शनिवार, 23 मई 2009

जाने किस सफ़र पर है मेरे घर की खामोशी : अभिनव शुक्‍ला, काफिया समझ ना आये ना बहर की खामोशी : प्रकाश अर्श

पता नहीं क्‍या हो रहा है कि इन दिनों मेरा ब्‍लाग कई बार पेरशानी कर रहा है खुलते खुलते ही अचानक नहीं खोला जा सकता का पेज आ जाता है और डुम से बंद हो जात है । ऐसा केवल मेरे ब्‍लाग पर ही नहीं हो रहा है बल्कि कई सारे ब्‍लागों पर हो रहा है । किन्‍तु ये भी सही है कि ऐसा इंटरनेट एक्‍सप्‍लोरर पर ही हो रहा है गूगल क्रोम पर तो ठीक आ रहा है ब्‍लाग । उसी के कारण ये हुआ कि एक पोस्‍ट को लगा कर हटाना पड़ा और फिर दूसरे दिन फिर से लगाना पड़ा । तो अब यदि ये ब्‍लाग नहीं खुल पाये तो गूगल क्रोम में या फिर मोजिला में खोल कर देखें ।

तरही को लेकर जो मैंने कहा कि मैं अब इसके स्‍थान पर कुछ और करना चाहता हूं तो उसके पीछे भी कई कारण हैं जैसा कि मैंने पिछली पोस्‍ट में बताया था कि जनाब रामपाल अर्शी जो कि एक बड़े शायर हुए हैं उनकी एक ग़ज़ल का बहुत ही सुंदर मकता है कफ़न कांधे पे लेकर घूमता हूं इसलिये अर्शी, न जाने किस गली में जिंदगी का शाम हो जाये । आप देखें तो दोनों मिसरों में ग़ज़ब का तारतम्‍य है । बरसों पहले इसी मकते के मिसरा सानी को किसी तरही मुशायरे में दिया गया और तब के एक युवा शायर ने उस पर गिरह कुछ इस प्रकार बांधी उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाये ।  शेर अच्‍छा है किन्‍तु आप बहुत गौर से देखें तो दोनों मिसरों में कोई तारतम्‍य नहीं है । चूंकि जिंदगी की शाम हो जाने का सीधा अर्थ होता है मौत हो जाना । अत: रामपाल अर्शी साहब का शेर मुकम्‍म्‍ल था क्‍योंकि वहां पहले मिसरे में कफ़न था और दूसरे में मौत थी दोनों एक दूसरे के पूरक हैं । किन्‍तु बशीर बद्र साहब ने जो उपयोग किया है उसे जिंदगी की शाम के स्‍थान पर सफर में शाम की तरह किया है । अर्थात हम कह रहे हैं कि अपनी यादों के उजाले हमारे साथ रहने दो जाने कहां सफर में शाम हो जाये । ये तो ठीक है । किन्‍तु जिंदगी की शाम के साथ कहीं कोई तारतम्‍य नहीं हैं । किन्‍तु आज रामपाल अर्शी को कोई नहीं जानता सब ये ही जानते हैं कि ये शेर बशीर बद्र साहब का ही है । इसी प्रकार का एक दिलचस्‍प वाक़या श्री आलोक श्रीवास्‍तव जी का भी है वो कभी विस्‍तार से बताऊंगा ।

आज बात करते हैं हम तीन युवा तुर्कों की । आज की ग़ज़लों में आपको बहर के दोष दिखाई दे सकते हैं । लेकिन चूंकि ये सीधा प्रसारण है इसलिये ऐसा ही होगा ।

