सोमवार, 25 मई 2009

आज आप समझेंगे, इस नज़र की खामोशी : कंचन चौहान, काट लूँगा उम्र-भर मैं रह-गुज़र की खामोशी : दिगम्‍बर नासवा, थरथराते होंठों पर ये सिसकती खामोशी : मीनाक्षी धनवंतरी

सबसे पहले तो ये कि मेरे विचार में कुछ ब्‍लाग ऐसे हैं जो कि इंटरनेट एक्‍सप्‍लोरर पर नहीं खुल पा रहे हैं शायद उनमें मेरा ब्‍लाग भी शामिल है । सो यदि आपके साथ भी ऐसा हो रहा हो तो एक काम करें कि इस ब्‍लाग को या तो मोजिला  पर खोलें या फिर गूगल क्रोम पर । क्‍योंकि जो ब्‍लाग इंटरनेट एक्‍सप्‍लोरर पर नहीं खुल पा रहे हैं वे इन दोनों पर खुल रहे हैं ।

एक और अच्‍छी खबर है वो ये कि परम श्रद्धेय कुमार गंधर्व साहब के सुपुत्र श्री मुकुल शिवपुत्र जी के बारे में जो कुछ मैंने लिखा था कि वे फक्‍क्‍ड़ अवस्‍था में घूम रहे हैं तो वैसा होने के पीछे वही कारण था जो अक्‍सर कलाकारों में आ जाता है कि वे अचानक ही मोहभंग वाली स्थिति में आ जाते हैं और उनको ऐसा हो ही जाता है । वो कहते हैं ना जिंदगी को जो समझा जिंदगी पे रोता है तो वैसा ही कुछ कलाकारों के साथ भी हो जाता है । एक और शेर है जिंदगी को क़रीब से देखो इसका चेहरा तुम्‍हें रुला देगा  ।  बस वही बात कलाकारों के साथ भी हो जाती है वे जिंदगी को इतना करीब से देख लेते हैं कि उनको जिंदगी से मोह खत्‍म हो जाता है । कबीर का फक्‍कड़पन हो या सूफी संतों का फक्‍कड़पन उसमें एक प्रकार का जिंदगी पर हंसने का भाव होता है । खैर अच्‍छी खबर ये है कि मध्‍यप्रदेश के संस्‍कृति मंत्री श्री लक्ष्‍मीकांत शर्मा  ने एक बहुत अच्‍छा काम किया है । वैसे श्री शर्मा एक अत्‍यंत साहित्‍य अनुरागी प्राणी हैं । वे कवि सम्‍मेलन में स्‍वयं मंच से नीचे श्रोताओं में बैठ कर पूरा कवि सम्‍मेलन सुनते हैं । खैर तो श्री शर्मा ने श्री शिवपुत्र को भोपाल में रहने पर राजी कर लिया है और अब संस्‍कृति विभाग भोपाल के संस्‍कृति भवन में ही एक खयाल गायकी का प्रशिक्षण केन्‍द्र आज से प्रारंभ करने जा रहा है जहां पर श्री मुकुल शिवपुत्र नयी प्रतिभाओं को खयाल गायकी सिखाएंगें । आज शाम सात बजे उस केन्‍द्र का उद्घाटन है ।

चलिये आज बात करते हैं अंतिम दौर के शायरों की जिनमें दो शायराएं भी हैं ।

कंचन चौहान  ग़ज़ल की पाठशाला की सबसे पुरानी सदस्‍य हैं कहें तो पिछले दो सालों से कक्षा में हैं । इनकी एक और विशेषता ये है कि ये खूब मन लगाकर पढ़ती तो हैं लेकिन होमवर्क करने का नाम जान पर बनती है । जितना मैं जानता हूं उससे तो ये ही पता चलता है कि ये पूरे ब्‍लाग जगत की सबसे चहेती कवियित्री हैं हां ये अलग बात है कि अपने ब्‍लाग पर कविता कम करती हैं चटर पटर बातें ज्‍यादा करती हैं । तो सुनिये इनकी ग़ज़ल ।

कंचन चौहान - तरही मुशायरा शुरू भी हो गया और हम वादा फिर नही पूरा कर पाये। मगर तरही मुशायरा में तकीतई और चीरफाड़ ना होने का फायदा उठा कर, कल रात के २ बजे जो सामने आया, वो भेज रही हूँ, इस डर से कि हर बार गोल करने से कहीं गुरुकुल से मुझे ही ना गोल कर दिया जाये। मीटर पर नही बैठाया है, बस लय में आ रहा था, लिखती चली गई।

