शनिवार, 30 जनवरी 2010

बहुत हो चुका अब न झांसे में आना 'न जाने नया साल क्या गुल खिलाए' समापन के एक पायदान पहले सुनिये श्रद्धेय दादा भाई महावीर शर्मा जी और देवी नागरानी जी को

तरही का समापन आ ही चुका है । आज की पोस्‍ट के बाद अब केवल एक और पोस्‍ट शायद लगे । क्‍योंकि मैं चाह रहा था कि समापन एक शायर और एक शायरा से हो । वैसे तो आज भी यही काम्बिनेशन है लेकिन अंतिम प्रस्‍तुति में भी यही होगा । ये चारों नाम मैंने आखिरी दो पोस्‍टों के लिये संभाल के रखे थे । आज देवी नागरानी जी हैं और अगली पोस्‍ट में जो शायरा आएंगीं, इन दोनों का एक गुण बहुत मिलता है, वो ये कि इन दोनों में ही ज्ञानार्जन की उत्‍कट ललक है । आज दादा भाई महावीर जी का आशीष भी मिल रहा है । हालांकि उनका स्‍वास्‍थ्‍य ठीक नहीं है किन्‍तु फिर भी उन्‍होंने अपना आशीष तरही के लिये भेजा ये बड़ी बात है । अगले अंक में जो शायर आएंगें वे भी एक स्‍थापित शायर हैं । ये चारों नाम मैंने पहले से ही समापन के लिये छांट कर अलग रख दिये थे । उसको कारण ये था कि मैं चाहता था कि तरही का भव्‍य समापन भी हो ।

सूचना तथा आमंत्रण

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शिवना प्रकाशन के वार्षिक आयोजन की तारीख 26 फरवरी तय की गई है । उस दिन शिवना प्रकाशन की दो नई पुस्‍तकों 'एक खुशबू टहलती रही' ( मोनिका हठीला ) तथा 'विरह के रंग' ( सीमा गुप्‍ता ) का विमोचन होना है । कवि सम्‍मेलन, सम्‍मान समारोह तथा अन्‍य बहुत कुछ करने की योजना है । 26 के बाद लगातार तीन दिन अवकाश है इसलिये आप आराम से आ सकते हैं । सीहोर दिल्‍ली तथा बंबई से सीधे रेल मार्ग पर है । अपने आने का कार्यक्रम तय करके सूचित करें ।

कुछ लोगों को शिकायत है कि ग़ज़ल का सफर ब्‍लाग नियमित नहीं हो पा रहा है । आप सब जानते हैं कि यहां पर सप्‍ताह में तीन पोस्‍ट लगानी पड़ रही हैं । फिर अपनी वेब साइट http://www.subeer.com को फिर से डिजाइन कर रहा हूं क्‍योंकि वो बहुत खराब तरीके से बनी थी। फिर ये कि शिवना प्रकाशन की दोनों पुस्‍तकों पर फाइनल कार्य चल रहा था । 

तो चलिये आज आनंद लेते हैं दादा भाई की बहरे हजज पर लिखी गई एक शानदार ग़ज़ल का और देवी नागरानी जी की ग़ज़ल का ।

दादा भाई श्रद्धेय महावीर शर्मा जी

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प्रिय सुबीर
आजकल मैं भी 'महावीर' पर कवि-सम्मलेन के लिए कवियों से उनकी रचनाएं इकट्ठी करने में व्यस्त रहा. अभी भी रचनाएँ आ रही हैं जिसकी वजह से पोस्ट करने में परेशानी सी आजाती है. इसे कल सुबह पोस्ट करके लगानी है.इसीलिए तरही पर तो कुछ न लिख सका, बस कुछ दिन पहले नए साल पर 'हजज़' में एक ग़ज़ल लिखी थी, वह मैं भेज देता हूँ अगर इससे काम चल सके. आज इस कवि-सम्मलेन की वजह से वक्त और मूड दोनों ही साथ नहीं दे रहे. आप जानते ही हैं कि अब मैं बहुत ही कम लिख पाता हूँ.

बह्र हजज़ पर नए साल की ग़ज़ल:

मिले हैं प्यार के आसार नूतन वर्ष में यारो
मिला दुश्मन भी जैसे यार नूतन वर्ष में यारो

मुहब्बत की नज़र से देखिये सारे ज़माने को
न हो फिर आपसी तक़रार नूतन वर्ष में यारो

मिटा कर नफ़रतें दिल से बनाएं स्वर्ग धरती को
न होंगे हाथ में हथियार नूतन वर्ष में यारो

कोई भूका कहीं भी हाथ फैलाए न सड़कों पर
न इन्सां हो कोई लाचार नूतन वर्ष में यारो

अधूरे रह गए हैं जो पुराने साल में सपने
उन्हीं को हम करें साकार नूतन वर्ष में यारो

ज़माना होगया देखे बिना बिछड़े हुए साथी
कहीं हो जायेगा दीदार नूतन वर्ष में यारो.

कितनी सकारात्‍मक सोच से भरी हुई ग़ज़ल है पूरी । सब के लिये कोई न कोई शुभकामना लिये हुए है पूरी की पूरी ग़ज़ल । मुहब्‍बत की नज़र से देखिये सारे ज़माने को, ये शेर उन सबकों सुनाना चाहिये जिन लोगों ने चंद स्‍वार्थों के चलते इतनी सुंदर दुनिया को नर्क बना दिया है । कहीं हो जाएगा दीदार नूतन वर्ष में यारों कितनी सकारात्‍मक सोच है । ईश्‍वर दादा भाई को दीर्घायु करे स्‍वस्‍थ रखे । उनकी लेखनी यूं ही आशीष बरसाती रहे ।


आदरणीया देवी नागरानी जी

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नया साल
चले जब पुराना नया साल आए
इसे देखकर सब के सब मुस्कराए

बहुत हो चुका अब न झांसे में आना
'न जाने नया साल क्या गुल खिलाए'

कहाँ ये पुरानी, हैं कल की तो बातें
गज़ब "त्ताज" पर कम नहीं इसने ढाए

धमाकों की आवाज़ कानों में गूंजे
ख़ुशी में कोई गर फटाके जलाए

दरारें धमाकों से सीने पे आईं 
कहो मामता उसको कैसे भुलाए

जो ममता की चौखट पे कुरबां हुए कल
कई दीप यादों में फिर झिलमिलाए

'मुबारक' ख़ुशी 'अलविदा' ग़म तुझे हो
कभी फिर न जीवन में तू लौट आए

न करती जहाँ दहशतें रक्सां 'देवी'
उसी सर-ज़मीं को कोई घर ले आए

मुबारक ख़ुशी अलविदा ग़म तुझे हो बीते हुए साल के लिये और आने वाले साल के लिये इससे बेहतर और क्‍या दुआ की जा सकती है । आज के डरे हुए इन्‍सान के लिये धमाकों की आवाज़ कानों में गूंजे जैसे शेर बिल्‍कुल सामयिक हैं । जो ममता की चौखट पे कुरबां हुए कल, शेर पढ़कर कर संदीप उन्‍नीकृष्‍णन की याद आ गई ।

तो आप लीजिये दोनों ग़ज़लों का आनंद और प्रतीक्षा करें अगले धमाकेदार समापन अंक का जिसमें होगी एक शायर और एक शायरा की जुगलबंदी ।  दाद देते रहें मुझे आज्ञा दें ।

गुरुवार, 28 जनवरी 2010

ये कैसे भंवर में फँसी जिंदगानी, न पूछो वजह क्यूँ कदम डगमगाए । समापन की तरफ बढ़ रहे तरही मुशायरे में आज सुनिये अभिनव चतुर्वेदी, प्रकाश अर्श और वीनस केसरी को ।

तरही मुशायरे को लेकर इस बार काफी व्‍यस्‍तता हो गई है और ऐसा लग रहा है कि अगली बार से इसका कुछ फार्मेट तय करना होगा कि किस प्रकार से इतन सारे कवियों को लगाया जाये । लोगों में उत्‍साह है और सब इस मुशायरे को अपना समझ रहे हैं । ये ही बड़ी बात है । वैसे भी ये ब्‍लाग तो आप सबका है, मैं तो केवल आप सब की तरफ से इसका संचालन कर रहा हूं । खैर आगामी अंक तो वैसे भी होली का होगा । उसमें तो वैसे भी रौनक होती है । सो उसके लिये तो विशेष तैयारी करनी ही होगी । हां ये ज़रूर बताना चाहता हूं कि 20 फरवरी को संभावित कार्यक्रम है शिवना प्रकाशन का । श्री राकेश खंडेलवाल जी से तारीख कन्‍फर्म होना बाकी है । कार्यक्रम में आने की तैयारी करके रखिये सब ।

तरही में आज पाठशाला के विद्यार्थियों का दिन है । एक बात मैं कंचन और गौतम से ज़रूर कहना चाहूंगा कि ये प्रकाश की ग़ज़लों में इन दिनों सौंदर्य बोध इतना उच्‍च स्‍तर पर कैसे पहुंचा हुआ है इस बात का ज़रूर पता लगाया जाये । वीनस ने काफिये को अपने हिसाब से परिवर्तित कर दिया है, विद्यार्थियों को इस बात की इजाज़त नहीं होती कि वे कोई पतली गली पकड़ें । अभिनव तो हमेशा की ही तरह सदाबहार शेर के साथ उपस्थित है । तीनों को सुना जाये ।

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वीनस केसरी

अभी भी समय है अगर चेत जाएँ
हवा पेड़ पानी औ धरती बचाएँ

अगर मुफ्त मिलता है तो क्या जरूरी
की चुल्लू पियें और लोटा बहाएँ

न बहला है दिल जब किसी और जिद से
तो फिर से गजल को ही ओढें बिछाएँ

नया साल जीवन को खुशियों से भर दे
ह्रदय से सभी को है शुभकामनाएँ

किसे है खबर कल, क़यामत का दिन हो
चलो आज के दिन हंसें मुस्कुराएँ

सुनहरी हंसी की तरह तेरी यादें
अगर छू के देखू कहीं डर न जाएँ

रुमाली बदन, संगेमरमर निगाहें
किसे याद रक्खें किसे भूल जाएँ

कहीं रूह "वीनस" बगावत न कर दे
चलो जिस्म को फिर से सपने दिखाएँ

हूं अच्‍छे शेर निकाले हैं रुमाली बदन संगमरमर निगाहें, किसे है ख़बर कल क़यामत का दिन हो । अच्‍छे शेर निकाले हैं भाई । बहुत ही उम्‍दा, और इन शेरों के कारण ही काफिया बदलने की ग़लती को क्षमा किया जाता है ।

