रविवार, 28 फ़रवरी 2010

होली का तरही मुशायरा अंतिम भाग:- होली नहीं ये होला है, ये रंगों का गोला है । आज वरिष्‍ठों का छिछोरपन देखने का दिन है । राकेश खंडेलवाल जी, नीरज गोस्‍वामी जी, समीर लाल जी, तिलक राज कपूर जी, योगेन्‍द्र मौदगिल जी की चित्रावली और हजलें ।

नोट :- होरी आ चुकी है और कल रंगों का दिन है । जो भी रंगों से परहेज करते हों वे घर से न निकलें । मेरे जैसे छिछोरे रंग लेकर घूम रहे हैं और जो किसी का कोई लिहाज नहीं करते हैं रंग डालने से पहले ।

हम तो पहिले ही कहे रहे कि ये सब कुछ ऊपर की पीढ़ी से ही आ रहा है । सब लोग फिजूल में ही नयी पीढ़ी पे इल्‍जाम दे रहे हैं । अब यही देखा ना कि सारे के सारे किस कदर गन्‍ना रहे हैं । इतरा इतरा कर जाने क्‍या क्‍या कर रहे हैं । इतनी भी शरम नहीं है कि नये बच्‍चे क्‍या सोचेंगें ।

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होली की सवारी तिलक राज कपूर जी और समीर लाल जी

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एक पति दो पत्‍नियां ( एक कली दो पत्तियां )

समीर जी के साथ राकेशी और नीरजा बाइयां

सुखी परिवार

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आय हाय राकेश खंडेलवाल जी मैं मर जाऊं गुड़ खाके क्‍या छब बनाई है  

हजार किस्से जो इश्क वाले पढ़े तो जागा ह्रदय का रांझा

चला लड़ाने वो इश्क अपना चिलम में भर कर छटाँक गाँजा

शहर की सड़कों को छोड़ पकड़ी इक रहगुजर तेरे गांव वाली

तेरे दरीचे तले खड़ा हो हुआ था दीदार का सवाली

उछाले गुल जो थे हाथ रक्खे, खरीदे जितने इक पावली में

उतर गया है बुखार सारा, पड़े यूँ जूते तेरी गली में

जो फूल उछले थे हाथ से वो गिरे थे अब्बू मियाँ के सर पर

नजर उठाई तो मुझको देखा, हुए खड़े वो तुरत तमक कर

बगल में अपने रखी उठाली जो एक बन्दूक थी दुनाली

लगा के कांधे निशाना मुझको बना लिया फिर ट्रिगर संभाली

थी खैर मानी बस भागने में लगाके पर अपनी पगतली में

उतर गया है बुखार सारा, पड़े यूँ जूते तेरी गली में

बनी हुई थी गली के कोने में नांद, गोबर की गैस वाली

गिरा फ़िसले के उसी में, छिप कर थी जान अपनी जरा बचाली

जो निकला पीछे पड़ा अचानक् इक मरखना बैल था वो शायद

हुआ ज्यों मेजर मिलिटरी का, करा ली हफ़्ता भरी कवायद

पड़े थे कुत्ते भी चार पीछे अजब मची ऐसी धांधली में

उतर गया है बुखार सारा, पड़े यूँ जूते तेरी गली में

मुहल्ले भर में थे जितने आशिक, सभी ने पकड़ा गरेबाँ मेरा

लगा के कीचड़ सजाया मेरा था लोरियेल से धुला जो चेहरा

बिठाया फिर लाकर इक गधे पर जुलूस मेरा गया निकाला

फ़टे हुए जूते चप्पलों की गले में मेरे सजाई माला

सजाई सर पे ला एक टोपी सनी हुई सरसों की खली में

उतर गया है बुखार सारा, पड़े यूँ जूते तेरी गली में

गधे की दुम में न जाने किसने लगा दिया फिर कोई पटाखा

दुलत्ती झाड़ी गिराया मुझको उठा के अपनी वो दुम को भागा

संभल उठा मैं ले चोटें अपनी , न जाने क्यों गांव आ गया था

लगा है जैसे अजाने में ही मैं दो किलो भांग खा गया था

उठाईं कसमें पड़ेंगें फिर न इस इश्क की धुन करमजली में

उतर गया है बुखार सारा, पड़े यूँ जूते तेरी गली में

दे नाम तरही का छेड़ डाला है दुखती रग को सुबीरजी ने

बहाना होली का है बनाया दिवाली करने को तीरगी में

मैं दूध हल्दी औ फिटकरी से ही काम अपना चला रहा हूँ

उन्हें तो मल्हार सूझती है, मैं अपना दुखड़ा सुना  रहा हूँ

खिलाई तीखी मिरच हरी है, छुपा के मिसरी के इक डली में

उतर गया है बुखार सारा, पड़े यूँ जूते तेरी गली में

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अरे नीरज गोस्‍वामी जी गधे पर ही बैठने का शौक था तो हमसे तो कहते एक बार

कमीने, पाजी, हरामी, अहमक, टपोरी सारे, तेरी गली में

रकीब बन कर मुझे डराते मैं आऊँ कैसे, तेरी गली में

खडूस बापू, मुटल्ली अम्मा, निकम्मे भाई, छिछोरी बहनें

सदा ही घेरें, भले ही आऊं, दुबक-दुबक के, तेरी गली में

हमारी मूंछो, को काट देना, जो हमने होली, के दिन ही आके

न भांग छानी, न गटकी दारू,  न खाये गुझिये, तेरी गली में

अकड़ रहे थे ये सोच कर हम, जरा भी मजनू से कम नहीं हैं

उतर गया है, बुखार सारा, पड़े वो जूते, तेरी गली में

किसी को मामा किसी को नाना किसी को चाचा किसी को ताऊ

बनाये हमने तुम्हारी खातिर ये फ़र्ज़ी रिश्ते, तेरी गली में

तमाम रस्‍ता कि जैसे कीचड़, कहीं पे गढ्ढा कहीं पे गोबर

तेरी मुहब्‍बत में डूबकर हम मगर हैं आये, तेरी गली में

भुला दी अपनी उमर तो देखो ये हाल इसका हुआ है लोगों

पड़ा हुआ है जमीं पे 'नीरज' लगा के ठुमके, तेरी गली में

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उफ ये टेन पैक्‍स समीर लाल जी इन पर ये दोनों सुंदरियां फिदा न हों तो क्‍या हो

ये कैसा जलवा दिखाया तुमने, मुझे बुलाके तेरी गली में
उतर गया बुखार सारा, पड़े जो जूते तेरी गली में

मुझे भरम था कि मेरी खातिर, मिठाई तूने बना रखी है
कसम खुदा की भरम है टूटा, पिटाई खा के तेरी गली में

वो तेरे भाई हैं या कसाई, न उनको जन्नत नसीब होगी.
पिला के दारु पटक ही दूँगा, मैं उनको आके तेरी गली में.

