शुक्रवार, 10 जुलाई 2026

शोध, समीक्षा तथा आलोचना की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका शिवना साहित्यिकी का वर्ष : 11, अंक : 42, त्रैमासिक : जुलाई-सितम्बर 2026 अंक

मित्रों, संरक्षक एवं सलाहकार संपादक- सुधा ओम ढींगरा, संपादक- पंकज सुबीर, कार्यकारी संपादक- शहरयार, सह संपादक- शैलेन्द्र शरण, आकाश माथुर के संपादन में शोध, समीक्षा तथा आलोचना की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका शिवना साहित्यिकी का वर्ष : 11, अंक : 42, त्रैमासिक : जुलाई-सितम्बर 2026 अंक अब उपलब्ध है।

इस अंक में शामिल हैं- आवरण कविता- वर्षा राग / उदय प्रकाश, संपादकीय / शहरयार, व्यंग्य चित्र / काजल कुमार।

शोध आलोचना- दाग़-दाग़ उजाला, वंदना वाजपेयी, प्रज्ञा, कुछ चाँद ने कहा कुछ उसने सुना- दीपक गिरकर, उर्मिला शिरीष, बक्से का कोट- राजेश कुमार सिन्हा, डॉ. अमरीश सिन्हा, रेत होते ख़्वाब- डॉ. अशोक वशिष्ठ, मंजुश्री, पर छवि कहाँ समाय- दीपक गिरकर, डॉ. गरिमा संजय दुबे, धूलकोट- वंदना वाजपेयी, मनीष वैद्य।

केंद्र में पुस्तक- सुर- डॉ. मधु संधु, अतुल्य खरे, डॉ. सत्यनारायण, नीलिमा शर्मा, एक पुराना मौसम लौटा- यतीन्द्र मिश्र, शैलेन्द्र शरण, दीपक गिरकर, शहरयार, उम्मीद की तरह लौटना तुम- राजेश सक्सेना, कुंकुंम गुप्ता, चारुमित्रा, अशोक अंजुम, पंकज सुबीर।

पुस्तक समीक्षा- बीज और आकाश- दीपक गिरकर, ममता सिंह, जब से आँख खुली है- मोहन कुमार डहेरिया, लीलाधर मंडलोई, साज़-बाज़, डॉ. कुमारी उर्वशी, प्रियंका ओम, विचार और समय- मधु संधु, सुधा ओम ढींगरा, नयनभोग- सीमा गुप्ता, गोवर्धन गब्बी, जसविन्दर कौर बिन्द्रा, मन के चौहट्टे पर बोनसाई- सुधा आदेश, सुधा जुगरान, टेसू लेके ही टरे- मधु संधु, रेखा राजवंशी, कोई और रास्ता तथा अंतराल- डॉ. स्वाति चौधरी, प्रताप सहगल, शिष्टाचार आयोग की सिफारिशें- लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव, अरविंद मिश्र, गधों का आदमी विमर्श- राहुल देव, गोविंद सेन, पहला मौसम- डॉ. नीलोत्पल रमेश, प्रेम रंजन अनिमेष, दुनिया काठ की- दीपक गिरकर, ज्योति जैन, टनल- डॉ. यशोधरा भटनागर, सुनील चतुर्वेदी, हरि सुमिरन- विनय उपाध्याय, डॉ. विनीता चौबे, संगीता चतुर्वेदी।

शोध आलेख- मुरारी गुप्ता के कथा साहित्य में युगीन संवेदना के स्वर- डॉ. विजेयता चारण, विजयमोहन सिंह की आलोचना दृष्टि- डॉ. पूनम सिंह।

आवरण चित्र- पंकज सुबीर, डिज़ायनिंग- सनी गोस्वामी, सुनील पेरवाल, शिवम गोस्वामी। आपकी प्रतिक्रियाओं का संपादक मंडल को इंतज़ार रहेगा। पत्रिका का प्रिंट संस्करण भी समय पर आपके हाथों में होगा।

ऑन लाइन पढ़ें-

http://www.vibhom.com/shivna/jul_sep_2026.pdf

साफ़्ट कॉपी पीडीऍफ यहाँ से डाउनलोड करें

http://www.vibhom.com/shivnasahityiki.html

फेसबुक पर-

https://www.facebook.com/shivnasahityiki/

ब्लॉग-

http://shivnaprakashan.blogspot.com/

बुधवार, 8 जुलाई 2026

वैश्विक हिन्दी चिंतन की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका विभोम-स्वर का वर्ष : 11, अंक : 42, जुलाई-सितम्बर 2026 अंक

मित्रो, संरक्षक तथा प्रमुख संपादक सुधा ओम ढींगरा एवं संपादक पंकज सुबीर के संपादन में वैश्विक हिन्दी चिंतन की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका विभोम-स्वर का वर्ष : 11, अंक : 42, जुलाई-सितम्बर 2026 अंक अब उपलब्ध है। इस अंक में शामिल हैं- संपादकीय। मित्रनामा। साक्षात्कार- कश्मीर को शब्दों में उकेरना हिन्दी वालों के वश की बात नहीं है, सुप्रसिद्ध शायर, कथाकार, उपन्यासकार कर्नल गौतम राजऋषि से आकाश माथुर की बातचीत। विस्मृति के द्वार- उल्टे पाँव स्मृतियों की यात्रा, गोविन्द सेन। कथा-कहानी- दूर कहीं बहती है, एक नदी विस्मृति की- प्रताप दीक्षित, तमाशा- सैली बलजीत, तीसरा कौन- ममता त्यागी, डेथ सर्टिफिकेट/बर्थ सर्टिफिकेट- ज्योति जैन, जिउंदी रह पुत्त- हर्ष बाला शर्मा, शब्दों के पार- राजनारायण बोहरे, ज्वालामुखी- निवेदिता श्रीवास्तव 'निवी'। लंबी कहानी- जंग-दर-जंग- सूर्यनाथ सिंह। लघुकथा- कमांड- किसलय पंचोली, उपहार- मीरा जैन, यह क्या था- डॉ. दलजीत कौर। भाषांतर- डांसिंग गर्ल, सिंधी कहानी, लेखक- ज़ैब सिंधी, अनुवाद- देवी नागरानी, साक्षात्-देवात्मा- गुजराती कहानी, मूल लेखक- निमिषा मजमुंदार, अनुवाद- राजेन्द्र निगम। व्यंग्य- आठवें आयोग की आठ कलाएँ, दिलीप कुमार, हम उत्सवधर्मी लोग, विजयानन्द विजय। आलेख- महात्मा गाँधी और लेव तालस्तोय- प्रगति टिपणीस। शहरों की रूह- केसर की क्यारियों वाला कश्मीर, निर्मला दोशी। दोहे- भारती शर्मा। ग़ज़लें- विज्ञान व्रत, जय चक्रवर्ती। आख़िरी पन्ना। आवरण चित्र- पंकज सुबीर, डिज़ायनिंग सनी गोस्वामी, शहरयार अमजद ख़ान, सुनील पेरवाल, शिवम गोस्वामी, आपकी प्रतिक्रियाओं का संपादक मंडल को इंतज़ार रहेगा। पत्रिका का प्रिंट संस्क़रण भी समय पर आपके हाथों में होगा।

ऑनलाइन पढ़ें पत्रिका-

https://www.vibhom.com/pdf/july_sep_2026.pdf

वेबसाइट से डाउनलोड करें

http://www.vibhom.com/vibhomswar.html

फेस बुक पर

https://www.facebook.com/Vibhomswar

ब्लॉग पर पढ़ें-

http://shabdsudha.blogspot.com/

http://vibhomswar.blogspot.com/

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026

वैश्विक हिन्दी चिंतन की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका विभोम-स्वर का वर्ष : 11, अंक : 41 अप्रैल-जून 2026 अंक