सबसे पहले लेते हैं ग़ज़ल की पाठशाला के सबसे होनहार छात्र अभिनव शुक्‍ला को । किसी कारण से इन दिनों बहुत व्‍यस्‍त हैं तथा ब्‍लागिंग से भी दूर ही हैं । अभिनव बहुत अच्‍छे कवि हैं और गाते भी बहुत अच्‍छा हैं उनकी आवाज़ में कुछ कविताएं सुनने का मौका मुझे पिछले दिनों मिला । चलिये पहले तो सुनते हैं उनकी ग़ज़ल । ग़ज़ल पूरी तरह से बहर में भी है और कहन में भी है ।

रहगुज़र की खामोशी हमसफ़र की खामोशी
कितनी जानलेवा है दोपहर की खामोशी,

हिंदी और उर्दू में सिर्फ़ फ़र्क इतना है,
ये नगर की खामोशी वो शहर की खामोशी,

और क्या कहूँगा मैं और क्या सुनोगे तुम,
सब तो बोल देती है इस नज़र की खामोशी,

हम करीब होकर भी दूर दूर रहते हैं,
जाने किस सफ़र पर है मेरे घर की खामोशी,

लखनऊ से गुज़रे हैं लोग तो बहुत से मगर,
साथ सिर्फ़ कुछ के है उस डगर की खामोशी.

एक शेर मुझे खास पसंद आया है और क्‍या कहूंगा मैं वाला । इसका मिसरा सानी बहुत मासूम है  ।

चलिये अब बात करते हैं प्रकाश अर्श की । प्रकाश का नाम इन दिनों नये रचनाकारों में तेजी से सामने आ रहा है । प्रकाश एक भावुक और कम बोलने वाले इंसान है । और मेरे विचार में ग़ज़ल की पाठशाला के एकमात्र छात्र हैं जिनसे मैं रूबरू भी मिल चुका हूं । । तो सुनिये ग़ज़ल ।

 

कौन घर ले आया है दर बदर की खामोशी

कितनी जानलेवा है दोपहर की खामोशी .

साथ उसका पाने को हम चले थे कांटो पे
वो समझ सका भी ना हम सफ़र की खामोशी ..

खुश है दूसरो का घर वो जला के लो कैसे
कल बताएगा वही अपने घर की खामोशी ...

अब समझ गया हूँ मैं जिस्म लूटती है क्यूँ
आबरू बचाए कैसे यूँ शह्र की खामोशी ...

लाफ हम भी तो रक्खे है ज़ुबां पे अपनी पर
आज सुन रहा हूँ दीवारों दर की खामोशी...

अर्श ये ग़ज़ल कैसे पूरी होगी क्‍या जाने
काफिया समझ ना आये ना बहर की खामोशी ...

तो आनंद लीजिये इन दोनों का और अगले अंक में मिलिये दो शायराओं और एक शायर से ।

15 टिप्‍पणियां:

  1. रवि की खामोशी से अर्श तक की खामोशी
    मन को बेहद भाई इस सफ़र की खामोशी

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  2. गुरुदेव...........आपके सानिध्य में विकास न हो यह तो संभव नहीं..............दोनों गलें एक से बढ़ कर एक हैं..........कल्पना का अंदाज़ भी अपना अपना है.............. बेहतरीन हैं दोनों के शेर...........

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  3. khamoshi ki bhi apni jubaan hoti hai
    khamoshi ko sunne wali bhi khamoshi hoti hai
    kyun dhoondhon mein kisi ki khamoshi
    yahan to khamoshi mein bhi chupi hai khamoshi

    bahut hi badhiya rachnayein padhwa di aapne..........sach khamoshi ka bhi apna hi mazaa hota hai.

    shukriya.

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  4. रामपाल अर्शी साब के इस शेर को पढ़ लेने के बाद तो शायद अब मैं कभी इस उजाले अपनी यादों के शेर को कोट करना नहीं चाहुँगा।
    अभिनव जी को इतने दिनों बाद देखना मन खुश कर गया...वो भी इतने लाजवाब शेरों के साथ। वाह!
    और अर्श जी के तो क्या कहने...कल बतायेगा वही अपने घर की खामोशी वाला शेर तो कमाल का है और मक्‍ता एकदम अलग से दाद माँग रहा है...

