सोमवार, 23 अगस्त 2010

रक्षा बंधन का ये पावन त्‍यौहार, इस त्‍यौहार के दिन तो केवल और केवल बहनों की ही बात होनी चाहिये । तो आज की तरही में भी आ रही हैं बहनें ही ।

देखते ही देखते साल बीत जाता है । और फिर से सारे त्‍यौहार आ जाते हैं । अभी पिछला साल बीता ही है कि नया आ गया । फिर से राखी आ गई । राखी, एक छोटा सा धागा, जो जब बंधता है तो अपने साथ सारी कायनात को बांधने की ताक़त रखता है  । स्‍त्री के कितने रूप हैं, मां, बहन, पत्‍नी, प्रेमिका, लेकिन बहन के रूप में स्‍त्री का नेह सावन के उन बादलों की तरह ही होता है जो हर पल हर क्षण केवल अपने भाई पर ही बरसते रहना चाहते हैं । हम सौभाग्‍यशाली हैं कि हमने भारत में जन्‍म लिया क्‍योंकि यहीं तो हमने जाना कि बहन और भाई के रिश्‍ते की व्‍यपकता क्‍या है । एक छोटा सा धागा जब बंधता है तो वो रिश्‍तों का कैसा संसार रच देता है ।

आज के तरही में सात बहनें हैं । इनमें से दो की ग़ज़लें तो आप पहले ही पढ़ चुके हैं लेकिन आज फिर से एक बार उनकी ग़ज़लों को पढि़येगा क्‍योंकि आज तो उनका ही दिन है । हां आज भाई होने के नाते मैं उनके उन पत्रों को भी सार्वजनिक कर रहा हूं जो इन बहनों ने ग़ज़ल के साथ भेजे थे । और हां आज बीच बीच में मैं बक बक करने नहीं आऊंगा, आप एक साथ पूरी गज़लें सुनें और आनंद लें । लावण्‍या दीदी साहब ने आज के लिये एक विशेष कविता भेजी है जो रिश्‍तों के ताने बाने में बुनी हुई है उसका अपना ही एक आनंद है ।

नुसरत दीदी और कंचन की ग़ज़लें पढने के लिये नीचे उनकी तस्‍वीर पर क्लिक करें और सुनें ।

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कंचन चौहान           नुसरत दीदी

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फलक पे झूम रहीं सांवली घटाएं हैं

वर्षा मंगल तरही मुशायरा  

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seema-gupta-2

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सीमा गुप्‍ता 

कुछ दो चार पंक्तियाँ लिखी हैं देखिएगा........ये ग़ज़ल का काम मेरे बस का नहीं.........क्या करूं.....?????

ये बादलों की पहाड़ों के संग वफाएं हैं 
फलक पे झूम रहीं सांवली घटाएं हैं

लचकती चाल हवाओं की हाय क्‍या कहना
किसी हसीन की क़ातिल सी ज्‍यों अदाएं हैं

फिजाएं पहने हुए हैं फुहार की झांझर
हरी भरी सी दरख्‍तों की अब कबाएं हैं 

मेरे ख़याल में दिन रात तू ही रहता है 
हमेशा साथ मेरे तेरी ही सदाएं हैं

Raksha8 copy2

 shar di

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शार्दूला दीदी

हा हा भैया, काले चोर का ख़त पढ़ा...ये देखिये आज लंच में क्या भुरता बनाया है मैंने इस ग़ज़ल (??) का : ) किसी दिन लम्बी बात करेंगे, बच्चों को प्यार देना और जब वो बदमाशी करें तो मुझे याद कर के उन्हें डांटना मत... सोचना दी को पता चला तो आ के पिटाई करेंगी... :) टाफी की बात पे एक वार्ता और उच्च समिति बैठाई जायेगी... निष्कर्ष बीबीसी द्वारा सूचित किया जाएगा :) शुभाशीष...दी :)भाई आप बड़ा काम करवाते हैं... मुझे तो आज सुदामा के चिवड़े याद आ रहे हैं... आपके बज़्म में क्या लायें , क्या परोसें... झेलिये :)

नवेली पौध ने दीं दुधमुही सदाएं हैं
फ़लक पे झूम उठीं सांवली घटाएं हैं

जमात चार पढीं, तो ज़मीनें बेचीं क्यों 

मिला न काम, मिलीं आत्मवंचनाएं हैं

नदी, तलाब नहीं और है न सागर ये

धरा के देह की दूषित हुईं शिराएं हैं

कलैंडरों से सरकने लगे तपे मौसम
गुमीं तिजारती खग-वृन्द की दिशाएं हैं
 

खुले पहाड़, ज़मीं, आसमां नहीं मिलते
अभागे चाँद से मिलतीं न अब विभाएं हैं

कभी गरीब को मिलता नहीं है शहज़ादा

कहानियों में लिखीं सिर्फ कल्पनाएं हैं  

Raksha8 copy2

Sudha di

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सुधा दीदी

मैं नहीं जानती यह क्या बना है ...

