शुक्रवार, 4 नवंबर 2016

बासी दीपावली तो देव प्रबोधिनी एकादशी तक जारी रहती है तो आइए आज देवी नागरानी जी और शिफ़ा कजगाँवी जी की ताज़ा ग़ज़लों के साथ मनाते हैँ बासी दीवाली।

Diwali-celebration-in-Andhra-Pradesh

मित्रो इस बार का मुशायरा बहुत आनंद प्रदान कर रहा है। हर बार कुछ नए भावों की ग़ज़लें सुनने को मिल रही हैं। मिसरे को नए नए तरीकों से गिरह में बाँधा जा रहा है। बहुत उम्दा शेर सुनने को मिल रहे हैं। त्योहार का ऐसा माहौल बन गया है कि लगता है जैसे यह चलता रहे बस यूँ ही। और अभी जिस प्रकार ग़ज़लें बची हुईं हैं उससे तो लगता है कि हम इस मुशायरे को देव प्रबोधिनी एकादशी तक तो चला ही पाएँगे।

उजाले के दरीचे खुल रहे हैं

आज की दीपावली हम मनाने जा रहे हैँ दो शायरात की ग़ज़लों के साथ। दोनों ही बहुत समर्थ रचनाकार हैं और इस ब्लॉग परिवार की आधी आबादी की सशक्त प्रतिनिधि हैं। आदरणीया देवी नागरानी जी और शिफ़ा कजगाँवी जी की ग़ज़लों के साथ आइये आज दीपावली के क्रम को आगे बढ़ाते हैं।

deepawali

devi_nangrani

देवी नागरानी जी

deepawali (1)

दिवाली के कई दीपक जले हैं
ग़ज़ल के रंग शब्दों में सजे हैं  

सुमन सूरजमुखी कितने खिले हैं
‘उजाले के दरीचे खुल रहे हैं’

सितारे गर्दिशों के आज़माएँ
सितम खारों के लगते फूल से हैं

चले घर से थे जिन राहों पे हम तुम
कई अनजान राहों से मिले हैं

समाये सब्ज़ मौसम आँखों में जो
वही सपनों की राहें तक रहे हैं

शजर कोई न था, साया न ‘देवी’
सफ़र सहरा में करते जा रहे हैं

deepawali (4)

वाह वाह वाह बहुत ही सुंदर ग़ज़ल कही है। मतला हमारे इस मुशायरे को मानो परिभाषित कर रहा है, ग़ज़ल के शब्दों के रंग से दीपावली मनाता हुआ सा मतला। और उसके बाद गिरह का शेर हुस्ने मतला भी खूब बना है। सूरजमुखी के फूलों के खिलने से उजाले के दरीचों के खुलने का बहुत ही सुंदर चित्र बनाता हुआ शेर। और उसके बाद जीवन के कठिन समय को समर्पित दो शेर। सचमुच यह बड़ी बात है कि यदि आप अपने जीवन के कठिन समय को याद करेंगे तो वर्तमान समय की परेशानियाँ आपको फूल सी ही लगेंगी। सोच से ही सब कुछ होता है। प्रेम में डूबा शेर जिसमें आँखों में समाए सब्ज़ मौसम सपनों की राह तक रहे हैं खूब है। मकते का शेर भी अच्छा बना है । बहुत ही सुंदर ग़ज़ल कही है क्या बात है वाह वाह वाह।

deepawali[4]

ismat zaidi didi

‘शिफ़ा’ कजगाँवी

deepawali (1)[4]

धमाके जब से बच्चों ने सुने हैं
कलेजे माँओं के थर्रा रहे हैं

न जाने कितनी गुड़ियाँ फूँक डालीं
न जाने कितने बस्ते जल चुके हैं

लहू से सींचते हैं बाग़ ओ गुलशन
जो दहशत की तिजारत चाहते हैं

ख़मोशी वादियों की कह रही है
कि परवाज़ों के पर टूटे हुए हैं

जिन्होंने अम्न का परचम उठाया
वो ज़ुल्म ओ जौर की ज़द में खड़े हैं

किसी जानिब शफ़क़ फूटी है शायद
"उजाले के दरीचे खुल रहे हैं"

deepawali (4)[4]

