गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013

आज वसंत पंचमी है और आज ही 14 फरवरी भी है तो आइये आज से ही शुरू करते हैं तरही मुशायरा ।

इस बार का तरही मुशायरा कुछ अलग सोच के साथ होना है । अलग तेवर की ग़जल़ें और अलग प्रकार के शेर इस बार सुनने को मिलने हैं ये तय है । आज वसंत पंचमी है तो पहले वसंत पंचमी पर की जाने वाली सरस्‍वती पूजन की जाए ।

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या कुन्देन्दु तुषारहार धवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना ।
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ।।1।।
शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमांद्यां जगद्व्यापनीं
वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यांधकारपहाम्।
हस्ते स्फाटिक मालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्।।2।।

आइये अब प्रारंभ करते हैं तरही मुशायरा ।

ये क़ैदे बामशक्‍कत जो तूने की अता  है

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वे कहने को तो कंचन की बड़ी दीदी थीं, किन्‍तु ऐसा लगता नहीं था कि वे केवल कंचन की ही बड़ी दीदी हैं । पिछले कुछ सालों से अपनी पूरी जीवटता के साथ वो केंसर जैसी बीमारी के साथ संघर्ष कर रही थीं । हम सब सोचते थे कि कोई चमत्‍कार होगा । मगर नहीं हुआ । और 27 जनवरी को केवल स्‍मृति शेष रह गईं । पिछली बार जब मैं लखनऊ गया था तो अपनी बीमारी के बाद भी वे चल कर मुझसे मिलने आईं थीं । उनसे मिलकर अंदर तक एक भीगा सा अपनापन फैल जाता था । कंचन के लिये उनका जाना एक ऐसा नुकसान है जिसको शब्‍दों में व्‍यक्‍त नहीं किया जा सकता । वे कंचन के लिये रोल मॉडल थीं । कंचन के लिये वे स्‍थाई चीयर लीडर थीं । हमेशा कंचन का उत्‍साह वर्द्धन करते हुए उसके पीछे खडी़ रहती थीं । जब ये मिसरा दिया था तब नहीं पता था कि नियति की मंशा क्‍या है । किन्‍तु अब ऐसा लगता है कि ये मिसरा उनके उस संघर्ष को प्रतिबिम्बित करता है जो उन्‍होंने किया । सो ये मिसरा और इस पर कही गईं ग़ज़लें उन्‍हीं को समर्पित ।

मैं नहीं जानता कि मैंने कंचन से ये जिद क्‍यों की, कि इस बार का तरही मुशायरा कंचन की ही गज़ल से होगा और अपनी निर्धारित तारीख पर ही होगा । मगर ये कह सकता हूं कि कंचन ने मेरी जिद का मान रखा । और ऐसे समय में भी ये ग़ज़ल लिख कर भेजी । जैसा मैंने पहले भी कहा कि मुझे भी नहीं पता कि मैंने ये जिद क्‍यों की । तो आज तरही मुशायरे के प्रारंभ में कंचन की ये ग़ज़ल ।

न इस ग़ज़ल के पहले कोई बात न ग़ज़ल के बाद कोई बात । कुछ चीज़ें कहने सुनने से परे अनुभूत करने की होती हैं । सो बस अनुभूत कीजिये ग़जल़ को ।

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कंचन सिंह चौहान

क्‍या मैंने था लिखा और क्‍या तूने पढ़ लिया है,
अरज़ी थी मौत की पर, दी  ज़ीस्त की सज़ा है।

माना है तुझको प्रीतम, तू तो मेरा पिया है,
मरना मेरा ये तिल तिल, तू कैसे झेलता है।

फाँसी चढ़ा कि सूली, बेहतर हज़ार इससे,
''ये कैदे बामशक्कत, जो तूने की अता है।''

सारे शहर में मेरा बस एक था ठिकाना,
जाना ये आज ही है, जब तू नही रहा है।

दफ्तर में तेरे भी है शायद यहीं के जैसा,
तकदीर जैसी शै का, रिश्वत से फैसला है।

डोली चढ़ी तो बोली, बस कुछ क़दम है जाना,
इस बार के सफर का, कोई नही पता है।

कुछ भी तो कह न पाए, कुछ भी तो सुन न पाए
झटके से फेरना मुँह, ये कैसा कायदा है।

इक बार चूम लेते, इक बार लग के रोते,
इक बार ये तो कहते, बस अब ये अलविदा है।

मीरा, कबीर, सूफी, ज़ेह्नो जिगर, खुदा तक,
जाँ कैसे छोड़ दी जब, सब मेरा ले गया है।

मैं पहले ही कह चुका हूं कि जब अनुभूत करने की बात आ जाए तो शब्‍दों के बिना ही काम चलाना होता है । कई बार शब्‍द अनुभूति को पूरी तरह से अभिव्‍यक्‍त नहीं कर पाते । कई बार मौन किसी चीज़ को ज्‍़यादा अच्‍छी तरह से अभिव्‍यक्‍त कर देता है । सो कंचन की इस ग़ज़ल को मैं अनुभूत कर रहा हूं आप भी करिये ।