मित्रो, संरक्षक तथा प्रमुख संपादक सुधा ओम ढींगरा एवं संपादक पंकज सुबीर के संपादन में वैश्विक हिन्दी चिंतन की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका विभोम-स्वर का वर्ष : 11, अंक : 41 अप्रैल-जून 2026 अंक अब उपलब्ध है। इस अंक में शामिल हैं- संपादकीय। मित्रनामा। साक्षात्कार- कविता असाध्य की साधना है, वरिष्ठ साहित्यकार लीलाधर मंडलोई से आकाश माथुर की बातचीत। विस्मृति के द्वार- लोग छुप-छुप कर प्यार करते हैं...- सूर्यबाला। कथा-कहानी- लौट आओ दा...! - प्रमोद त्रिवेदी, अधूरे घर की चौखट- सुधा जुगरान, ईशू, यह दुनिया ऐसी क्यों है?- अरुण अर्णव खरे, मुँह पर कपड़ा- रामा तक्षक, गिरगिट- रेनू मंडल, कभी यूँ भी- अहमद मुख़्तार, बोधिवृक्ष के पक्षी- भरतचन्द्र शर्मा। लघुकथा- बराबरी- रेखा भाटिया, दांपत्य- सरस दरबारी, बहुमूल्य खज़ाना- डॉ. शिखा अग्रवाल, ज़हर- सरस दरबारी, नया सूरज- सुभाष चंद्र लखेड़ा। भाषांतर- पंजाबी कहानी, मूल लेखक- करनैल सिंह शेरगिल, अनुवाद- डॉ. अमरजीत कौंके। व्यंग्य- यदि यदि महाभारते चुनाव भवति- प्रेम जनमेजय, आओ ! ऐसे करें अपनी ब्रांडिंग- फारूक आफरीदी। ललित निबंध- जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानम- डॉ. वंदना मुकेश। संस्मरण- गर्मियों की छुट्टियों में मामा जी का गाँव- गोविंद सेन। डायरी- पापा की चिट्ठी बेटी के नाम- अभिषेक कुमार। रेखाचित्र- यादों की रोशनी में उत्तर प्रदेश- सृष्टि उपाध्याय। आलेख- निष्पक्ष लेखन का हिन्दी में- कुबेर कुमावत। शहरों की रूह- केसर की क्यारियों वाला कश्मीर- निर्मला दोशी। आख़िरी पन्ना। आवरण चित्र- पंकज सुबीर, डिज़ायनिंग सनी गोस्वामी, शहरयार अमजद ख़ान, सुनील पेरवाल, शिवम गोस्वामी, आपकी प्रतिक्रियाओं का संपादक मंडल को इंतज़ार रहेगा। पत्रिका का प्रिंट संस्क़रण भी समय पर आपके हाथों में होगा।

ऑनलाइन पढ़ें पत्रिका-

https://www.vibhom.com/pdf/april_june_2026.pdf

वेबसाइट से डाउनलोड करें

http://www.vibhom.com/vibhomswar.html

फेस बुक पर

https://www.facebook.com/Vibhomswar

ब्लॉग पर पढ़ें-

http://shabdsudha.blogspot.com/

http://vibhomswar.blogspot.com/

सोमवार, 5 जनवरी 2026

शोध, समीक्षा तथा आलोचना की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका शिवना साहित्यिकी का वर्ष : 10, अंक : 40, त्रैमासिक : जनवरी-मार्च 2026 अंक

मित्रों, संरक्षक एवं सलाहकार संपादक- सुधा ओम ढींगरा, संपादक- पंकज सुबीर, कार्यकारी संपादक- शहरयार, सह संपादक- शैलेन्द्र शरण, आकाश माथुर के संपादन में शोध, समीक्षा तथा आलोचना की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका शिवना साहित्यिकी का वर्ष : 10, अंक : 40, त्रैमासिक : जनवरी-मार्च 2026 अंक अब उपलब्ध है। इस अंक में शामिल हैं- नन्हीं बुलबुल के तराने / आलोक धन्वा, संपादकीय / शहरयार, व्यंग्य चित्र / काजल कुमार, वार्षिक लेखाजोखा- समकालीन कथा-साहित्य 2025- एक सिंहावलोकन, दीपक गिरकर। शोध आलोचना- क्या आएँगे कभी ऐसे भी दिन- डॉ. रमाकांत शर्मा, रमेश राजहंस, बलजीत सैली चर्चित कहानियाँ- डॉ. मधु संधु, बलजीत सैली, एक ख़ला है सीने में- (किन्नर विमर्श की कहानियाँ), दीपक गिरकर, सुधा ओम ढींगरा, केंद्र में पुस्तक- ख़ैबर दर्रा- यतीन्द्र मिश्र, डॉ. मधु संधु, अनीता सक्सेना, अमृतलाल मदान, पंकज सुबीर, मन के चौहट्टे पर बोनसाई- संजीव जायसवाल 'संजय', प्रगति गुप्ता, मधु शर्मा कटिहा, सुधा जुगरान, उम्मीद की तरह लौटना तुम- घनश्याम मैथिल 'अमृत', डॉ. नीलोत्पल रमेश, डॉ. जसविन्दर कौर बिन्द्रा पंकज सुबीर। पुस्तक समीक्षा- अनारकली के अश्क- डॉ. जसविंदर कौर बिन्द्रा, अमरीक सिंह दीप, जीवन के चाक पर- डॉ. नीलोत्पल रमेश, नीरज नीर, सफ़ह पर आवाज़- राजेंद्र नागदेव, विनय उपाध्याय, धीरे-धीरे रे मना- सुधा थपलियाल, सरोजिनी नौटियाल, काहू की काठी धरा- हरिराम मीणा, नंद भारद्वाज, पच्चीसवाँ प्रेम पत्र- दीपक गिरकर, आभा श्रीवास्तव, बेतरतीब प्रेम की लिपियाँ- लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव, डॉ. इन्दु गुप्ता, 1947 के बाद भारत, डॉ. जसविन्दर कौर बिन्द्रा, राजमोहन गांधी, ग्रहण काल एवं अन्य कविताएँ- राजेश कुमार सिन्हा, डॉ. रज़िया, लहरों के पूर्वरंग- पूजा अग्निहोत्री, सन्दीप तोमर, राहें मिल गुनगुनाती- डॉ. शैली जग्गी, डॉ. वीणा विज 'उदित', जयप्रकाश परिवर्तन की वैचारिकी- राजेश कुमार सिन्हा, शिव दयाल, तीन किरदार- लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव, राजेश कुमार सिन्हा, सेतु तथा अन्य कहानियाँ- दीपक गिरकर, ज्योति जैन, रूदादे-सफ़र- सरस दरबारी, पंकज सुबीर, कोई मिल गया था- दीपक गिरकर, स्नेह पीयूष, साँझ के घर में किरन- डॉ. गंगा प्रसाद शर्मा 'गुणशेखर', श्याम सुंदर तिवारी। शोध आलेख- सुधा ओम ढींगरा के कथा साहित्य में सामाजिक सरोकार, सांस्कृतिक अस्मिता और जीवन का यथार्थ- दीपक गिरकर। आवरण चित्र- पंकज सुबीर, डिज़ायनिंग- सनी गोस्वामी, सुनील पेरवाल, शिवम गोस्वामी। आपकी प्रतिक्रियाओं का संपादक मंडल को इंतज़ार रहेगा। पत्रिका का प्रिंट संस्करण भी समय पर आपके हाथों में होगा।

ऑन लाइन पढ़ें-

https://www.vibhom.com/shivna/jan_mar_2026.pdf

साफ़्ट कॉपी पीडीऍफ यहाँ से डाउनलोड करें

http://www.vibhom.com/shivnasahityiki.html

फेसबुक पर- https://www.facebook.com/shivnasahityiki/

ब्लॉग- http://shivnaprakashan.blogspot.com/

शनिवार, 3 जनवरी 2026

वैश्विक हिन्दी चिंतन की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका विभोम-स्वर का वर्ष : 10, अंक : 40 जनवरी-मार्च 2026 अंक