जान ले के जायेगी, ये कहर की खामोशी,
कब खुदारा टूटेगी, उस नज़र की खामोशी।

आँख भीग कर सारे भेद खोल जाती है,
हम छिपा न पाते हैं, दिल जिगर की खामोशी।

पैर के निशाँ बेशक, ले गई लहर लेकिन,
मन में अब भी बैठी है, रेत पर की खामोशी।

रोज आप आते हैं, रोज सोचते हैं हम,
आज आप समझेंगे, इस नज़र की खामोशी।

आपके मिजाजों से, और गर्म लगती है,
कितनी जानलेवा है, दोपहर की खामोशी

पा के शोर करता है, है अजब ये सागर भी,
दे के कुछ नही कहती, है लहर की खामोशी

कंचन आपको लय छंद की जरूरत क्‍या है जो भी गा दो वो गीत हो जाये ।

दिगम्‍बर नासवा दिगम्‍बर नासवा की छंदमुक्‍त कविताओं का मैं जबरदस्‍त प्रशंसक हूं । विशेषकर प्रेम की कविताओं में वे जो बिम्‍ब लाते हैं वे अनोखे होते हैं । जहां तक ग़जल की बात है तो अभी बहुत लम्‍बा सफर तय करना है । किन्‍तु ये अच्‍छी बात है कि वे लिख रहे हैं और अब बहुत आत्‍म विश्‍वास के साथ लिख रहे हैं । और जो सबसे अच्‍छी बात है वो ये है कि उनके पास भाव हैं । जिसके पास भाव हैं उसे व्‍याकरण तो सिखाया जा सकता है लेकिन जिसके पास केवल व्‍याकरण हो उसे भाव कौन सिखायेगा । तो लीजिये ग़ज़ल

नफरतों से देखती तेरी नज़र की खामोशी

मार ना दे फिर मुझे तन्हा सफ़र की खामोशी

धूप की गठरी सरों पर बूँद भर पानी नहीं

कितनी जानलेवा है दोपहर की खामोशी

चाहता हूँ खोलना दिल की किताबें बारहा

बोलने देती नहीं है उम्रभर की खामोशी

तू मेरी तन्हाई में चुपके से आ जाना कभी

में कहाँ सह पाऊंगा खूने-जिगर की खामोशी

तू जो मेरे साथ कर दे अपनी यादों के चिराग

काट लूँगा उम्र-भर मैं रह-गुज़र की खामोशी

शाम होते ही बुझा देता हूँ मैं घर के चिराग

जुगनुओं से महकती है मेरे घर की खामोशी

मीनाक्षी धनवंतरी जी  आप ग़ज़ल की कक्षाओं की सबसे पुरानी स्‍टूडेंट हैं लेकिन कुछ दिनों से गायब थीं और इस मुशायरे के लिये अचानक ही प्रकट हुईं हैं । बीच में माड़साब ने काफी अनुपस्‍थिति लगाई है रजिस्‍टर में । मीनाक्षी जी ने ई की मात्रा को काफिया बनाकर एक कविता निकाली है ।  बहुत दिनों बाद आयीं हैं अत: आज काफिया गलत पकड़ने पर कोई सजा नहीं । सुनिये ग़ज़ल  ।

मेरे बेजुबाँ लफ़्ज़ों पर हँसती सी खामोशी
कहती मुझे, तोड़ तू भी अपनी खामोशी
खुश्क आँखों में ठहर गई वीरान सी खामोशी
थरथराते होंठों पर ये सिसकती  खामोशी
सूरज की मार से सहमी दिशाओं की खामोशी
तपते रेगिस्तान में ये  जलाती  खामोशी
कहती मुझे, तोड़ तू भी अपनी खामोशी
कितनी जानलेवा है दोपहर की खामोशी

तो चलिये आनंद लीजिये इन ग़ज़लों का और मुझे आज्ञा दीजिये । अगली कक्षा में मिलते हैं कुछ नयी जानकारियों के साथ ।


 

15 टिप्‍पणियां:

  1. आज वास्‍तव में मुशायरे की अंतिम प्रस्‍तुतियां होनीं थीं लेकिन हमेशा लेट आने वाली उड़नतश्‍तरी ने आज ही अपनी होमवर्क की कापी सबमिट की है सो ये मान कर चलें कि अगले अंक में कक्षा के सबसे होनहार (....?) छात्र के साथ हम समापन करेंगें मुशायरे का ।
    पंकज सुबीर

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  2. जिस तरह की प्रविष्ठियां इस तरही मुशायरे में आयीं हैं उस से ये उच्च स्तर का हो गया है...कंचन जी, नासवा जी और मिनाक्षी जी ने अपनी रचनाओं से इस मुशायरे को बहुत रोचक बना दिया है...और अब समापन उड़न तश्तरी वाले समीर जी करेंगे...यानि...सोने पर सुहागा वाली बात हो जायेगी...
    एक सफल आयोजन पर आपको ढेरों बधाईयाँ...
    नीरज

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  3. Digambar Ji aur Meenakshi Ji ne achchhe bhav diye is misare ko...!

    badhaai..!

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  4. गुरुदेव..............आपकी शाबाशी मिल गयी........... मेरा आज का दिम तो बन गया.............ग़ज़ल में वाकई सीखने वाला और जानने वाला बहुत कुछ है.......... आपका आर्शीवाद रहेगा तो सीख जाऊँगा.........
    कंचा जी का ये शेर............पा के शोर करता है...........बहोत ही खूबसूरत लगा.........आप इस मुशायरे का आयोजन इतने खूबसूरत अंदाज में कर रहें है......... पता ही नहीं चलता और मुशायरे के साथ साथ इतनी बातें सीख जाते हैं हम लोग. .....