34 टिप्‍पणियां:

  1. दिल की गहराइयों से निकला दर्द गजल के बोल बन गए। फिर भी गजल अपना एक अलग अहसास दे ही रही है और आपने ठीक ही कहा कि हम उसे अनुभूत कर रहे है।

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  2. निशब्द हूँ कंचन! गले लगाती हूँ बच्चे! अपना ख़याल रखना! मन की पीर सुन रही हूँ।
    दीदी को श्रधांजलि !
    शार दी

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  3. @कंचन
    अगर मैं कहूँ कि मैं नहीं जानता कि जब इस ग़ज़ल के शेर जन्म रहे थे तब आपके मन में क्या चल रहा था तो यह मेरी अंतरआत्मा से अन्याय होगा। ये शेर ग़ज़ल कहने के लिये नहीं कहे गये हैं, सीधा-सीधा प्रवाह है उन भावों का जो न रुदन से प्रकट होते हैं न ऑंसुओं से। मन वेदना की पराकाष्ठां से गुजर रहा होता है और व्यक्ति प्रत्यक्ष में स्थिर होता है जैसे कुछ हो ही नहीं रहा। अंदर-अंदर जो चल रहा होता है वह इस रुप में प्रकट होता है। इस समय मेरे आस-पास बैठा कोई व्यक्ति यह समझने में असमर्थ है कि यकायक स्क्रीन पर ऐसा क्या पढ़ लिया कि मैं पूर्णत: अनुपस्थित हूँ। किसी भी शेर पर अभी कुछ नहीं कह सकूँगा वरना मेरे मन में चल रही पीड़ा प्रस्फ़ुाटित हो जायेगी।

    लॉंघ कर देहरी बदन की हो गया पिय से मिलन
    ऑंख में ऑंसू लिये जो रह गये वो रह गये।

    कल सॉंय फिर एक बार इस पोस्ट पर लौटूँगा।
    अव्यक्त संवेदनाओं के साथ।

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    1. मैं समझ सकता हूं तिलक जी आपकी संवेदनशीलता को । सीहोर के मुशायरे में आपका भावुक हो जाना याद आ गया ।

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  4. अभी मैं किसी एक को संबोधित नहीं कर रहा हूँ - ना ही ठीक ठीक कर सकता हूँ।
    अभी पिछले एक घंटे को पलट कर देखूं तो दर्जनों चीज़ें हैं जो घटित हुयी है और निरंतर घट रहा है। जैसे,,, घंटे - ढेर घंटे पहले ऑटो में मेट्रो में भागते हुए आफिस के कार्य योजना चिन्तनों के बीच दो चार जरूरी (या गैर जरूरी) संदेशे भेजना, अपने टूटे फूटे शेरो' को मन में दोहराना (दुरुस्त करना) और फिर तुरंत सामान्य अवस्था को प्राप्त करना ,,,जैसे,,, पेंडिंग इमेल्स के बीच में सर खपाना और फिर तुरंत सामान्य अवस्था को प्राप्त करना,,,जैसे,,, चाय पीने की इच्छा और तीव्र जरुरत महसूसने पर भी कुछ और की तलाश करना और कुछ कार्यों को " बाद में" कह कर टाल देना और फिर तुरंत सामान्य अवस्था को प्राप्त करना,,, जैसे,,, कोई जवाबी एस।एम्।एस या काल ना आने पर भी इसे सामान्य समझना और फिर तुरंत सामान्य अवस्था को प्राप्त करना इत्यादी इत्यादि...

    लेकिन यही इमेल युग की महानता है "जहाँ एक क्लिक पर बसंत पंचमी का आगमन होता है " लेकिन जिस चीज़ों को पिछली घटनाओं को हम देख सुन (पढ़ सुन) असहाय सा महसूस करें, जहां बोलती बंद हो जाए शायद वहीँ से पीड़ा अपने अपनों को तलाशते हुए किसी उचित स्थान पर जा कर कुछ रच देती है।

    क्या कहूँ दीदी मैं (?) जो मन में आया जैसे तैसे उतार रहा हूँ यहाँ, अब इस विशाल ह्रदय पृष्ठ पर स्मृति शेष है। श्रद्धांजलि !!

