मंगलवार, 8 नवंबर 2016

आइये नई पीढ़ी के साथ मनाते हैं बासी दीपावली आज युवा शायर नकुल गौतम, अंशुल तिवारी और गुरप्रीत सिंह लेकर आ रहे हैं अपनी ग़ज़लें।

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मित्रों दीपावली के बाद का उल्लास बना हुआ है और हम लगातार बाद के आयोजनों में वयस्त हैं। मज़े की बात यह है कि लोग भाग-भाग कर ट्रेन पकड़ रहे हैं। आप तो जानते ही हैं कि हमारा यह तरही मुशायरा उस शिमला की खिलौना ट्रेन की तरह होता है जिसे कोई भी कभी भी भाग कर पकड़ सकता है। सबका स्वागत है। लेखन समयबद्ध नहीं किया जा सकता। विचार जब हलचल मचाएँगे तभी तो लेखन होगा। इसलिए अपना तो एक ही नियम है कि कोई नियम नहीं है।

उजाले के दरचे खुल रहे हैं

मित्रों आज तीन एकदम युवा शायर अपनी ग़ज़लें लेकर आ रहे हैं। नकुल गौतम को आप सब जानते हैं। अंशुल तिवारी हमारे ब्लॉग के पुराने सदस्य श्री मुकेश तिवारी के सुपुत्र हैं दूसरी पीढ़ी के रूप में वे इस मुशायरे में प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। और गुरप्रीत दूसरी बार मुशायरे में आ रहे हैं। पहली बार उनका फोटो नहीं लग पाया था इसलिए दूसरी इण्ट्री फोटो के साथ। याद आता है फिल्म कभी-कभी का गीत –कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले, मुझसे बेहतर कहने वाले तुमसे बेहतर सुनने वाले।

deepawali

Nakul Gautam

नकुल गौतम

deepawali (1)

लुटेरे मॉल सज-धज कर खड़े हैं
सनम दीपावली के दिन चले हैं

लगी दीपावली की सेल जब से
मेरी बेग़म के अच्छे दिन हुए हैं

मेरे बटुए का बी.पी. बढ़ रहा है
मेरे बच्चे खिलौने चुन रहे हैं

सफाई में लगी हैं जब से बेग़म
सभी फनकार तरही में लगे हैं

तरन्नुम में सुना दी सब ने गज़लें,
मगर हम क्या करें जो बेसुरे हैं

कहाँ थूकें भला अब पान खा कर
सभी फुटपाथ फूलों से सजे हैं

यक़ीनन आज फिर होगी धुलाई
गटर में आज फिर पी कर गिरे हैं

नहीं दफ़्तर में रुकता देर तक अब
मेरे बेगम ने जब से नट कसे हैं

इन्हें खोजेंगे कमरे में नवासे
छिपा कर आम नानी ने रखे हैं

चलो छोड़ो जवानी के ये किस्से
'नकुल' अब हम भी बूढ़े हो चले हैं

deepawali (4)

हज़ल के रूप में लिखी गई सुंदर ग़ज़ल। मतले में तीखा कटाक्ष बाज़ारवाद पर किया गया है। उसके बाद एक बार फिर से बाज़ारवाद पर कटाक्ष करता हुआ शेर है जिसमें बच्चों के ‌खिलौने चुनने पर पिता के बटुए का बीपी बढ़ने के बात कही गई है। बहुत ही अच्छा शेर। पिता की पीड़ा पिता हुए बिना नहीं जानी जा सकती। कहाँ थूकें भला अब पान खाकर में हमारी मनोवृत्ति पर अच्छा व्यंगय कसा गया है। ज्यादा सज धज हमें परेशान कर देती है कि अब हम कचरा कहाँ फेंकेंगे। बाद के दो शेर विशुद्ध हास्य के शेर हैं। बहुत अच्छे। कमरे में नवासों द्वारा आमों को खोजा जाना मुझे बहुत कुछ याद दिला गया। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल। वाह वाह वाह।

deepawali[4]

ANSHUL TIEARI

अंशुल तिवारी

deepawali (1)[4]