बुजुर्ग सा कुछ था बाप तेरा, इसी की खातिर मैं कुछ न बोला
अगर लिहाजे उमर न हो तो दूं एक मिला के तेरी गली में.

मैं तुझको इतना बता रहा हूँ, नहीं मिलेगा समीर तुझको,
हो आशिकी का जो जोश बाकी, वो सर पटक ले तेरी गली में.

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अय हय मेरे सुसराल( ग्‍वालियर ) के तिलक राज कपूर जी तीसरी फोटो तो कमाल की है

चले थे हम तो, करेंगे तुझसे, नयन मटक्‍के, तेरी गली में
उतर गया है, बुखार सारा, पड़े वो जूते, तेरी गली में।

ये तुमने बोला, फलक का चँदा, बहुत ही प्‍यारा, सदा लगा है
तभी तो सपने, सजा के आये, शहर के टकले, तेरी गली में।

सुना था छज्‍जे, पे तुम खड़ी हो, गुलाल मलकर, हमें लुभाने
इसीलिये तो, पहन के टोपी, गधे पे आये, तेरी गली में।

बहुत हैं नादॉं, समझ न पाये, तिरी शरारत, की हद कहॉं है,
मिलाके गोबर, बनाये भजिये, खिलाये तूने, तेरी गली में।

न सेव गुझिया, जलेबी बर्फी, न ही मिठाई, का रूप कोई
हमें मिले हैं, तो बस ये कीचड़, भरे कटोरे, तेरी गली में।

गले मिलोगी, सभी से छुपके, हमें बुलाया, यही तो कहके,
लपेटते हैं, क्‍यूँ लीद हम पे, सभी ये छोरे, तेरी गली में।

ना भॉंग-गॉंजा, बियर या व्हिस्‍की, कसम है तेरी, छुई है हमने
तुझे जो देखा, गुलाल में तो, नशे में भटके, तेरी गली में

हमारी बॉंहों, में डाल बॉंहें, तू फाग गाती, हमें नचाती
तो रंग होली के और ज्‍़यादा, हमें सुहाते, तेरी गली में।

फटा पजामा, अधूरा कुर्ता, ये टूटा चश्‍मा, और एक चप्‍पल
बचा के ‘राही’, किसे बताये, मिले जो झटके, तेरी गली में।

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उफ योगेन्‍द्र मौदगिल जी क्‍या फिगर पाया है ( दूसरे चित्र में )

है चालू  आंटी  तो ठरकी  बुड्ढे  हैं लुच्चे  लौंडे  तेरी गली में 
ये लड़कियाँ  लागें  सारी  लैला  ग़ज़ब के जलवे तेरी गली में

हम आशिकों  की कुंआरी पलटन तेरे  मोहल्ले  में कैसे  आए 
के दूर से हमको दिख रहा है  खडे़ है बुड्ढे  तेरी गली में
 

पिटाई  को ये कहें  धुलाई  खुदा  ही मालिक  है आशिकों का 
वो लातें  बरसी पडे़ वो  घूँसे के सूजे  चेहरे तेरी गली में

किसी  की दुनिया  लुभा न पाई  किसी को ज़रा भी न रास आया 
कि जैसे मैं  हूँ  शुरू से बिल्लो  तेरे ही पीछे  तेरी गली  में  

हैं मेरे बटुए  के सारे  दुश्मन  ये मेरे  ससुरे  ये मेरे साले 
ये कुबडे़ क़ाने ये गंजे अंधे  ये झल्ले  झबरे तेरी गली  में
 

गली में आजा मना ले होती मैं  तुझको  रंग हूँ  तू मुझको रंग दे 
न आई  तो मै  करूँगा  दंगा बजा के घंटे तेरी गली में  
 

तेरा  मोहल्ला  मेरा मदीना है तेरी चौखट  ही मेरी मक्का
ये हर की पौढ़ी  ये गंगा  मय्या है नल के नीचे तेरी गली में

वो मेरी ग़ज़ले वो मेरे नगमें वो तेरे अब्बू ने फाड़ डाले 
सडे टमाटर  गले से अंडे  दिखा के डंडे तेरी गली में 

हुई तबीयत हरी हरी सी बदल गया है मिजाजे मौसम 
उतर गया है बुखार  सारा पडे वो जूते  तेरी गली  में 

वो दादा लच्छी  सुबक रहा है हुड़क  रहा है घुड़क रहा है 
बुला  के लच्छो  पटा  के लच्छो  खिला  के लच्छे तेरी गली  में

मैं किसको  दुखड़ा  सुनाऊँ  मुदगिल अजब कहानी गजब हैं मुद्दे  
फटे हैं कुरते  खुले  पजामे हैं ढीले कच्छे  तेरी गली मैं

सूचना : देखिये ये बहुत ही गलत बात है आज जब कुंभकरण परदे के पीछे बीड़ी पीने गया था तो कोई परदे से निकला और उसकी बीड़ी छुड़ा के भाग गया । कुंभकरण उसके बाद नाराज होकर कपड़े उपड़े समेत घर भाग गया है । इस कारण आज कुंभकरण वध की जगह पर मुन्‍नी बाई होली का धांसू तम नाच प्रस्‍तुत कर रही हैं ।

सूचना : रावण की सेना के   कलाकारों को मंच के पीछे उल्‍टी हो रही  है । हम पहिले ही बता दिये थे कि कोई भी रामलीला के कलाकारों को कच्‍ची नहीं पिलाए आप लोग नहीं माने इसलिये अब कल आपको रावण का युद्ध बिना सेना के ही देखना होगा ।