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  5. दर्द में भीगी, एकदम अलग एहसास देती हुई खूबसूरत गज़ल.

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  6. जरूरी नहीं ... दुःख-दर्द आंसुओं से बहाया जाए तभी नज़र आता है ... मुझे तो लगता है दर्द अपनी राह घुड हिबना लेता है निकलने की ... ओर उसे निकल भी जाना चाहिए किसी न किसी माध्यम से नहीं तो धारा में पुन: लौटना बहुत मुश्किल हो जाता है ... कंचन की हिम्मत, उसका साहस तो वैसे भी हर कदम पे नज़र आती है ...
    मन संवेदनशील हो साहस की कमी नहीं रहती ...

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  7. गज़ल का हर शेर मन में छिपे एहसास को बाखूबी व्यक्त कर रहा है ... अलग अंदाज़ की गज़ल .... ब्रावो कंचन ...

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  8. एक शे'र हम सबके लिए:
    ''इक ज़ख़ीरा हैं अज़्मो-हिम्मत का
    ग़म से लुटते नहीं लुटाए हम''........

    कंचन बिटिया हिम्मत बनाए रखना......

    नि:शब्द हूँ.
    ग़ज़ल में आपने अपना जो दर्द पिरोया है.... वह हम सब का दर्द है. दर्द की आँच में पकी हुई ग़ज़ल.

    दीदी के लिए मेरे श्रद्धा सुमन.

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  9. Lucknow ki tehzeeb apne me sameti hui ye gazal. har sher behtareen hai. didi ko dher sari badahayiaan. ek sher bahut pasand aya hai " saare shahr me mera........". umada gazal ke liye mubarakbaad

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  10. दर्द ही दर्द है। इस दर्द को नमन है। इस ग़ज़ल को नमन है। बड़ी दीदी को भावभीनी श्रद्धांजलि।

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  11. @कंचन दी, आपकी इस बेमिसाल ग़ज़ल को सलाम करता हूँ।

    आपके लिए दो शब्द -
    देखो सफ़र हमारा अब एक काफिला है
    हिम्मत की दास्ताँ है लफ़्ज़ों में जो घुला है
    सीखा है तुमसे बहना जबजब ग़ज़ल बुना है
    बातें है याद सारी रिश्तों से जो मिला है

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  12. कंचन की ग़ज़ल पढ़ते हुए बशीर बद्र का शेर याद आ गया " पत्थर के जिगर वालो ग़म में वो रवानी है, खुद राह बना लेगा बहता हुआ पानी है" जो ग़म कंचन की आँख से टपकने से रह गए वो ग़ज़ल बन के बह निकले हैं। ये ग़ज़ल अकेली कंचन की नहीं है हर उसकी है जिसने जीवन में अपना कोई प्रिय खोया है। ये ग़ज़ल सीधे दिल को छूती है और गला रुंध सा जाता है।

    किसी प्रिय के वियोग से उपजी पीड़ा को भुक्त भोगी ही जान सकता है।

    मैं बहुत कुछ कहना चाहता था इस ग़ज़ल पर लेकिन क्या करूँ शब्द कहीं अटक से गए हैं और जो मिल रहे हैं वो मेरी बात कहने में असमर्थ हैं। अभी चलता हूँ फिर लोटूंगा थोडा संभल लूं।

    नीरज

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  13. दर्द का कोई रूप नहीं होता पर क्या प्रभावित करता है ! रचनाकार का इसे शब्दबद्ध करना अपने और अपने इतर के दुःखों को जीना है. एकाकी पीड़ा प्रस्तुत ग़ज़ल के होने का कारण अवश्य हो, लेकिन इसकी टीस हर पाठक महसूस कर रहा है.
    जीवन का समुच्चय रूप, कंचनजी, सदा से शिव-स्वरूप है. सदा से सुन्दर है.

    कंचनजी, इस ग़ज़ल के हो जाने पर अतिशय बधाइयाँ.

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  14. आज ही तरही शुरू हो गई ! हर त्यौहार पर ब्लॉग की छटा देखते ही बनती है ! ग़ज़ल क्या करूँ बस ये कि हर शे'र पर वो हज़ार बार रोई होगी ! बड़ी दीदी को भावभीनी श्रधांजलि !