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प्रकाश अर्श

हवाओं में खुशबू ये घुल के बताए
वो खिड़की से जब भी दुपट्टा उडाए

मचलना बहकना शरम जैसी बातें
ये होती हैं जब मेरी बाँहों में आए

उनीदी सी आँखों से सुब्ह को जब भी
मेरी जान कहके मेरी जां ले जाए

अजब बात होती है मयखाने में भी
जो सब को संभाले वो खुद लडखडाए


वो शोखी नज़र की अदाएं बला की
न पूछो वजह क्यूँ कदम डगमगाए

वो हसरत से जब भी मुझे देखती है
मुझे शर्म आए मुझे शर्म आए

नजाकत जो उसकी अगर देखनी हो
मेरे नाम से कहदो मुझको बुलाए

शरारत वो आँखों से करती है जब भी
मेरी जान जाए मेरी जान जाए

मुझे जब बुला ना सके भीड़ में तो
छमाछम वो पायल बजा कर सुनाए

उम्मीदों में बस साल दर साल गुजरे
न जाने नया साल क्या गुल खिलाए

मैं पहले ही कह चुका हूं कि प्रकाश की इस पूरी ग़ज़ल पर कोई कमेंट नहीं करूंगा । अकबर साहब का शेर है इश्‍क को दिल में जगह दे अकबर, इल्‍म से शायरी नहीं आती ।  तो मुझे लगता है कि प्रकाश ने उस शेर को गांठ बांध कर रख लिया है । मुझे जब बुला ना सके भीड़ में तो और मतला दोनों ही सुंदर बनाए हैं । सुना दीदी कंचन, सुनो भैया गौतम, कहीं हाथ से अपना छोरा न जाए ।

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अभिनव शुक्‍ल

उगे स्वप्न में जब उड़ानों के साए,

परिंदे नें पिंजरे में पर फड़फाड़ाए,

है इस पार लोहा, है उस पार हिम्मत,

न ये जीत पाए, न वो हार पाए,

ये कैसे भंवर में फँसी जिंदगानी,

रहा भी न जाए, बहा भी न जाए,

मोहब्बत मोहब्बत मोहब्बत मोहब्बत,

मुझे और कोई न ऐसे बुलाये,

चलो अपनी क्यारी को तैयार कर लें,

न जाने नया साल क्या गुल खिलाये, 

मतला ही ऐसा है कि उसको कई बारे पढ़ते रहो । कई बार । न ये जीत पाये न वो हार पाये बहुत ही सुंदर प्रयोग किया है शेर में । और गिरह तो जबरदस्‍त बांधी गई चलो अपनी क्‍यारी को तैयार करलें । अभिनव के शेरों में एक बात होती है जो मुझे गौतम के शेरों में भी कभी कभी मिलती है, और वो ये कि बात को अलग तरीके से कहना ।

कई लोगों का कहना है कि हर बार के तरही को लेकर एक छोटी सी पुस्‍तक भी प्रकाशित की जाये जैसी कि देश की कुछ तरही चलाने वाली संस्‍थाएं करती हैं । किन्‍तु पुस्‍तक के प्रकाशन को लेकर समस्‍या आप सब जानते हैं । फिर भी देखते हैं यदि भविष्‍य में संभव हो सका तो । चलिये आज तो इन का आनंद लें । दाद देते रहें । 

मंगलवार, 26 जनवरी 2010

कोई जा के रूठे हुए को मनाए, उमीदों के दीपक सहर ने जलाए । तरही मुशायरे के सप्‍ताह के प्रथम खंड में आज सुनिये अर्चना तिवारी जी और सुलभ सतरंगी को ।

गणतंत्र दिवस की सभी को शुभकामनाएं और बरसों पहले किसी कार्यक्रम के लिये लिखी हुई ये कविता आज भारत के संविधान को समर्पित

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आज़ाद जहां तन है और मन स्‍वतंत्र है

ये जन का है ये मन का है ये गण का तंत्र है

जनता का है जनता के ही द्वारा रचा गया

जनता के लिये संविधान ये लिखा गया

सबसे बड़े गणतंत्र का है संविधान ये

मानों स्‍वयं विधाता के हाथों दिया गया

ये कोटि-कोटि जनता के प्राणों का मंत्र है

आज़ाद जहां तन है और मन स्‍वतंत्र है

ये जन का है ये मन का है ये गण का तंत्र है

सोने के अक्षरों से लिखा संविधान है

जिससे जुड़ी हुई हमारी आन बान है

हम क्‍यों न करें गर्व फिर ऐसी किताब पर

जिसमें लिखा है देश ये सबसे महान है

अनेकता में एकता रखने का मंत्र है

आज़ाद जहां तन है और मन स्‍वतंत्र है

ये जन का है ये मन का है ये गण का तंत्र है

तरही मुशायरा अब धीरे धीरे अपने समापन की ओर आ रहा है । कोशिश तो यही है कि जनवरी में ही इसका समापन हो जाये लेकिन अंकगणित ये कह रहा है कि शायद ऐसा नहीं हो पायेगा । चलिये कोई बात नहीं और दो पोस्‍ट फरवरी में सही । अभी भी कुछ नाम शेष हैं । और बहुत महत्‍वपूण नाम शेष हैं । वैसे इस बार का तरही मुशायरा बहुत ही शानदार रहा है । काफी अच्‍छी और शानदार ग़ज़लें सुनने को मिली हैं । और जो बची हैं वे भी जानदार और शानदार हैं । कुछ बिग बी टाइप के नाम तो मैंने धमाकेदार समापन के लिये भी बचा रखे हैं ताकि जितना अच्‍छी शुरूआत हुई थी उतना ही अच्‍छा समापन भी हो । हां ये सच है कि मुशायरे की व्‍यस्‍तता के चक्‍कर में ग़ज़ल के सफ़र की 15 तरीख को लगने वाली पोस्‍ट नहीं लग पाई है । आशा है 30 तारीख की पोस्‍ट मिस नहीं होगी ।

आज तरही में दो रचनाकार हैं । अर्चना तिवारी जी और सुलभ सतरंगी । अर्चना जी का चित्र नहीं मिल पाया तो उनकी प्रोफाइल में जो पेंटिंग लगी मिली उसे ही उनके प्रतिनिधि के रूप में लगा रहा हूं ।

 

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अर्चना तिवारी

मैं एक शिक्षिका हूँ,मैंने इतिहास एवं समाजशास्त्र से एम.ए.करने के उपरांत बी.एड. किया और लखनऊ के विद्यालय में अध्यापन कार्य कर रही हूँ| शिक्षा पर सभी का अधिकार है इसलिए मैं उन बच्चों को पढ़ाती हूँ जो निर्धन हैं शुल्क नहीं दे सकते... पेड़-पौधों से मेरा विशेष लगाव है,जब उनको नष्ट होते देखती हूँ तो बहुत दुःख होता है और क्रोध भी आता है, इसके लिए मैं अगर कुछ कर सकी तो अपने को धन्य समझूंगी...बचपन से मैंने सुना है, देखा है की कलम में बड़ी शक्ति होती है, वह धाराओं का रुख मोड़ सकती है...तो मैं भी कलम के साधन से शब्दों के रास्ते आशाओं की मंजिल पाने की कोशिश कर रही हूँ

गए साल ने क्‍या क्‍या मंज़र दिखाए
न जाने नया साल क्या गुल खिलाए

है अपनों ने भी बेरुखी इस कदर की
के जैसे हवा तीर खंजर चुभाए

बुझे दीप ना जाने कितने घरों के
हैं आतंकियों ने वो तूफां उठाए

फिज़ाएं गमकती थीं ख़ुश्‍बू से जिनकी
हजारों सितम उन ही कलियों पे ढाए

खजाने भरे रहनुमाओं के लेकिन
रिआया के घर में हैं फाकों के साए

चलें आंधियां अब न जुल्‍मो सितम की
नया साल दुनिया में सुख चैन लाए

वो सूरज नया देखो मशरिक़ से निकला
उमीदों के दीपक सहर ने जलाए

अच्‍छे शेर बनाये हैं । कुछ शेर तो बहुत ही अच्‍छे बन पड़े हैं । हालंकि अभी बहुत मेहनत और लगन की ज़ुरूरत है फिर भी यदि भाव अच्‍छे आ रहे हों तो व्‍याकरण तो आ ही जाती है । सूरज और रहनुमाओं के प्रयोग अच्‍छे हैं ।

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सुलभ 'सतरंगी'

पेशे से सूचना प्रोधोगिकी विशेषज्ञ निजी क्षेत्र दिल्ली में कार्यरत हैं.  उभरते ग़ज़लकार हैं, ग़ज़ल की बारीकियां सीख रहे हैं. कवितायें, क्षणिकाएं और  हास्य व्यंग्य लेखक के रूप में ज्यादा सराहे गए. सक्रिय ब्लोगर हैं. हिंदी ऊर्दू साहित्य विकास के प्रति समर्पण का भाव है. शैक्षणिक एवं सामजिक गतिविधियों में हाथ बंटाना अच्छा लगता है.