फलक पे झूम रही साँवली घटाएँ हैं 
लगीं चमकने हृदय में भी क्षण प्रभाएं हैं

वो मुझसे  मिलने था आया मगर न मिल पाया
उसी के ग़म में उदासी भरी दिशाएं हैं 

वो पास था तो न जाना उसे, मगर अब वो
चला गया तो लहू रो रहीं वफाएँ हैं

हैं बेवफाई के चर्चे तो उसके हर सूं अब
बुझे चराग़ हैं, रोती हुई हवाएं हैं

वतन को छोड़ के बेटा हुआ है परदेशी
उदास मां है मगर लब पे बस दुआएं हैं

नसीब में है 'सुधा' पान कब यहां सबके
गरल को पी के भी जीने की बस सज़ाएं हैं

 Raksha8 copy2

Nirmla Kapila di

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निर्मला दी

प्रिय सुबीर तरही के लिये एक गज़ल लिखी है आपके पुराने शिष्य तो इतने सध चुके हैं कि उन्हें मेरे जैसे पहली जमात के बच्चे की कोई गज़ल अच्छी नही लगती-- आपको भेज रही हूँ बस ये समझना कि मेरी शुरूआत है। मुझे सिहोर आ कर आपको विधिवत गुरू धारना है नही तो एक भाई से मै कुछ नही सीख पाऊँगी क्यों कि आप बडी होने के नाते मुझे न डाँट पायेंगे न कुछ कह पायेंगे और जब तक सख्ती नही होगी तब तक कुछ सीखा नही जायेगा। देखती हूँ कब आ पाती हूँ। अभी कुछ सेहत ठीक हो जाये।

फलक पे झूम रही सांवली घटाएं हैं
तभी तो आज हुईं बावरी हवाएं हैं

अदा से शान से भंवरे मचल रहे देखो
खिली खिली सी चमन में सभी लताएं हैं

न ठौर है न ठिकाना कोई अभी अपना
उन्‍हीं के दिल में बनाने की योजनाएं हैं

गुनाहगार सज़ा पाए ये चलो माना 
तेरे जहां में मगर प्यार पर सजाएं हैं

झुका के सर को तेरे दर पे शुक्र क्‍यों न करूं
नयामतें हैं तेरी, सब तेरी दुआएं है

मेरे ही मर्ज की बस उनमें है नहीं कोई 
यूं होने को तो यहां सैंकड़ों दवाएं हैं

जो एक राह हुई बंद तो न घबरा तू  
अभी खुली हुईं बाकी सभी दिशाएं हैं

 Raksha8 copy2 lavnya didi sahab

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लावण्‍या दीदी साहब

घर से जितनी दूरी तन की,
उतना ही नजदीक मेरा मन,
धूप छाँव का खेल जिंदगी
क्या वसँत और क्या है सावन!
नयन मूँदते ही दिखते हैं
मिट्टी के वो ही घर आँगन,
वही पिता की पुण्य छवि औ'
सजल नयन पढ़ते रामायण !
आटे लिपटे हाथ वो मां के 
वह सोँधी रोटी की खुशबु,
बहनोँ का वह निश्छल हँसना
साथ साथ, रातोँ को जगना !
वे शैशव के दिन थे न्यारे,
कितने थे अंबर पर तारे!
कितनी परियाँ रोज उतरतीँ,
सपनोँ मेँ आ आ कर मिलतीँ.
" क्या भूलूँ, क्या याद करूँ ? मैं "
अपने घर को या बचपन को ?
दूर हुआ घर का अब रस्ता,
कौन मेरा अब रस्ता तकता ?
ये है अनुभव की एक पुडि़या ,
सुन ले बहना रानी गुडि़या

आज तो मानो आनंद ही बरस गया है । काफी सारे शेर ऐसे हैं जो कोट करने लायक हैं । लेकिन आज तो मैंने चुप रहने की ही कह दी थी क्‍योंकि आज तो मैं मौन रह कर इस आनंद को महसूसना चाहता हूं । आनंद जो गुणी बहनों के भाई होने का आनंद है । आप भी आनंद लीजिये बहनों की रचनाओं का ।

25 टिप्‍पणियां:

  1. सच मे आनंद आ गया………………सभी एक से बढकर एक हैं………………इस मुशायरे का तो अन्दाज़ ही निराला है।
    रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनायें।

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  2. वाह आज तो ब्लॉग सच में निखरा हुवा है ... बहुत ही पावन सज़ा है राखी की प्रीत लिए ....

