गुरुवार, 10 नवंबर 2016

सभी को देव प्रबोधिनी एकादशी की बहुत बहुत शुभकामनाएँ। आइए बोर-भाजी-आँवला, उठो देव साँवला के सुर में सुर उचारते हैं मन्सूर अली हाशमी जी और तिलकराज कपूर जी की द्वितीय ग़ज़लों के साथ।

deepawali (15)

मित्रों कहा जाता है कि हर त्योहार हमें कुछ समय तक उत्साह और उल्लास से जीने की अतिरिक्त ऊर्जा प्रदान करता है। यह ऊर्जा हम सबके लिए बहुत आवश्यक होती है। हमें समझना चाहिए कि यह ऊर्जा ही हमारा वास्तविक जीवन है बाकी सब तो एक फिज़ूल की कवायद भर है। एक दौड़ है जिसमें हम दौड़े जा रहे हैं बस। किसी को रोक के पूछो कि भई क्यों दौड़ रहे हो तो उसके पास कोई उत्तर नहीं होता है। बस दौड़ना है सो दौड़ रहे हैं। हम सब एक ठिठके हुए समय में जी रहे हैं जिसमें हम बाहर से जितनी तेज़ी के साथ दौड़ रहे हैं, अंदर उतने ही ठहरे हुए हैं। स्थिर हैं। अरूज़ की भाषा में कहें तो हम बाहर से भले ही मुतहर्रिक दिख रहे हैं लेकिन अंदर से हम सब साकिन होते जा रहे हैं। ‌स्थिर होना कोई बुरी बात नहीं है लेकिन जड़ होना तो बुरी बात है ही। आइए अपने अंदर की जड़ता को आज तोड़ते हैं।

deepawali (1)[7]

उजाले के दरीचे खुल रहे हैं

deepawali (4)

मित्रों आज गोलमाल रिटर्न्स या धूम 2 की ही तरह हाशमी रिटर्न्स और तिलक 2 का दिन है। आज मन्सूर अली हाशमी जी और तिलक राज कपूर अपनी अपनी दूसरी ग़ज़लों के साथ अवतरित हो रहे हैं।

deepawali

Mansoor ali Hashmi

मन्सूर अली हाश्मी जी

deepawali (1)

नये हैं जी, अजी बिल्कुल नये हैं
रदीफों, काफियों में फिट करे हैं।

मिरे अशआर में ढूँढो न माअनी
जुनूँ हद से बढ़ा तो ये हुए हैं।

हुआ है क़त्ल कोई मेरे अन्दर
ग़ज़ल के लफ़्ज़ भी ख़ूँ से सने हैं।

अब उनसे बे वफाई का गिला क्या?
दग़ा हम भी तो ख़ुद से ही किये हैं।

अंधेरों अब समेटो अपनी चादर
उजाले के दरीचे खुल रहे हैं।

कलामे 'हाश्मी'  है बस तमाशा !
ये बाताँ आप कैसी कर रिये हैं ?

deepawali (4)[4]

बहुत ही सुंदर द्वितीय ग़ज़ल कही है हाशमी जी ने। एक मज़ाहिया अंडर टोन हाशमी जी की सभी ग़ज़लों में मिलता है और उसका होना उनकी ग़ज़लों को एक अलग प्रकार का सौंदर्य प्रदान करता है। यह पूरी गज़ल मानों अपने ही ऊपर हँसने के लिए लिखी गई है। मतला हास्य के साथ गहरा तंज़ कसता है उन पर जो मात्र तुक मिलाने और क़ाफ़िया मिलाने को ही कविता या ग़ज़ल कहना मान कर चलते हैं। उसके बाद का शेर बहुत खूब बना है एक प्रबल विरोधाभास का शेर । उसके बाद का शेर जिसमें अंदर क़त्ल होना और शेरों का खून से सन जाना प्रतीक बन कर खूबसूरती से सामने आया है। बेवफाई का शेर और गिरह का शेर भी अच्छा बना है । और मतले का शेर तो कहन के अंदाज़ में बहुत ही सुंदर है बहुत ही अच्छे से बातचीत के अंदाज़ में शेर कह दिया गया है। वाह वाह वाह बहुत ही सुंदर ग़ज़ल।

 deepawali[4]

TILAK RAJ KAPORR JI

तिलक राज कपूर

deepawali (1)[4]

ग़ज़ल हमारे सीमा-प्रहरियों के लिये

लकीरों में लिखाये रतजगे हैं
हमारे, सरहदों पर घर बसे हैं।

नहीं दिखता है अंतर देह में पर
अलग जज़्बा हम इसमें पालते हैं।

धुआँ, बारूद, दनदन गोलियों की
हमें तोहफे ये उत्सव पर मिले हैं।

जहाँ मुमकिन नहीं इन्साँ का बचना
वहीँ दिन-रात रहते बाँकुरे हैं।

जहाँ इक ज़िद लिये फौजी खड़ा हो
कठिन हालात्, मौसम हारते हैं।

सुकूँ से आप सोयें देश वालों
अभी सीमा पे प्रहरी जागते हैं।

यकीं हम प्रहरियों को है वतन में
उजाले के दरीचे खुल रहे हैं।

deepawali (4)[4]