मित्रो, संरक्षक तथा प्रमुख संपादक सुधा ओम ढींगरा एवं संपादक पंकज सुबीर के संपादन में वैश्विक हिन्दी चिंतन की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका विभोम-स्वर का वर्ष : 10, अंक : 40 जनवरी-मार्च 2026 अंक अब उपलब्ध है। इस अंक में शामिल हैं- संपादकीय, मित्रनामा, साक्षात्कार- साहित्य अपने समय और समाज की विडम्बनाओं और अन्याय को दिखाता है, उसके प्रति संवेदना जगाता है- कथाकार मनीष वैद्य से आकाश माथुर की बातचीत। कथा-कहानी- सूखी टहनियों से झड़ते फूल, विकेश निझावन, एक टुकड़ा धूप- मंजुश्री, मैट्रन मैम कहती हैं...- सुनीता मिश्रा, यूँ ही- गोविन्द उपाध्याय, कबाड़ घर- डॉ. रंजना जायसवाल, चार यार- डॉ. प्रेमलता यदु, यक्ष प्रश्न- सुधा आदेश, नए समीकरण- चंद्रकला जैन, श्मशान का भोज- कला कौशल, वजह जीने की- शालिनी खन्ना। लघुकथा- किन्नर विमर्श- चारुमित्रा। भाषांतर- फ्लैट नंबर, पंजाबी कहानी, मूल लेखक- सिमरन धालीवाल, अनुवाद- नीलम शर्मा 'अंशु', बड़े तबके परिंदे गा रहे हैं- मलयालम कहानी, मूल कथाकार- जेकब एब्राहम, अनुवाद- डॉ. षीना ईप्पन। व्यंग्य- जब स्वर्ग में पहुँचे राजनेता- धर्मपाल महेंद्र जैन, अब वह 'नूर' नहीं रहा- सतीश उपाध्याय। रेखाचित्र- मेरे दादाजी- सन्दीप तोमर। संस्मरण- बाबा-अम्मा और मैं- दिव्या माथुर। शहरों की रूह- ब्रिस्बेन और गोल्ड कोस्ट- रीता कौशल। ग़ज़ल- प्रदीप कांत, अशोक अंजुम, विज्ञान व्रत। दोहे- डॉ. गोपाल राजगोपाल। आख़िरी पन्ना। रेखाचित्र- अशोक अंजुम, आवरण चित्र- पंकज सुबीर, डिज़ायनिंग सनी गोस्वामी, शहरयार अमजद ख़ान, सुनील पेरवाल, शिवम गोस्वामी, आपकी प्रतिक्रियाओं का संपादक मंडल को इंतज़ार रहेगा। पत्रिका का प्रिंट संस्क़रण भी समय पर आपके हाथों में होगा।

ऑनलाइन पढ़ें पत्रिका-

https://www.vibhom.com/pdf/jan_mar_2026.pdf

वेबसाइट से डाउनलोड करें

http://www.vibhom.com/vibhomswar.html

फेस बुक पर

https://www.facebook.com/Vibhomswar

ब्लॉग पर पढ़ें-

http://shabdsudha.blogspot.com/

http://vibhomswar.blogspot.com/

शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2025

शोध, समीक्षा तथा आलोचना की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका शिवना साहित्यिकी का वर्ष : 10, अंक : 39, अक्टूबर-दिसम्बर 2025 अंक

मित्रों, संरक्षक एवं सलाहकार संपादक- सुधा ओम ढींगरा, संपादक- पंकज सुबीर, कार्यकारी संपादक- शहरयार, सह संपादक- शैलेन्द्र शरण, आकाश माथुर के संपादन में शोध, समीक्षा तथा आलोचना की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका शिवना साहित्यिकी का वर्ष : 10, अंक : 39, अक्टूबर-दिसम्बर 2025 अंक अब उपलब्ध है। इस अंक में शामिल हैं- आवरण कविता- तुम और मैं / अज्ञेय, संपादकीय / शहरयार, व्यंग्य चित्र / काजल कुमार, शोध आलोचना- समय बोलता है- समीक्षक : डॉ. गोपाल शर्मा 'सहर', संपादक : क़मर मेवाड़ी, साहित्य की गुमटी- समीक्षक : आर पी तोमर, लेखक : धर्मपाल महेंद्र जैन, कगार के आख़िरी सिरे पर- समीक्षक : कुसुम लता पांडेय, संपादक : प्रताप दीक्षित, संदिग्ध- समीक्षक : डॉ. दिलबागसिंह विर्क, लेखक : तेजेन्द्र शर्मा, डेढ़ बूँद पानी- समीक्षक : लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव- लेखक : प्रेमा श्रीवास्तव। केंद्र में पुस्तक- ख़ैबर दर्रा- समीक्षक : अशोक प्रियदर्शी, प्रदीप कान्त, जया जादवानी / लेखक : पंकज सुबीर, नींद और जाग- समीक्षक : डॉ. मधु संधु, मनीषा कुलश्रेष्ठ / लेखक : उजला लोहिया, मन के चौहट्टे पर बोनसाई- समीक्षक : दीपक गिरकर, डॉ. मधु संधु, डॉ. सविता मोहन / लेखक : सुधा जुगरान, उम्मीद की तरह लौटना तुम- समीक्षक : प्रकाश कांत, शैलेन्द्र शरण, मनीष वैद्य / लेखक : पंकज सुबीर। पुस्तक समीक्षा- प्रेम गणित और अन्य कहानियाँ- समीक्षक : पूजा अग्निहोत्री, लेखक : सन्दीप तोमर, मेरी मदरबोर्ड- समीक्षक : सरोजिनी नौटियाल, लेखक : अर्चना पैन्यूली, गुलाबी इच्छाएँ- समीक्षक : दीपक गिरकर, लेखक : मनीष वैद्य, अगम बहै दरियाव- समीक्षक : राजेश कुमार सिन्हा, लेखक : शिवमूर्ति, मेरी तलब का सामान, समीक्षक : दीपक गिरकर, लेखक : रश्मि भारद्वाज, नया सवेरा- समीक्षक : प्रताप सहगल, लेखक : अनिल गोयल, कविता का अक्षांश- समीक्षक : दीपक गिरकर, लेखक : साधना अग्रवाल, धूप से गुज़रते हुए- समीक्षक : पूनम मनु, लेखक : राजेश कुमार सिन्हा, अधजले ठुड्डे- समीक्षक : डॉक्टर विजया सती, लेखक : हंसा दीप, घाघ और उनकी कहावतें- समीक्षक : डॉ. राजकुमार, लेखक : डॉ. सत्य प्रिय पाण्डेय, थैंक यू यारा- समीक्षक : शेफालिका श्रीवास्तव, लेखक : अमिता त्रिवेदी, आईना हँसता है- समीक्षक : संजय वर्मा 'दृष्टि', लेखक : डॉ. दीपा मनीष व्यास, बाँसलोई में बहत्तर ऋतु- समीक्षक : राजेंद्र नागदेव, लेखक : सुशील कुमार। शोध आलेख- सुधा ओम ढींगरा के साहित्य में भारतीय जीवन दृष्टि- शालिनी / डॉ. सीमा शर्मा, अमरकांत का कथा-साहित्य : निम्न मध्यमवर्ग की स्त्री संवेदना का एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़- दीपक गिरकर। आवरण चित्र- पंकज सुबीर, डिज़ायनिंग- सनी गोस्वामी, सुनील पेरवाल, शिवम गोस्वामी। आपकी प्रतिक्रियाओं का संपादक मंडल को इंतज़ार रहेगा। पत्रिका का प्रिंट संस्करण भी समय पर आपके हाथों में होगा।

ऑन लाइन पढ़ें-

https://www.slideshare.net/slideshow/shivna-sahityiki-october-december-2025-pdf/283736325

https://www.vibhom.com/shivna/oct_dec_2025.pdf

साफ़्ट कॉपी पीडीऍफ यहाँ से डाउनलोड करें

http://www.vibhom.com/shivnasahityiki.html

फेसबुक पर- https://www.facebook.com/shivnasahityiki/

ब्लॉग- http://shivnaprakashan.blogspot.com/

गुरुवार, 9 अक्टूबर 2025

वैश्विक हिन्दी चिंतन की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका विभोम-स्वर का वर्ष : 10, अंक : 39, अक्टूबर-दिसम्बर 2025 अंक