आदरणीया इस्मत दी ने इस ग़ज़ल के साथ एक भावुक पत्र भी लिखा था जिसकी भावना यही थी कि हमारा देश एक बार फिर से उसी प्रकार भाईचारे और सुकून का देश बन जाए। यह आतंक या नफरत सब मिट जाए। पूरा ब्लॉग परिवार आमीन के स्वर में उस दुआ के स्वर में स्वर मिलाता है। पूरी ग़ज़ल लगभग मुसलसल ग़ज़ल है लेकिन जैसा कि साहित्य का स्वभाव होता है वह अंत में आशा के साथ समाप्त होता है वही यहाँ भी हो रहा है। मतला बहुत ही प्रभावी है बच्चे धमाके सुन रहे हैं और माँओं के कलेजे थर्रा रहे हैं,सच में यही तो होता है, दुनिया की हर बारूद केवल माँ के कलेजे को ही फूँकती है। और उसके बाद आतंकवाद का एक और घिनोना चेहरा दूसरे शेर में उभर कर सामने आया है। जिसे अगले शेर में भी मुसलसल कायम रखा गया है। बहुत ही साहसिक और पैने शेर हैं ये दोनों। अगले शेर में वादियों की ख़मोशी और परवाजों के टूटे पर जैसे एक पूरा कैनवस है जिस पर दर्द के रंगों से चित्रकारी की गई है। बहुत ही सुंदर। और अगला शेर एक बार फिर उन सब अच्छे लोगों की पीड़ा को बयाँ करता है जो अमपसंद हैं लेकिन हर बार उन्हीं पर बिजलियाँ टूटती हैं। यह चारों शेर मिलकर मानों पूरी कहानी कह रहे हैं, दर्द कर कहानी। लेकिन अंत का गिरह का शेर आशा की किरण को लेकर आता है ग़ज़ब की सकारात्मक गिरह बाँध कर शेर बनाया है। पूरी ग़ज़ल जिस सन्नाटे में छोड़ती है उससे यह शेर आशा की राहत देकर निकालता है। बहुत ही प्रभावशाली और सामयिक ग़ज़ल कही है क्या बात है वाह वाह वाह।

deepavali2

तो यह हैं आज की दोनों ग़ज़लें, बहुत ही सुंदर और प्रभावी ग़ज़लें। आपके पास अब काम है कि इन सुंदर ग़ज़लों को उतनी ही सुंदर दाद देकर सराहें। और हम अगले अंक में कुछ और रचनाकारों के साथ मिलते हैं। भभ्‍भड़ कवि भी जुरासिक पार्क के युग से लौटने की तैयारी कर रहे हैं।

deepawali[4]

33 टिप्‍पणियां:

  1. वाह वाह क्या सुन्दर रचनाएँ मिलीं हैं पढ़ने को. देवी जी ने बहुत ही शानदार मतला बनाया है. और फिर गिरह का शेअर और सितारे गर्दीशों के आज़माएँ लाजवाब शेअर हैं. हर शेअर का अपना अलग ही रंग है. वाह वाह मज़ा आ गया

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    1. गुरप्रीत जी आपका रहे दिल से धन्यवाद प्रोत्साहित करने के लिए...
      इस मच से आग़ाज़ किया था और जुड़े रचना। सौभाग्य है।

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  2. शिफा जी ने आतंकवाद का घिनोना चेहरा उजागर करती हुई बहुत शानदार ग़ज़ल कही है. मतला और आखरी शेअर दोनों बहुत ही ज़ोरदार हैं. परवाजों के पर टूटे हुए हैं और बाकि के सारे शेअर भी बहुत असरदार हैं.

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  3. बहुत अच्छी ग़ज़लें..

    देवी जी की ग़ज़ल बहुत सुंदर बन पड़ी है. "चले घर से थे जिन राहों पे हम तुम.." बहुत सुंदर शेर है. मक्ता भी बहुत पसंद आया. खूबसूरत ग़ज़ल के लिए बधाई..