ये दिल जब भी टूटे न आवाज़ आए
यूं ही दिल ये रस्‍मे मुहब्‍बत निभाए

वो भी साथ बैठे हंसे और हंसाए 
कोई जा के रूठे हुए को मनाए

मेरी दास्‍ताने वफा बस यही है
युगों से खड़ा हूं मैं पलकें बिछाए
 

न पूछो कभी ज़ात उसकी जो तुमको
कहीं तपते सेहरा में पानी पिलाए

खलल नींद में कब है बहरों की पड़ता
कोई चीख के शोर कितना मचाए

मेरे सपनों की राह में मुश्किलें हैं
न जाने नया साल क्या गुल खिलाए

अच्‍छे शेर बने हैं । अलग तरीके से बात को कहने का प्रयास किया है । भावों के अनगढ़ शिल्‍प को अब एक कुशल छैनी और दक्ष हथौड़ी की आवश्‍यकता है । ताकि हर शिल्‍प सुंदर और साकार नज़र आये । पहली दस्‍तक अच्‍छी है ।

स्‍वागत करें इनका और प्रतीक्षा करें अगले अंक की जिसमें होंगें पाठशाला के खिलाड़ी अपने कौशल का प्रदर्शन करने के लिये । अभी भी पाठशाला के कुछ खिलाड़ी बाकी हैं । तो इंतजार करें अगले अंक का तथा आज के शायरों को दाद देते रहें ।

शनिवार, 23 जनवरी 2010

'थ्री जीनियस' श्री नीरज गोस्‍वामी जी, श्री समीर लाल जी और श्री योगेन्‍द्र मौदगिल जी। नये साल के तरही मुशायरे के विशेष आमंत्रण खंड में आज सुनिये तीन विशेष आमंत्रित शायरों को ।

नये साल का तरही मुशायरा इस मायने में सफल तो कहा ही जा सकता है कि कई सारे आमंत्रितों ने अपनी क़लम की चुप्‍पी को तोड़ कर ग़ज़लें भेजीं हैं । और उसी कारण ये हुआ है कि इस बार बहुत ही आनंद रस की वर्षा हो रही है । वसंत पंचमी के शिवना प्रकाशन के आयोजन की रपट आप लोग यहां शिवना प्रकाशन के ब्‍लाग पर पढ़ ही चुके होंगें । आजकल मैं पुराने लिखे गीतों को फिर फिर पढ़ कर आनंद उठा रहा हूं । पिछले मुशायरे में दर्द बेचता हूं पढ़ा था और इस बार यायावर हैं, आवारा हैं, बंजारे हैं  को पढ़ा । इसको भी लोगों ने पसंद किया । वसंत पंचमी की पूजा की सबसे बड़ी बात ये रही कि लगभग ढाई साल बाद शिवना के संस्‍थापक तथा मेरे श्रद्धेय श्री नारायण कासट जी किसी कार्यक्रम में आये । वे ढाई साल से रीढ़ की समस्‍या के कारण बिस्‍तर पर ही थे । उनका आना सुखद लगा । बालकवि बैरागी जी तथा कैफ भोपाली साहब के मित्र श्री कासट बहुत अच्‍छे गीतकार हैं । देखिये उनको यहां ।

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चलिये अब प्रारंभ करते हैं आज का मुशायरा । आज तो वैसे भी धमाकेदार काम्बिनेशन है। तीनों ही जबरदस्‍त शायर हैं । और शायर के साथ साथ अच्‍छे इंसान भी हैं । नीरज गोस्‍वामी जी, समीर लाल जी और योगेन्‍द्र मौदगिल जी । मेरा मतलब ये है कि आज सुबीर संवाद सेवा पर थ्री जीनियस  रिलीज हो रही है और मेरा मानना है कि ये मूवी आमीर की मूवी से भी बड़ी हिट होने जा रही है । क्‍योंकि कलाकार ही ऐसे एकत्र किये गये हैं तीनों ।

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श्री समीर लाल ’समीर’

ये सूरज जो निकला है चेहरा छुपाये
न जाने नया साल क्या गुल खिलाये
बड़ी मुद्दतों बाद सुख ये मिला है
न कोई मेरी माँ को हँसता रुलाये
दिये ज़ख्म काँटों ने मुझको हमेशा
कोई तो मुहब्बत की चादर बिछाए
अंधेरो भरी राह मेरी है अब तक
ज़रा आज कोई चिरागां दिखाए
न जाने कहाँ मीत मेरा छुपा है
कोई तो उसे मुझसे आकर मिलाये.

दिये जख्‍़म कांटों ने मुझको हमेशा कोई तो मुहब्‍बत की चादर बिछाये, वाह अच्‍छा लिखा है समीर जी । बहुत अच्‍छे आपकी ये तिकड़ी तो वैसे भी आज कयामत ही ढाने वाली है ।

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श्री  योगेन्द्र मौदगिल

न जाने नया साल क्या गुल खिलाये
मुसल्सल हंसाये मुसल्सल रुलाये

ये कैसा नज़ारा है महफ़िल में तेरी
कोई रो रहा है कोई खिलखिलाये

मुकद्दर या रेखाएं सब कुछ है झूठा
बशर झूम लेता है बैठे-बिठाये

उन्हीं को अंधेरों ने उलझाया होगा
हमें तो अंधेरे बहुत रास आये

जो मिलना है धोखा तो मिल के रहेगा
गो आती मुसीबत है बैठे-बिठाये

के हम भी तो तेरे बुलाये हुये हैं
के दो घूंट साक़ी हमें भी पिलाये

जवानी-दिवानी जवानी-दिवानी
जवानी वो कैसी जो गुल ना खिलाये

ना नदियों ने समझा ना सागर ने जाना
ये कैसा मिलन जो समझ में ना आये

न नदियो ने समझा न सागर ने जाना ये कैसा मिलन जो समझ में न आये । योगेन्‍द्र जी बड़ी बात कह गये हैं आप । नदी न समझे ये तो कबीर भी कह गये हैं किन्‍तु सागर के न समझने वाली बात तो सचमुच नयी है । आनंद आ गया ।

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श्री नीरज गोस्‍वामी

सितम यूँ ज़माने के हमने भुलाये

भरी सांस गहरी बहुत खिलखिलाये

कसीदे पढ़े जब तलक खुश रहे वो

खरी बात की तो बहुत तिलमिलाये

न समझे किसी को मुकाबिल जो अपने

वही देख शीशा बड़े सकपकाये

भलाई किये जा इबादत समझ कर 

भले पीठ कोई नहीं थपथपाये

खिली चाँदनी या बरसती घटा में

तुझे सोच कर ये बदन थरथराये

बनेगा सफल देश का वो ही नेता

सुनें गालियाँ पर सदा मुसकुराये

बहाने बहाने बहाने बहाने

न आना था फिर भी हजारों बनाये

गया साल 'नीरज' तो था हादसों का

न जाने नया साल क्या गुल खिलाये

बहाने बहाने बहाने बहाने न आना था फिर भी हजारों बनाए । नीरज जी की ग़ज़लों में वैसे भी एक अदा होती है । उसे हम मासूमियत की अदा कहते हैं । वाह सारे शेर जबरदस्‍त बन पड़े हैं ।

चलिये आज तो बड़ी मूवी रिलीज़ हुई है इसका आनंद लें और दाद दें । अगला अंत तीन आगंतुकों का होगा जो तरही में पहली बार आए हैं उनका । अभी भी काफी नाम शेष हैं सो अब हर अंक में तीन शायरों को लेना मजबूरी है। कई लोग कह रहे हैं कि ग़ज़ल का सफर पर कुछ नहीं हो रहा । दरअसल में यहां पर सप्‍ताह में तीन पोस्‍ट लगाना और फिर शिवना की जिन चार पांच पुस्‍तकों पर अंतिम दौर का काम चल रहा है उन सबके कारण ये हो रहा है । जल्‍द ही वहां नियमित हो जाऊंगा ।  

 

बुधवार, 20 जनवरी 2010

वसंत पंचमी की सभी को मंगल कामनाएं, मां शारदा के चरणों में ग़ज़ल के पुष्‍प चढ़ा रहे हैं आज के तरही मुशायरे में गौतम राजरिशी, कंचन चौहान और अंकित सफर ।

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    या कुन्देन्दु- तुषारहार- धवला या शुभ्र- वस्त्रावृता या वीणावरदण्डमन्डितकरा या श्वेतपद्मासना |
    या ब्रह्माच्युत- शंकर- प्रभृतिभिर्देवैः सदा पूजिता सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ||

आज वसंत पंचमी है । मां शारदा का प्राकट्य दिवस । वसंत का उल्‍लास और आनंद चारों और बिखर जाता है । मां सरस्‍वती जो हम सब शब्‍द साधकों की आराध्‍य हैं । उनकी ही कृपा से हमें शब्‍द मिलते हैं, भाव मिलते हैं और हमें कविता लिखने का सलीका आता है । यद्यपि इस बार वसंत पंचमी कुछ पहले आ गई हैं । वातावरण में वसंत न होकर अभी शीत ही है ।  किन्‍तु आज का ये तरही मुशायरा पूरी तरह से समर्पित है मां सरस्‍वती को । उनके श्री चरणों में अपनी ग़ज़लों के पुष्‍प चढा़ने आ रहे हैं आज पाठशाला के ही तीन विद्यार्थी गौतम, कंचन और अंकित ।

कल रात में देर तक मुशायरे में रहा इसलिये आज की ये पोस्‍ट कुछ देर से लग रही है । मुशायरा खूब हुआ, श्रोता उठने का नाम ही नहीं ले रहे थे । मप्र उर्दू अकादमी की सचिव नुस्रत मेहदी जी, श्री राम मेश्राम जी, श्री अनवारे इस्‍लाम, श्री डॉ कैलाश गुरू स्‍वामी, श्री वीरेंद्र जैन जी, श्री डॉ मोहम्‍मद आज़म और श्री रियाज़ मोहम्‍मद रियाज़ इन सबने मिल कर समां बांध दिया । संचालन की डोर आपके ही इस मित्र के हाथ में थी । पूरे कार्यक्रम को अभिनव द्वारा भेजे गये विशेष उपकरण में रिकार्ड किया है जल्‍द ही आडियो फाइल को कहीं अपलोड कर आपको लिंक देता हूं । कल बहुत दिनों के बाद सचमुच कवित सुनने को मिली । मां सरस्‍वती इन दिनों बहुत अनुग्रह कर रहीं हैं । पहले कवि मित्रों का आगमन और अब शायर मित्रों का घर आना । एक कविता जिसे मैंने पांच साल पूर्व लिखा था उसे लिख कर कभी पढा़ नहीं था । कल यूं ही उसे पढ़ दिया तो उसे मिली दादा से मैं उसी प्रकार हैरान रह गया जैसे महुआ घटवारिन के समय रह गया था । कविता है दर्द बेचता हूं मैं ।

खैर तरही में आज वसंतोत्‍सव है और इस वंसतोत्‍सव में आज पाठशाला की प्रस्‍तुतियां देने आ रहे हैं तीन होनहार विद्यार्थी । तीनों ने कुछ शेर मां सरस्‍वती की वंदना में भी निकाले हैं । तरही को इस बार जो ऊंचाइयां मिल रहीं हैं वो सब मां शारदा का ही प्रताप है । हम तो बस ये कह सकते हैं तेरा तुझको अर्पण क्‍या लागे मेरा । पहला शेर जो ग़ज़ल से ऊपर लिखा जा रहा है वो इन तीनों की ओर से मां शारदा को अर्पण है ।

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मैं आंखें मिला जग से सच ही लिखूं मां

मेरी सोच मेरी क़लम भी बताये

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अंकित सफर

जो लोरी सुना माँ ज़रा थपथपाए.