सूचना : शूर्पनखा का रोल करने वाला लड़का कल रात से गायब है पुरुषोत्‍तम जी से अनुरोध है कि वे अपने लड़के से बोलें के शूर्पनखा को रामलीला मंडली को वापस नहीं किया गया तो हम पुलिस में चले जाएंगें ।

सूचना : होली की सबको बहुत शुभकामनाएं ।

शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

होली का तरही मुशायरा:- आज के मुशायरे में न केवल जूते पड़ रहे हैं बल्कि मारे भी जा रहे हैं । क्‍योंकि आज हैं सुलभ सतरंगी, अर्चना तिवारी और पारुल ।

नोट : होरी में अब केवल दो दिन ही बाकी हैं सो सभीको अगाह किया जाता है कि भजिये, गुझिये, आदि हर वो चीज जो दिखने में हरी हो उसे संभल कर खाएं क्‍योंकि उसमें भंग होने की प्रबल संभावना है ।

अब माटसाब भी का करें जब पूरे कुंए में ही भंगवा घुरी हो । पर आज तो हम मुकाबला टाइप का कुछ लाये हैं । मुकाबला टाइप का बोले तो आज एक तो पुरुष हैं ( कन्‍फर्म नहीं है ) और दो सन्‍नारियां हैं । कन्‍फर्म नहीं है कहने से हमार मतबल ये है कि आजकल अपने ब्‍लाग जगत में कोनो बात को कन्‍फर्म नहीं कह सकते । पता चलता है कि जिनको आप महिला समझ कर कई दिन से ब्‍लाग पर टिपिया रहे थे वे तो पुरूष निकले । सो हम ने भी एही वास्‍ते कह दिया कि हम लिखते तो भले ही हैं कि पुरुष हैं लेकिन हमको भी कोनो बिसबास नहीं होता है कि हम सही ही कह रहे हैं । आज सुलभ सतरंगी हैं अर्चना तिवारी हैं और पारुल हैं । हम पहिले ही घोषणा करे रहे कि जो भी आपन फोटो ग़ज़ल के साथ नहीं भेजेगा तो फिर हम सुतंत्र होंगें कि हम उका नाम के सामने चाहे जो फोटो लगा दें । तो आज पहिली बार हमको मौका मिला है कि हम आपन मन की कर लें । काहे । काहे कि पारुल जी भहुत रिक्‍भेस्‍ट के बाद भी फुटवा नाही भेजीं । हम भहुत रिक्‍भेस्‍ट करे । पर सायद वे नरभस हो रही थीं फोटो भेजने में सो हम ने उनके लिये फोटो ढुंढ लिया है । मत नरभसाइये, इसमें नरभस होने का कोनो बात नहीं है ।

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क्रम से अर्चना तिवारी, सुलभ सतरंगी और पारुल

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पारुल

( जज साहब जो टेबुल पर चिमनी और झाड़ू सजा कर बैठे हैं उनकी टेबुल पर भी एक खास फोटो है ये सीहोर की वो शख्‍सियत है जिसको देश के सारे अखबारों ने मुख पृष्‍ठ पर छापा था ) 

जो फूल गूलर का हो रहे थे ,लो आके टपके गली हमारी
उतारो जूतों से आरती सब  ,सनम हैं आए गली हमारी
मिलाके शोख़ी अदा से उनको, दो बूंद हमने जो भंग दे दी
कभी वो खटिया कभी वो मचिया, रहे पकड़ते गली हमारी

चढ़ा है फागुन का रंग ऐसा, लगे उसे हर गली हमारी
गवां के रतियाँ बनाके बतियाँ,दीवाना झाके गली हमारी
क्या ख़ूब सूरत क्या ख़ूब सीरत खुदाया क्या ख़ूब हड़बड़ी भी
पहन के कुर्ता मियाँ जनाना ,रहे टहलते गली हमारी

समझ के "पुखराज" बढ़ गए वो ,वहाँ थीं अम्मा खड़ी हमारी
पड़े हैं फटके वो या इलाही ,कभी न फटके गली हमारी

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अर्चना तिवारी

लो आया फागुन, मचा के धम धम, धमाल करने गली हमारी
उतारो जूतों से आरती सब, सजन हैं आए गली हमारी
न छेड़ना फिर कभी ओ छोरे मिलेगी गाली, पड़ेंगे जूते
करेगी स्वागत लगा के कीचड़, बदन को तेरे गली हमारी
बही है रंगों की धार ऐसी, धरा से अम्बर सरार सर सर
हरे, बसंती, गुलाबी, नीले गुलाल रंग से गली हमारी
नशा चढ़ा है रंगों का ऐसा जो भंग से भी नहीं चढ़ेगा
ये मस्त, पागल, दिवाने, सनकी न जाएँ बच के गली हमारी
सभी के चेहरे पे कीच-गोबर, रंगों से टोली सजी हुई थी
चखा दिया जब मज़ा सभी को, न फिर वो लौटे गली हमारी
मजीरा बाजे, मृदंग बाजे, ढमाक ढम ढम ढमाक ढम ढम
रंगे पुते से तमाम चेहरे झमक के नाचे गली हमारी


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सुलभ सतरंगी

मझीरे ढोलक रहे थे बजते हुए तमाशे तेरी गली में
है अपनी इज्ज़त उतर गई हम हैं हाथ जोड़े तेरी गली में

बला के सपने थे देखे हमने के रंग गालों पर तेरे मल दें
ये ही थी चाहत की होली खेलूं जो रंग बरसे तेरी गली में

यूं नाम लेकर तुझे पुकारा जो तेरे घर में रखे कदम थे
निकल गए दिल के सारे अरमान भांग पीके तेरी गली में

पता था क्या ये यूं हाल होगा बनेगा कीमा मेरे ही दिल का
उतर गया है बुखार सारा पड़े वो जूते तेरी गली में

खमोश रहता था जो  हमेशा मेरे ही आगे मेरे ही डर से
उसीने गोबर भरे तगारे हैं मुझ पे  फेंके तेरी गली में