मित्रो, संरक्षक तथा प्रमुख संपादक सुधा ओम ढींगरा एवं संपादक पंकज सुबीर के संपादन में वैश्विक हिन्दी चिंतन की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका विभोम-स्वर का वर्ष : 10, अंक : 39, अक्टूबर-दिसम्बर 2025 अंक अब उपलब्ध है। इस अंक में शामिल हैं- संपादकीय, मित्रनामा, साक्षात्कार- व्यंग्य अपने स्वभाव में आक्रामक, सायास एवं बौद्धिक आधार ग्रहण किए हुए होता है, वरिष्ठ व्यंग्यकार डॉ. प्रेम जनमेजय (संपादक- व्यंग्य यात्रा) से आकाश माथुर की बातचीत। विस्मृति के द्वार- लिखना मेरे लिए एक यात्रा है, डॉ. शैलजा सक्सेना। कथा-कहानी- जड़खोद- प्रज्ञा, अफ़सोस- डॉ. रमाकांत शर्मा, कुरजाँ के देश में- टीना रावल, मन वीगन- हंसा दीप, कठपुतली के धागे- डॉ. शिखा अग्रवाल, पनडुब्बी- संतोष श्रीवास्तव। लघुकथा- खेल- ज्ञानदेव मुकेश, चश्मे- डॉ. यशोधरा भटनागर। भाषांतर- मुझ पर कहानी लिखो, मराठी कहानी, मूल लेखक- द. बा. मोकाशी, अनुवाद- देवी नागरानी। ललित निबंध- बदलाव, डॉ. कृष्णा कुमारी। व्यंग्य- काव्य संग्रह वाले कवि का लोकार्पण- अशोक गौतम, इन दिनों इतिहास- देवेन्द्र कुमार पाठक। रेखाचित्र- मेरे पिता, प्रताप सहगल। संस्मरण- वह युधिष्ठिर, डॉ. भावना शेखर। शहरों की रूह- लूसर्न कहें या लूज़र्न कहें, रेखा भाटिया। ग़ज़ल- तीन ग़ज़लें, के. पी. अनमोल। दोहे- बहुरंगी दोहे, रघुविन्द्र यादव। गीत- दो गीत, सूर्य प्रकाश मिश्र। आवरण चित्र- पंकज सुबीर, डिज़ायनिंग सनी गोस्वामी, शहरयार अमजद ख़ान, सुनील पेरवाल, शिवम गोस्वामी, आपकी प्रतिक्रियाओं का संपादक मंडल को इंतज़ार रहेगा। पत्रिका का प्रिंट संस्क़रण भी समय पर आपके हाथों में होगा।

ऑनलाइन पढ़ें पत्रिका-

https://www.vibhom.com/pdf/oct_dec_2025.pdf

https://www.slideshare.net/slideshow/vibhom-swar-magazine-october-december-2025-pdf/283716124

वेबसाइट से डाउनलोड करें

http://www.vibhom.com/vibhomswar.html

फेस बुक पर

https://www.facebook.com/Vibhomswar

ब्लॉग पर पढ़ें-

http://shabdsudha.blogspot.com/

http://vibhomswar.blogspot.com/

कविता कोश पर पढ़ें

http://kavitakosh.org/kk/विभोम_स्वर_पत्रिका

गुरुवार, 3 जुलाई 2025

शोध, समीक्षा तथा आलोचना की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका शिवना साहित्यिकी का वर्ष : 10, अंक : 38, जुलाई-सितम्बर 2025 अंक

मित्रों, संरक्षक एवं सलाहकार संपादक- सुधा ओम ढींगरा, संपादक- पंकज सुबीर, कार्यकारी संपादक- शहरयार, सह संपादक- शैलेन्द्र शरण, आकाश माथुर के संपादन में शोध, समीक्षा तथा आलोचना की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका शिवना साहित्यिकी का वर्ष : 10, अंक : 38, जुलाई-सितम्बर 2025 अंक अब उपलब्ध है। इस अंक में शामिल हैं- आवरण कविता- चरवाहे का गीत / केतन यादव, संपादकीय / शहरयार, व्यंग्य चित्र / काजल कुमार। शोध आलोचना- एक तानाशाह की प्रेमकथा- राहुल देव, ज्ञान चतुर्वेदी, प्रताप सहगल - एक शिनाख्त- अनिल गोयल- शशि सहगल, अधूरी जिरह- राजेश कुमार सिन्हा, मंजुला बिष्ट, अम्बर परियाँ- सन्दीप तोमर, बलजिंदर नसराली, (अनुवाद- सुभाष नीरव), सीता एक नारी- अनिमा दास, प्रताप नारायण सिंह, कोशिशों के पुल- लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव- गरिमा सक्सेना। केंद्र में पुस्तक- ख़ैबर दर्रा, मनीषा कुलश्रेष्ठ, सूर्यकांत नागर, डॉ. जसविन्दर कौर बिन्द्रा, पंकज सुबीर। थैंक यू यारा- डॉ. कुंकुम गुप्ता, मधूलिका श्रीवास्तव, अमिता त्रिवेदी। पुस्तक समीक्षा- गुलाबी नदी की मछलियाँ, साधना अग्रवाल, सिनीवाली, तीस की लाइन- दीपक गिरकर, अनुलता राज नायर, ग्यारह कहानियाँ- सूर्यकांत नागर, ज्योति जैन, सूर्यकांत नागर, पत्तियों पर काँपता कोमल गांधार- दीपक गिरकर, पल्लवी त्रिवेदी, आग और पानी- राजेश सक्सेना, व्योमेश शुक्ल, तुम मेरे अज़ीज़ हो- डॉ. आशा सिंह सिकरवार, पंकज त्रिवेदी, अम्मा- ज्योति जैन, दीपक गिरकर, साहित्य की गुमटी- मधुर कुलश्रेष्ठ, धर्मपाल महेंद्र जैन, एक और दुनिया होती- भावना शेखर, शिवदयाल, घुमक्कड़ी- अंग्रेज़ी साहित्य के गलियारों में- उजला लोहिया, मनीषा कुलश्रेष्ठ, मिडिल क्लास मंचूरियन- गरिमा श्रीवास्तव, जयंती रंगनाथन, हथेली पर कर्ण, राकेश भारतीय, नरेंद्र नागदेव, विदेश में हिन्दी पत्रकारिता, विनय उपाध्याय, जवाहर कर्नावट। शोध आलेख- विमर्श दृष्टि- भाग 2, (पंकज सुबीर की कहानियाँ), दीपक गिरकर, शहरयार। आवरण चित्र- पंकज सुबीर, डिज़ायनिंग- सनी गोस्वामी, सुनील पेरवाल, शिवम गोस्वामी। आपकी प्रतिक्रियाओं का संपादक मंडल को इंतज़ार रहेगा। पत्रिका का प्रिंट संस्करण भी समय पर आपके हाथों में होगा।

ऑन लाइन पढ़ें-

https://www.slideshare.net/slideshow/shivna-sahityiki-july-september-2025-pdf/281189291

https://www.vibhom.com/shivna/jul_sep_2025.pdf

साफ़्ट कॉपी पीडीऍफ यहाँ से डाउनलोड करें

http://www.vibhom.com/shivnasahityiki.html

फेसबुक पर- https://www.facebook.com/shivnasahityiki/

ब्लॉग- http://shivnaprakashan.blogspot.com/

बुधवार, 2 जुलाई 2025

वैश्विक हिन्दी चिंतन की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका विभोम-स्वर का वर्ष : 10, अंक : 38, जुलाई-सितम्बर 2025 अंक

मित्रो, संरक्षक तथा प्रमुख संपादक सुधा ओम ढींगरा एवं संपादक पंकज सुबीर के संपादन में वैश्विक हिन्दी चिंतन की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका विभोम-स्वर का वर्ष : 10, अंक : 38, जुलाई-सितम्बर 2025 अंक अब उपलब्ध है। इस अंक में शामिल है- संपादकीय, मित्रनामा, संपादकीय, मित्रनामा, साक्षात्कार- साहित्य, संगीत और कला त्रिवेणी की आवाजाही साहित्य को ख़ूबसूरत बनाती है, कहानीकार-उपन्यासकार ममता सिंह (रेडियो सखी) से आकाश माथुर की बातचीत। विस्मृति के द्वार- याद आने लगे भूले फ़साने..., रेखा राजवंशी। कथा-कहानी- मिलन, नीलिमा शर्मा, खिड़की के पार की तिलिस्मी दुनिया- डॉ. मंजु शर्मा, एक फूल-गुलमोहर- भरत चन्द्र शर्मा, यह तुम ही हो मेरे दोस्त !- रानी सुमिता, चोर पर मोर- डॉ. वीणा विज 'उदित', पनाह- अब्दुल ग़फ़्फ़ार, मैं कहाँ हूँ- डॉ. मधु संधु। लघुकथा- भिखारी कहीं का- इन्दु सिन्हा "इन्दु", विषकंठ, अंतिम इच्छा- पूजा अग्निहोत्री, बालकनी- सन्दीप तोमर, मण्डी- भारती शर्मा। भाषांतर- सिर्फ़ गृहिणी- मराठी कहानी, मूल लेखक- सानिया, अनुवाद - डॉ. महेश दवंगे, भाव-अभाव- गुजराती कहानी- मूल लेखक- प्रज्ञा पटेल, अनुवादक-राजेन्द्र निगम। ललित निबंध- प्रदक्षिणाम पदे पदे- डॉ. गरिमा संजय दुबे। व्यंग्य- सजना है मुझे...सोशल मीडिया के लिए- रेखा शाह आरबी, सवालों पर बवाल!- देवेन्द्र कुमार पाठक, विश्वगुरु हो गए फेल- नूपुर अशोक। संस्मरण- मायाजाल- दिव्या माथुर। शहरों की रूह- यॉर्क - तीन दिन और तीन मित्र- शिखा वार्ष्णेय। आख़िरी पन्ना। रेखाचित्र- अनीता सक्सेना, आवरण चित्र- पंकज सुबीर, डिज़ायनिंग सनी गोस्वामी, शहरयार अमजद ख़ान, सुनील पेरवाल, शिवम गोस्वामी, आपकी प्रतिक्रियाओं का संपादक मंडल को इंतज़ार रहेगा। पत्रिका का प्रिंट संस्क़रण भी समय पर आपके हाथों में होगा।