    लचकती चाल हवाओं की .... क्या कहने हैं इस शेर के .... सीमा जी ने बहुत ही हसीन शेर कहा है .....
    जमात चार पढ़ीं ..... शार्दुल जी की संजीदगी और संवेदना इस शेर के माध्यम से सामने आ रही है ...
    वतन को छोड़ के बेटा हुवा है परदेसी .... सुधा दीदी ने रुला दिया इस शेर में इस परदेसी को ....
    न ठौर है न ठिकाना ... निर्मला जी ने बहुत ही दार्शनिक अंदाज़ में दूर की बात की है ... जीवन का फलसफा लिख दिया है .
    और लावण्या दी ने तो बचपन की यादों में पहुँचा दिया .... अंदर तक भिगा गयी ये कविता ...

    आज सच में ये मुशायरा अपनी उँचाइयों पर पहुँच गया है ....

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति
    रक्षाबंधन पर पर हार्दिक बधाई और शुभकामनाये.....

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  4. पंकज जी, आदाब.
    आपने सच ही कहा, रिश्तों के बंधन और इनकी मान मर्यादाएं ही हमारी भारतीय संस्कृति की पहचान है.
    आज की तरही में सभी रचनाएं अभीभूत करने वाली रहीं, सभी को बधाई...
    रक्षा बंधन के पुनीत पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएं.

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  5. बहुत सुन्दर..सभी बहनों का स्नेह भाइयों को मिलता रहे इससे बेहतर और क्या हो सकता है| सभी गज़ले बेहतरीन है| रक्षाबंधन की ढेरों शुभकामनाएं|

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  6. तरही में लगी कवितायेँ देखीं -
    आपकी मेहनत , उजागर है -
    सब प्यारी बहनों को
    मेरा स्नेह सिक्त प्यार व नमन
    स - स्नेह
    - लावण्या

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  7. भाई-बहिन के पावन पर्व रक्षा बन्धन की हार्दिक शुभकामनाएँ!
    --
    आपकी पोस्ट की चर्चा यहाँ भी है!
    http://charchamanch.blogspot.com/2010/08/255.html

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  8. आप सबको रक्षा-बंधन की शुभकामनाएं!
    सुबीर भैया, गौतम और कंचन को बहुत आशीषें. दीदी लोगों को सादर प्रणाम!
    अब तरही:
    कंचन को मैंने लिखा था कि मुझे उसके दो शेर, "मेरी सपाट हँसी..." और "मैं जब उदास थी...." बहुत खूबसूरत लगे थे...आज भी वो मन मोह गए!
    -------
    नुसरतजी से कहना चाहुँगी पहले कि उनके चेहरे की भंगिमा मुझे अपने एक बहुत प्रिय जने की याद दिलाती है सो उनकी तस्वीर पे अटकी रही थोड़ी देर तक:)
    बहुत खूबसूरत ग़ज़ल, हर शेर में एक हेजी से मूवमेंट का अहसास, जैसे धुआंसे-धुआंसे शेर हों !
    उनके ये शेर बहुत असरदार:
    "धुएं में डूबी..." बहुत ग्राफिक! इमेजरी से भरा हुआ, चित्र बनाता सा शेर...
    " ये धड़कने किसी साईल...."- बहुत ही सुन्दर, लगा जैसे किसी की मज़ार पे कोई पढ़ रहा है ये शेर...
    " है कैसा दौर..." ये एक ज़रूरी बात समझने- मन में समोने लायक.
    "अजीब रंग है ..." बहुत सादगी से सूक्ष्म बात कही है इस शेर में.
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    सीमाजी का " फिजायें पहने हुयें हैं ..." बहुत ख़ूबसूरत!
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    मुझे जो मेरे दो शेर पसंद थे वो नहीं है यहाँ यानि उन दोनों में बहर की गलती होगी... :) सो सुबीर भैया ये आपका ये नेह सिर आँखों पे ... किसी दिन सच में बैठ के ग़ज़ल लिखना सीखूंगी ज़रा लेखन में कविताओं से फ़ुर्सत जो मिले!
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    सुधादीदी, प्रणाम:) आपका "क्षण प्रभाएं" वाला शेर और " वतन को छोड़ के ..." बहुत ही खूबसूरत ...
    "क्षण प्रभाएं" का इस्तेमाल मन को खुश कर गया ... माँ की दुआएं मन को भिगो गईं.
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    निर्मला दी की योजनायें, सजायें दोनों शेर उनकी एवरग्रीन शक्सियत के द्योतक है :) सुन्दरता से कही हुई बात!
    दुआएं है ... वाला शेर हम सब पे लागू. दिशायें हैं वाला शेर भी बहुत सुन्दर भाव लिए, मुझे लगा कि 'सभी' के बजाये यहाँ 'कई' हो दूसरे मिसरे में तो शायद ज्याद जंचे.
    --------
    लावण्यादी, सादर प्रणाम! कविता में मन निचोड़ के रख दिया है, क्या कहूँ ... हर बात जैसे मन की बात हो , यही तो कहना था... बहुत बहुत बहुत ही सुन्दर!
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    ये पावन पर्व आप सब के जीवन में खुशियाँ लाये और विषाद को समाप्त करे, इसी कामना के साथ..शार्दुला