है हड्डी हड्डी दरद में डूबी बचाई जां तो है जैसे तैसे
किसे सुनाएँ ये दर्द-ए-आशिक चले हैं दुचके तेरी गली में

रहेगी हमको ये याद बरसो तेरी गली में  जो खेली होली 
उतर गया है बुखार सारा पड़े वो जूते तेरी गली में

तीनों ने बहूत ही अच्‍छा टाइप का कुछ लिखा है पारुल जी ने गंवा के रतियां बना  के बतियां में अमीर खुसरों साहब की उस दुर्लभ रचना की याद दिला दी है । अर्चना जी ने ढमाक ढम ढम, सरार सर सर, धमाल धम धम जैसी ध्‍वनियों का जबरदसत प्रयोग किया है । सुलभ सतरंगी हड्डी हड्डी का शेर बहुत अच्‍छा निकाला है । चले हैं दुचके तेरी गली में ।

सूचना - कल हमने पुरुषोत्‍तम का लड़का के समझाय दिया था कि सूर्पनखा का रोल करने वाले कलाकार का न छ़ेड़े, काहे कि वो कलाकार भले ही सुर्पनखा बना है पर वो नारी नहीं है नर है । एतना बताने के बाद भी पुरुषोत्‍तम का लड़का आज फिर सूर्पनखा के छेड़ा है । सूर्पनखा मंच के पीछे बैठी रो रही है कि हम नहीं आयेंगें नाक कान कटवाने, गांव वाले रामलीला करवाना चाहते हैं तो पुरुषोत्‍तम का लरिका के संभालें ।

सूचना - भभ्‍भड़ कवि भौंचक्‍के द्वारा लिखी गई ग़ज़ल को मुशायरे के संचालकों ने खारिज कर दिया है । उस पूरी ग़ज़ल में 75 जगह पर बीप बीप ( ####) करना पड़ रही थी । भभ्‍भड़ कवि भौंचक्‍के बहुत गुस्‍सा में ग़ज़ल लेकर चले गये हैं ।

सूचना - कल मुशायरे का समपान होगा पंच परमेश्‍वर की रचनाओं के साथ पांच महारथियों की ग़ज़लों का आनंद लें कल । और फिर होगा होली पर उपाधियों का वितरण ।

सूचना – ( ##########################) और चाही कि इतना बस है ।

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

होली का तरही मुशायरा :- सनम की गली में आज किसकी बारी है, और किसकी हो सकती है बर्थडे बाय के सिवा । तो आज एकल काव्‍य पाठ सुनिये प्रकाश अर्श का ।

नोट : सूचना मिली है कि होली को देखते हुए सरकार ने अखंड भारतमंडल में सनम की गली में जाने पर लगा प्रतिबंध हटाने की घोषणा कर दी है । सो अब सब आराम से आये जाएं कोई राकेने वाला नहीं है ।

ई बेवार हमार बबुआ अभीन तलक सिरफ जन्‍मदिन ही मना रहा है । बाकी के सारे लोग शान से साल की दो दो तारीखें मनाते हैं । एक खुशी के साथ एक दुख के साथ । मगर ई अभी तक मैरिज एनिवरसरी जइसन चीज से बिल्‍कुल ही दूर है । काहे कि अभी खुशी का ही काम हो रहा है । गम वाली बात अभी है नहीं । हम पूछन रही कि बचुवा आपन बारे में कुछ बताओ । तो ठंडी सांस भर के बोला कि का बताएं हमारी तो किस्‍मत में ही कोनो गौतम राजरिशी टाइप का ग्रह बैठा है । जब भी हमारा मन कहीं जुड़ता है तो पता चलत है कि पार्टी तो पहले से ही बुक है । हमार किस्‍मत कि हमे कंचन जइसे बहिना मिली जो चटर पटर बात तो बहूत करती है लेकिन अजून तलक एक ठौ भी ढंग का काम नहीं करा हमारे लिये । कहिन लाग रहा कि हम तो बहूत ही शर्मिंदा हैं कि अभइन तलक हमारी एक्‍को भी कहानी नहीं बनी । हम जब भी मलोज कुमार की फिलिम किरान्‍ती का ऊ गाना सुनते हैं वो जवानी जवानी नहीं जिसकी कोई कहानी नहीं तो हमार दिल पर बरछी कटार सब कुछ थोक के भाव में चल जात रही । हमारी जवानी के कहानी तो दूर अभी तो लघुकथा भी नहीं बन पाई है । हमें लगा कि अर्श बबुआ के अंदर बहूत ही पीड़ा भरी है । सच भी है कब तक केवल जन्‍मदिन मनाए । तो हम आज ही ये विज्ञापन देने जा रहे हैं आप लोग भी देख ले ।

विज्ञापन :- आभश्‍यकता है एक पांचवी फैल होनहार लड़के के लिये चौथी फैल सुंदर युवती की । लड़का गांव से पांचवी की परीक्षा को पांच बार सफलता पूर्वक फैल करके शहर आ चुका है । तथा जब भी किसी बरात को निकलते देखता है तो उसके हाथ पैर में सलबलाहट होने लगती है । लड़का एक बड़ी मल्‍टी नेशनल कम्‍पनी के बड़े से मालिक की बड़ी सी गाड़ी को चलता है, नहीं नहीं चलाता नहीं है साफ करता है । लड़का शराब नहीं पीता( ड्रग्‍स लेता है ), लड़का सिगरेट नहीं पीता ( गांजे की चिलम पीता है ) लड़का पांच अंकों में कमाता है ( 100 रुपये 50 पैसे मासिक ), लड़का लिखा पढ़ा है ( अंग्रजी के ए से डी तक सुना देता है और हिंदी बोल लेता है पढ़ नहीं पाता ) लड़का लम्‍बा है ( चार फुट दस इंच) खिलते रंग का है ( खिलती अमावस के रंग का ) अपना बैंक बैलेंस है ( तीन रुपये पचहत्‍तर नये पैसे ) लड़के का पुलिस रिकार्ड बहुत अच्‍छा है ( पूरा रिकार्ड इसी के नाम से भरा है ) लडके के पास अपना खुद का चार पहिया वाहन है ( हाथ ठेला ) ।  शादी की बहुत जल्‍दी है इसलिये किसी भी प्रकार की लड़की चलेगी बस शर्त ये है कि साठ से अधिक उम्र नहीं होनी चाहिये । विशेष : लड़के की एक बहन है जो लखनऊ में रहती है कविता उविता करती है, जो भी लड़की लड़के से शादी करेगी उसे अपनी इस ननद की चटर पटर झेलनी होगी । शीघ्र संपर्क करें 04204204200

जन्‍मदिन की शुभकामनाएं प्रकाश अर्श को। ईश्‍वर तुमको हर खुशी हर सुख दे

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नये नये पैदा हुए बच्‍चे के कुछ फोटो और ग़ज़ल

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उतर गया है बुखार सारा पड़े वो जूते तेरी गली में
वो बन के मजनूं कमर हिलाते जो सब थे आये तेरी गली में !