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  5. ... पहली गजल का तीसरा शेर .... दूसरी गजल का दूसरा और पाँचवा शेर ... बेहद प्रभावशाली हैं, दोनों ही लेखक को बधाई ... बधाई।

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  6. गुरु जी प्रणाम
    अभिनव जी की ब्लॉग जगत में वापसी बहुत जोरदार हुई दिल खुश हो जाये ऐसी गजल कही है
    हिन्दी और उर्दू में सिर्फ फर्क इतना है ....
    क्या शेर है मैं तो पढ़ कर अचम्भित रह गया कितनी खूबसूरती और सादगी से कही गई बात है
    अभी तो मुशायरा चल ही रहा है और भी सुन्दर शेर पढने को मिलेंगे मगर इस शेर की क्या दाद दूं अभिनव भाई को,
    बस दिल खुश हो गया
    अर्श भाई को मैं निरंतर पढता रहता हूँ,
    मैं जानता हूँ जो गजल उन्होंने तरही के लिए भेजी है आप उससे कही ऊँची गजल लिख चुके हैं और लिखते है मुझे अर्श भाई का केवल मक्ता पसंद आया

    गुरु जी आपने तो मुझे प्रश्न चिन्ह से नवाज दिया है :)
    एक प्रश्न है जब तरही शुरू हुआ था तो आपने कहाँ था की जो मिश्रा हमें मिलेगा वो हम मतले में इस्तेमाल नहीं कर सकते मगर आज की दोनों गजल में तो ऐसा ही हुआ है


    अर्शी जी का मक्ता तो बस निगाहों से दिल में उतर गया

    और आख़री में .........
    गुरु जी तरही मुशायरे को मत बंद कीजिये विनती है
    आपका वीनस केसरी

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  7. आपके यहां आकर हमेशा कुछ न कुछ सीखने को मिलता है।

    उम्‍दा शेर और इन्‍हें समझाने के लिए आभार।

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  8. Abhinav Ji ka doosara aur Arsh ka teesara shER Behatareen laga...!

    aur Gury ji mera blog khulne me to Google se bhi samasya aa rahai hai.

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  9. ji kisii ko pata chala
    ke blog IE me kyo nahi khul rahe the??

    if anybody has the solution, please share it with me
    @ yogesh249@gmail.com

    Thanks

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  10. ओह! तो ये अर्शी साहब का शेर है, मालूम नहीं था। और ये जो आपने इतनी बारीकी से आपने मिसरों की तारतम्यता समझायी है वो काबिलेतारीफ़ है। अभिनव और अर्श की गज़लें अच्छी हैं। वैसे भी आपके सान्निध्य में ये तो होना ही था।

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  11. कफ़न कांधे पे लेकर घूमता हूं इसलिये अर्शी,
    न जाने किस गली में जिंदगी का शाम हो जाये

    वाकई इस शेर में जो खूबसूरती है वो बशीर साहेब के शेर में नहीं...आपने बहुत अच्छा किया ये बता कर की ये अर्शी साहेब का शेर है...शायरी के लिए भी मार्केटिंग आनी चाहिए...सीधे सादे न जाने कितने बेमिसाल शायर और शेर वर्ना यूँ ही गुमनामियों में खो जाते हैं...

    गुरुदेव आप की मेहनत का नतीजा अब सामने आता नज़र आ रहा है...ऐसे होनहार ग़ज़लकार आपके सानिध्य से प्रकाश में आ रहे हैं जिन पर किसी भी गुरु को फक्र हो सकता है...

    और क्या कहूँगा मैं और क्या सुनोगे तुम,
    सब तो बोल देती है इस नज़र की खामोशी,
    जैसा शेर कहना हर किसी के बस की बात नहीं...अभिनव जी को बहुत बहुत बधाई....बहुत सुन्दर ग़ज़ल कही है...दूसरी और अर्श जी की इस मासूम सच बयानी ने दिल जीत लिया...
    अर्श ये ग़ज़ल कैसे पूरी होगी क्‍या जाने
    काफिया समझ ना आये ना बहर की खामोशी ...