ऑनलाइन पढ़ें पत्रिका-

https://www.slideshare.net/slideshow/vibhom-swar-july-september-2025-magazine-pdf/281186334

https://www.vibhom.com/pdf/july_sep_2025.pdf

वेबसाइट से डाउनलोड करें

http://www.vibhom.com/vibhomswar.html

फेस बुक पर

https://www.facebook.com/Vibhomswar

ब्लॉग पर पढ़ें-

http://shabdsudha.blogspot.com/

http://vibhomswar.blogspot.com/

कविता कोश पर पढ़ें

http://kavitakosh.org/kk/विभोम_स्वर_पत्रिका

शनिवार, 19 अप्रैल 2025

वैश्विक हिन्दी चिंतन की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका विभोम-स्वर का वर्ष : 10, अंक : 37, अप्रैल-जून 2025 अंक

मित्रो, संरक्षक तथा प्रमुख संपादक सुधा ओम ढींगरा एवं संपादक पंकज सुबीर के संपादन में वैश्विक हिन्दी चिंतन की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका विभोम-स्वर का वर्ष : 10, अंक : 37, अप्रैल-जून 2025 अंक अब उपलब्ध है। इस अंक में शामिल है- संपादकीय, मित्रनामा, साक्षात्कार- साहित्य और टीवी या फ़िल्मों के लिए लेखन में ज़मीन-आसमान का अंतर है, कहानीकार-उपन्यासकार जयंती रंगनाथन से आकाश माथुर की बातचीत। विस्मृति के द्वार- कहीं दूर खड़ी वह- विकेश निझावन। कथा-कहानी- ए चाँद आसमाँ के- डॉ. पूरन सिंह, शालोम ब्रू- अनुजीत इकबाल, लाल छत वाला घर- ममता त्यागी, थोड़ा सा मज़ा- रोचिका अरुण शर्मा, पुनरागमन- पूजा गुप्ता, मुझे माफ़ कर दो अम्माँ- पद्मा मिश्रा। लघुकथा- बैनर- डॉ. दिलबाग सिंह विर्क, सिसकियाँ- सुशील स्वतंत्र, भरपेट खाना- चारुमित्रा। भाषांतर- अब दिल ख़ुश है- पंजाबी कहानी- रवि शेरगिल, हिन्दी अनुवाद- डॉ. अमरजीत कौंके। प्रथम पग- टीचर- विनीता कुमार। ललित निबंध- जल जलहिं समाना...- डॉ. वंदना मुकेश। व्यंग्य- ये जो टेंशन है- प्रेम जनमेजय, दीनानाथ के हाथ- हरीश नवल, न खाऊँगा....- कमलेश पाण्डेय, दादाजी का हनीमून- अर्चना चतुर्वेदी। संस्मरण- कितने पास कितने दूर- गोविंद शर्मा। रेखाचित्र- कमजोर हाथों से भी सीढ़ी थामने वाले- ज्योति जैन। ग़ज़ल- अंजना वर्मा, सत्यशील राम त्रिपाठी। शहरों की रूह- प्रकृति का डिज़्नी वर्ल्ड-यूटाह- रेखा भाटिया। आख़िरी पन्ना। रेखाचित्र- अनीता सक्सेना, आवरण चित्र- पंकज सुबीर, डिज़ायनिंग सनी गोस्वामी, शहरयार अमजद ख़ान, सुनील पेरवाल, शिवम गोस्वामी, आपकी प्रतिक्रियाओं का संपादक मंडल को इंतज़ार रहेगा। पत्रिका का प्रिंट संस्क़रण भी समय पर आपके हाथों में होगा।

ऑनलाइन पढ़ें पत्रिका-

https://www.slideshare.net/slideshow/vibhom-swar-magazine-april-june-2025-pdf/278123120

http://www.vibhom.com/pdf/april_june_2025.pdf

वेबसाइट से डाउनलोड करें

http://www.vibhom.com/vibhomswar.html

फेस बुक पर

https://www.facebook.com/Vibhomswar

ब्लॉग पर पढ़ें-

http://shabdsudha.blogspot.com/

http://vibhomswar.blogspot.com/

कविता कोश पर पढ़ें

http://kavitakosh.org/kk/विभोम_स्वर_पत्रिका

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2025

होली के मिसरे की बहुत ही प्रचलित बहर है और गायी जाने वाली बहर है तो इस पर काम करने में आप लोगों को कोई परेशानी नहीं आयेगी।

ब्लॉगिंग का सुनहरा समय तो अब लगभग बीत चुका है, मगर यादें कब पीछा छोड़ती हैं। कुछ न कुछ ऐसा होता है जिसके कारण बस फिर से यहाँ आने की इच्छा हो जाती है। जैसे कोई त्योहार आ जाता है और याद आ जाता है कि पहले हम किस प्रकार यहाँ पर सारे त्योहार मनाते थे। अब तो ख़ैर वह समय एक सुनहरी याद बन कर मन में बसा हुआ है। अब उतने लोग तो नहीं आते हैं मगर फिर भी जितने आ जाते हैं, उनके साथ ही एक बार फिर से हम उन यादों को ताज़ा कर लेते हैं। होली का त्योहार सामने आ चुका है, इस बार मिसरा देने में कुछ देर हो गयी है, मगर विश्वास है कि पन्द्रह दिनों में आप लोग ग़ज़लें तैयार कर लेंगे।

इस बार मुशायरा एक बहुत ही लोकप्रिय बहर पर होने वाला है- बहरे हज़ज मुसम्मन सालिम, मतलब मुफाईलुन-मुफाईलुन-मुफाईलुन-मुफाईलुन, 1222-1222-1222-1222

होली के मिसरे की बहुत ही प्रचलित बहर है और गायी जाने वाली बहर है तो इस पर काम करने में आप लोगों को कोई परेशानी नहीं आयेगी।

मिसरा कुछ इस प्रकार है-

कहा दिल तोड़ कर उसने बुरा मानो न होली है

कहा दिल तो (मुफाईलुन-1222) ड़ कर उसने (मुफाईलुन-1222) बुरा मानो (मुफाईलुन-1222) न होली है (मुफाईलुन-1222)

अब इसमें जो क़ाफ़िया की ध्वनि है वह है शब्द ‘उसने’ में आ रही ‘ए’ की मात्रा, मतलब बैठे, चलते, देखे, गिरते, के, ले, आए, जाए, आओगे, जाओगे, पहनाए, लगाओगे, दिखाओगे, उतरवाए, उतारेंगे और रदीफ़ है उसके आगे का पूरा ‘बुरा मानो न होली है’ । मतलब आपको क़ाफ़िया रखना है 2 जैसे ‘के’ या 22 जैसे ‘आए, देखे’ या 222 जैसे ‘पहनाए, आओगे’ या 1222 जैसे ‘लगाओगे, उतरवाए’ मतलब कुल मिलाकर यह कि मात्रिक वज़न यही हो मगर अंत में ‘ए’ की मात्रा पर शब्द समाप्त हो रहा हो। और इस प्रकार से हो रहा हो कि उसके आगे जब रदीफ़ आये ‘बुरा मानो न होली है’ तो एकदम ठीक से कनेक्ट भी हो जाए। वाक्य पूरा हो जाए।

चलिए अब इस बहर पर गानों की बात करते हैं-

ख़ुदा भी आस्मां से जब ज़मीं पर देखता होगा

बहारो फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है,

सुहानी चाँदनी रातें, हमें सोने नहीं देतीं

मुझे तेरी मुहब्बत का सहारा मिल गया होता
और यदि आपको मुशायरों की धुन चाहिए तो कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है इसी बहर पर है।

तो मेरे विचार में इतना कुछ काफ़ी है कि आप काम शुरू कर सकें। तो लिख डालिए आपनी ग़ज़ल और भेज दिजिए 12 मार्च तक subeerin@gmail.com पर। इंतज़ार रहेगा। कृपया कमेंट बॉक्स में न भेजें ग़ज़ल को मेल पर ही भेजें।