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जिसे मैं कहता था अपना साला, वही लिए था लो बरछी भाला
सभी ने मेरी ठुकाई करदी ,बड़े झमेले तेरी गली में !


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ये फाग का है महीना आया की अब जुदाई न सह सकूँगा
जो तुम ना आये तो सोच लेना ये दम भी जाये तेरी गली में !


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ये होली आयी,लो होली आयी ,लो हर तरफ है ख़ुशी का मौसम
कहीं पे झाझर, कहीं पे ढोलक, कहीं पे ठेके, तेरी गली में !

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अबीर लाओ, गुलाल लाओ, मुझे ज़रा सी तो भंग पिलाओ
सुनो ओ साजन मैं आ रहा हूँ तुझी को रंगने तेरी गली में !

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चला है जादू ये किसका ऐसा बुढ़उ जवां सब हैं लडखडाये
वो नन्हकू भैया बटोही चाचा सभी पड़े थे तेरी गली में !

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नवेली भौजी बहुत लजाये मैं जब भी जाता हूँ रंग लगाने
वो मेरी कमजोरी जानती हैं वो भाग जाये तेरी गली में !

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गली के गोबर में कीच नल की मगर नजाकत इधर भी देखो
मुझे बुलाया बहाना करके औ सर उड़ेले तेरी गली में !

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बहन तुम्हारी बहुत नशीली ये दिल हमारा फिसल रहा है
जो तुम ना आये जो फाग में भी तो वो सुहाए तेरी गली में !

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चले धकाधक, चले धकाधक, चले धकाधक, चले धकाधक
अबीर होली छुआरे किसमिस दो एक प्याले तेरी गली में !

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कंवारे नैना , सुलगती साँसे , मचलती धड़कन , थिरकती खुश्बू
हिफाजतों से रखा है जिनको मुझे मिलेंगे तेरी गली में !

दैया रे दैया पैदा होते ही कंवारे नैना, सुलगती सांसें मचलती धड़कन और जाने क्‍या क्‍या । हम कुछ नहीं बोलेंगें बोलने के लिये इसकी तेज और महातर्रार बहने हैं ।

सुचना - गली वाले पुरुषोत्‍तम का लड़का रामलीला में शूर्पनखा का रोल करने वाले पात्र को छेड़ रहा है । उका हम ये बतान चाही कि शूर्पनखा का रोल करने वाला लड़का है लड़की नहीं है बाकी वो खुद समझदार है ।

सूचना - आप सबकी दुआएं फलीभूत हो गयी हैं । आपके इस मित्र को कुछ उपलब्धि मिली है । आज का हिन्‍दुस्‍तान समाचार पत्र देख लें आप जान जाएंगें कि क्‍या समाचार है । दिल्‍ली के आज के हिंदी के समाचार पत्रों में समाचार छपा होगा यदि आप मुझे स्‍कैन करके समाचार भेज पाएं या डाक से भेज पाएं तो आभारी रहूंगा ।

सूचना - काहे हमें का मुन्‍नी बाई मुजरे वाली समझ रखा है । नानी की एक और छिछोरी कहावत गेल में हगें और आंखें दिखाएं ।

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

होली का तरही मुशायरा :- आज आ रही है एक चांडाल चौकड़ी जिसमें शामिल हैं गिरीश पंकज, डॉ. मोहम्‍मद आज़म, राजेन्‍द्र स्‍वर्णकार और जोगश्‍वर गर्ग । सनम की गली में जूते खाने ।

( नोट : होली तक के लिये समूचे भारतवर्ष में किसी भी प्रकार के दिमागी काम पर रोक लगा दी गई है । वे सारे लोग जो कि होली के अवसर पर किसी भी प्रकार से दिमाग का उपयोग करते पाये जाएंगें उनका रोमगोपाल वर्मा की आग फिल्‍म पूरे सप्‍ताह भर दिखाई जायेगी । होली दिमाग का नहीं दिल का मामला है । )

अरे राम ये हो क्‍या रहा है । क्‍या समूचे पृथ्‍वी के पानी में ही भांग घुल गई है । हम तो सोच रहे थे कि चलो बड़े लोग हैं उनको तो होली के मौसम में सठियाना होना ही है । लेकिन ये क्‍या ये तो बच्‍चों की पूरी टोली भी चली आ रही है । हमहूं का कौनो खबर नहीं कि किसके बच्‍चे हैं कहां से आये हैं हमका तो बस इतरा पता है कि कल से धमाल कर रहे हैं कि हमका भी गजलवा पेलनी है । हमने बहूत समझाया कि नाहीं बचुवा ई जो गजल होती है ये बच्‍चों के खेलने की चीज नहीं होती है, लग जाये तो खून निकल आता है । पर मानत ही नहीं हैं कह रहे हैं जब अइसन अइसन लोग लुगाई भंगिया पी के गजलवा लिखिस रहिन तो हम कौनो से कम नहीं हैं । हम भी पेलेंगें और दमादम पेलेंगें । ऊ में है का एक ठो काफिया और एक ठो रदीफ, बस । हम तो रोते भी इसी बहर में हैं जब रात को भूख लगती है बताएं का उं आं अ आं आं, उं आं अ आं आं, उं आं अ आं आं, उं आं अ आं आं । खैर बहर में रोकर इन चारों की चांडाल चौकड़ी ने आज का मुशायरा अपने नाम कर लिया है । सुनिये ।