अंधेरे रोशनी में घुल रहे हैं,
उजाले के दरीचे खुल रहे हैं।

ख़ुशी बिखरी है चारों ओर देखो,
दर-ओ-दीवार में गुल खिल रहे हैं।

दीवाली साथ में ले आई सबको,
पुराने यार फिर से मिल रहे हैं।

मोहल्ले में मिठाई बँट रही है,
गली में भी पटाखे चल रहे हैं।

सभी आँखों में रौनक़ छा रही है,
सुहाने ख़्वाब जैसे पल रहे हैं।

भुलाए ज़ात, मज़हब, नफ़रतों को,
मिलाए हाथ इंसाँ चल रहे हैं।

ये मंज़र देख, दिल को है तसल्ली,
हरेक आँगन में दीपक जल रहे हैं।

deepawali (4)[4]

अंशुल के रूप में हमारे यहाँ अगली पीढ़ी ने दस्तक दी है अंशुल ने भी उसी तरह ग़़जल कही है जिस प्रकार नुसरत दी ने कही थी मतलब क़ाफ़िये को ज़रा पीछे खिसका कर। मतला ही बहुत सुंदर बना है। यह पूरी ग़ज़ल सकारात्मक ग़ज़ल है। असल में इस समय जितनी नकारात्मकता हमारे समय में घुली हुई है उसमें हमें इसी प्रकार के सकारात्मक साहित्य की आवश्यकता है। दीवाली साथ में ले आई सबको पुराने यारों का फिर से मिलना यही तो दीवाली का मूल स्वर है। भुलाए ज़ात मज़हब नफ़रतों को मिलाए हाथ इन्साँ चल रहे हैं, यह शेर नहीं है बल्कि एक दुआ है, हम सबको एक स्वप्न है जो शायद कभी पूरा हो आमीन। और अंत का शेर शायर के साथ हम सबको भी तसल्ली देता है कि हरेक आँगन में दीपक जल रहे हैं अभी समय बहुत खराब नहीं हुआ। सुंदर ग़ज़ल वाह वाह वाह।

deepawali[4]

Gurpreet singh

गुरप्रीत सिंह

deepawali (1)[4] 

उजाले के दरीचे खुल रहे हैं
अंधेरे दुम दबा के भाग उठे हैं

हुई सीने पे बारिश आँसुओं की
तो शिकवे दिल के सारे धुल गए हैं

उजाले में जिसे खोया था हमने
अंधेरे में अब उसको ढूंढते हैं

चलो करते हैं दिल की बात दिल से
चलो चुप चाप कुछ पल बैठते हैं

ये माना ज़िंदगी इक गीत है तो
ये मानो लोग कितने बेसुरे हैं

deepawali (4)[4]

गुरप्रीत का यह दूसरा प्रयास है। गुरप्रीत ने इस ब्लॉग की पुरानी पोस्टों से ग़ज़ल कहना सीखा है। हुई सीने पे बारिश आँसुओं की तो शिकवे दिल के सारे धुल गए हैं में प्रेम का बहुत जाना हुआ और भीगा हुआ रूप सामने आ रहा है। उसके बाद का शेर एकदम चौंका देता है उजाले में जिसे खोया था हमने, अँधेरे में अब उसको ढूँढ़ते हैं में एकदम से बड़ी बात कह डाली है। तसल्ली होती है कि ग़ज़ल की अगली पीढ़ी कहने में ठीक हस्तक्षेप कर रही है। अगले शेर में दिल की बात दिल से करने के लिए चुपचाप बैठने की बात भी बहुत सुंदर कहन के साथ सामने आई है। और अंत का शेर भी बहुत खूब बन पड़ा है। जिंदगी का गीत होना और लोगों का बेसुरा होना। बहुत अच्छी बात कही गई है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल क्या बात है वाह वाह वाह।

deepawali[4]

तो मित्रों ये हैं आज की तीनों ग़ज़लें, तीन युवाओं का प्रभावी हस्तक्षेप। इसके बाद एक और पोस्ट आएगी जिसमें दो बुज़ुर्ग शायर अपनी ग़ज़लें ला रहे हैं और उसके बाद चिर युवा कवि भभ्‍भड़ कवि भौंचक्के यदि मेरे करण अर्जुन आएँगे की तर्ज पर आ पाए तो आकर समापन करेंगे। लेकिन आज तो आपको इन युवाओं को जी भर कर दाद देना है कि ये हमारे ध्वज वाहक हैं आगे के सफ़र में।

deepawali (4)[4]

49 टिप्‍पणियां:

  1. वाह वाह वाह नकुल,अंशुल,गुरप्रीत जी तीनों शासकों ने बाकमाल ग़ज़लें कही हैं। हर शेर आसान से लफ़्जों से गढा गया है सो सीधे दिल मे उतरा है। गुणा शायरो रो सतत लेखन की दुआएँ। भविष्य मे इन सभी से और भी ऐसी ही खूबसूरत ग़ज़लों की उम्मीदें रहेंगी। शुभकामनाएँ।

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    1. पारुल जी बहुत बहुत धन्यवाद

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  2. तीनों गजलकारों को बहुत बहुत बधाई । एक से एक अच्छी गजल देने के लिए ।

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  3. तीनोंं मेंं ही बेहतरीन शायर बनने की प्रबल संभावनाए‍ँ दिख रही हैंं। हिंदी ग़ज़ल का भविष्य निःसंदेह सुरक्षित हाथों में है। बहुत बहुत बधाई तीनों रचनाकारों को।

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    1. धर्मेंद्र जी बहुत बहुत शुक्रिया

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  4. प्रणाम पंकज जी

    दौड़ते दौड़ते ट्रेन पकड़ने की आदत यह मुम्बई डलवा ही देती है। आपने हाथ बढ़ा कर ट्रेन में जगह दी, इसके लिए तहे दिल से आभार।

    पारुल जी ने कुछ देर के लिए हमें शासक बनाया। उसके लिए और भी आभार। एक विवाहित पुरुष के लिए इस शब्द के मआनी कितने गौरवशाली होते हैं, आप समझ ही सकते हैं।

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  5. नकुल जी का मतला और मक्ता तो है ही बहत खूब पर दूसरा तीसरा चौथा और सातवाँ शेर भी मजेदार है !
    अंशुल जी का दूसरा छठा और सातवाँ शेर बहत खूब है !
    गुरप्रीत जी का मक्ता ज़ोरदार है और बाकी सारे शेर भी बहत खूब है !

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय अश्विनी जी

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    2. हार्दिक आभार अश्विनी जी

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  6. बेहतरीन रचनाये! सभी रचनाकारों को साधुवाद . हैरान हूँ देखकर , एक मिश्रा और न जाने कितनी सारी गज़ले . सबकी अलग सोच और कितने खुबसूरत मायने . एक और निवेदन है - मैं गुरुजी से जानना चाहूंगी कि आपको ग़ज़ल कैसे भेजी जाणी होगी क्यिंकि मैंने blog पर ही लिख दी थी. चूँकि नई हूँ इसलिए नियमो से बिलकुल वाकिफ नहीं हूँ. आपने सही कहा चलती हुई लोकल में चढ़ गई हूँ और ये सफर और सभी साथी उनकी रचनाये बेहद भावपूर्ण और सुन्दर है. कृपया मुझे नियमो की जानकारी अवश्य दे. आभार
    धन्यवाद

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  7. माफ़ करे मिसरा के बदले में 'मिश्रा" शब्द आ गया है गलती से और भी त्रुटियाँ है. प्रयत्न रहेगा इस किस्म की गलती फिर न दोहराऊँ.

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  8. आज प्रस्‍तुत ग़ज़लें मेरे एक विचार को पुष्‍ट कर रही हैं कि उम्र के साथ वैचारिक ठहराव आने लगता है और नयी पीढ़ी में वैचारिक नवीनता रहती है।
    नकुल ने भले ही हास्‍य प्रधान ग़ज़ल कही लेकिन मॉल के रूप में बाज़ार की प्रवृत्ति और पान खाकर सजे फुटपाथ पर न थूक पाने के माध्‍यम से एक ऐसा मनोवैज्ञानिक हल दिया है जो हम सभी अपने आस-पास व्‍यवहारिक पाते हैं। सभी ने देखा होगा कि जहॉं किसी जड़ ने थूक दिया हो वहॉं और लोग भी थूकते जाते हैं जबकि साफ़-सुथरी जगह पर थूकने में सामान्‍यत: संकोच होता है। बहुत खूब। वाह।
    अंशुल ने अंधेरे रोशनी में घुलने का जीवंत दृश्‍य प्रस्‍तुत किया और अंतिम दो परस्‍पर सम्‍बद्ध शेर के माध्‍यम से सांप्रदायिक सौहार्द्र का खूबसूरत दृश्‍य प्रस्‍तुत किया है। बहुत खूब। वाह।
    गुरप्रीत की इस मुशायरे में दूसरी ग़ज़ल मुझे डरा रही है (एक चुनौती खड़ी हो रही है)। खूबसूरत मत्‍ला और सीने पर ऑंसुओं की बारिश से दिल के शिकवे धुलना, उजाले में खोये को अंधेरे में खोजना और चुप चाप कुछ पल बैठकर दिल से दिल की बात। बहुत खूब। वाह।

