सोमवार, 5 मई 2008

ग़ज़ल का साज़ उठाओ बड़ी उदास है रात - मैं वापस आ रहा हूं अपनी ग़ज़ल की कक्षाओं के साथ

दादाजी कहा करते थे कि ईश्‍वर जिनको प्रेम करता है उनको खूब कष्‍ट देता है । उनको कभी भी सुकून से नहीं रहने देता है । अगर दादाजी की भाषा में बात करूं तो शायद ईश्‍वर मुझसे कुछ ज्‍़यादा ही प्रेम करता है । और शायद इसीलिये ...... ख़ैर मगर मुझे इस बात में इस बात की खुशी तो है ही कि जब भी ईश्‍वर मुझे कष्‍ट देता है तो कई सारे लोगों को भी भेजता है जो आकर कहते हैं कि हम तुम्‍हारे साथ हैं । मेरी पिछली पोस्‍ट पर कई सारे लोगों के संदेश प्राप्‍त हुए और कई सारे फोन भी । ऐसा लगा कि मेरा दुख तो बंट गया है कई सारे लोगों ने उस पीर को बांट लिया है । अभिनव को फोन मिला और जो बात अभिनव ने कही उससे मैं अभिभूत हो गया मैं नहीं जानता कि कैसे कोई किसी के इतना नजदीक हो जाता है । और वो भी संबंधों के ठंडेपन वाले इस दौर में । अभिनव ने जो कुछ कहा वो सीधे जाकर ह्रदय को छू गया । अपनेपन का एक झौंका सा आप लोगों की ओर से आया और जीवन की तपन को कम करके चला गया । संकट के दिन भले ही ना टले हों पर ये तो विश्‍वास है कि मेरे साथ कई लोग हैं जो कि संकट के दिनों में मेरे साथ खड़े हैं । एक पुराना गीत है '' पास बैठो तबीयत बहल जाएगी मौत भी आ गई हो तो टल जाएगी''   बस वैसा ही कुछ लगा मुझे भी भले ही आप सब मेरे साथ भौतिक रूप से नहीं हैं पर आत्‍मीय रूप से तो सब मेरे साथ हैं और वही साथ होना खास होता है । जो भौतिक रूप से साथ होते हैं वो कितना साथ होते हैं ये हम सब जानते हैं । राकेश जी के यहां पर भी दुखों का सिलसिला थम नहीं रहा है । पहले एक भ्राता का बिछोह और अब दूसरे का भी । ईश्‍वर का ये न्‍याय कभी कभी अच्‍छा नहीं लगता कि अच्‍छे लोगों को ज्‍यादा दुख दिये जाएं । उस सब के बाद भी राकेश जी का फोन प्राप्‍त हुआ तो ऐसा लगा कि कहीं दूर बैठा कोई बड़ा भाई सांत्‍वना दे रहा है कि छोटे दुखी मत होना मैं तेरे साथ हूं । कंचन और सुनीता जी का फोन वैसे ही मिला जैसे परदेस में बसी कोई बहन भाई पर किसी संकट के दौरान अकुला के फोन करती है कि भैया के पास जा तो नहीं सकते पर मन तो वहीं है । मैं नहीं जानता था कि मेरा परिवार इतना बड़ा हो गया है कि उसमें इतने सारे भाई बहन हो गए हैं । समीर जी का स्‍नेह उनका प्रेम ये सब बातें भला भूल जाने वाली हैं । अभिनव का जब फोन आया तो ऐसा लगा कि परवाह के साथ को छोटा भाई कह रहा है कि मैं हूं ना । मैं नहीं जानता कि मेरे किन अच्‍छे कार्यों के कारण ईश्‍वर ने मुझे ये परिवार दिया है । खैर अब मैं वापस आ रहा हूं । एक लम्‍बी नज्‍़म लिख रहा हूं अपनी मिष्‍टी (मीठी) पर और उसके साथ ही संभवत: अपनी दूसरी पारी का प्रारंभ करूंगा । अंग्रेजी में कहावत है शो मस्‍ट गो ऑन । समीर जी आपने काफी पहले एक सलाह दी थी मैंने उसे नहीं माना तो एक दुख कहीं से और भी मिला जिसका जि़क्र यहां नहीं कर सकता पर ये ज़रूर कहूंगा कि अब मैं दोस्‍तों की सलाह को इग्‍नोर नहीं करूंगा । जाने क्‍यों वो ग़लती कर बैठा और अपमानित हो गया । खैर तुलसी बाबा ने कहा है यश अपयश जीवन मरण सब विधना के हाथ । यश की कामना हो तो अपयश के लिये भी अपने आपको तैयार रखना चाहिये । चलिये जल्‍दी ही हम मिलते हैं अपनी ग़ज़ल की कक्षाओं के दूसरे खंड के साथ । अभी तो बस ये

एहसान मेरे दिल पे तुम्‍हारा है दोस्‍तों, ये दिल तुम्‍हारे प्‍यार का मारा है दोस्‍तों

5 टिप्‍पणियां:

  1. हिन्द युग्म पर आपकी कक्षाओं का बीच में ही रुक जाना थोड़ा बुरा जरूर लग रहा है।
    लेकिन जैसा गुरुजी चाहें।
    हम तो सीखने यहाँ भी आ जाएँगे।

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  2. वाकई, है तो बहुत प्यारा परिवार.

    अब आपकी गजल का इन्तजार है. सुनाईये और लगातार सुनाईये.

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  3. ये कब कहने की बात व्यथा एकाकी हो
    परिवार एक जुट होकर सदा रहेगा ही
    आंसू ने अकसर कहा यही मुस्कानों से
    मैने भी हँसना सीखा है बस तुमसे ही
    आंखों का पानी और अधर की मुस्कानें
    हैं साथ जिस तरह सावन रहता बादल के
    गीतों का साथ रहा है जैसे छंओं से
    या मंदिर का अटूट जैसे गंगाजल से
    जब तय है कांटों के संग ही जीना हमको
    हर पीड़ा को हम सुखदा ही तब समझेंगे
    शब्दों ने बन कर जादूगर ये बतलाया
    हम आंसू को मुस्कान सदा ही कर लेंगें

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  4. ग़ज़ल का साज़ उठाओ
    कुछ सुनो कुछ सुनाओ
    देवी नागरानी

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