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  5. ये तरही मुशायरा दो कारणों से काफ़ी रोचक हो गया है। एक तो गुरूदेव द्वारा हर शायर/शायरा का व्यक्तित्व विश्लेषण और दूसरा पुराने खिलाड़ियों का वापस लौट आना। न सिर्फ़ लौट आना बल्कि पूरे फ़ार्म में लौटना। बधाई कंचन जी, दिग्म्बर जी और मीनाक्षी जी को।

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  6. मुकुल के बारे में जान कर हर्ष हुआ। यह जान कर कि अब ब्लाग विधा भी व्यवस्था में हस्तक्षेप कर सकती है।
    आप की ग़ज़ल की पाठशाला अद्भुत है। पर इस उम्र में इस में भर्ती होने का मन नहीं। हाँ विद्यार्थियों की कला का आनंद लेने आते रहेंगे।

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  7. आपकी खबर ने बड़ा ही सुकून दिया...

    बड़ा ही उम्दा रहा यह मुशायरा..कोई किसी से कम नहीं सब के सब लाजवाब....

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  8. teenon gazalen behatareen/lajawaab, pankaj ji , is aayojan ke liye sadhuwaad.

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  9. पँकज भाई ,
    ऐसे मुशायरे और रचनाकारोँ की क्लास और पढने को मिले सुँदर रचनाएँ तो अभार आपका... ऐसे मार्गदर्शन का... और आशा करेँ कि गुरु और शिष्य सभी सदैव तरक्की करेँ
    शुभम्स्तु,
    - लावण्या

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  10. कंचन की ग़ज़ल को कई बार पढ़ लिया....मुझे तो कहीं से बहर से बाहर जाती नहीं दिखाई दे रही।बेमिसाल शेर सब के सब...खास कर "पैर के निशां..." वाले शेर में ख्यालों और सोच की उड़ान शायरा के लिये बेपनाह आदर के भाव ले आती है। मेरी तुच्छ सोच-समझ से तो ये अभी तक का हासिले-मुशायरा शेर है।

    और गुरू जी ने दिगम्बर जी की प्रेम-कविताओं के बारे में जो भी कहा, बिल्कुल सही। हम भी दीवाने हैं उनके इन अद्‍भुत बिम्बों के।"चाहता हूँ खोलना दिल की किताबें बारहा.." वाला शेर खूब बन पड़ा है...

    मीनाक्षी जी को बधाई एक सुंदर कविता के लिये।
    अब सरकार समीर जी के आमद का इंतजार है। क्लाइमेक्स से पहले का जबरदस्त ट्विस्ट रहा ये तो गुरूवर!

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  11. i observed that one of my friend was not able to open my blog in IE

    jab ki main khol paa raha tha, in both IE and google chrome.

    Don't know, whats the issue, why she was not able to open it in IE, if that is opening at my end (in IE)

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  12. हम तो क्लास के बाहर थे...अपने आप को सबके साथ बैठा देखकर हैरान परेशान हो गए....अन्दाज़ा लगाइए कि वीक स्टूडैंट की क्या हालत होगी...."काश आजकल के गुरु(कुछ)यहाँ आकर सीखते कि गलती करने पर भी छात्र को सज़ा नही दी जाती.."
    कंचन (अजब सागर...लहर की खामोशी) और दिगम्बरजी(जुगनुओं से महकती है मेरे घर की खामोशी) का तो कहना ही क्या...

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  13. हम तो क्लास के बाहर थे...अपने आप को सबके साथ बैठा देखकर हैरान परेशान हो गए....अन्दाज़ा लगाइए कि वीक स्टूडैंट की क्या हालत होगी...."काश आजकल के गुरु(कुछ)यहाँ आकर सीखते कि गलती करने पर भी छात्र को सज़ा नही दी जाती.."
    कंचन (अजब सागर...लहर की खामोशी) और दिगम्बरजी(जुगनुओं से महकती है मेरे घर की खामोशी) का तो कहना ही क्या...

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  14. GURU DEV KO PRANAAM,
    GURU BAHAN KANCHAN NE JO SHE'R UTAARE HAI WO KAHIN SE NAHI LAGTA KE WO HOMEWORK NAHI KAR RAHI HAI .UNSE HAMESHAA BAAT HOTI RAHTI HAI AUR BAHOT SAARI BAATEN AAPKE BAARE ME KE KAISE AUR KAHAAN PE AAP KARINE SE SIKHAATE RAHTE HAI... INKAA HAR SHE'R BEHAD UMDAA HAI WO HOMEWORK CHHUPAA KAR KE KARTI HAI AAPKO BAHI NAHI BATAATI...

    USI TARAH SE DIGAMBAR JI NE BAHI ACHHE BHAV DAALE HAI ... AAPNE SAHI KAHAA HAI KE CHHANDMUKTAK LAAJAWAAB LIKHTE HAI WO....

    SAATH ME MINAAKHI JI KE IS KAVITAA NE TO MANMOH LIYAA....

    AAP TINO KO DHERO BADHAAYEE....

    AUR GURU DEV KO SAADAR PRANAAM..


    ARSH

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