शुक्रवार, 31 अक्तूबर 2008

दंगें के मुहाने से लौटा एक शहर, तरही मुशायरे की उलझन और दीवाली के कुछ माड़साब के फोटो

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दीपावली के दूसरे दिन हमारे शहर में मिलने जुलने का दिन होता है । और एन उसी दिन हमारे शहर में दंगे का माहौल बन गया । पत्रकारिता से जुड़े होने के कारण और अपने शहर को लेकर चिंता के कारण घटना स्‍थल पर पहुंचे तो ज्ञात हुआ कि दोनों पक्ष आमने सामने हैं पथराव चल रहा है और तलवार बाजी की भी एकाध घटना हो चुकी है जिसमें कुछ लोगों को चोट आ चुकी है । स्थिति बड़ी विकट थी घटना कस्‍बा नामक मोहल्‍ले में हो रही थी जो शहर से थोड़ा हटकर एक मोहल्‍ला है । या यूं कहें कि पुराना सीहोर है । इधर नये शहर में लोगों को पता ही नहीं था कि वहां कस्‍बे में क्‍या हो गया है । मगर रही सही कसर पुलिस ने पूरी कर दी । पुलिस ने सायरन बजाती हुई गाडि़यों को पूरे शहर में दौड़ा कर दहशत को माहौल पूरे शहर में बना दिया । बात की बात में शहर में भगदड़ मच गई शटर गिर गए और दीपावली मिलन के लिये बाजार में निकले हिन्‍दू मुस्लिम अपने अपने घरों में दुबक गए । उधर कस्‍बे में हालत बिगड़ रही थी तो इधर बाजार में अफवाहें गर्म थीं । कोई कह रहा था कि चार मर गये कोई कह रहा था कि पांच के हाथ काट दिये गये हैं । उधर समाचार चैनल उनकी तो क्‍या कहें उनको तो चाहिये ही था  कि दंगे हो जायें क्‍योंकि समचार तो उससे ही बनना था । तो उन्‍होंने भी अपनी बुद्धिमानी का पूरा परिचय देते हुए अतिरंजित टिकर ( नीचे चलने वाली पट्टी या स्‍‍क्रोल ) चला दियें । सीहोर में तनाव धारा 144 लगी ( अरे मूर्खों धारा 144 तो चुनावों की घोषणा के साथ पूरे प्रदेश में लग चुकी है ) । एनडीटीवी जैसे राष्‍ट्रीय चैनल ने भी आग में घी डालने वाले टिकर चलाये । अफवाहें फैलने लगीं और आप तो जानते ही हैं कि अफवाहें क्‍या करती हैं । बात की बात में दोनों पक्ष के बाकी श्‍ाहर में फैले लोग लामबंद होने लगे । एकबारगी तो मुझे भी लगा कि 22 सालों से कमा कर रखी गई सौहार्द्र की भावना का हुआ सत्‍यानाश । 22 साल इसलिये कि 1986 में हमारे शहर में एक भीषण दंगा हुआ था जिसके घाव भरने में वर्षों लग गये थे । अभी भी वे घाव टीस देते हैं । जब दोनों पक्ष आमने सामने थे तो एक छोटी सी चिनगारी पूरे शहर को आग में झोंक देने के लिये पर्याप्‍त थी । प्रशंसा करनी होगी एक वर्ग की ( नाम नहीं लूंगा कौन सा ) कि उसके बुजुर्गों ने समझाबुझाकर अपने लोगों को पीछे हटाया और घरों में भेज दिया । नये लड़कों को डांट कर डपट कर जैसे बन सका घर भेजा । 1 घंटे से जो तनाव था वो समाप्‍त हुआ और लोगों ने कुछ राहत की सांस ली । कुछ इसलिये क्‍योंकि एक वर्ग अभी भी डटा था । और जाने का नाम ही नहीं ले रहा था । मगर पुलिस के लिये राहत की बात इसलिये थी कि एक वर्ग जा चुका था और मैदान में केवल एक ही था । दूसरा वर्ग जाने का नाम ही नहीं ले रहा था । पुलिस ने लाठी चार्ज किया और बात की बात में दूसरे वर्ग को खदेड़ दिया । दंगें की आशंका में लरजते शहर ने चैन की सांस ली ।

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खैर तो बात तरही मुशायरे की उसको लेकर एक दिक्‍कत ये आ रही है कि माड़साब का सिस्‍टम एक बार फार्मेट हो गया है और माड़साब अपने मेल आउटलुक में देखते हैं आउटलुक में आने के बाद मेल एकाउंट से मेल हट जाता है । सो दिक्‍कत ये आ रही है कि कुछ लोगों पारुल, तरु न गोयल, कंचन, संजय चतुर्वेदी, वीनस, अभिनव की ग़ज़लें तो हैं पर बाकी के लोगों की ग़ज़लें नहीं मिल रही हैं । मैं चाहता हूं कि सब की गज़लें रहें सो जिन लोगों के नाम ऊपर की सूची में नहीं हैं वे लोग एक बार फिर ग़ज़लें भेज दें । ये गलती मेरी है कि मैं उन ग़ज़लों को समय पर बैकअप लेकर नहीं रख पाया । जैसे ही बाकी के लोगों की ग़ज़लें फिर से मिलती हैं उसी दिन तरही मुशायरे का आयोजन हो जायेगा ।

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बिजली की हालत तो वैसी ही है इसलिये अब कोशिश कर रहा हूं कि रात में कुछ काम तैयार कर के रख लूं और सुब्‍ह आकर केवल पोस्‍ट लगा दूं

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6 टिप्‍पणियां:

  1. शुक्र है गुरू जी कि सब सही-सलामत है.अंत भला तो सब भला.
    और आपकी तस्वीरें बड़ी प्यारी आयी हैं...खास कर आईने के समक्ष वाली.
    अपनी तरही दुबारा भेज रहा हूँ मेल पर.

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  2. चलिये, बुरा वक्त टल गया, यह बड़ा ही अच्छा रहा. आपको अपनी गज़ल पुनः प्रेषित करता हूँ.

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  3. सर ,
    क्या मैं अपनी कोई एक ग़ज़ल भेज सकता हूँ आप उसपे अपनी टिपण्णी करेंगे ....
    शायद आज ही मैंने आपसे समय मांगी थी मगर ऑफिस में मीटिंग के कारन घर देर से लौटा और आपको कॉल नही कर पाया इसके लिए आपसे क्षमा चाहूँगा ...


    अर्श

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  4. चलिये सब कुछ सही सलामत हैँ और तस्वीरेँ भी बढिया हैँ -
    ( पता नोट कर लिया है )
    स स्नेह,
    - लावण्या

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  5. ईश्वर का धन्यवाद कि बुजुर्गों के पहल से एक बड़ा हादसा टल गया वरना आज बुजुर्गों की सुनता कौन है? तरही मुशायरे से संबंधित सारे मेल इकट्ठे भेज दी है।

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