आज का होली विचार : सिकंदर से पंगा लो, नेपोलियन से पंगा लो, हिटलर से पंगा लो लेकिन कभी भी भूल कर छोटे बच्‍चों से पंगा मत लो ।

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गिरीश पंकज,जोगश्‍वर गर्ग, डॉ. मोहम्‍मद आज़म, राजेन्‍द्र स्‍वर्णकार

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गिरीश्‍ा पंकज

वहां पहलवान जाने कितने मिले टहलते तेरी गली में
उतर गया है बुखारा सारा पड़े वो जूते तेरी गली में

चढ़ी जवानी में भंग ऐसी नशा कभी भी उतर न पाया
इसीलिये ही जवान दिखते हैं आज बूढ़े तेरी गली में

जो हमने काला ये मुंह किया तो वो लाल-पीली सी होके बोलीं
के अब न खेलेंगे हम तो होली लला जी आके तेरी गली में

सभी भंगेड़ी, सभी गंजेड़ी बसे हैं आकर लगे यहीं पर
मिला के गोबर में थोड़ा कीचड़ नहाए मिल के तेरी गली में
दिखे है टुनटुन-सी तेरी मम्मी कहूं क्‍या तुझसे बताऊं मैं क्‍या
लड़ाए नैना बनाए बतियां ग़ज़ब वो ढाए तेरी गली में

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डॉ. मोहम्‍मद आज़म

सुन ऐ सियासत हो खैर तेरी लुटा के पैसे तेरी गली में
कई उचक्‍के भी गन गय हैं शरीफज़ादे तेरी गली में

शरीफ जैसा हूं बन के रहता मैं आऊं कैसे तेरी गली में
इधर खड़े हैं, उधर खड़े हैं सभी कमीने तेरी गली में

है तेरी औक़ात कितनी ऊंची इसी से मालूम हो रहा है
कली है बिखरी, न फूल बिखरे, हैं बिखरे जूते तेरी गली में

गय था इक रोज़ तुझसे मिलने, पकड़ लिया तेरे भाइयों ने
उतार डाला ख़ुमारे उल्‍फ़त वो मारे डंडे तेरी गली में
पयामे उल्‍फ़त, सलामे उल्‍फ़त, हूज़र तेरे मैं कैसे लाता
हैं शेर कुत्‍ते तेरी गली के जो काट खाते तेरी गली में
तू है सितमगर, तू मेहरबां है तू नर्म दिल है तू संगदिल है
ज़बान जितनी बयान उतने तिरे ही चर्चे तेरी गली में
अबीर छिड़कें, गुलाल छिड़कें, मनाएं खुशियां मनाएं होली
नशा चढ़े भांग का कुछ ऐसा न होश आये तेरी गली में

हो चाहे मुस्‍लिम हो चाहे हिंदू ग़रीब हो या अमीर कोई
भुला के होली पे फ़र्क सारे हों एक जैसे तेरी गली में

दिलों को आपस में जोड़ दें जो हैं रंग होली के गोंद जैसे
तू रंग उस पर भी डाल देना जब आज़म आए तेरी गली में

 

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राजेन्‍द्र स्‍वर्णकार

हमारी मारी गई थी मत , जो...मटकते आए तेरी गली में
मगर ये क्या ! दिन में  हमने देखे चमकते तारे तेरी गली में

तुम्हारे घर के अभी तो हमने लगाए भी थे न चार चक्कर
रईसजादे हमारा भुरता लगे बनाने तेरी गली में

जड़े दनादन हजार घूंसे , जनानियों ने परोसे सेंडल
ये पूतना-कंस-रावणों के नये नमूने तेरी गली में

किसी ने जबड़े ही तोड़ डाले , किसी ने कपड़े भी फाड़ डाले
बनाया शाहरूख से हमको शेटी ,  ये बाल उजड़े तेरी गली में
नहीं पछाड़े यों कपड़े धोबी , लगी वो धोबी पछाड़ हमको
धुलाई सबने हमारी यों की गजब हैं गुंडे तेरी गली में
हमारे मुखड़े पे मल के कीचड़ , गधे पे हमको बिठा' घुमाया
भरे हुए हैं कसाई सारे जहान भर के तेरी गली में

रगड़ के हम नाक , छूट' दौड़े , इशक से तौबा है अब रजिंदर
उतर  गया है बुखार सारा पड़े वो जूते तेरी गली में

 

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जोगेश्‍वर गर्ग

महाबली भी झुकाए मस्तक जब आ रहे हैं तेरी गली में
हुज़ूर हम भी वही रवायत निभा रहे हैं तेरी गली में

तेरी गली में कभी कहीं भी न हो अन्धेरा न हो अन्धेरा
इसीलिये हम जिगर की होली जला रहे हैं तेरी गली में

न वो पिलाते दबाव दे कर न हम बहकते यूं भंग पी कर
बजा बजा कर वो चंग हमको नचा रहे हैं तेरी गली में

न रंग ऐसे कभी उड़े थे न ढंग ऐसे कभी दिखे थे
गुलाबजल की जगह पे कीचड लगा रहे हैं तेरी गली में

बजा रहे हैं वो तालियाँ भी सुना रहे हैं वो गालियाँ भी
वो खुद ही खुद को बना के जोकर हंसा रहे हैं तेरी गली में

हजार जूते हजार गाली लिए खड़े वो सजाये थाली
न यार कोई खिला रहे हैं न खा रहे हैं तेरी गली में

मचा हुया है अजब अनोखा रहस्य सा इक तेरे शहर में
हजार बातें करोड़ किस्से न जाने क्या है तेरी गली में

वो जो कभी भी हँसे नहीं थे वो जो कभी भी फंसे नहीं थे
वो आज आलम बेहूदगी का मचा रहे हैं तेरी गली में

तेरी गली से निकल गए जो उन्हें ठिकाना कहाँ मिलेगा
जगह मुकम्मल उन्हें भी मुश्किल जो आ रहे हैं तेरी गली में