    शिफा जी की ग़ज़लें हमेशा ही गहरे भाव लिए होती हैं. ग़ज़ल काफी इन्टेंस है और हालत ब्यान कर रही है. दिली दाद.

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  4. नागरानी दीदी का जवाब नहीं ! मुम्बई की वो हसीन शामें भूलती नहीं जिनमें उनके घर पर नशिश्तें हुआ करती थीं !उनसे बहुत कुछ सीखा ! दीदी की गजलें बहुत हट के हुआ करती हैं इस बार तरही में आ कर उन्होंने मुशायरे में चार चॉंद लगा दिये हैं ! गजल के रंग लफ़्ज़ों में सजाने का हुनर उन्हें खूब आता है! बहुत खूबसूरत गजल कही है दीदी ने वाह मजा आ गया ! ज़िंदाबाद !!

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  5. आज की पोस्ट की मेरे लिये अहम है मेरी बड़ी और छोटी बहने दोनो एक साथ आई हैं ! इस्मत बहन की क्या तारीफ़ करूँ ? जब गजल कहती हैं कमाल करती हैं ! अमन का संदेश देती उनकी ये मुसलसल गजल लाजवाब है ! न जाने कितनी गुड़िया फूँक डाली जैसे अशआर पढ कर कलेजा मुँह को आता है ? क्यूँ दुनिया में अमन चैन नहीं रह पाता ? इस्मत बहन की गजल मन में संवेदनाओं का सैलाब ला रही है! ज़िंदाबाद बहना !!

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    1. शुक्रिया नीरज भैया , आशीर्वाद बनाए रखिये जो कुछ भी है सब उसी का फल है

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    2. अनुज नीरज क्या कहूँ,, वो दिन भी क्या दिन थे जब अक्सर मिलना होता था, सुनना और सुनाना हुआ करता था.. ग़ज़ल जीवन की धड़कन है

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  6. देवी नागरानी जी के आखिरी तीन शेर ज़ोरदार हैं ,वाह।

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  7. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  8. शिफा जी का मतला तो है ही ज़ोरदार ,चौथा और पांचवा शेर भी बहत खूब है । वाह ।

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  9. क्या बात.... दोनों ही ग़ज़लें शानदार हैं. इस्मत की गज़ल ने तो सिहरन पैदा कर दी... पहला शेर पढते ही दबा-सहमा माहौल, जो आज की पहचान बन चुका है, साकार हो उठा. "जिन्होंने अम्न का परचम उठाया..... " कमाल शेर. "किसी जानिब शफ़क फूटी है..." शानदार मक़्ता. सच्चा शायर/कवि वही है जो उम्मीद का दामन न खुद छोड़े, न छोड़ने दे. बधाई.

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    1. हाँ वंदना हालात ऐसे अश’आर लिखवा रहे हैं :( जब्कि सच पूछो तो अमन , शाँति, भाईचारे पर लिखने का बड़ा मन करता है पर लगता है जैसे झूठ बोल रहे हों

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    2. वंदना जी
      आभार आपका

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  10. आदरणीय देवी नगरानी जी ने हुस्‍ने मत्‍ला में जिस खूबसूरती से खिलते सूरजमुखी में उजाले के दरीचे का दृश्‍य प्रस्‍तुत किया है वह बेहद खूबसूरत है। लाजवाब। खूबसूरत ग़ज़ल। वाह-वाह।
    इस्‍मत आपा ने जिस खूबसरती से ग़ज़ल में निरंतरता जारी रखते हुए वादी के हालात् सामने रखे हैं, मुझेे लगता है वादी का कोई भी बाशिंदा इन्‍हें पढ़ने के बाद सोचने के लिये मजबूर हो जायेगा कि आखिर क्‍यों हो रहा है ऐसा क्‍यों उनकी आने वाली नस्‍लें घुटनभरे धुऍं में पैदा हो रही हैं और पल रही हैं। इसके साथ ही अंतिम शेर केसर की वादियों में फूूटी शफ़क़ में उजाले के दरीचे देखना लाजबवाब है। वाह-वाह।