सोमवार, 27 जनवरी 2025

शोध, समीक्षा तथा आलोचना की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका शिवना साहित्यिकी का वर्ष : 9, अंक : 36, जनवरी-मार्च 2025 अंक

मित्रों, संरक्षक एवं सलाहकार संपादक- सुधा ओम ढींगरा, संपादक- पंकज सुबीर, कार्यकारी संपादक- शहरयार, सह संपादक- शैलेन्द्र शरण, आकाश माथुर के संपादन में शोध, समीक्षा तथा आलोचना की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका शिवना साहित्यिकी का वर्ष : 9, अंक : 36, जनवरी-मार्च 2025 अंक अब उपलब्ध है।

इस अंक में शामिल हैं- आवरण कविता / नव वर्ष / रामदरश मिश्र, संपादकीय / शहरयार, व्यंग्य चित्र / काजल कुमार। शोध आलोचना- संदिग्ध / दीपक गिरकर / तेजेन्द्र शर्मा, क़मर मेवाड़ी की कविताएँ / प्रो. मलय पानेरी / क़मर मेवाड़ी, साज-बाज़ / डॉ. दिलबागसिंह विर्क / प्रियंका ओम, अंजलि भर उजास / रूपसिंह चन्देल / माधव नागदा, हिडिंबा / डॉ. हनी दर्शन / सुमन केशरी। केंद्र में पुस्तक - ज़ोया देसाई कॉटेज / वंदना गुप्ता, दीपक गिरकर, नीरज नीर / पंकज सुबीर। पुस्तक समीक्षा- पिकासो की उदास लड़कियाँ / सुधीर देशपांडे / शैलेन्द्र शरण, अम्मा / सतीश राठी / दीपक गिरकर, चहट चंपा / रमेश शर्मा / उर्मिला आचार्य, लमही जुलाई-दिसम्बर 2024 विशेषांक / डॉ. दया दीक्षित / विजय राय, इक्कीसवीं सदी की कहानियाँ समीक्षा / डॉ. रंजना गुप्ता / सुधा जुगरान, डोर अंजानी सी / डॉ. दिनेश पाठक 'शशि' / ममता त्यागी, रास्ता इधर से भी है / अंतरा करवड़े / अश्विनीकुमार दुबे, ग़ज़लकार अशोक 'अंजुम' / डॉ. विनोद प्रकाश गुप्ता 'शलभ' / अशोक अंजुम, बिखरे हुए लम्हात / के. पी. अनमोल / शिज्जू शकूर, अंजामे-गुलिस्ताँ क्या होगा / दीपक गिरकर / पल्लवी त्रिवेदी, सरई के फूल / अनुराग अन्वेषी / अनीता रश्मि, खाकी में स्थितप्रज्ञ / सरोजिनी नौटियाल / अनिल रतूड़ी, वे लोग / मंजुश्री / सुमति सक्सेना लाल, कहानी का रास्ता / राजेन्द्र नागदेव / संतोष चौबे, राहुल सांकृत्यायन अनात्म बेचैनी का यायावर / प्रियंवदा पाण्डेय / अशोक कुमार पांडेय, मुझे सूरज चाहिए / दीपक गिरकर / आकाश माथुर, जिस लाहौर वेख लेया / दीपक गिरकर / प्रितपाल कौर, विदुर कुटी का संत / डॉ. वेदप्रकाश अमिताभ / योगेन्द्र शर्मा। शोध आलेख / नाटककार रमेश उपाध्याय / प्रो. प्रज्ञा। आवरण चित्र- पंकज सुबीर, डिज़ायनिंग- सनी गोस्वामी, सुनील पेरवाल, शिवम गोस्वामी। आपकी प्रतिक्रियाओं का संपादक मंडल को इंतज़ार रहेगा। पत्रिका का प्रिंट संस्करण भी समय पर आपके हाथों में होगा।

ऑन लाइन पढ़ें-

https://www.slideshare.net/slideshow/shivna-sahityiki-january-march-2025-pdf/275170679

http://www.vibhom.com/shivna/jan_mar_2025.pdf

साफ़्ट कॉपी पीडीऍफ यहाँ से डाउनलोड करें

http://www.vibhom.com/shivnasahityiki.html

फेसबुक पर- https://www.facebook.com/shivnasahityiki/

ब्लॉग- http://shivnaprakashan.blogspot.com/

शुक्रवार, 24 जनवरी 2025

वैश्विक हिन्दी चिंतन की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका विभोम-स्वर का वर्ष : 9, अंक : 36, जनवरी-मार्च 2025 अंक

मित्रो, संरक्षक तथा प्रमुख संपादक सुधा ओम ढींगरा एवं संपादक पंकज सुबीर के संपादन में वैश्विक हिन्दी चिंतन की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका विभोम-स्वर का वर्ष : 9, अंक : 36, जनवरी-मार्च 2025 अंक अब उपलब्ध है। इस अंक में शामिल है- संपादकीय, मित्रनामा, साक्षात्कार- हम साहित्य में गहरे और व्यापक होने की जगह उथले हो रहे हैं, कहानीकार-उपन्यासकार मनीषा कुलश्रेष्ठ से आकाश माथुर की बातचीत। विस्मृति के द्वार- स्मृतियों के झरोखे से, अरुणा सब्बरवाल। कथा-कहानी- दरवाज़े- उर्मिला शिरीष, एक धड़कन चूक गई- लक्ष्मी शर्मा, किसी और मिट्टी की बनी- डॉ. रमाकांत शर्मा, रेड सिग्नल- सुधा आदेश, मैं तुम्हें गाता रहूँगा- रंजना अनुराग, दस्तूर- विवेक द्विवेदी, सूरज की तरह नहीं ढलते पिता... विनीता राहुरीकर, यूँ ही चलते चलते- छाया श्रीवास्तव, प्रायश्चित- राजा सिंह। लघुकथा- सिग्नल- सौरभ सोनी, तुरपाई- रचना श्रीवास्तव, साहस- वीरेंद्र बहादुर सिंह, रानी गोटी- टि्वंकल तोमर सिंह, बुझी हुई मोमबत्ती- डॉ. मृदुल शर्मा। ललित निबंध- अप्प दीपो भव, डॉ. वंदना मुकेश। संस्मरण- स्मृति शेष - ज़ाकिर हुसैन, जब ताल-तलैयों की नगरी में जागा ताल के उस्ताद का तिलिस्म, विनय उपाध्याय। ग़ज़ल- जयप्रकाश श्रीवास्तव, अशोक 'अंजुम'। व्यंग्य- खट्टे-मीठे संपादक जी, धर्मपाल महेंद्र जैन। शहरों की रूह- तुर्की यात्रा, प्रतिभा अधिकारी। आख़िरी पन्ना। रेखाचित्र- अशोक अंजुम, आवरण चित्र- पंकज सुबीर, डिज़ायनिंग सनी गोस्वामी, शहरयार अमजद ख़ान, सुनील पेरवाल, शिवम गोस्वामी, आपकी प्रतिक्रियाओं का संपादक मंडल को इंतज़ार रहेगा। पत्रिका का प्रिंट संस्क़रण भी समय पर आपके हाथों में होगा।

ऑनलाइन पढ़ें पत्रिका-

https://www.slideshare.net/slideshow/vibhom-swar-patrika-januray-march-2025-pdf/275093566

http://www.vibhom.com/pdf/jan_mar_2025.pdf

वेबसाइट से डाउनलोड करें

http://www.vibhom.com/vibhomswar.html

फेस बुक पर

https://www.facebook.com/Vibhomswar

ब्लॉग पर पढ़ें-

http://shabdsudha.blogspot.com/

http://vibhomswar.blogspot.com/

कविता कोश पर पढ़ें

http://kavitakosh.org/kk/विभोम_स्वर_पत्रिका

सोमवार, 11 नवंबर 2024

आइए आज तरही मुशायरे को आगे बढ़ाते हैं मन्सूर अली हाश्मी जी के साथ, जो अपनी दूसरी ग़ज़ल लेकर हमारे बीच उप​स्थित हुए हैं

बस अब दीपावली का पर्व बीत रहा है। कल देव प्रबोधिनी एकादशी है जिसके साथ ही आंशिक रूप से दीपावली का पर्व समाप्त हो जाता है। कहीं-कहीं यह कार्तिक पूर्णिमा तक भी चलता है। इस प्रकार हमारे यहाँ भी दीपावली का पर्व अभी भी चल रहा है।