दबे पांव निंदिया उन आँखों में आये.

चलो फिर से जी लें शरारत पुरानी,

बहुत दिन हुए अब तो अमिया चुराए.

खिंची कुछ लकीरों से आगे निकल तू,

नयी एक दुनिया है तुझको बुलाये.

मुझे जानते हैं यहाँ रहने वाले,

तभी तो दो पत्थर मिरी ओर आये.

किया जो भी उसका यूँ एहसां जता के,

तू नज़दीक आकर बहुत दूर जाये.

मैं उनमे कहीं ज़िन्दगी ढूँढता हूँ,

वो लम्हें तिरे साथ थे जो बिताये.

खुली जब मुड़ी पेज यादें लगा यूँ,

के तस्वीर कोई पुरानी दिखाए.

दुआओं में शामिल है ये हर किसी के,

नया साल जीवन में सुख ले के आये.

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रहम वीणापाणि का इतना हुआ है

के हम भी अदीबों के संग बैठ पाए

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कंचन चौहान

किसे कब हँसाये, किसे कब रुलाये,

ना जाने नया साल क्या गुल खिलाये।

समय चक्र की गति भला कौन जाने,

किसे दे बिछोड़ा, किसे ये मिलाये।

वो आते ही क्यों हैं भला जिंदगी में,

जो जायें तो भूले नही हैं भुलाये

नही काठ की, माँस की पुतलियाँ हम,

वो जब जी हँसाये, वो जब जी रुलाये।

मेरी ज़िद थी माँ से औ माँ की खुदा से,

जो अंबर का चंदा ज़मी पे नहाये।

कि ये साल होगा अलग साल से हर,

यही इक दिलासा हमें है जिलाये।

जो आँखौं के आगे नमूदार हो तुम,

तो खाबों को उनमें कोई क्यों बुलाये।

गली वो ही मंजिल समझ लेंगे हम तो,

जो जानम से हमको हमारे मिलाये।

वो अफसर थे सरकारी पिकनिक पे उस दिन,

गरीबों को मैडम से कंबल दिलाये।

लिहाफों, ज़ुराबों में ठिठुरे इधर हम,

उधर कोई छप्पर की लकड़ी जलाये।

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कृपा शारदा की ये विद्या उन्‍हीं की

हुनर जो भी मेरा वो ही सब लिखाये

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गौतम राजरिशी

गिराये, उठाये, रुलाये, हँसाये

न जाने नया साल क्या गुल खिलाये

है तरकीब कैसी समय की कहो ये

जो कल साल आया था, वो आज जाये

कोई बंदगी है कि दीवानगी ये

मैं बुत बन के देखूँ, वो जब मुस्कुराये

समंदर जो मचले किनारे की खातिर

लहर-दर-लहर क्यों उसे आजमाये

कहीं थम न जाये ये बाजार सारा

न गुजरा करो चौक से सर झुकाये

मचे खलबली, एक तूफान उट्ठे

झटक के जरा जुल्फ़ जब तू उड़ाये

हवा जब शरारत करे बादलों से

तो बारिश की बंसी ये मौसम सुनाये

हैं मगरुर वो गर, तो हम हैं मिजाजी

भला ऐसे में कौन किसको मनाये

क्‍या कहूं क्‍या लिखूं इन तीनों के बारे में । मो सरस्‍वती का आशीष तीनों पर यूं ही बना रहे ये ही कामना करता हूं । और ये ज़ुरूर लिखना चाहूंगा कि तीनों ने आज वसंत पंचमी को सार्थक कर दिया । तीनों ने ही कुछ शेर तो बिल्‍कुल ही उस्‍तादाना अंदाज़ में निकाले हैं । किस किस शेर को क्‍या क्‍या कहूं । बस कंठ रुंध रहा है और उंगलियां कांप रही हैं । सुनें और खूब सुनें इन सबको और आनंद लें दाद दें । हम मिलते हैं अगले अंक में विशेष आमंत्रित खंड में ।

सोमवार, 18 जनवरी 2010

हंसी दर्द में लाज़मी तो है लेकिन, कोई तो चिराग़े मोहब्बत जलाये तरही मुशायरे में आज सुनिये दो नयी प्रविष्टियां मुस्‍तफा माहिर पंतनगरी और इस्मत ज़ैदी 'शेफ़ा' को ।

तरही मुशायरा नये साल की एक बेहतरीन शुरूआत रही है । और जैसा कि हर सप्‍ताह किया जा रहा है । इस बार भी वही कि सप्‍ताह का पहला अंक नयी प्रविष्टियों का, दूसरा अंक पाठशाला के छात्रों का और तीसरा शनिवारीय अंक विशेष आमंत्रित खंड के रूप में । इस प्रकार सप्‍ताह में छ: प्रविष्टियां हो जाएंगीं । हो सकता है कि पाठशाला के विद्यार्थियों वाले खंड में तीन प्रविष्टियां लेनी पड़ें । क्‍योंकि अभी भी काफी नाम बाकी हैं और इच्‍छा ये है कि जनवरी में ही समापन हो जाये मुशायरे का । ताकि अगले माह से होली की तैयारियां प्रारंभ की जा सकें । बीस जनवरी को वसंत पंचमी है । ज्ञान की देवी सरस्‍वती का प्राकट्य दिवस है वो । उस दिन शिवना प्रकाशन विशेष आयोजन करता है । हो सकता है उस दिन परसों  यहां भी कुछ विशेष हो  ।

रविवार को सुबह कुछ कवि मित्रों का सीहोर आगमन हुआ । डॉ. कुमार विश्‍वास, श्री शशिकांत यादव और कुलदीप दुबे सीहोर पहुंचे । डॉ. कुमार विश्‍वास से कविता को लेकर कई सारी बातें हुईं । विस्‍तृत विवरण समाचारों वाले ब्‍लाग तथा शिवना प्रकाशन के ब्‍लाग पर पढ़ने को मिल जायेगा । यहां तो कुवल कुछ चित्र, वो भी इसलिये कि आज के दोनों ही शायरों के चित्र उपलब्‍ध नहीं हैं ।

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चलिये अब प्रारंभ करते हैं आज का तरही मुशायरा । आज की जुगलबंदी में दोनों ही शायर हमारे लिये नये हैं हालंकि शायरी के मान से देखें तो दोनों ही काफी स्‍थापित शायर हैं । परिचय भी दोनों का कुछ विशेष उपलब्‍ध नहीं है और ना ही चित्र । किन्‍तु वही बात है ना कि कवि की सबसे बड़ी पहचान तो उसकी कविता ही होती है । जब कविता स्‍वयं ही परिचय हो तो किसी और परिचय की ज़ुरूरत ही क्‍या है । चलिये तो आज सुनते हैं श्री मुस्‍तफा माहिर पंतनगरी को और मोहतरमा इस्‍मत ज़ैदी शेफ़ा जी को । चित्रों की समस्‍या को इनके ही शेरों से संबंधित चित्र लगा कर पूरा किया है 

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मुस्‍तफा माहिर पंतनगरी

शायद आप मुझे नहीं पहचानते हों किन्‍तु मैं अंकित सफर का न केवल बचपन का मित्र हूं बल्कि शायर बंधु भी हूं । अंकित हमेशा  आपके बारे में बात करता है । उसीने मुझे नये साल का मिसरा दिया जिस पर ये ग़ज़ल लिख कर आपको भेज रहा हूं ।

न उस पार पहुंचे न इस पार आए

बहुत से सफीने समंदर ने खाए

मिली सच की तालीम बचपन से मुझको

कोई किस तरह मेरी नीवें हिलाए

हंसी दर्द में लाज़मी तो है लेकिन

ये तहज़ीब भी आते आते ही आए

मुहब्‍बत के हर ज़ख्‍़म में जिंदगी है

दवा मिल सके ना कभी मौत आए

सफ़र के अंधेरे में कुछ लोग थे जो

मुझे रोशनी की तरह याद आए

हंसी दर्द में लाज़मी तो है लेकिन ये तहज़ीब भी आते आते ही आए । मुस्‍तफा भाई बहुत ऊंची बात कह गये हो इस शेर में । वाह वाह । मुझे रोशनी की तरह याद आए । कमाल के शेर निकाले हैं । बहुत ही उम्‍दा तरीके से बड़े ही सलीके से शेर बनाये हैं । मानो किसी ने रूमाल पर बूटे काढ़े हों । मज़ा आ गया ।

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इस्मत ज़ैदी 'शेफ़ा'

मैं इस्मत ज़ैदी हूँ ,'शेफ़ा' मेरा तख़ल्लुस है,मेरा कोई ख़ास ता'आरुफ़ नहीं है अभी शाएरी और ज़बान ओ बयान की दर्सगाह में दाख़िल होने की कोशिश कर रही हूँ .एक ग़ज़ल हाज़िर ए ख़िदमत है अगर पसंद आए तो हौसला अफज़ाई होगी . मैं ८ सालों से गोवा में मुक़ीम हूँ ,लेकिन मेरा आबाई वतन कजगांव (जौनपुर) है  .

ग़ज़ल

कदूरत का गहरा अँधेरा मिटाए

कोई तो चिराग़े मोहब्बत जलाये

पहेली सुलझती नहीं ज़िन्दगी की

रुला कर हंसाये, हंसा कर रुलाये

वो नन्हे लबों पर अधूरा तबस्सुम

मेरे दिल की दुनिया में हलचल मचाये

जो अगयार हैं उन से कैसी शिकायत?