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया तिलक भाई ,
      अपने देश की हालत पर और बदलती हुई सोच पर मन बहुत दुखी है

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    2. लोकतंत्र में राजनीति रोजगाार बन जाती है तो यही होता है।

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    3. तिलक राज जी
      आपके प्रोत्साहन ने हमेशा मुझे सहारा दिया है.. ThanQ is no reciprocation

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  11. देवी जी की ग़ज़ल ने तो मतले के साथ ही समा बांधना शुरू कर दिया ... फिर सूरज मुखी से उजाले के दरीचे खुलने वाला शेर तो और भी कमाल है ... एक राह से अनेक राहों का मिलना एक सकारात्मक सोच लिए है ... पूरी ग़ज़ल ही बेहतरीन बन पड़ी है ... बहुत बधाई देवी जी को ...

    आदरणीय इस्मत जी की ग़ज़ल का हर शेर सोचने पर मजबूर करता है ... कहाँ जा रहा है आज का समाज ... और क्यों जा रहा है ... मतले के शेर ने बहुत देर तक रोके रखा ... आज की सच्चाई को सहज ही कह दिया उन्होंने ... धमाकों में एक माँ के दिल से पूछे की क्या सोचती है ... अगले ही शेर में आतंक के घिनोने चेहरे से रूबरू कराया है ... गुड़ियों और बस्तों के सहारे एक कडवे सच को लिखा है ... वादियों की खामोशी वाला शेर भी बहुत लाजवाब है और फिर अंत में आशा और उम्मीद के साथ जो गिरह बाँधी है बहुत हो कमाल है ... बहुत बहुत बधाई इन बेहतरीन शेरों पर ....

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया दिगंबर जी ,,, बस एक उम्मीद ही तो है जिस का दामन हम ने कस कर पकड़ रखा है

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  12. पंकज बहुत बहुत शुक्रिया, ख़ुश रहो

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  13. प्रिया इस्मत जी
    आपकी ग़ज़ल का हर शेर वतन परस्ती की ओर एक सजदा है... आपको दाद के साथ
    इस देश के जवाँ सब अपने ही भाई बेटे
    ममता का क़र्ज़ देवी हर एक ने उतारा,,,जयहिंद

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  14. अच्छे अश’आर कहे हैं आदरणीया नागरानी जी ने। मत्ला सचमुच इस ब्लॉग की हकीकत बयानी कर रहा है। बहुत बहुत बधाई उन्हें।

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  15. आदरणीया शिफ़ा जी ने दो ही शेरों में वादियों का सारा हाल बयाँ कर दिया है। उसके बाद शे’र दर शे’र एक मंजर बुना है जो सोचने पर मजबूर करता है। यही इस ग़ज़ल की सफलता है कि ये सोचने पर मजबूर कर रही है। सचमुच मुकम्मल ग़ज़ल है। बहुत बहुत बधाई आदरणीया शिफ़ा जी को।

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  16. आदर्णीय देवीजी की गज़लों के तो जाने कब से शैदाई रहे हैं. हर बार नई सोच का इज़हार होता है उन्के शेरों में. आदरणीय इस्मतजी के अल्फ़ाज़ के विषय में कुछ कहना मेरी हैसियत के बाहर है. बस वाह वाह वाह वाह..

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  17. आदरणीया देवी नागरनी जी की ग़ज़ल का अंदाज़ अपना-अपना-सा है. उम्दा ग़ज़ल हुई है. इसमें भी सुरजमुखी वाला शेर तो कमाल का बन पड़ा है.

    आदरणीया इस्मत जी की ग़ज़ल से निस्सृत सोच और विवशता आज के माहौल को शब्दशः बखान रही है. आज दुनिया जिस तरह के लोगों के हाथों में खिलौना-सी हुई दिख रही है, इस पर आपकी चिंता आपके लेखन और उसके आयाम का बल है.
    सादर बधाइयाँ आदरणीया..

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