कभी-कभी ऐसा लगता है कि कुछ कहा न जाए कोई भी प्रतिक्रिया व्यक्‍त नहीं की जाए, बस निःशब्द होकर सुना जाए। तिलक जी ने हमारे सेना के जवानों के लिए जो ग़ज़ल कही है वह ऐसी ही है। इस पर क्या प्रतिक्रिया व्यक्त की जाए। मतला ही इतनी खूबसूरती के साथ कहा गया है कि वहीं पर निःशब्द हो जाने की जी करता है। और उसके बाद अलग जज़बा समान देह में वालने का शेर भी बाकमाल तरीके से कहा गया है। उत्सव के तोहफे भी बहुत खूबसूरती के साथ चुने हैं शायर ने, जो एक सैनिक की पूरी पीड़ा को स्वर प्रदान कर रहे हैं। और फौजी की ज़िद के आगे कठिन हालात और मौसमों का हारना कितना बड़ा सच है यह हमारे समय का। और उसके ठीक बाद का शेर एक आश्वस्ति है देशवासियों को सेना की ओर से कि अभी हम हैं चिंता मत करिए। और अंत के शेर में बहुत ही खूबसूरत तरीके से गिरह लगाई गई है। बहुत ही सुंदर। यह निश्चित ही एक अलग प्रकार की और बेहद सुंदर ग़ज़ल है। वाह वाह वाह।

 deepawali[4]

तो यह हैं आज के दोनों शायर अपनी-अपनी ग़ज़लों के साथ। बहुत ही सुंदर ग़जलें कही हैं दोनों ने। आपका दाद देने का काम बढ़ा दिया है। अभी शायद एकाध पोस्ट और आनी है उसके बाद य‌दि सब कुछ ठीक रहा तो भभ्‍भड़ कवि भौंचक्के अपनी ग़ज़ल के साथ आ सकते हैं।

deepawali (1)[4]

17 टिप्‍पणियां:

  1. आज पहली टिप्पणी करने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हो रहा है !
    हाशमी साहब यों तो आपकी गज़अल के सरे शेर अच्छे हैं पर खासतौर पर दूसरा , पांचवां और छठा शेर पसंद आये !
    तिलक राज कपूर जी की ग़ज़ल के भी तमाम शेर अच्छे हैं और खासतौर पर इनका भी दूसरा ,पांचवां और छठा शेर पसंद आये !

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  2. वाह वाह क्या सुंदर प्रस्तुति. बिल्कुल सही कहा गुरु जी ने हाश्मी जी की गज़ल के बारे में.मज़ाहिया अंडरटोन में कही शानदार गज़ल.इतनी सादगी,इतनी सरलता, जैसे झरने की तरह बहती जा रही हो गज़ल.लाख कोशिश करने पर भी मैं अपनी गज़ल में ऐसी रवानगी नहीं ला पाता.हर शेर शानदार.हर शेर में अलग ही बात है.एक से बढ़कर एक.बहुत पसंद आई

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  3. सलाम सीमा प्रहरियों को,तिलक जी को भी,सजीव चित्रण के लिये. अन्तर्मन को छूने वाले अशआर.

    " पढ़ो, सर को अदब से ख़म करो भी
    'तिलक' सीमा प्रहरियों पर लिख रहे है।"

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    1. तहेदिल से आपका शुक्रिया जनाब।
      मोहब्‍बतें बनाये रखें।

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  4. और तिलक राज कपूर जी के तो क्या कहने.हमारे जवानों को समर्पित इससे बेहतर गज़ल हो ही नहीं सकती.क्या शानदार मतला वाह वाह.जहाँ इक जिद लिए फौजी खड़ा हो कठिन हालात मौसम हारते हैं. क्या बात है श्रीमान. बाकी सारे शेर भी बहुत दमदार.और वही कमाल की सादगी और रवानगी इस गज़ल में.बहुत बढ़िया sir.
    और हाँ मेरे शेर को सुधारने के निवेदन पर जो आपने अपना समय दिया.उसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद.वाकई आपने सही कहा मैं शेर के शब्दों को छोड़ने को तयार नहीं था. जबकि शेर का अर्थ हमारा असली आशय हों चहिए.ये एक बहुत अच्छी सीख मिली है आपसे.आपने जो इस शेर का नया रूप सुझाया है.उस पर और कोशिश करके फ़िर आपसे जानना चाहूंगा.