    दोनो होनहार युवा शायरों को ये ही कहना है की इसी तरह लिखते रहो और गुरु देव का नाम रोशन करते रहो...
    नीरज

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  12. गुरु देव को सादर प्रणाम,
    मुझे जो इज्जत बक्शी है इन बड़े बड़े गज़लकारों के बिच वो मेरे लिए बहोत बड़ी बात है,मुझे खुद ही पता है के ये ग़ज़ल कुछ नहीं ... मुझे क्रमागत रूप से प्रयास और निरंतर अभ्यास करते रहना होगा आपके सरक्क्षण में ...और आपके आदेस के हिसाब से ...आपका आर्शीवाद मिलता रहे यही चाहूंगा...
    सारे ही पढने वाले को मेरा दिल से बधाई और शुक्रिया..
    आपका
    अर्श

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  13. Guru ji
    Aapki saari rachnayen gyanvardhak evam ruchikar hain. kripya mere blog ko ek baar padhkar tippani den... kya meri kavitaayen kavita nahin hai... kripya karan bhi batayen...
    Saadar...

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  14. एक अन्‍य पोस्‍ट से संदर्भ पाकर आया हूँ।
    'न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाये'
    दो खूबसूरत शेर सामने हैं लेकिन बात है नज़रिये की। समालोचक की दृष्टि से देखूँ तो सब ठीक ठाक है लेकिन कुछ देर को आलोचक होने का दुस्‍साहस करूँ बहुत से दिलों को चोट पहुँचेगी फिर भी एक बात देखने की है शाम वृद्धावस्‍था की स्थिति है मृत्‍यु-काल की नहीं और यहीं दोनों अशआर में मिसरों का परस्‍पर संबंध समाप्‍त हो जाता है।
    पहले शेर में जो बात कही गयी है वह सर पर कफ़न बॉंधे घूमने के अधिक करीब है और इसमें शाम होना न होना महत्‍व नहीं रखता।
    दूसरे शेर में जो उजाले की बात आई है वह अंधकार से तो संबंध रख सकती है लेकिन शाम के धुँधलके के लिये उपयुक्‍त नहीं कही जा सकती है।
    अगर मेरे कथन से किसी की भावनायें आहत हों तो पूर्ण विनम्रता से मेरी क्षमा प्रार्थना पूर्व से ही प्रस्‍तुत मानें।

    उत्तर देंहटाएं
  15. एक अन्‍य पोस्‍ट से संदर्भ पाकर आया हूँ।
    'न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाये'
    दो खूबसूरत शेर सामने हैं लेकिन बात है नज़रिये की। समालोचक की दृष्टि से देखूँ तो सब ठीक ठाक है लेकिन कुछ देर को आलोचक होने का दुस्‍साहस करूँ तो बहुत से दिलों को चोट पहुँचेगी फिर भी एक बात देखने की है शाम वृद्धावस्‍था की स्थिति है मृत्‍यु-काल की नहीं और यहीं दोनों अशआर में मिसरों का परस्‍पर संबंध समाप्‍त हो जाता है।
    पहले शेर में जो बात कही गयी है वह सर पर कफ़न बॉंधे घूमने के अधिक करीब है और इसमें शाम होना न होना महत्‍व नहीं रखता।
    दूसरे शेर में जो उजाले की बात आई है वह अंधकार से तो संबंध रख सकती है लेकिन शाम के धुँधलके के लिये उपयुक्‍त नहीं कही जा सकती है।
    अगर मेरे कथन से किसी की भावनायें आहत हों तो पूर्ण विनम्रता से मेरी क्षमा प्रार्थना पूर्व से ही प्रस्‍तुत मानें।

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