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  9. रक्षा बंधन के इस पावन पर्व की छटा देखते ही बन रही है.
    क्या कहूँ मैं... अन्दर गहरे तक भिगो गया ये मुशायरा और उसकी ख़ास प्रस्तुति.
    कंचन दी, नुसरत दी, सीमा दी, शार्दूला दी, सुधा दी, निर्मला आंटी और लावण्या दी... आप सभी को बहुत बहुत शुभकामनाएं!!

    एक से एक शेर ऐसे सुनने को मिलेंगे कभी सोचा नहीं था. इस अनोखी और महान प्रस्तुति पर आचार्य जी को बहुत बधाई!!

    फिजाएं पहने हुए हैं फुहार की झांझर... क्या ख़ूबसूरत नज़ारा है.
    कैलेंडरों से सरकने लगे तपे मौसम... क्या अंदाजे बयाँ है.
    उदास माँ है मगर लब पे बस दुआएं हैं... यहाँ तो ठहर गया मै.
    उन्‍हीं के दिल में बनाने की योजनाएं हैं ... और
    मेरे ही मर्ज की बस उनमें है नहीं कोई
    यूं होने को तो यहां सैंकड़ों दवाएं हैं ... बहुत ख़ूब.
    नयन मूँदते ही दिखते हैं
    मिट्टी के वो ही घर आँगन.... घर से तो मैं भी दूर हूँ. बस यहीं से आनंद और पीड़ा की मिश्रित अनुभूति हो रही है.

    घर पर सभी बहनों को भी इस भाई का प्यार और आशीर्वाद मिले. आचार्य जी, आज आपके बहुत करीब महसूस कर रहा हूँ सो सिहोर में भी इस भाई के तरफ से सभी बहनों को शुभकामनाएं!!
    - सुलभ

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  10. वाह मास्साब, आज की महफिल भी खूब रही...रक्षाबंधन के मौके पर...आनन्द आ गया.


    सभी को रक्षा बंधन की हार्दिक शुभकामनाएँ.

    उत्तर देंहटाएं
  11. तरही में एक से बढ़ कर एक गज़ल प्रस्तुत करने के लिये आपको हार्दिक धन्यवाद. बात अंकित की हो या कंचन की, नीरजजी की गज़ल लें या तिलकराजजी की. सभी दाद की सीमाओम से परे. रविकान्त के नये प्रयोग अच्छे लगे. अपनी ओढ़ी हुई व्यस्तता के कारण हर बार आकर टिप्पणी दे पाना नहीं हुआ लेकिन पढ़ कर जो आनन्द प्राप्त हुआ वह शब्दों में नहीं बँधेगा.