इन चराग़ों को जलना है अब रात भर

आइए आज तरही मुशायरे को आगे बढ़ाते हैं मन्सूर अली हाश्मी जी के साथ, जो अपनी दूसरी ग़ज़ल लेकर हमारे बीच उप​स्थित हुए हैं।  

मन्सूर अली हाश्मी
 
इन चराग़ों को जलना है अब रात भर
आरज़ूओं को पलना है अब रात भर
तेज़ रफ्तार ख़रगोश सोया हुआ
चाल कछुए को चलना है अब रात भर

दोपहर, सह पहर बल्कि आठों पहर
दिल ए नादां मचलना है अब रात भर
दिन मटर गश्तियों में गुज़ारा तो फिर
बच्चा तुतलाया, 'ढुलना है अब लात भल'

दिन में खेला किये है जो गैजेट्स से
थक के आंखें मसलना है अब रात भर
'ट्रम्प' का कार्ड चल ही गया बिल अख़ीर
सब उथलना-पुथलना है अब रात भर

जब बुढ़ऊ कह दिया है तो देखे गुलांट
बंदरों को उछलना है अब रात भर !
कच्चा-पक्का पढ़ा, कुछ तो लिख भी दिया
'हाश्मी' को उगलना है अब रात भर


इस बार हाश्मी जी सिरदार ग़ज़ल लेकर उपस्थित हुए हैं। पिछली बार बेमतला ग़ज़ल लेकर आये थे। मतले में ही चरागों के माध्यम से आरज़ुओं के पलने का दृश्य बहुत सुंदरता के साथ उपस्थित किया गया है। और अगले ही शेर में ख़रगोश का सोना और कछुए का आगे निकलना प्रतीक के माध्यम से बहुत अच्छे से आया है। इश्क़ में दिल का आठों पहर मचलना ख़ूब है। और बच्चे के तुतलाने को अगले शेर में बहुत अच्छे से पिरोया गया है। यह अपनी तरह का अनूठा प्रयोग है। फिर दिन भर मोबाइल पर आँखें दुखाने के बाद रात का मंज़र भी अगले शेर में सुंदर आया है। ट्रम्प के साथ ग़ज़ल का शेर ग्लोबल होकर सामने आ रहा है। बंदर की गुलाँट को भी अगले शेर में बहुत अच्छे से पिरोया है। मकते में अपने आप को ही कें​द्र में रख कर अपनी ही आलोचना करने का अच्छा प्रयास है। बहुत सुंदर ग़ज़ल, वाह वाह वाह।

तो आज की इस सुंदर ग़ज़ल ने जैसे दीपावली का माहौल ही रच दिया है। आप दिल खोल कर दाद दीजिए और इंतज़ार कीजिए अगले अंक का।

शुक्रवार, 8 नवंबर 2024

आइए आज तरही मुशायरे को आगे बढ़ाते हैं प्रवासी रचनाकार गुणी कवयित्री रेखा भाटिया के साथ, जो अमेरिका से हमारे बीच उप​स्थित हुई हैं

चूँकि अभी देव प्रबोधिनी एकादशी नहीं हुई है, इसलिए हम कह सकते हैं कि दीपवली का पर्व अभी भी जारी है। वैसे तो दीपावली का पर्व पूरे अठारह दिन का होता है, जो धन तेरस से लेकर कार्तिक पूर्णिमा तक चलता है। इस हिसाब तो अभी दीपावली के इस पर्व के और भी कुछ दिन बचे हुए हैं। अभी तो हम कार्तिक पूर्णिमा तक दीपावली का पर्व मना सकते हैं। कार्तिक पूर्णिमा पर दीपदान के बाद पर्व संपन्न होता है।

इन चराग़ों को जलना है अब रात भर

आइए आज तरही मुशायरे को आगे बढ़ाते हैं प्रवासी रचनाकार गुणी कवयित्री रेखा भाटिया के साथ, जो अमेरिका से हमारे बीच उप​स्थित हुई हैं। 

रेखा भाटिया
 
दिन के फूलों को ढलना है अब रात भर
और कलियों को खिलना है अब रात भर
मछलियाँ पेड़ पर, पानियों में विहग
सृष्टि को ही बदलना है अब रात भर

नींद तो उड़ चुकी, ख़्वाब भी गुम हुए
सिर्फ़ डर को ही पलना है अब रात भर
ज़िंदगी के नशे में है घायल ये मन
मोम बन कर पिघलना है अब रात भर

उत्सवों का है मेला फ़कत ज़िंदगी
रौशनी से बहलना है अब रात भर
है चुनावों की बेला, खरा क्या करे
खोटा सिक्का उछलना है अब रात भर

जाग उठे हैं वो जो कब से सोए ही थे
जाग कर उनको चलना है अब रात भर
रौशनी तेरे हिस्से की मुझसे है ली
'इन चराग़ों को जलना है अब रात भर'


मतले में ही दिन भर के खिले हुए फूलों के रात भर मुरझाकर ढलने और नयी कलियों के खिलने के बहाने बहुत अच्छे से ज़िंदगी का दर्शन प्रस्तुत किया गया है। और अगले ही शेर में उलटबाँसी विधा का बहुत अच्छे से प्रयोग कर स्वप्न विज्ञान को दिखाया है। जब आँखों से नींद और ख़्वाब दोनों चले जायें तो सिर्फ़ डर ही शेष रह जाता है। ज़िंदगी का अपना ही एक नशा है जो जब उतरता है तो घायल मन मोम सा पिघलता रहता है। हमारी ज़िंदगी उत्सवों का एक मेला ही तो है, हम सब रौशनी से जिसमें रात भर बहलते रहते हैं, बहुत ही सुंदर। अमेरिका में भी चुनाव का समय है, ऐसे में चुनाव के दौरान खरों का छुप जाना और खोटे का सामने आ जाना, बहुत सुंदर। जब तब इंसान सोया रहता है, तब तक सफ़र उसके हिस्से में नहीं आता, मगर जागते ही उसको सफ़र में उतर जाना पड़ता है, सुंदर दर्शन जीवन का। और अंत में प्रेम के शेर में बहुत ही सुंदर गिरह बाँधी गयी है तरही मिसरे की। वाह वाह वाह, बहुत सुंदर ग़ज़ल।

तो आज की इस सुंदर ग़ज़ल ने जैसे दीपावली का माहौल ही रच दिया है। आप दिल खोल कर दाद दीजिए और इंतज़ार कीजिए अगले अंक का।

सोमवार, 4 नवंबर 2024

आइए आज तरही मुशायरे को आगे बढ़ाते हैं तीन रचनाकारों तिलक राज कपूर, मन्सूर अली हाशमी, और पारुल सिंह के साथ।

दीपावली का पर्व बीत भी गया और उसके साथ ही पाँच दिनों का रौशनी का पर्व समाप्त हो गया। मगर देर से गाड़ी पकड़ने वालों को देर से ही गाड़ी पकड़ कर बासी त्योहार मनाने में आनंद आता है। तो आज भी कुछ रचनकार अपनी रचनाएँ लेकर आ रहे हैं, इन्होंने देर से गाड़ी पकड़ी है, मगर रचनाएँ दुरुस्त हैं। मतलब यह कि कहावत को पूरा किया है कि देर आयद दुरुस्त आयद। वैसे भी हमारे यहाँ तो परंपरा रही है बासी त्योहार मनाने की। तो आइए आज बासी दीपावली के पटाखे चलाते हैं।

इन चराग़ों को जलना है अब रात भर  
आइए आज तरही मुशायरे को आगे बढ़ाते हैं तीन रचनाकारों तिलक राज कपूर, मन्सूर अली हाशमी, और पारुल सिंह के साथ।

तिलक राज कपूर

आदतों को बदलना है अब रात भर
उलझनों से निकलना है अब रात भर।
अवसरों से भरी दोपहर में उठी
चाहतों को कुचलना है अब रात भर।

सूर्य की रौशनी में जमी बर्फ़ ने
धीरे-धीरे पिघलना है अब रात भर।
ख़्वाब की जिंदगी हम बहुत जी लिए
इक हक़ीक़त में ढलना है अब रात भर।

दिल को समझा रहा हूँ कि ए दिल तुझे
पिय मिलन को मचलना है अब रात भर।
शाम तक तो न जाने कहाँ गुम रहे
तेरी राहों पे चलना है अब रात भर।