    अर्श

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  15. आज तब की सुनी हुई एक ग़ज़ल याद आ रही है । तक की जब ये भी नहीं समझ पड़ता था कि ग़ज़ल क्‍या होती है । शायद कॉलेज के दौर की बात है । चाचा ने एक वॉकमेन उपहार दिया था उप पर टी सीरीज के सस्‍ते वाले कैसेट पर चंदन दास को सुना था । निदा फाज़ली की ग़ज़ल गाते हुए । http://www.youtube.com/watch?v=lbIgzprZ1rs इस लिंक पर आप भी ग़जल़ को सुनें। सुनें आज की कंचन की ग़ज़ल के संदर्भ में ।

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  16. ब्लॉग की छटा हर मौसम में हर त्यौहार में देखने लायक होती है, मन खुश हो जाता है ! इस निहायत ही मसरूफ ज़माने में भागते दौड़ती दुनिया में बचपन की बातें बचपन के वो दिन कहाँ याद आते हैं ! पर त्यौहार में इस ब्लॉग पर जो तरही मनाई जाती है वो अपने आप में एक सकून देने वाली बात होती है ! मरते एहसास को अचानक से ज़िंदा कर देने वाली बात होती है !

    ग़ज़ल पर बात करने से पहले यह कहूंगा की ग़ज़ल लिखते वक़्त शे'र दर शे'र मेरी बहन रोई होगी ! हज़ार बार हुक उठ्ठी होगी , हज़ार बार ख़ुद को कोसा भी होगा !
    सच कह रहे है आप गुरु देव कि इस ग़ज़ल को महसूस करने की बात है ! लफ्ज़ दर लफ्ज़ मुहब्बत को टूटते होने का एहसास है !
    मतला ही ऐसा है कि क्या कहूँ ! मौत की अर्जी और ज़िस्त की सज़ा,.. क्या कहने !
    जहां तक शे'र ख़ुद कह रहा है ये शे'र दीदी के हवाले से है ... !
    और गिरह , ख़ुद में कठोरतम बात ख़ुद को तद्पाने की बात है , ख़ुद को सज़ा देने की बात की गई है !

    सारे शहर में मेरा .... इसमे ख़ुद के अकेलेपन की बात है , एक ऐसी बात जो धुरी से छूटने जैसी हो !

    दफ्तर में ... दुनियादारी की बातें है !

    डोली चढी... इस शे'र में बिछड़ने के दो वक़्त-ओ-हालात पर है , एक तब जब घर से बेटी विदा हो रही हो और दूसरी तब जब इस संसार से ! यह शे'र बहुत मुश्किल हुआ होगा लिखते वक़्त !

    एक बार चूम लेते .... यह शे'र इस ग़ज़ल का सबसे ज़बरदस्त शे'र है हासिले ग़ज़ल शे'र मेरे तरफ से है !

    और आखिर का शे'र एक पुरे युग के हवाले से है !

    बहन जी और दीदी के मुहब्बत के बारे बस यही कहूंगा की वो बहन जी की माँ , पिता जी , भाई और साथ में बहन सब कुछ थीं !
    और एक साथ इन सबका एक ही बार में एक ही झटके में चले जाने के दुःख को हम महसूस भी नहीं कर सकते , बहुत मुश्किल है ! श्रधांजलि !

    अर्श

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  17. लगता है जैसे आँसू, खूँ बन टपक गया है,
    क्या लिख दिया है तुमने, क्या तुमने लिख दिया है !

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  18. कंचन जी इस मुश्किल समय में हम सब आपके साथ है . और आपकी इस गजल के बारे में क्या कहूँ। में बहुत ज्यादा गजल नहीं जानता पर ये कहुगा की आपकी इस गजल को पड कर आपके दर्द को मैंने महसूस किया है और सच कहूँ तो आँख नम हो गई है इसे पड़ कर .

    सारे शहर में मेरा बस एक था ठिकाना,
    जाना ये आज ही है, जब तू नही रहा है।


    कुछ भी तो कह न पाए, कुछ भी तो सुन न पाए
    झटके से फेरना मुँह, ये कैसा कायदा है।


    इक बार चूम लेते, इक बार लग के रोते,
    इक बार ये तो कहते, बस अब ये अलविदा है।



    एक शेर सुना था मैंने कभी वो याद आ रहा है ...
    तुम्हारी कब्र पर मैं फ़तहां पड़ने नहीं आया .
    मुझे मालूम था तुम मर नहीं सकते
    तुम्हारी मोत की सच्ची खबर जिसने उड़ाई थी
    वो झुटा था वो झुटा था वो झुटा था

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    1. माफ़ी , गलती से फातिहा को फतहा लिख दिया