    सभी को शुभकामनायें

    उत्तर देंहटाएं
  12. रक्षा बंधन के शुभ अवसर पर इस ब्लॉग का रूप रंग देखते ही बनता है, आदरणीय पंकज भाई जी ने खूब मेहनत की है उनका आशीर्वाद और स्नेह हम पर यूँही बना रहे . दो दिन के अवकाश के कारन ब्लॉग पर नहीं आ सकी. यहाँ उपस्थित सभी "दी" को सादर प्रणाम करते हुए सभी का शुक्रिया अदा चाहूंगी की इस मौके पर एक से एक ग़ज़ल और कविता पढने को मिली. एक बार फिर सभी को रक्षा बंधन की हार्दिक शुभकामनाएँ.

    regards

    उत्तर देंहटाएं
  13. ये भाईयों वाला त्योहार नहीं आता कभी क्या..कि जब हमारी भी तस्वीरें सजे इस ब्लौग पर?

    फिलहाल शार्दुला दी की ग़ज़लों में डूबा हुआ हूं। अन्य बहनों की ग़ज़लो पर अलग से आना होगा। शार्दुलादी के दो शेर बे-बहर थे सुनकर बड़ा मजा आया। बहुत डांट लगाती रहती हैं....

    उत्तर देंहटाएं
  14. @ गौतम,
    अरे वह प्यारेलाल! ऐसे थोड़ी फ़ोकट में खुश हो लोगे, ये लो शेर इन्हें बहर में कर के दो :)
    नहीं हमीद जनम लेते अब यहाँ मुंशी
    तवे पे हाथ जलातीं तो अमीनाएं हैं ----> (आमिनाएं ) ??

    चुभी मसीह के हाथों में कोई कील नहीं
    ये दागदार हुईं दोस्त की ज़फाएं हैं
    सस्नेह, दी
    ========
    @लावण्या दीदी,
    "सजल नयन पढ़ते रामायण...", आज दूसरा दिन हो गया, ये पंक्ति साथ नहीं छोडती है... क्या करूँ!
    नमन!
    सादर, शार्दुला

    उत्तर देंहटाएं
  15. माँ निर्मला के साथ साथ सभी दीदी को सदर प्रणाम ,....
    राखी जैसे त्यौहार के बारे कुछ कहना मेरे बस की बात नहीं ... आज ब्लॉग पे सभी गुनी बहनों को देख और पढ़ बड़ा आनंद आया ... बहुत अछे अछे शे'र निकाले गए हैं इन सभी के द्वारा देख कर खुद पर शर्म कर रहा हूँ और अपने पे लानत .... वाकई नुसरत दीदी ने जिस तरह से तरही की शुरुयात कि थी ग़ज़ल कि फिर बहन कंचन और अब ये सभी कमाल ही है ये तो ... अब तो गुरु जिसे गुजारिश ही करूँगा कि मेरी ग़ज़ल को ना लगायें तरही में ....

    अर्श

    उत्तर देंहटाएं
  16. guru ji pranaam,

    सच मे आनंद आ गया………………

    सभी गज़ले बेहतरीन है| रक्षाबंधन की ढेरों शुभकामनाएं|

    रक्षा बंधन पर्व इससे बेहतर और क्या हो सकता है|
    सभी का आशीर्वाद और स्नेह हम पर यूँही बना रहे

    (copy past tippani hai)
    jald hi fir se ataa hoon

    -venus kesari

    उत्तर देंहटाएं
  17. त्यौहार की छटा देख मन खुश है।

    ब्लॉग देख कर दीदी की टिप्पणी है.. "लो तुम अपने गुरू जी के भी गले का फंदा बन गई हो...!!!"

    समझ नही पा रही इस टिप्पणी पर रोऊँ या हँसू :( :(

    नुसरत दी की गज़ल की तारीफ के शब्द पहले ही कम थे दोबारा काहें मेहनत करवा रहे हैं।

    सीमा जी ने मतला सुंदर बाँधा है।

    सुधा दी ने क्षण प्रभाएं का प्रयोग अच्छा किया है।

    ब्लॉग माता का शेर

    ना ठौर है ना ठिकाना कहीं अभी अपना,
    उन्ही के दिल में बनाने की योजनाएं...!

    यहाँ वृंदावन आवास योजना, नेहरू आवास योजना, इंदिरा आवास योजना जैसी कई योजनाएं देखीं ये किस योजना के अंतर्गत आता है कृपया बताये तथा नियम एव शर्तों से भी अवगत करायें। :)

    लावण्या दी का गीत कई कई बार पढ़ा... बहुत भावुक किया इसने कल से आज तक

    शार्दूला दी दूसरे से ले कर अंतिम शेर और साथ में वो शेर जो शायद बेबहर है... (मुझ पागल को तो कुछ लगता ही नही):( सब वाह वाह वाह वाह वाह....!!!! आप जब नहीं लिखती तब इतना अच्छा कैसे लिख लेती हैं कुछ प्रकाश डालेंगी क्या ???