युग प्रवर्तन की आशा इन्हें सौंप दी
'इन चराग़ों को जलना है अब रात भर।

मतले में ही बहुत अच्छे से आदतों को बदल कर उलझनें समाप्त करने की बात कही गयी है। और उसके बाद दिन के उजाले में जागी हसरतों को रात के अँधेरे में कुचलने का प्रयोग बहुत अच्छा है। एक विरोधाभास के रूप में सूर्य की रौशनी में बर्फ़ का जमना और रात को पिघलना बहुत सुंदर है। और ख़्वाब की दुनिया से वापस हक़ीक़त में आना बहुत​ अच्छे से शेर में आया है। पिय मिलन को मचलने को उतारू दिल को रात की सच्चाई बताने का शेर भी सुंदर बना है। जो शाम तक कहीं दिखाई दिए उनकी राहों पर चलने का प्रयोग अच्छा है। और अंतिम शेर में गिरह के साथ मिसरा ऊला बहुत सुंदर बना है। विशेष कर युग-प्रवर्तन यह शब्द युग्म बहुत सुंदरता के साथ मिसरे में बाँधा गया है। बहुत सुंदर ग़ज़ल वाह वाह वाह।
 
 
मन्सूर अली हाश्मी

शौर कर के पटाख़े तो बुझ भी गये
'इन चराग़ों को जलना है अब रात भर'
कुछ मुरादें न बर आईं दिन ढल गया
कुछ इरादों को टलना है अब रात भर

जूँए* होतीं अमल-पैरा क्यूँ रात में *Lice
करवटें ही बदलना है अब रात भर
शब्द के अर्थ दिन में, न ढूँढे मिले
काफ़िये में तो ढलना है अब रात भर

गर्मी-ए-शम्स, शबनम उड़ा ना सकी
चाँदनी में पिघलना है अब रात भर
बन सके ना दरोग़ा न सैनिक तो फिर
लठ ही लेकर टहलना है अब रात भर

'हाश्मी' दिन में सोये! चलो ठीक है
ग़फ़्लतों से निकलना है अब रात भर

हाश्मी जी की ग़ज़लों में व्यंग्य का पुट हमेशा होता है, इस बार भी है। उनकी व्यंग्य की ही भाषा में कहा जाये तो उन्होंने इस बार सिरकटी (बे-मतला) ग़ज़ल कही है। पहले ही शेर में पटाखों और दीपक की तुलना के साथ सुंदर गिरह बाँधी है। और अगले ही शेर में मुरादों में दिन का बीतना और इरादों को रात आने पर टालना, बहुत अच्छे से व्यक्त हुआ है। रात भर अगर सिर में जूँए काटती रहेंगी तो करवटें बदलने के अलाव और चारा ही क्या है। सूरज की तपिश को शबनम उड़ाने में असमर्थ हो जाये तो चाँद की चाँदनी में पिघलना ही होता है। और यदि आप दरोग़ा या सैनिक नहीं बन सके तो लठ हाथ में लेकर यूँ ही टहलना है। और मकते में दिन में सोने वालों को रात की ग़फ़लतों से होशियार करने की बात अच्छी है। बहुत सुंदर ग़ज़ल, वाह वाह वाह।

पारुल सिंह

रौशनी ले के चलना है अब रात भर
इन चरागों को जलना है अब रात भर
मेहँदी लगने लगी है किसी नाम की
ख़्वाब आँखों में पलना है अब रात भर

चेहरा उनका है और हैं दो आँखें मेरी
सुब्ह को तो टलना है अब रात भर
चाँद आया तो छक कर के पी चाँदनी
बाँहों में ही पिघलना है अब रात भर

बेख़ुदी पूछ बैठी पता आपका
हमको काँटों पे चलना है अब रात भर
जिस पे दुनिया मरे मुझपे मरता है वो
मुझको मुझ से ही जलना है अब रात भर

ज़िन्दगी रात काली, बुझी दोस्ती
हिम्मतों को ही बलना है अब रात भर
चारा-गर कह गया रात भारी है ये
दिल को गिरना सँभालना है अब रात भर

चराग़ रात भर जलते नहीं हैं, वे तो रौशनी का एक कारवाँ लेकर चलते हैं, यह बात मतले में बहुत अच्छे से सामने आयी है। और जब हाथों में किसी के नाम की मेहँदी लग जाये तो आँखों में ख़्वाब ही पलते हैं। अगले ही शेर में किसी का चेहरा और उसे देखते हुए सुब्ह के टलने की बात बहुत सुंदर है। बेखुदी ने किसी का पता पूछ लिया तो रात भर काँटों पर चलना, बहुत सुंदर। अगले शेर में सारी दुनिया के चहेते की चाहत पाकर ख़ुद से ही जलने की बात बहुत ही सुंदरता के साथ कही गयी है। ज़िंदगी और दोस्ती ये दोनों जब साथ छोड़ दें तो हिम्मतों के सहारे रात काटी जाती है, बहुत ही सुंदर। और अंतिम शेर में चिकित्सक के कहने पर कि आज की रात भारी है, दिल को रात भर गिरना और सँभलना ही तो है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल, वाह, वाह वाह।

तो ये आज के तीनों शायरों की दीपावली है। बहुत सुंदर ग़ज़लें तीनों ने कही हैं। आप दिल खोल कर इनको दाद दीजिए और इंतज़ार कीजिए अगले अंक का।

बुधवार, 30 अक्टूबर 2024

आइए आज तरही मुशायरा आगे बढ़ाते हैं सौरभ पाण्डेय जी की एक सुंदर ग़ज़ल के साथ

आज चतुर्दशी है, आज का दिन कहीं कहीं छोटी दीवाली भी कहलाता है। कहीं कहीं इसको रूप चतुर्दशी कहते हैं तो कहीं कहीं इसको वैकुंठ चतुर्दशी कहा जाता है। मुझे याद है कि बचपन में माँ का कड़ा निर्देश होता था कि आज के दिन सुबह जल्दी उठ कर उबटन लगा कर स्नान करना है। इसे रूप में निखार आता है। उन दिनों दीपावली पर ठंड आ चुकी होती थी, तो सुबह से उठ कर नहाना बहुत कष्टदायक होता था। अब तो ख़ैर दीपावली तक भी ठंड का कोई पता नहीं होता और उस पर गीज़र के गरम पानी से नहाना होता है। बचपन में बहुत कुछ वह सब जो हमें मिला वह हमारे बच्चों को नहीं मिला। कितना कुछ खो दिया है इन बच्चों ने। ख़ैर आइए आज छोटी दीवाली मनाते हैं। 

इन चराग़ों को जलना है अब रात भर

आइए आज तरही मुशायरा आगे बढ़ाते हैं सौरभ पाण्डेय जी की एक सुंदर ग़ज़ल के साथ। 


सौरभ पाण्डेय

इस तमस में सँभलना है अब रात भर
दीप के भाव जलना है अब रात भर
हर अँधेरा निपट कालिमा ही नहीं
एक विश्वास पलना है अब रात भ

एकपक्षीय प्रेमिल विचारों भरे
इन चरागों को जलना है अब रात भर
निर्निमेषी नयन का निवेदन लिये
मन से मन तक टहलना है अब रात भर

देह को देह की भी न अनुभूति हो
मोम जैसे पिघलना है अब रात भर
अल्पनाओं सजी गोद में बैठ कर
दीप को मौन बलना है अब रात भर 

कितना सुंदर मतला है तमस में सँभालना और दीप के भावों से जलना यदि इंसान सीख ले तो उसके लिए हर दिन दीपावली हो जाए। और अगले ही शेर में कितनी सुंदरता के साथ कहा गया है कि हर अँधेरा केवल कालिमा ही नहीं होता। एकपक्षीय प्रेमिल विचारों जैसी सुंदर बात के साथ क्या ही सुंदर गिरह बाँधी गयी है। वाह। और अगले ही शेर में एक बार फिर से निर्निमेषी नयन का निवेदन लिए मन से मन तक टहलना वाह वाह क्या सुंदर प्रयोग किया गया है। और अगले ही शेर में मोम जैसे पिघलने की बात और उस पर शर्त कि देह को देह की अनुभूति तक न हो। अंतिम शेर में अल्पनाओं की गोद में दीप का बलना... कितने सारे अर्थ लिए हुए है यह एक शेर। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल, वाह, वाह, वाह।

तो आज की इस सुंदर ग़ज़ल ने जैसे दीपावली का माहौल ही रच दिया है। आप दिल खोल कर दाद दीजिए और इंतज़ार कीजिए अगले अंक का।

परिवार