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    1. आदरणीय तिलक राज जी आप से ऐसी टिप्पणी पा कर मुग्ध हूँ.आप की ये टिप्पणी मेरे लिए बहुत मायने रखती है. ये आप लोगों का प्रोत्साहन और अपनापन ही तो है जिसकी वजह से मुझ जैसा कम क्षमता वाला व्यक्ति भी अपनी क्षमता से अधिक करने के काबिल हो जाता है,मैं हैरान हूँ ये कैसे हो पाता है.यकीन मानिए जब पिछले सप्ताह पहली बार इस ब्लॉग में मैने अपना नाम देखा तो मुझे यकीन नहीं आय कि मेरी रचना यहाँ पर छप गयी है.और बहुत देर तो मैं डर और संकोच के मारे लिंक खोल कर देखने से ही कतराता रहा कि पता नहीं कैसी प्रतिकिया हुई होगी गुरु जी कि और सब की. लेकिन आप सब से मिली हौसला अफजाई से प्रोत्साहित होकर दूसरी गज़ल भी लिखने की कोशिश की. आशा करता हूँ आप का मार्ग दर्शन और आशीर्वाद मेरे साथ रहेगा.

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    2. आभार sir

      फुटपाथ वाले शेर् तक पहुँचने के लिए आभार।
      ऐसी कुछ कोशिशें मुम्बई के कॉलेज के छात्र कर रहे हैं। उम्मीद है एक दिन यह समस्या सुलझेगी

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    3. बहुत-बहुत धन्यवाद श्रीमान,
      आपकी टिप्पणियों से उत्साहवर्धन हुआ.आपका स्नेह और आशीर्वाद बना रहे.

      - सविनय अंशुल तिवारी

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  9. इस गुरुकुल में अंशुल की शिष्यता स्वीकार कर ली गई इससे बड़ा दिवाली का तोहफा और क्या हो सकता है...

    विस्तृत टीप कुछ देर से आज ही लौटा हूँ...

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  10. वाह ... बहुत ही कमाल का आगाज़ है युवा पीढ़ी का ... हास्य के पुट के साथ नकुल जी की ग़ज़ल कितने गुल खिला रही है ... दिवाली की सेल बटुये का बी पी तरही में जुटे लोग ... सभी शेर माहोल में नयी ताजगी भर रहे हैं ... बहुत बधाई ....
    अंशुल की का तो मतला ही लाजवाब है ... मोहल्ले में मिठाई और यारों का मिलना ... बहुत ही खूबसूरत शेर हैं ... आखरी शेर तो आशावाद और उमीद की नीव रख रहा है ... बहुत लाजवाब ग़ज़ल हुयी है ... बधाई ...
    गुरप्रीत जी की ग़ज़ल में पहला शेर ही धमाकेदार है ... अलग अंदाज़ लिए कई शेर इस ग़ज़ल को नयी दिशा दे रहे हैं ... बहुत बहुत बधाई गुरप्रीत जी को ...

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    1. धन्यवाद श्रीमान

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    2. बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय दिगम्बर नास्वा जी.कोशिश को सराहने के लिए शुक्रिया.आप सब गुणी लोगों से सीखने की कोशिश कर रहा हूँ.

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  11. आदरणीय पंकज जी,
    गोस्वामी तुलसीदास जी के शब्दों को उद्धृत करते हुए मैं स्वीकार करता हूँ कि,
    "निज बुधि बल भरोसा मोहिं नाहीं, ताते बिनय करऊँ तुम्ह पाहीँ"

    आपका हार्दिक आभार मुझे ब्लॉग पर स्थान देने के लिए, अवश्य ही ये मेरा सौभाग्य है.
    साथ ही सभी सुधिजनों का भी धन्यवाद अपनी विस्तृत प्रतिक्रिया एवं टिप्पणियाँ देने के लिए.