जब अपने ही भाई हुए हों पराये

हरासाँ हैं इंसानियत के वो दुश्मन

" जाने नया साल क्या गुल खिलाये "

वो किलकारियां ले गया इक धमाका

तड़पती है माँ किसको झूला झुलाए

वतन से बहुत दूर बेचैन दिल को

'शेफ़ा' यादे माज़ी सुकूँ बख्श जाए

मतले में ही क्‍या खूब कामना की है । आज जो सबसे बड़ी ज़ुरूरत है कि कोई चिराग़े मोहब्‍बत जलाए और कदूरत का तम मिटा दे । और मकता भी बहुत सुंदर है । पूरी की पूरी ग़ज़ल ही ताज़गी से भरी है । रुला कर हंसाए हंसा कर रुलाए या तड़पती है मां किसको झूला झुलाए । बहुत ही सुंदर ग़ज़ल है । और जब अगले अंक में पाठशाला के विद्यार्थियों की बारी आनी है तो उसके पहले ये एक सबक की तरह है कि शेर कैसे निकाले जाते हैं ।

आनंद लीजिये दोनों मुकम्‍मल शायरों की खूबसूरत ग़ज़लों का और आनंद लेते रहिये दाद देते रहिये । अगले अंक में हम मिलते हैं सरस्‍वती पूजन के लिये क्‍योंकि अगला अंक होगा वसंत पंचमी का अंक जिसमें होंगें पाठशाला के शायर अपने तेवरों के साथ ।

शनिवार, 16 जनवरी 2010

करूं काम तो मन बहुत गीत गाए, गया वक्‍त जाकर न फिर लौट पाए । तरही मुशायरे के विशेष आमंत्रित खंड में आज दो अग्रजाओं लावण्‍य दीदी साहब और शार्दूला दीदी को सुनें ।

आज तरही में विशेष आमंत्रित रचनाओं को सुनने का दिन है । पिछले शनिवार को हमने आज के दिन गीत और ग़ज़ल की जुगलबंदी सुनी थी । राकेश जी और प्राण साहब ने मिल कर समां बांध दिया था । आज भी एक जुगल बंदी है । आज की जुगल बंदी दो अग्रजाओं की है । इनमें भी शार्दूला दीदी से तो कविता बाकायदा कानूनी नोटिस भेज कर प्राप्‍त की गई है । लावण्‍य दीदी साहब  ने कानूनी नोटिस भेजने का अवसर नहीं दिया । केवल निवेदन पर ही उनकी कविता प्राप्‍त हो गई । तरही का पिछला अंक बहुत ही जबरदस्‍त अंक था । रविकांत और दिगम्‍बर दोनों ने ही धमाकेदार प्रस्‍तुति दी । दिगम्‍बर ने जिस प्रकार से शेर निकाले उससे मैं हतप्रभ हूं । ऐसा लग रहा था मानो अपनी भावनाओं का एक एक क़तरा निचोड़ कर शेरों में भर दिया है । शार्दूला दीदी और लावण्‍य दीदी साहब का परिचय देने की धृष्‍टता नहीं कर सकता । सुनिये दोनों अग्रजाओं  को और आनंद में डूबिये ।

शार्दूला दीदी का नाम परी और पंखुरी ने चॉकलेट वाली सिंगापुर बुआ रखा है । सही नाम रखा है क्‍योंक‍ि जितनी सुरीली आवाज़ शार्दूला दीदी की है उससे मुझे लगता है कि ये दिन भर चॉकलेट खाती रहती हैं । अपना ब्‍लाग नहीं बनाने पर अड़ी हैं और मेरा समर्थन उनके इस निर्णय को है । इन्‍होंने मेरी कहानी तमाशा को बहुत सुंदर तरीके से रिकार्ड करके भेजा है जो ब्‍लाग के साइड बार में विजेट पर उपलब्‍ध है कृपया उसे ज़रूर सुनें ।

shardula didiशार्दुला दीदी

करूँ काम तो मन बहुत गीत गाए
लिखूँ बैठने कुछ लिखा ही न जाए
ग़ज़ल बन गई एक सहमी चिरैया
उड़ाऊँ उड़े ना, बुलाऊँ न आए
समय एक माली, कि मैं फूल सूखा
न जाने नया साल क्या गुल खिलाए

ग़ज़ल पर दाद देने के साथ एक आपत्ति लगा रहा हूं आप सब मेरा साथ दें । आपत्ति ये कि मतला और दो शेर बस । सुनने वालों पर ये इमोशनल अत्‍याचार करना ठीक नहीं है । इतने सुंदर शेर निकाले और इतने कम निकाले । गौतम के ब्‍लाग से बाकायदा चुराई गई आपकी इस तस्‍वीर का होली के मुशायरे में जो कार्टून बनाया जायेगा उसके लिये अब आप स्‍वयं जिम्‍मेदार होंगीं ।( इसे धमकी समझा जा सकता है ) । और अब दाद, उफ क्‍या शेर निकाले हैं मतला तो ऐसा लगता है कि मेरे मन की ही बात लिख दी है । और ग़ज़ल को चिरैया बना कर क्‍या प्रतीक लिया है । वाह वाह वाह ।

lavnya didi sahabलावण्‍य दीदी साहब

दीदी साहब के बारे में क्‍या कहूं ऐसा लगता है मानो नेह की एक गागर लिये निकलती हैं और सबके ब्‍लागों पर अपने आशीष के रूप में छलकाते हुए निकल जाती हैं । जब भी वे ब्‍लाग पर आती हैं तो ऐसा लगता है मानो हज़ारों हज़ार ज्‍योति कलश ब्‍लाग पर छलक गये हैं । पूरा ब्‍लाग जगमगा उठता है । उनकी कविताओं के बारे में कुछ कहना अर्थात अपने ही शब्‍दकोश के अकिंचन होने की बात सार्वजनिक करना है जो मैं नहीं करना चाहता । पहले उनके शुभकामना संदेश और फिर तरही पर लिखा उनका विशेष गीत ।

आयी किरण धरा पर, लेकर शुभ सन्देश
तन, मन धन अर्पन कर,पाओ सुफल विशेष .
हो मंगलमय प्रभात पृथ्वी पर मिटे कलह का कटु उन्माद ,
वसुंधरा हो हरी - भरी , नित, चमके खुशहाली का प्रात !
 

मंगल कामना : वर्ष २० १० के लिए

गया वक्त जाकर न  फिर लौट पाए

न जाने नया साल क्या गुल खिलाये

समय की नदी में कहीं खो गये हैं

जो दामन छुड़ाकर के, गुम हो गये हैं,

पुकारो, पुकारो, उन्हें भी पुकारो

कोई बीते लम्हों को कैसे बुलाये ?

गया वक्त जाकर न  फिर लौट पाए

न जाने नया साल क्या गुल खिलाये ?

चिता पर शहीदों की आंसू बहे हैं

चिता संग माताओं के दिल जले हैं

जला " ताज " या उनका गुलशन था उजड़ा

धुंआ बन के जो नभ में जाकर समाए 

गया वक्त जाकर न  फिर लौट पाए

न जाने नया साल क्या गुल खिलाये ?

कहीं रंजो गम हैं, कहीं है मुसीबत,

वो बच्चों का रोना, वो बदहाल, हालत,

ए मालिक, रहम के जो कतरे मिलें तो,

ये दुनिया उजड़कर, संवर फिर से जाए,

गया वक्त जाकर न  फिर लौट पाए

न जाने नया साल क्या गुल खिलाये ?

[-- ताज महल होटल के हर शहीद  के परिवार को मेरी विनम्र अंजलि

इस आशा के साथ कि, आनेवाले साल में कोइ बुरा हादसा न हो ...]

ए मालिक, रहम के जो कतरे मिलें तो, ये दुनिया उजड़कर, संवर फिर से जाए, मुझे लगता है कि ये पंक्तियां बिल्‍कुल ह्रदय से निकली पंक्तियां हैं । मौन होकर सुनने के अलावा कुछ नहीं किया जा सकता है । श्रोता पर जादू करते हुए गुज़रती हैं ये कविता । ऐसा लगता है मानो समय भी स्‍तब्‍ध होकर कविता को सुन रहा है  । प्रणाम प्रणाम प्रणाम । मुझे आज्ञा दीजिये और आप आनंद लीजिये दोनों अग्रजाओं की कविताओं का ।

गुरुवार, 14 जनवरी 2010

न पनघट न झूले न पीपल के साए, हरे खेत जख्मों के फ़िर लहलहाये । तरही में आज सुनिये दो शायरों दिगम्‍बर नासवा और रविकांत पांडेय की ग़ज़लें ।

मकर संक्रांति, पोंगल और लोहड़ी की शुभकामनाऍं

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तरही में इस बार काफी रचनाएं मिली हैं और सबसे अच्‍छी बात ये है कि इस बार सभी रचनाएं एक से बढ़कर एक हैं । प्रतियोगिता जैसी तो कोई बात नहीं है लेकिन ये तो तय है कि प्रतिस्‍पर्धा हमेशा ही गुणवत्‍ता को जन्‍म देती है । जब हम विद्वानों की सभा में होते हैं तो हमें एक एक वाक्‍य को कहने से पहले सोचना होता है । किन्‍तु जब हम साधारण सभा में होते हैं तो कुछ भी कहने से पहले सोचना नहीं होता है । खैर इस बार की तरही बहुत अच्‍छी हो रही है । कई सारे नये लोगों को रचनाएं मिली हैं । जैसा कि मैंने बताया कि हर सप्‍ताह तीन पोस्‍ट लगाए बिना काम नहीं होने वाला है । सो आज दो और शायरों को पढि़ये तरही में । आज पाठशाला के ही दिगम्‍बर नासवा और रविकांत पांडे की ग़ज़लें शामिल हैं । दोनों ही संवेदनशील कवि हैं । दिगम्‍बर की छंदमुक्‍त कविताओं का तथा रवि की छंदबद्ध कविताओं को मैं सबसे बड़ा प्रशंसक हूं । दोनों का ही परिचय देने की कोई आवश्‍यकता इसलिये नहीं है कि दोनों ही नाम सुपरिचित हैं । सीधे ही सुनते हैं दोनों को ।

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दिगम्‍बर नासवा

न पनघट न झूले न पीपल के साए

शहर काँच पत्थर के किसने बनाए

मैं तन्हा बहुत ज़िंदगी के सफ़र में

न साथी न सपने न यादों के साए

वो ढाबे की रोटी वही दाल तड़का

कोई फिर सड़क के किनारे खिलाए

वो तख़्ती पे लिख कर पहाड़ों को रटना

नही भूल पाता कभी वो भुलाए

वो अम्मा की गोदी, वो बापू का कंधा

मेरा बचपना भी कभी लौट आए

मैं बरसों से सोया नही नींद गहरी

वही माँ की लोरी कोई गुनगुनाए

मेरे घर के आँगन में आया है मुन्ना

न दादी न नानी जो घुट्टी पिलाए

सुदामा हूँ मैं और सर्दी का मौसम

न जाने नया साल क्या गुल खिलाए

मैंने पूर्व में ही लिखा था कि मैं दिगम्‍बर की संवेदनशील कविताओं का प्रशंसक हूं । ये पूरी ग़ज़ल डाउन मेमोरी लेन है । पूरी गज़ल संवेदनाओं से भरी हुई है । एक एक शेर माज़ी से निकल के आ रहा है । वो तख्‍ती वे लिख कर पहाड़ों को रटना, उफ याद आ गया मुझे भी वो बचपन, सूख मेरी पट्टी चंदन की बट्टी । दिगम्‍बर अपनी ये संवेदनशीलता बचा कर रखना ये तुम्‍हारी कविताओं की सबसे बड़ी पूंजी है ।