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    1. बहुत-बहुत आभारी हूॅंं आपका। शेर कहते कहते ही आते हैं, मैं तो अभी भी इस विधा में एक शिक्षार्थी भर हूँ।

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  5. हाश्‍मी साहब विनोदपूर्ण स्‍वभाव के जिन्‍दादिल इंसान हैं यह उनकी ग़ज़लों से स्‍पष्‍ट होता है। मत्‍ले के शेर में जो मस्‍ती है और दूसरे शेर में शेर होने की स्थिति से एकाएक अन्‍दर होने वाले कत्‍ल की गंभीरता से फिर एकाएक संजीदगी से सहज स्‍वीकार्यता और फिर अंधेरों को चादर समेटने की चुनौती से मक्‍़ते के शेर में फिर वापिस हास्‍य विनोद पर आ जाना; अद्भुत अनुभव देता है। वाह-वाह और वाह।
    पाठशाला के गुरूजी, धन्‍य हैं आप। जिस आत्‍मीयता से आपने मुझे प्रस्‍तुत किया वह मुझ जैसे कठोर व्‍यक्ति को आत्‍मविभोर कर ऑंखें नम किये बिना नहीं रहता। ईश्‍वर से प्रार्थना है कि यह आत्‍मीयता सदैव बनी रहे।

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  6. दोनों ही शायरों ने अपने निराले अंदाज़ में शानदार ग़ज़लें कही हैं। बहुत बहुत बधाई हाश्मी जी और तिलक जी को।

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  7. हाशमी साहब का -हुआ है कत्ल कोई मेरे अन्दर-- पने आप में पूरी की पूरी गज़ल है. इसके बाद कुछ रहने के लिये शेष ही नहीं रहता.

    तिलकजी की कलम को सिर्फ़ सर झुका कर नमन ही किया जा सकता है. इसके विषय में कुछ कहने के लिये शब्द कोश में शब्द नहीं हैं.

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    1. सृजन आप सबकी प्रेरणा से ऊर्जा प्राप्‍त है और जो आप देख रहे हैं वह उसी ऊर्जा का प्रतिबिम्‍ब है। आपकी भावना सादर सर माथे पर।

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  8. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  9. इतनी खूबसूरत ग़ज़ले - एक विनोद और कटाक्ष से भरपूर और दूसरी सीमा प्रहरी को समर्पित. ये उजालों के दरीचे न जाने कहाँ कहाँ खुले है - समाज मे , देश मे , सीमा पर , मौसम मे , प्रकृति मे और भी न जाने कहाँ कहाँ . और इन सब दरीचों का एक ही जगह आकर एकाकार हो जाना - गुरुजी के ब्लॉग पर . कोटि कोटि अभिनंदन गुरुजी और सभी साथियों को

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  10. उजाले की अन्जुमन सजाने के लिये दिली शुक्रिया, आभार। अब इंतिज़ार है महा नायक "भौचक्के" जी का, जो इन्किसारिए तबियत की वजह से सबसे अख़ीर में आते है या टाल ही जाते है.............इस मर्तबा आपकी आमद अपेक्षित है, उम्मीद है निराश नही करेंगे।

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  11. भभ्‍भड़ कवि भौंचक्‍के आये ही जानिये। ज्‍यादह देर लगी तो सिहोर जाकर ले आयेंगे। स्‍वागत के लिये तैयार रहें।

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  12. हास्य और व्यंग मंसूर अली जी की खासियत रही अहि और वो इस ग़ज़ल में बाखूबी नज़र आ रही है ... मतले से ही मजमून नज़र आ जाता है और उसके बाद तो बस सुभान अल्ला ही निकलता है जुबान से ... मेरे अशआर, हुआ है खून ... और गिरह .... तालियाँ बस तालियाँ ही तालियाँ ...

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  13. सैनिकों को समर्पित तिलक राज जी की ग़ज़ल को सेल्यूट है मेरा ... हर शेर उनके नाम ... इनकी हर अदा पर कुर्बान है ... नहीं दीखता है अंतर ... जहां मुमकिन नहीं लाजवाब शेर हैं ... और जहां के सैनिक जागते हैं वहां तो जनता सुकूं से सो ही सकती है ... गिरह का शेर भी कमाल है ... सच कहूं तो पूरी ग़ज़ल ही लाजवाब है ... सलाम है मेरा वीर सैनिकों के नाम ...

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  14. मैं लगातार सफ़र में था. इसीलिए प्रतिक्रिया में विलम्ब हुआ है. हालाँकि ग़ज़लें पढ़ गया था.
    आ. मंसूर अली जी और आ. तिलकराज जी के एक-एक शेर पर बहुत कुछ कहने के लिए है. जिस धारा में मुशायरे की शुरुआत हुई है उसी प्रवाह की ग़ज़लों का होना मुग्ध कर रहा है.
    दोनों आदरणीय ग़ज़लकारों के लिए शुभकामनाएँ
    सादर

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