    - सविनय अंशुल तिवारी

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  12. देश का युवा जब सकरात्मक दिशा में सोचता है, तब समझिये अच्छे दिन आने को हैं :) ये आहट है बदलाव की. सुन्दर ग़ज़लें हैं तीनों. अंशुल जितना बढिया लिखते हैं, उतना ही बढिया पढते भी हैं. मैने उनकी कविताएं सुनी हैं. बेहतरीन कवि हैं वे अपने पिता की तरह . बधाई.

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    1. शुक्रिया वंदना जी

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    3. आपके आशीर्वचनों से अभिभूत हूँ, साथ ही आपका स्नेह यूँ ही बना रहे ईश्वर से ये मंगलकामना है.
      अपनी लिखी टूटी-फूटी कविताएँ आपको सुनना मेरा सौभाग्य रहा, आशा है ऐसे अवसर आते रहेंगे. आपसे बहुत कुछ समझने को मिला, पुनः भेंट की प्रतीक्षा में.
      -सादर अंशुल.

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  13. सबसे पहले मैं गुरु जी का शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ. जिन्होंने मेरी इस कोशिश को अपने ब्लॉग में जगह दी.आज से चार महीने पहले तक मैं ग़ज़ल के बारे में केवल इतना ही जानता था कि हर दूसरी लाइन में तुक मिलाना है.जानकारी न होने की वजह से जो भी गजलें मैने लिखी थी वो बे बहर हो गयीं. और फ़िर मैं अचानक इस मंच पर आ पहुँचा. और यहाँ पर पुरानी पोस्ट्स पढ़ कर मैने बहुत कुछ सीखा. हालाँकि अभी भी मैं सीखने की शुरुआती प्रकिर्या में ही हूँ लेकिन अगर मैं इस मंच के सम्पर्क में नहीं आता तो शायद यहाँ तक भी नहीं पहुँच पाता. मैं जब पुरानी पोस्ट्स पढ़ता था तो अपनी किस्मत को कोसता था के मैं पहले क्यों नहीं आय यहाँ.इस ब्लॉग पर जो सभी सदस्सय परिवार की तरह थे मैं भी इसका हिस्सा बनना चाहता था.और अब मेरी ये इच्छा पूरी हुई है.मेरे लिए इस परिवार का हिस्सा बनना ही बहुत बड़ी बात है.गुरु जी का किन शब्दों में आभार करूँ समझ नहीं आ रहा.बस धन्यवाद कह रहा हूँ.जिस तरह से उन्होंने इतनी आसानी से गज़ल के बारे में ज्ञान दिया है की हर कोई ग़ज़ल कहना सीख सकता है.पता नही क्यों ये सब लिखते समय मेरे आँखों में आँसू भर आये हैं

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  14. जैसे कि आप सब जानते हैं कि मैं अभी गज़ल सीख रहा हूँ. इसलिये आप में से अगर कोई मेरे शेरों में कोई सुधार करना चाहे तो उसका खुले दिल से स्वागत है.विशेष तौर पर
    "खिलौने से पराये जैसे बच्चा
    वो ऐसे दिल से मेरे खेलते हैं."
    इस शेर के आरे में.मुझे लगता है यहाँ मैं एक अच्छे विचार को अच्छे शेर में नहीं ढाल पाया."खिलौने से पराये जैसे बच्चा" यह मिसरा आम बोलचाल की भाषा से दूर हो गया है.इस तरह इस में रवानी नहीं रही.मैने शब्दों को आगे पीछे करके बहुत कोशिश की लेकिन बात नहीं बनी.इस शेर को अच्छे तरीके से कैसे कहा जा सकता है ,ये आप सब से जानना चाहूगा.

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    1. ग़ज़ल कहने के प्रारंभिक दौर में अक्‍सर शायर ग़लती कर बैठते हैं शब्‍दों को पकड़े रखने की और नतीजतन कुछ शेर गड़बड़ा जाते हैं। इसलिये शेर रचना में मूल विचार केन्‍द्र में रखना चाहिये शब्‍द छोड़ने पड़ें तो कोई समस्‍या नहीं। जैसे आपके शेर का एक प्रारंभिक रूप हो सकता है:

