई साब को भी पढ़वाई,जो आजकल मेरे यहाँ आये हुए है...बहुत अच्छी लगी..
    और मुशायरे में तो दादा भाई आप छा गए...मुशायरे में हमने शायर बनके शुरुआत में आये थे और मुशायरे के अंत तक विशुद्ध श्रोता बनने में भलाई समझी...नहीं तो शायरी के चक्कर में इन उम्दा गजलों का क्या आनंद ले पाते...
    फूल तितली रंग खुशबू ...
    और
    जो दिया था आपने...

    कितना सुन्दर लिखा है...मजा आगया.
    परम आदरणीय देवी नागरानी जी की गजल पढने को मिले तो सौभाग्य ही कहेंगे..
    नजरे आतिश बस्तियों में कोहरा है छा गया
    साफ़ कुछ शायद दिखेगा धुंध के उस पार से

    मेरे विचार से हासिले मुशायरा का हकदार जान पड़ा

    गुरुदेव इतने जानदार मुशायरे की सम्पन्नता की बधाई स्वीकार फरमावें..
    मेरे विचार से बहर पे काम करना उचित होगा ...कंचनजी से सहमत !

    प्रकाश पाखी

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  7. उस्ताद शायर...और उस्ताद शायरा ने जुबान छीन ली हमारी तो गुरूदेव। हम तो नीरज जी की तरही के लिये कब से आश लगाये बैठे थे और तरही ...आहहाहा...मतले से शुरू हुआ वाह-वाह, एक-एक मिस्रे एक-एक शेर तक जारी रहा, गिरह ने वाह-वाह को अपने उत्कर्ष पर पहुँचा दिया....बस हम और कुछ नहीं कह सकते...ह नत-,मस्तक हुये जाते हैं नीरज जी आपके समक्ष!
    उस्ताद शायरा का जब जिक्र चला था तभी समझ गया था कि वो देवी नागरानी जी होंगी। हमने और कंचन ने आपस में इस बात की चरचा भी की थी...नागरानी जी का बहुत दिनों बाद लौटना मुशायरे में मुशायरे को अनंत ऊँचाइयों पर ले गया है..बओझ उठा कर झुक गया और कर लिया गम से निबह ...वाले शेर जुबान पर चढ़ गये...

    एक नए बहर को जाना गुरूदेव...कुछ कोशिश करता हूँ इस पर...और मेरे ख्याल से बहर की जगह मिस्रा ही ठीक रहेगा सर!

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  8. उस्ताद शायर और उस्ताद शायरा की ग़ज़लें और
    यह प्रस्तुति बहुत ही अच्छी लगी..बहुत बहुत बधाई...नये बहर के बारे में जानकर और भी अच्छा लगा....धन्यवाद.

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