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रविकांत पांडेय

कोई कैसे पहलू में दिल को बचाये
कयामत सी गुज़रे वो जब मुस्कुराये
हुई आज फ़िर उनकी यादों की बारिश
हरे खेत जख्मों के फ़िर लहलहाये
जो वादा था दोनों ही महफ़िल में आये
मैं सर को झुकाये वो खंजर उठाये
है बाहों का चकला निगाहों का बेलन
मुझे रोटियों की वो माफ़िक घुमाये
मैं हर दांव पर उसके हंसता रहा तो
सितमगर परीशां है कैसे सताये
खुदाया बगावत का अब हौसला दे
जमाने ने हम पर बहुत जुल्म ढाये
गया साल मुझको रुलाकर गया है
न जाने नया साल क्या गुल खिलाये
लहू में जो भर दे उफ़नता-सा लावा
नई पीढ़ी को कौन आल्हा सुनाये
है मुश्किल नहीं पार दरिया को करना
मैं कब से खड़ा हूं वो मुझको बुलाये
तड़पकर किसी रोज हम तुम मिले थे
नहीं भूलता है वो मंज़र भुलाये
चली छोड़कर काम सारे ही राधा
नदी-तीर कान्हा जो वंशी बजाये

वाह वाह मुन्‍नी के पप्‍पा आप तो उस्‍तादों की तरह लिखने लगे हो । देखा इसीको कहते हैं बेटी के शुभ क़दम घर में पड़ना । बना दिया न पापा को पूरा शायर । बहूरानी ने रोटियों की माफिक घुमा रखा है तो उसमें हम कुछ नहीं कर सकते क्‍योंकि उसका तो बहूरानी को लायसेंस मिला है बाकायदा बैंड बाजे के साथ ये लायसेंस मिला है । हुई आज फिर उनकी यादों की बारिश वाह क्‍या शेर निकाला है ।

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एक बार फिर से आप सभीको मकर संक्रांति की शुभकामनाएं । तिल गुड़ खाएं, पूरन पोली खाएं, पतंगें उड़ाएं, गिल्‍ली डंडा खेलें, सूर्य नमस्‍कार करें और स्‍वागत करें उत्‍तरायण होते सूर्य का । 

मंगलवार, 12 जनवरी 2010

मुहब्बत मुहब्बत मुहब्बत मुहब्बत, ये क्या कर दिया उसने बैठे बिठाये नये साल का तरही मुशायरा । आज सुनिये निर्मल सिद्धु और शाहिद मिर्जा को तरही मुशायरे में ।

पहले सोचा था कि एक बार की पोस्‍ट में केवल दो ही शायरों को लगाया जायेगा किन्‍तु जिस प्रकार से तरही के लिये ग़ज़लें प्राप्‍त हुई हैं उसके कारण लगता है कि यदि जनवरी में समापन करना है तो इस निर्णय को बदलना होगा या फिर एक सप्‍ताह में तीन पोस्‍ट लगानी होंगीं ।  सप्‍ताह  की पहली दो पोस्‍ट होगी तरही की तथा तीसरी पोस्‍ट होगी तरही के लिये विशेष आमंत्रित सम्‍माननीय जनों की रचनाएं जिसमें आपने पिछली बार आदरणीय राकेश जी तथा प्राण जी की रचनाएं पढ़ीं । इन स्‍थापित रचनाकारों के लिये हमने तरही के कोई बंधन नहीं रखे हैं हमें तो बस इनका आशिर्वाद चाहिये वो चाहे जिस स्‍वरूप में मिले । गीत हो ग़ज़ल हो छंदमुक्‍त कविता हो या और कुछ भी हो । उसमें भी तरही के मिसरे की बाध्‍यता भी नहीं है ।

न जाने नया साल क्‍या गुल खिलाए

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आज के तरही में दो शायर आ रहे हैं और दोनों ही तरही में पहली बार आ रहे हैं । दोनों के बारे में जानने पर ज्ञात हुआ कि दोनों ही बहुत अच्‍छे शायर हैं तथा नये तेवरों के साथ ग़ज़लें लिखते हैं ।  निर्मल सिद्धु और शाहिद मिर्जा को सुनिये और आनंद लीजिये ।

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निर्मल सिद्धु 

सक्रिय ब्‍लागर हैं हिन्‍दी राइटर्स गिल्‍ड के नाम से अपना ब्‍लाग चलाते हैं जहां पर अपनी काफी अच्‍छी ग़ज़लों तथा गीतों का नियमित प्रकाशन करते हैं ।तरही में पहली बार आ रहे हैं अत: स्‍वागत करें इनका ।

न जाने नया साल क्या गुल खिलाये

बना दे किसे और किसको मिटाये

समय की ये आदत पुरानी जो ठहरी

मुहब्बत में हरदम जुदाई दिखाये

कोई साथ इसके चले ना चले पर

ये सबको लिये जा रहा है भगाये

बड़े शौक़ से हम सजाते हैं सपने

घनी आँधी पल में उड़ा के ले जाये

नये साल आते यूं हरदम रहेंगे

कोई चाहे कितना ही इनको दबाये

असर आज का कल पे पड़ता ज़रूरी

नया भी पुराने के अंदर से आये

नया नाम निर्मल का महफ़िल में आया

ये क्या कर दिया उसने बैठे बिठाये

वाह क्‍या शेर निकाले हैं निर्मल जी ने और बिल्‍कुल आनंद भर दिया मकते के अनुरूप ही न जाने क्‍या कर दिया है बैठे बिठाये । समय की ये आदत पुरानी जो ठहरी जैसे शेर निकाले हैं निर्मल जी ने और तरही में आते ही धमाकेदार इन्‍ट्री ली है ।

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शाहिद मिर्जा

सक्रिय ब्‍लागर हैं तथा जज्‍़बात के नाम से अपना ब्‍लाग चलाते हैं  जहां पर ग़ज़लों को प्रकाशित करते हैं । तरही में पहली बार आ रहे हैं ।

नए साल हर दिन हों रहमत के साए

हर इक लम्हा खुशियों का पैगाम लाए

बुलंदी के आकाश पर जाके छाए

ये 'सोने की चिड़िया' मधुर गीत गाए

न बदले कभी ये बहारों का मौसम

महकता चमन ये महकता ही जाए

दिलों से दिलों तक सदाओं की खातिर

कोई तो हो, जो एक खिड़की बनाए

मुहब्बत मुहब्बत मुहब्बत मुहब्बत

ये आवाज़ हर दिल की धड़कन से आए

ज़रूरत हों पूरी हर इक, हर बशर की

तमन्ना अधूरी कोई रह न पाए

उमीदों के गुलशन की शाखों पे शाहिद

'न जाने नया साल क्या गुल खिलाए'

मुहब्‍बत भाई चारे और वतनपरस्‍ती से भरी ऐसी ग़ज़ल के लिये क्‍या कहूं । किसी भी एक शेर की तारीफ करके किसी दूसरे शेर को कम कैसे कह दूं । और मेरे विचार से तरही की एक श्रेष्‍ठ गिरह भी बंध चुकी है । फिर भी मुझे लगता है कि बुलंदी के आकाश पर जाके छाए ये शेर जिस प्रकार वतनपरस्‍ती और देशभक्ति के जज्‍बे से भरा है उस शेर के लिये खड़े होकर तालियां बजाना ज़ुरूरी है आप भी मेरे साथ खड़े होकर तालियां बजाएं । मुहब्बत मुहब्बत मुहब्बत मुहब्बत ये प्रयोग भी इस बहर में खूब किया जाता है तरही में इन्‍होनें पहली बार किया है ।

पिछली बार के पोस्‍ट पर शाहिद मिर्जा जी ने एक प्रश्‍न उठाया है चूंकि गीत का प्रश्‍न है इसलिये मैं चाहूंगा कि रवि इस प्रश्‍न का उत्‍तर दे ।

सूचना : तरही के लिये लिस्टिंग पूर्ण हो चुकी है अत: अब कोई नयी ग़ज़ल नहीं भेजें । जो पूर्व में भेज चुके हैं तथा यदि वे अपनी ग़ज़ल में कुछ संशोधन करना चाहते हैं तो कर सकते हैं । चलिये मुझे आज्ञा दीजिये और आनंद लीजिये इन दोनों शानदार ग़ज़लों का । दाद देते रहिये । ग़ज़ल के सफ़र पर इस सप्‍ताह ग़ज़ल की विधिवत कक्षा प्रारंभ हो जाएगी ।

शुक्रवार, 8 जनवरी 2010

आदरणीय राकेश खंडेलवाल जी और आदरणीय प्राण साहब की जुगलबंदी कैसी रहेगी आज के अंक के लिये । गीत सम्राट और ग़ज़ल के बादशाह की जोड़ी आज तरही मुशायरे में आ रही है अपनी अपनी विधाओं के रंग लेकर ।

बहरे मुतकारिब, नये सीखने वालों को उस्‍ताद अक्‍सर एक ही बात कहते हैं जाओ मुहब्‍बत की झूठी कहानी पे रोये इस गीत को सुनो और इस की धुन पर कोई ग़ज़ल लिख कर लाओ । दरअसल में ये गीत नये सीखने वालों के लिये कखग सीखने जैसा है । इसमें रुक्‍न बहुत सीधे सीधे टूटे हुए हैं । न सोचा, न समझा, न देखा, न भाला । खबर क्‍या, थी होंठों, को सीना, पड़ेगा । मुहब्‍बत, की झूठी, कहानी, पे रोये । इस बहर का मुझ पर एक एहसान ये है कि इसी बहर पर लिखे गये देश के एक शीर्ष कवि के एक गीत को बचपन में मैंने पढ़ा और कवि बन गया । गीत की जानकारी फिर कभी दूंगा । इस बार का तरही मुशायरा प्रारंभ होते ही रंग में आ गया है । पहले डॉ आज़म साहब की शुरूआत और फिर उसके बाद में पिछले अंक में प्रकाश पाखी जी और पंकज जी की शानदार ग़जलों ने समां बांध दिया । मंच संचालके के सामने कई बार ये परेशानी आती है कि अब जब मंच इतनी ऊंचाई पर पहुंच गया है तो अब किसको उतारा जाये । तो ऐसे में कई बार घबरा कर वो अपने तुरुप के पत्‍ते ही चल देता है । जैसा आज मैं कर रहा हूं ।