    वीर जी एक गुरू जी हैं, इतना बड़ा आयोजन कर रहे हैं बहनो के लिये और एक आप हैं, खुद से तो कुछ करते नही बना उल्टा ईर्ष्या अलग से कर रहे हैं....!! सुधार लाइये कुछ खुद में गुरू जी को देख कर...!!

    उत्तर देंहटाएं
  18. सभी रचनाएँ बहुत अच्छी लगीं.

    सीमा जी ने इतने अच्छे अशआर निकालें हैं और फिर भी कहती हैं गज़ल उनके बस की बात नहीं. मैं बिलकुल नहीं मानता.

    शार्दूला जी का शेर "कभी गरीब को मिलता नहीं है शहजादा.." बेहद अच्छा है. आसान शब्दों में कहा शेर मन को छू गया.

    सुधा जी की गज़ल के शेर भी क्या कहने. "वो मुझसे मिलने आया था.." और "वतन को छोड़ कर बेटा हुआ है परदेसी.." कमाल के हैं.

    निर्मला जी की गज़ल का मतला तो लाजवाब है. गिरह बहुत ही अच्छी बाँधी है.'दवाएं, दिशाएं और दुआयें काफियों वाले शेर भी बहुत अच्छे लगे.

    लावण्या जी की कविता की पहली दो पंक्तियाँ तो मानो उन्होंने मेरे ही मन की बात लिख दी.
    "आते लिपटे हाथ वो माँ के, वह सोंधी रोटी की खुशबू", "क्या भूलूँ क्या याद करूँ में, अपने घर को या बचपन को." वाह. बहुत ही अच्छी कविता.

    उत्तर देंहटाएं
  19. सुधाजी ,
    वतन को छोड़ के बेटा हुआ है परदेशी ,
    उदास माँ है मगर लब पर बस दुआएं हैं |
    बड़े ही आसान लफ़्ज़ों में आपने सच्ची बात कह डाली है | आपकी कवितायेँ एवं ग़ज़लें पढने का
    अक्सर अवसर मिलता है लेकिन पहली बार टिप्पणी कर रहा हूँ | आपकी कविता मुझे त्रिपाठी भाई
    ने भेजी थी |

    उत्तर देंहटाएं
  20. सुधाजी ,
    वतन को छोड़ के बेटा हुआ है परदेशी ,
    उदास माँ है मगर लब पर बस दुआएं हैं |
    बड़े ही आसान लफ़्ज़ों में आपने सच्ची बात कह डाली है | आपकी कवितायेँ एवं ग़ज़लें पढने का
    अक्सर अवसर मिलता है लेकिन पहली बार टिप्पणी कर रहा हूँ | आपकी कविता मुझे त्रिपाठी भाई
    ने भेजी थी |

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  21. एक ही टिपण्णी में सभी बहनों की ग़ज़लों पर कुछ भी कहना संभव नहीं है...और इतनी सारी टिपण्णी देना भी संभव नहीं...फिर क्या करें...बस इतना ही कहना चाहता हूँ के इन सब को पढ़ कर अभूतपूर्व आनंद प्राप्त हुआ...ऐसी विलक्षण बहने दुनिया के हर भाई को मिलें...आमीन...

    नीरज

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  22. सीमा जी का शेर "फिजाएं पहने हुए हैं फुहार की झांझर", शार्दूला जी का "कलैंडरों से सरकने लगे तपे मौसम", आदरणीय सुधा जी का "वो मुझसे मिलने था आया मगर न मिल पाया", आदरणीय निर्मला जी का "झुका के सर को तेरे दर पे शुक्र क्‍यों न करूं", आदरणीय लावण्या जी की नज़्म से "क्या भूलूँ, क्या याद करूँ ? मैं " अपने घर को या बचपन को ?" अहा .................... कितने बेशकीमती अशआर है.
    आदरणीय नुसरत जी और कंचन दीदी की ग़ज़लें बिना फोटो पे क्लिक किये ही ज़ेहन में ताज़ा हो गयी हैं..............

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  23. लावण्या दी की सहज, सरल और हृदयस्पर्शी कवित समझ में आ गई और बहुत अच्छी लगी। भाइयों और मायके से दूरी भले ही हो पर प्रेम सदा बना रहे।

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