न "जोग" कोई न कोई "ईश्वर" न आज "जोगेश्वरों" की जुर्रत
न समझदारी न होशियारी दिखा रहे हैं तेरी गली में

वाह वाह क्‍या ही शेर निकाले हैं । जोगश्‍वर जी कुछ टुन्‍न जियादा थे सो रदीफो काफिया बदल गया । मगर फिर भी निभा ले गये । तो देते रहिये दाद खाज़ खुजली सब कुछ ।

सूचना - कल जब लक्ष्‍मण जी मंच के पीछे से बीड़ी पीकर मंच पर मेघनाथ युद्ध के लिये आ रहे थे तो किसी ने उनको गन्‍ने की गंडेरी फैंक कर मारी । जब उनने पूछा कौन तो जवाब मिला कि भूत । ये भूत पिछले साल भी गंडेरी फैंक कर गया था इस साल भी आया है । भूत से निवेदन है कि पूरा गन्‍ना फैंके ताकि खाने के काम आ सके ।

सूचना - कल हरियाणा से किसी समाचार पत्र की सम्‍पादिका जी का फोन आया था वे कह रहीं थीं कि वे होली के तरही को अपने होली विशेषांक में स्‍थान देना चाह रहीं है । स्‍वीकृति चाहती थीं सो हमने दे दी । अब हरियाणा वालों की जिम्‍मदारी है कि वो उस समाचार पत्र को बाकियों तक पहुंचायें ।

सूचना - कल हमार बचुवा का जिन्‍नमदिन हइबल । गोबर भेजें । कीचड़ भेजें । मगर शुभकामनाओं के साथ भेजें । कल बचुवा सन्‍नारियों के बीच आपन गजलवा पढि़ल ।

सूचना - दुर, का समझ लिहिन है हमका । जाओ नहीं देते कोई सूचना । रो रो डुकरियां गीत गाएं मोड़ा मोड़ी के हंसी आए ( नानी की कहावत) ) कल नानी की एक और कुछ घटिया सी कहावत के साथ मिलते हैं ।

बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

होली का तरही मुशायरा:- दो दिन से जूते चल रहे हैं तो आज देखें कि कौन उतार रहा है जूतों से आरती ? हैं ये तो निर्मला कपिला दी, शार्दूला दीदी और कंचन चौहनवा रही ।

( विशेष नोट : होली के तरही मुशायरों की ग़ज़लों को पढ़ने के लिये अपने दिमाग को उसी प्रकार खूंटी पर टांग दें जिस प्रकार से आप डेविड धवन की कामेडी फिल्‍मों को देखते समय करते हैं । यदि दिमाग को साथ रखेंगें तो मनोर‍ंजन की हमारी कोई जिम्‍मेदारी नहीं है ।)

तभी न हम सोचें कि ये हंगामा उंगामा हो क्‍यों रहा है । हम तो लाठी लेकर पहूंच गये थे कि कौन हैं जो गली में एतना धमाल कर रही हैं । पर हम जइसयन गयल बा वइसन ही पूंछ दबाय के कूकर की भांति अइल भी गये । काहे, अरे जोन तीन सन्‍नारियां धमाल करत रहीं वो तो हमार बहीन रहीं । अब कंचन के तो चुटिया पकड़ के हम अभीन खींच लाएं । कछू लाज शरम है या सब भांग के गिलास में घोंट के पी गईं हों । हम नहीं डरते । पर का करें हमारी तो किस्‍मत ही फूटी है । चुटिया पकड़बे का इत्‍ता सानदार मौका हाथ से हीट गया । काहे, के उके साथ हमारी दो बड़ी बहिनियां भी धमाल कर रहीं हैं । दद्दा रे दद्दा का हो गया है इन तीनों को । कौन जाने का पी लिया है होरी के दिन कि तीनों ही आरती की थाली में जूते सजाय के गली के नीम के नीचे खूब तो नाच रही हैं और धमाल कर रही हैं । हम तो आपको का बताएं हमारी तो नाक गोड़ से ही कट गई फचाक दनी से । हम तो काहू के अपना सुंदर मुखड़ा दिखाय के लायक भी नहीं रहे । कंचन अकेली होती तो तो कोई बात नहीं थी पर ई पंजाबी जिज्‍जी और सिंगापुरी भैनजी को क्‍या हो गया । हे राम हम तो किसी नाली में मुंह दबा लेते हैं अब होली तक । ( पहले ये बताओ कि तीनों को भंग पिलाई किसने । )

आज का होली विचार : आज के चित्रों ने ये बात सिद्ध कर दी है कि लोग व्‍यर्थ में ही ये कहते हैं कि पुरुष जन्‍मजात छिछोरे होते हैं ।

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देखिये तो भला किस प्रकार से धमाल कर हैं तीनों की तीनों बहनियाएं । अपने इत्‍ते इज्‍जतदार भाई भभ्‍भड़ कवि का भी ध्‍यान नहीं हैं । हम तो अब सटक रहे हैं आप खुद ही पढ़ लो अब ।

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निर्मला कपिला दी ( भैनजी)

बहार ले कर, है आयी  होली, खुशी मनाये गली हमारी
उतारो जूते से आरती अब सजन है आये गली हमारी

सखी ले आना तगारी गोबर गुलाब ले कर उसे सजाना
करो सुवागत, जु शान से वो, ठहर न पाये गली हमारी

अबीर कीचड मिला बनाएं जरा सा उबटन, लगे सजीला
खिलाऊँ घी गुड चुरी उसे जो पकड के लाये गली हमारी

बना सखी हार चप्पलों से, सडे टमाटर, पिरोना उपले
है चाहता तो गधे पे चढ कर चला वो आए गली हमारी
निगाह उसकी मुझे है ढूँढे मैं बचती छुप छुप सखी के पीछे
बने वो छैला, कहे है लैला,  मुझे सताये गली हमारे

करूँ विनय लो न भंग धतूरा अभी है मेरी नज़र शराबी
सजी धजी सजनी ले के डंडा तुझे बुलाये गली हमारी