      खिलौना मान, इस मासूम दिल से
      परायों की तरह वो खेलते हैं।

      अब इसे आप और नया रूप दे सकते हैं।

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  15. नकुल जी को ये सफल हास्य प्रधान गज़ल कहने के लिए बहुत बहुत बधाई.बहुत ही असरदार मतले से शुरुआत की है उन्होंने.बटुए का बी पी बढ़ना,नानी का आम छुपाना और बाकी सभी शेर भी बहुत अच्छे हैं. और पान खाकर थूकने वाला शेर भी बहुत पसंद आया

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  16. अंशुल जी का भी स्वागत है इस मंच पर. उन्होंने ने भी बहुत ही प्रभावशाली मतले के साथ जोरदार शुरुआत की है.सकरात्मक शौच को साथ लेकर कुल्ती हुई एक सफल कोशिश. पुराने यारो का मिलना ,गली में पटाखे चलना. वाह वाह दिवाली के दृश्यों को सजीव कर दिया.बहुत बधाई आपको

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    1. क्रुप्या शौच को सोच पढ़ें.

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    2. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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    3. बहुत-बहुत आभार बंधुवर,
      साथ ही एक बेहतरीन ग़ज़ल रचने पर हार्दिक बधाई आपको. वाकई आँसुओं की बारिश में शिकवे-शिकायतें धुल जाती हैं...बहुत उम्दा ख़याल है जनाब.
      और यही नहीं, चुप-चाप बैठ कर भी बहुत कुछ बोल गए आप तो...हार्दिक बधाईयाँ हेतु बधाई मेरी ओर से.
      -अंशुल तिवारी

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  17. ताजा हवाके खोंके सरीखी तीनों गज़लों के लिये नकुल, अंशुल और गुरमीत को बधाई

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  18. नकुल गौतम:
    हज़ल नुमा ग़ज़ल, तबियत की शोख़ी ही एसे अशआर को जन्म देती है।
    "कहाँ थूकें भला अब पान खा कर 
    सभी फुटपाथ फूलों से सजे हैं।"
    सुंदर व्यंग।

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    1. गुरप्रीत सिंह:

      उजाले में जिसे खोया था हमने
      अंधेरे में अब उसको ढूंढते हैं
      बहुत अच्छा शेर कहा है , बधाई।

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    2. गुरप्रीत सिंह:

      उजाले में जिसे खोया था हमने
      अंधेरे में अब उसको ढूंढते हैं
      बहुत अच्छा शेर कहा है , बधाई।

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  19. अंशुल तिवारी:

    "भुलाए ज़ात, मज़हब, नफ़रतों को, 
    मिलाए हाथ इंसाँ चल रहे हैं।"
    गंभीर शेर कहा है, सामयिक संदेश है, बहुत ख़ूब।

    "गली में भी पटाखे चल रहे हैं।"..... पर यह ख़्याल ज़हन में आया:-

    छतो पर फुलझड़ी रोशन हुई तो
    गली में भी 'पटाख़े' चल रहे है !

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  20. अंशुल तिवारी:

    "भुलाए ज़ात, मज़हब, नफ़रतों को, 
    मिलाए हाथ इंसाँ चल रहे हैं।"
    गंभीर शेर कहा है, सामयिक संदेश है, बहुत ख़ूब।

    "गली में भी पटाखे चल रहे हैं।"..... पर यह ख़्याल ज़हन में आया:-

    छतो पर फुलझड़ी रोशन हुई तो
    गली में भी 'पटाख़े' चल रहे है !

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  21. नकुल गौतम:
    हज़ल नुमा ग़ज़ल, तबियत की शोख़ी ही एसे अशआर को जन्म देती है।
    "कहाँ थूकें भला अब पान खा कर 
    सभी फुटपाथ फूलों से सजे हैं।"
    सुंदर व्यंग।

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  22. नकुल गौतम:
    हज़ल नुमा ग़ज़ल, तबियत की शोख़ी ही एसे अशआर को जन्म देती है।
    "कहाँ थूकें भला अब पान खा कर 
    सभी फुटपाथ फूलों से सजे हैं।"
    सुंदर व्यंग।

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    1. शुक्रिया sir
      आपका आशीर्वाद साथ रहा तो कभी pure अच्छी हज़ल भी होगी

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  23. आप सभी गुरूजनों का आह्सिर्वाद अंशुल को मिला और इस गुरु परिवार का हिस्सा बन पाना ही उसका औभाग्य है....

    सादर,

    मुकेश कुमार तिवारी

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