न जाने नया साल क्‍या गुल खिलाए

 आदरणीय प्राण शर्मा जी और आदरणीय राकेश खंडेलवाल जी    ये दोनों ही ऐसी शख्‍सियतें हैं जिनका परिचय देने का प्रयास जो भी करेगा उससे बड़ा मूर्ख कोई हो ही नहीं सकता । उसके पीछे भी दो कारण हैं पहला तो ये कि ये दोनों ही नाम किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं । और दूसरा ये कि यदि फिर भी कोई इनका परिचय देने का प्रयास करता है तो परिचय के लिये शब्‍द लायेगा कहां से । एवरेस्‍ट की ऊंचाई का परिचय नहीं होता, सागर की गहराई का कोई परिचय नहीं होता । बस इतना कहना चाहता हूं कि एक ग़ज़ल के बादशाह है तो दूसरे गीतों के सम्राट । अपने अपने क्षेत्र के चक्रवर्ती । सो नये साल में इन दोनों की जुगलबंदी से बेहतर कुछ नहीं हो सकता । सुनिये आपको भी लगेगा कि आप श्री गोपालदास नीरज और श्री निदा फाज़ली की जुगलबंदी सुन रहे हों । मैं बीच से हटता हूं आप आनंद लेते रहें ।

pran_sharma 

आदरणीय प्राण शर्मा जी की ग़ज़ल

रुलाये, हँसाए या खिल्ली उडाये

जाने ,नया साल क्या गुल खिलाये

सभी को कुछ ऐसा ही जलवा दिखाए

खुशी से लबालब नया साल आये

सदा दोस्ती को ही क्यों कोसता है

ये बेहतर है, वो दोस्ती भूल जाए

कभी खूबियों से ह्रदय अपना भर लो

कि जैसे दियों से महल जगमगाए

कि इतने भी अनजान से हम नहीं हैं

ये कह दो उसे ,वो हमे मत बनाये

अगर जीते हैं हम तो इसके लिए ही

भला ज़िन्दगी रास क्योंकर आये

पतंगे उड़ाना सुहाता है मुझको

जरूरी नहीं के उसे भी सुहाए

भला क्यों झूमे ह्रदय मस्तियों में

खुशी जब भी आती है डंका बजाये

किसी को दुखाऊँ ,नहीं मेरी फितरत

भले ही कोई " प्राण" मुझको दुखाये

rakesh-khandelwal

आदरणीय राकेश खण्‍डेलवाल जी का गीत

चलो ढल रही आज इस सांझ से हम

कहें, आस के गीत अब गुनगुनाये

किरन इक नई चल पड़ी है डगर पर

छँटेंगे घिरे जो कुहासों के साये

चलो आज फिर आँख में स्वप्न आँजें

चलो कल्पना के कबूतर उड़ायें

ये अन्देशा पल भर भी पालें मन में

जाने नया साल क्या गुल खिलाये

वो परछाईयों को निगल हँस रही थी

गये वर्ष में धूप तम से मिली थी

उन्हें मालियों ने स्वयं तोड फ़ैंका

जो उम्मीद की चन्द कलियाँ खिली थीं

गईं सूख प्यासे अधर पर कराहें

जले नैन में चित्र अवशेष के ही

वही ले गया लूट कर पोटली को

था समझा हुआ जिसको अपना सनेही

चलो आज फिर बीज रोपें नय कुछ

नया एक विश्वास जो सींच जाये

करें कामना जो घटित हो चुका है

वो फिर से कोई भी दुहराने पाये

चलो आज फिर आँख में स्वप्न आँजें

चलो कल्पना के कबूतर उड़ायें

ये अन्देशा पल भर भी पालें मन में

जाने नया साल क्या गुल खिलाये

चमकती हुई झालरों में उलझकर

भ्रमित दॄष्टि होकर रही रात-वासर

जो था भाव इक भाईचारे का कोमल

उसे पी के लिप्सा हँसी थी ठठाकर

अंगूठी मिली एक पल को जिसे बह

वही उंगली करती है व्यापार मन का

उसी की लगी बोलियां दिन दहाड़े

जो घुँघरू जरा पायलों मे था खनका

धरा की लहरती हुई ओढ़नी से

कोई बूटे तो कोई धागे चुराये

रुका है महज रात भर के लिये जो

वही इसको जागीर अपनी बताये

चलो आज फिर आँख में स्वप्न आँजें

चलो कल्पना के कबूतर उड़ायें

ये अन्देशा पल भर भी पालें मन में

जाने नया साल क्या गुल खिलाये

उफ़..................! क्‍या करें, ये तो स्‍तंभित कर देने वाला अनुभव है । जुबां पर ताला पड़ गया है । हाथों पर सन्निपात हो गया है । तालियां बजाने और वाह वाह करने के लिये उस टोने से बाहर आना पड़ेगा जो इस गीत और ग़ज़ल की जुगलबंदी ने मारा है । मैं कभी इलाहाबाद नहीं गया किन्‍तु मुझे लगता है कि वहां संगम पर जो दृष्‍य होता होगा आज यहां भी वही हो गया है । दो भिन्‍न प्रकार के काव्‍यों के ऐसा संगम । आप भी इस संगम में गोते लगाइये और यदि जुबां साथ दे और आपके पास शब्‍द हों तो वाह वाह करें ।  मैं भी कोशिश करता हूं आप तब तक आनंद लें ।

मंगलवार, 5 जनवरी 2010

बहुत घना कोहरा, कड़ी ठंड और उसके बीच चलता हुआ एक मुशायरा । तरही मुशायरे में आज सुनिये दो शायरों की ग़ज़लें, गिरीश पंकज और प्रकाश पाखी की ग़ज़लें ।

देखते ही देखते नया साल आ भी गया है । 2010, देखने में ही सुंदर अंक लग रहा है । अब देखते है कि ये बीस दस क्‍या गुल खिलाता है । आज कोहरे का जो आलम देखा वो अनोखा था । इतना कि वास्‍तव में हाथ को हाथ ही नहीं सूझ रहा था । हर तरफ धुंध और धुंआ । ठंड इतनी कि मोटर साइकल चला कर आफिस पहुंचने पर ज्ञात हुआ कि शायद हाथ हैं ही नहीं । टटोल कर देखा कि कहीं गिर तो नहीं गये । कुछ देर बाद हाथ वापस आये । मौसम की सबसे कड़ाके की ठंड ने सीहोर को आज अपने आग़ोश में ले लिया है । सब कुछ रुक गया है लेकिन हमारा तरही मुशायरा तो चालू है । डॉ आज़म साहब ने बहुत ही जोरदार शुरूआत दी है मुशायरे को । कायदे में सोमवार को तरही का अगला अंक लगना था क्‍योंकि सोमवार और गुरूवार ये दो दिन ही सोचे थे तरही के लिये । लेकिन शिवना प्रकाशन की नये वर्ष की पहली पुस्‍तक अनुभूतियां लेखक दीपक चौरसिया मशाल, प्रकाशित होकर आ गई है और आज उरई उप्र में उसका विमोचन होना है । बस पुस्‍तकों को लेकर कल कुछ व्‍यस्‍तता थी । ये शिवना की पहली पुस्‍तक है जो ISBN  के साथ आई है । पुस्‍तक के बारे में जानकारी अगले अंक में क्‍योंकि तब तक इसका विमोचन हो चुका होगा । आज तो आप स्‍वयं करे उसका विमोचन

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ग़ज़ल का सफ़र  blog300 ब्‍लाग को जिस प्रकार आप सबने हाथों हाथ लिया है वह सुखद लगा । वहां पर जो योजन है उसके अनुसार माह की तीन निश्चित तारीखों को लेख लगा करेंगें । दस दस दिन के अंतर से वहां लेख प्रकाशित हुआ करेंगें और उसकी सूचना ब्‍लाग के सदस्‍यों को मेल द्वारा मिल जाया करेगी ।  वहां पर सब कुछ पुस्‍तक के स्‍वरूप में होगा । अर्थात अध्‍याय होंगे एक के बाद एक और बाकायदा तारतम्‍य में होंगें ।

न जाने नया साल क्‍या गुल खिलाए

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इस बार की तरही को लेकर कई सारे लोगों की रचनाएं मिल चुकी हैं । और कुछ लोग अभी तक भेज रहे हैं । नये साल की तरही है इसलिये सब ने बहुत अच्‍छी रचनाएं भेजी हैं । जाहिर सी बात है कि इसके बाद जो तरही आनी है वो होली  विशेषांक होगा । पिछली बार का होली विशेषांक बहुत सराहा गया था  । इस बार भी कुछ अलग करने की योजना है । खैर वो तो अगले की बात मगर फिलहाल तो अभी की बात की जाये । आज हम दो और शायरों को ले रहे हैं । इनमें से एक पहली बार तरही में आ रहे हैं और दूसरे हमारे जाने पहचाने हैं ।

आइये सबसे पहले सुनते हैं गिरीश पंकज जी की ग़ज़ल। चूंकि ये तरही में पहली बार आ रहे हैं अत: पहले जानते हैं उनके बारे में । श्री गिरीश पंकज जी संपादक, " सद्भावना दर्पण"/ सदस्य, " साहित्य अकादमी"/ नई दिल्ली/ अभी हाल ही में किताबघर, दिल्ली  द्वारा प्रकाशित तीसरा ग़ज़ल शतक में ग़ज़ले समाहित / ३ उपन्यास, ८ व्यंग्य संग्रह, २ ग़ज़ल संग्रह सहित २९ पुस्तकें प्रकाशित/. गिरीश पंकज व्यक्तित्व-कृतित्व पर कर्णाटक के शिक्षक नागराज द्वारा पीएचडी एवं उपन्यास पालीवुड की अप्सरा पर पंजाब के दीपिका द्वारा शोध कार्य जारी