बहुत सताया, मुझे है पर अब, मैं गिन के बदले करूँगी पूरे
बुरा न मानो शुगल करें जो होली मनाये गली हमारी
मुझे सताये बना बहाने बता भला ये उमर है कोई
चखाऊँ उसको बना के भुर्ता मजे से खाये गली हमारी
है दाँत नकली,चढा है चश्मा,झुकी कमर है बने जवां वो
ले धूल मिर्ची बुरक उसे जो ये छब बनाये गली हमारी

करो पिटाई, करो ठुकाई,बुढ़उ को देखो बना मजाजी
मज़ा चखाऊँ,उसे बताऊ कभी जु आये गली हमारी

निरा ही लम्पट न शक्ल सूरत मलो तो चूना औ चाक मुंह पर
बना के जोकर नमूना नमूना उसको उठा दिखाये गली हमारी
ये ब्लाग दुनिया हुयी चकाचक बिखर रही है खुशी जहाँ मे
सुबीर लाये रंगीन होली हंसे हसाये गली हमारी
सजे ये होली सजे नशिश्‍तें सभी तरफ हो खुशी मुहब्बत
मुबारके हैं सलाम भी हैं, यूं खिलखिलाए  गली हमारी

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शार्दूला नोगजी दीदी ( सिंगापुर बुआ)

उतारो जूतों से आरती सब सनम हैं आए गली हमारी

कि जिसकी लाठी, है भैंस उसकी, नियम निभाए गली हमारी

उठा पटक दे, गिरा झटक के, दे मार बैलून आँख तक के

बहुत मिलाए रहे इ अंखियाँ, नज़र छुड़ाए गली हमारी

उसी तरह से बजाव सीटी, कि जिस तरह ये रहे बजाते

सुनो सुनयना, सही सिलेमा, इने दिखाए गली हमारी

बेपेंद लोटा, कपार खोटा, छुटंक हाइट, त ऊ प मोटा

सजन हमारा बनय क सपना,  सकल भुलाए गली हमारी

कहाँ से आया सुफेद-काला, पुरान मॉडल कबाड़ वाला

कलर्ड डिजिटल दिलाव हमका, वही चलाए गली हमारी

बुरा न मानो गुलाल के दिन, लगे है गारी परम पियारी

बनो सजनवा तुमहु गुलाबी, तुम्हें मनाए गली हमारी

अबीर तन पे, अबीर मन पे, अबीर चहु दिसि धरा-गगन पे

पिया परस बिन गहन अगन रे, जलद बुलाए गली हमारी

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कंचना चौहान ( बतौली बहना )

अबीर रंगो के रंगी बादल, हैं आज छाये मेरी गली में

कि काश साजन, भी बन कोई घन, मुझे भिगाये मेरी गली में।

गुलाल का रंग है फीका फीका, औ ढोल गुमसुम अलग पड़ी है,

मनेगा फागुन, जो आ के हमदम, भी फाग गाये मेरी गली में।

ये श्यामरंगी सजन के ऊपर, जो हलका हलका सा रंग पड़ा है,

कि मुझ सी जोगन मचल पड़ी वो, मुझे रिझाये मेरी गली में।

जो खुशबू मीठी सी आ रही है, वो खुरमे भाभी बना रही है,

हाँ ये ही खुरमे, हाँ ये ही गुझिया, मुझे ले आये मेरी गली में।

नयन तुम्हारे बने गुबारे, निशाना दिल का ही साध मारे,

मेरी ही गलती से दिल ये मेरा, है चोट खाये मेरी गली में।

हरी चुनरिया औ लाल टिकुली, नयन में काजल है काला काला,

हुई है पूरी हमारी होली, जो आप आये मेरी गली में।

है होलिका अब गली गली में, वो चाहे संसद हो या कि कालेज,

कहाँ पे ढूँढ़े उसे कोई अब, जिसे जलाये मेरी गली में।

अजी हो सुनते पवन के पापा, खड़े ज़रा सा हो जाओ छत पर,

भगे तुरत फिर ये सारे बंदर, जो मिल के आये मेरी गली में।

बड़े दिनो से पड़े हैं पीछे, कि आज इनका भी मान रख लो,

उतारो जूतो से आरती सब, सनम हैं आये मेरी गली में।

वो बोले भाभी गले है मिलना, वो बोली पहले नहा के आओ,

बनाया गोबर का एक दरिया, वो तब नहाये मेरी गली में

पहले एक गंभीर बात आज की तीनों ग़ज़लों को कई कई बार पढि़ये और प्रिंट आउट निकाल कर पढि़ये । आपको कारण समझ में आ जायेगा कि हजल क्‍या होती है । आपको समझ में आ जायेगा कि निर्मल और निश्‍छल हास्‍य क्‍या होता है । तीनों बहनों को मेरा सलाम आप तीनों ने आज मुशायरा सार्थक कर दिया । मैं कोई एक शेर कोट नहीं कर सकता । उफ ये क्‍या लिख डाला आप तीनों ने मिलकर । मित्रों आज की ग़ज़लों पर इतनी दाद आनी चाहिये कि जगह ही कम पड़ जाये । और वो भी बड़ी बड़ी दाद । तीनों की मेहनत और इतनी सुंदरतम ग़ज़लों के लिये यदि आपने लम्‍बी लम्‍बी दाद नहीं दी तो होली के दिन आपको काला कुत्‍ता काटेगा ।

सूचना: कलावती बाई अपने घर को छोड़कर पड़ोस के घर में ताला लगा आई हैं सो वे मुशायरा छौड़ कर पहिले घर पहुंचे ।

सूचना : कल हमारी पाठशाला के एक कुंआरे बच्‍चे का जनमदिन भी है सो कल सब मिलकर शुभकामनाएं दें, कंचन से अनुरोध है कि वो गोबर और बकरी की मेमनियों से डेकोरेट किया हुआ केक तुरंत भेजे अपने भाई के जन्‍मदिन के लिये ।

सुचना : सभी से अनुरोध है कि ठीक होली के दिन अपने अपने ब्‍लाग पर होली की यही हज़ल लगा कर होली का त्‍यौहार मनाएं । 

सूचना : काहे हम का आकाशवाणी हैं कि विविध भारती हैं कि सूचना देते ही रहेंगें । अरे हटाओ बाल्‍टी नल कब के जा चुके हैं ।