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गिरीश पंकज

इसी बात पर हम नहीं मुस्कराए
''न जाने नया साल क्या गुल खिलाए''

हुआ जो बुरा तुम उसे भूल जाओ
नया दौर शायद नया रंग लाए

अगर टूटते हैं उन्हें टूटने दो
दुबारा सभी ने ही सपने सजाए

कहाँ पल रहा है सदा एक जैसा
कभी ये रुलाए कभी ये हँसाए

उठो तुम तो पंकज करो खैरमकदम
नया पल ये आया है लो खिलखिलाए

हुआ जो बुरा तुम उसे भूल जाओ नया दौर शायद नया रंग लाए । वाह वाह वाह कितनी सकारात्‍मक सोच से भरा हुआ है ये शेर । पूरी ग़ज़ल सकारात्‍मक शेरों से भरी हुई । यही तो जीवन है, विगत का भुला कर आगत का स्‍वागत करना । बहुत उम्‍दा ग़ज़ल कहने के लिये बधाई ।

आइये अब सुनते हैं प्रकाश पाखी जी की ग़ज़ल इनका परिचय इसलिये नहीं क्‍योंकि ये हमारे जाने पहचाने हैं पूर्व की तरही में भाग ले चुके हैं तथा अब ग़ज़ल की पाठशाला के नियमित छात्र हैं । इन्‍होंने ग़ज़ल के साथ ये कमेंट भेजा है आवाज फटे बांस सी है और शायरी पढना नहीं आता इसलिए प्रकाश अर्श भाई से मेरी गजल पढवाना मेरा सपना है...

pakhiप्रकाश पाखी

नसीबों की सरगम अमर राग गाए
शुभम गान हो जिन्दगी धुन बजाए 

मिले गम नया या ख़ुशी दे के जाए 
''न जाने नया साल क्या गुल खिलाए'' 

मुसीबत बड़ी हो तो भी डर नहीं है 
मिरे हौसलों में कमी बस न आए 

न पीने की खाई क़सम तो है लेकिन 
अदा कोई दिलकश कसम तोड़ जाए 

सदर बेहयाई करे अब बचा क्या 
रिआया ही पत्‍थर कोई अब उठाए 

जमीं की हकीकत तो कडवी थी पाखी 
बड़े ख्वाब जन्नत के क्यूँकर सजाए
 

वाह वाह अच्‍छे शेर निकाले हैं ।  बहुत ही हौसले का शेर लिखा है मुसीबत बड़ी हो तो भी डर नहीं है मिरे हौसलों में कमी बस न आए । बहुत ही सुंदर शेर निकाला है । पूरी ग़ज़ल ही बेहतरीन बन पड़ी है । एक एक शेर बोलता हुआ शेर है । बधाई हो ।

आज के दोनों ही शायरो ने समां बांध दिया है दोनों ही ग़ज़लें बहुत ही सुंदर हैं तो आज आनंद लीजिये इन दोनों ग़ज़लों का । और इंतजार कीजिये अगले अंक का । और हां पिछली पोस्‍ट पर प्रकाश पाखी जी ने कुछ जिज्ञासा प्रकट की हैं । आपमें से कोई भी पिछली पोस्‍ट पर उनकी टिप्‍पणी में जाहिर जिज्ञासा का समाधान इस पोस्‍ट पर टिप्‍पणी के माध्‍यम से करें ।

शुक्रवार, 1 जनवरी 2010

नया साल जीवन में सुख ले के आए : यही है ग़ज़ल की कक्षा की तरफ से सबके लिये कामना । आज ही से प्रारंभ हो रहा है ग़ज़ल की तकनीक पर आधारित ब्‍लाग ग़ज़ल का सफ़र और आज नये साल के ठीक पहले ही दिन प्रारंभ करते हैं तरही मुशायरा 2010

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आप लोग हैरत में पड़ रहे होंगें कि ये अचानक मिसरा बदला हुआ क्‍यों आ रहा है । दरअसल में मिसरा तो वही है किन्‍तु नये साल के लिये उसे थोड़ा बदल कर कह रहा हूं । उसके पीछे एक कारण ये है कि कल ही शार्दूला दीदी का मेल मिला जिसमें उन्‍होंने कहा है कि नये साल को लेकर मिसरा कुछ नकारात्‍मक है सो मैंने भी सोचा कि मिसरा तो वही रहने देते हैं लेकिन आज नये साल के ठीक पहले दिन उसको यूं कह कर बोलते हैं नया साल जीवन में सुख ले के आये आपको ये मिसरा सुना सा लग रहा होगा । दरअसल में ये मिसरा नहीं है बल्कि नये साल के शुभकामना संदेशों पर छपने वाला वाक्‍य है जो संयोग से हमारी बहर से भी मिल रहा है और काफिये से भी । सो इसलिये ही इसको उपयोग कर लिया है । वैसे भी जीवन की जो आपाधापी है उसमें सबके लिये यही कामना होनी चाहिये कि नया साल सबके जीवन में सुख लेकर आये ।

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ग़ज़ल का सफ़र :  ग़ज़ल का सफ़र आज से ही प्रारंभ हो रहा है । श्री नीरज गोस्‍वामी जी को शुभारंभ के लिये चुना है कि वे आज सबसे पहले इसका अवलोकन करेंगें और पहली टिप्‍पणी देंगें और उसके बाद ये ब्‍लाग आमंत्रितों के लिये खोल दिया जायेगा । ग़ज़ल का सफ़र ब्‍लाग उस ऊहापोह का समापन करने का प्रयास है जिसमें पिछले एक साल से उलझा था । ऊहापोह ये कि अब आगे की बातें सार्वजनिक कैसे की जाएं । बस उसको लेकर सोचते सोचते यहां तक पहुंचा कि यहां पर ही आगे की बातें बताई जाएं । इस ब्‍लाग पर सिवाय ग़ज़ल की व्‍याकरण तथा तकनीक के कुछ और नहीं होगा । केवल एक ही बात होगी ग़ज़ल की । उसमें भी विशेष तकनीक की बात की जाएगी । हालंकि हो सकता है कि कुछ बातें दोहराई जाएं लेकिन उसमें भी कोशिश की जाएगी कि कुछ नया किया जाए । कुछ ऐसा जो कि पिछले से अलग हो । कई लोग कहते हैं कि बहर वगैरह तो हमें आती नहीं काफिया रदीफ पता नहीं, हम तो जो मन में आए लिख देते हैं । मेरा ऐसा मानना है कि यदि आप नियम को ही नहीं मान रहे हैं तो फिर लिख ही क्‍यों रहे हैं । ये लोग सीखने से बच रहे हैं । सीखने की कोई उम्र नहीं होती ये बात हम निर्मला दी से सीख सकते हैं उनमें सीखने की जो ललक है वो अद्भुत है ।

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नया साल ना जाने क्‍या गुल खिलाए

डॉ. मोहम्‍मद आज़म जी के मिसरे पर इस बार हम नये साल का तरही मुशायरा आयोजित कर रहे हैं । बहरे मुतकारिब का ये मिसरा है जिसमें 122-122-122-122 का वज्‍़न है । और जो लोग बहरों के बारे में नहीं जानते हैं उनके लिये ये कि ललाला-ललाला-ललाला-ललाला  को गा लें बहर समझ में आ जायेगी ।

आज की शुरूआत डॉ. मोहम्‍मद आज़म साहब की ग़ज़ल के साथ ही करते हैं । आज़म जी अब कोई अपरिचित नाम नहीं हैं । पिछली तरही में वे खूब दाद बटोर कर गये हैं । इस बार चूंकि मिसरा उनका ही था इसलिये हम उनसे ही आरंभ करते हैं ।

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डॉ. मोहम्‍मद आज़म 

खुदा दिन न ऐसे किसी को दिखाए
जब उसका ही साया उसी को डराए

सदा एक ऐसी मेरे दिल से आए
कोई जैसे बिछड़े हुए को बुलाए

नये देश में ख़ूब रं‍गीनियां हैं
मगर मुल्‍क अपना न हम भूल पाए

मुझे याद हैं वो मुसीबत के दिन जब
मिरे अपने भी बन गए थे पराए

हर इक साल गुज़रा है नीरस अभी तक
''न जाने नया साल क्‍या गुल खिलाए''

ये है दर्द सहने की ताक़त पे निर्भर
कराहे कोई तो, कोई मुस्‍कुराए

मैं उस राह पर दौड़ता फिर रहा हूं
फरिश्‍तों के जिस पर क़दम डगमगाए

ख़ता है यही, सच को सच कह दिया है
हर इक शख्‍़स मुझ पर है पत्‍थर उठाए

अदा से मिरी कशमकश में फंसा हूं
न तू दूर जाए, न तू पास आए

हर इक रास्‍ते से जो वाकि़फ थे आज़म
वही मंजि़लों तक कभी जा न पाए

ठीक वीरेंद्र सहवाग की तरह धमाकेदार शुरूआत की है तरही की डॉ आज़म ने । मेरे विचार में लगभग हर विषय को उन्‍होंने स्‍पर्श कर दिया है । फिर भी मुझे सबसे ज्‍यादह पसंद आया है मकता । मकते में बहुत खूबी से उन्‍होंने तंज कसा है । ये आनंद का मकता है निर्मल आनंद का मकता  । आप सब आनंद लीजिये दाद दीजिये और अपनी बारी आने की प्रतीक्षा कीजिये । इस बार भी तरही में बहुत धमाकेदार प्रस्‍तुतियां होने जा रही हैं । कई वरिष्‍ठ जनों ने इस बार भी अपना आशिर्वाद तरही को प्रदान किया है । उनकी प्रस्‍तुतियां तो विंटेज क्‍लासिक की तरह होंगीं हीं साथ में पाठशाला के विद्यार्थियों में भी जबरदस्‍त प्रदर्शन की उत्‍साह है । इस बार कई सारे लोग पहली बार तरही में आ रहे हैं । सो उनका भी स्‍वागत होगा । इसी बीच नीरज जी ने शायद ग़ज़ल का सफ़र का फीता काट कर उसका उद्घाटन कर दिया होगा मैं उधर जाता हूं आप इधर संभालें । दाद देते रहें तालियां बजाते रहें । नव वर्ष शुभ हो मंगलमय हो ।

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