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  19. बेहतरीन ग़ज़ल, मतला और गिरह का शे"र लाजवाब लगा।

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  20. आचार्य चतुरसेन के उपन्याजस ‘गोली’ के जैकेट पर एक टिप्पणी पढ़ी थी 70 के दशक में ‘आप इतने कठोर-हृदय कैसे हो सकते हैं कि ये लिख सके’ उस उपन्या्स में व्यक्तिगत वेदना की पराकाष्ठा जी गयी थी। कुछ वही स्थिति है आज की ग़ज़ल में। जब अंतस में बह रही वेदना को व्यक्त करने के अन्य साधन असमर्थ हो जाते हैं तब ऐसा काव्य़ जन्मता है।
    मेरा निजि अनुभव रहा है उस द्वन्द का जो ऐसे क्षणों में चल रहा होता है। मृत्यु की ओर अग्रसर किसी अपने के उन पीड़ादायक क्षणों में एक ओर जब चिकित्सक इंगित कर रहा होता है कि मरीज़ किस दिशा में बढ़ रहा है हृदय किसी चमत्कार की आशा में होता है और हर तरह से दुआ कर रहा होता है मरीज़ के यथाशीघ्र ठीक होने के लिये; दूसरी ओर मरीज़ का बढ़ रहा कष्ट देख दुआ कर होता है कि अब इस कैद-ए-बामशक्करत से मरीज को बिना कष्ट के मुक्ति मिले। बहुत कठोर हो जाता है हृदय इस द्वन्द में और फिर यकायक वो पल आता है जब सोच भी कुछ देर के लिये मौन हो जाती है। अर्न्तवेदना की वही पराकाष्ठा इस ग़ज़ल में जी गयी है जिसपर कुछ कहने को शब्द पर्याप्‍त नहीं हैं।

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  21. गुरुदेव प्रणाम,
    बरबस दुष्यंत का एक शेर याद हो आया, देखिये न कैसा मौजूँ हो रहा है ...

    हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए|
    इस हिमालय से कोई गंगा निकालनी चाहिए |......

    इस ग़ज़ल के रूप में ऐसा ही किया गया है, पीर के पर्वत से एक गंगा निकाली गई है

    // मैं नहीं जानता कि मैंने कंचन से ये जिद क्‍यों की, कि इस बार का तरही मुशायरा कंचन की ही गज़ल से होगा //

    यही कारण था गुरुदेव, बस यही ... एक गंगा निकालनी बहुत जरूरी थी

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  22. हैं लफ्ज़ ख़त्म सारे कहने को क्या बचा है

    जो दर्द दिल में उमडा उसको ग़ज़ल कहा है


    कंचन तपा है जब भी कुंदन ही होक निखरा

    यह मोड़ ज़िंदगी का इससे कहाँ जुदा है


    आंसू पिघल के रचते ग़ज़लों में इक मुजस्सम

    होठों पे तैरती बस रुन्धती हुई सदा है

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  23. प्रिय कंचन
    शब्द मौन हो जाते हैं जब दर्द गहराइयों में धंस जाता है...भगवान के बाद शायद माँ या उसके स्थान पर ऐसा अपना हो जो हमारी आस्थाओं को पनाह दे, या वह रिक्तता पूर्ण कर दे । यह पाने का बाद खोने का पड़ाव दुखड़ाई होता है...माना "पर मैं हूँ ना" कितनों को अपने आस पास मिलते है.... यह मंच सुबीर जी ने इन रिश्तों की पुख्तगी की नीव पर रखा है, स्नेह और मृदुल प्यार के ये रिश्ते हमारी यादों में हमारा सहारा बनते है...
    जब जब मन घबराये तुम प्रार्थना करो
    कोई राह नज़र न आए तुम प्रार्थना करो...आराधना करो॥

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  24. बड़ी दीदी के जाने के बाद कंचन दीदी का हर एक पल कैसे गुज़र रहा होगा उसका बस थोड़ा बहुत ही अंदाज़ा लगा सकता हूँ। पिछले कुछ सालों से बड़ी दीदी के साथ-साथ पूरा परिवार भी जूझ रहा था। हर पल एक दुआ उम्मीद भरी नज़रों से उठती थी और आते हुए लम्हें कभी-कभी उम्मीद की लौ को ज़ोर भी देते थे मगर 27 जनवरी वो लौ बुझ गई, मगर बुझने से पहले वो लौ इतना उजाला कर गई है कि उसकी रौशनी में उस लौ के अपने परिवार के सदस्यों के लिए देखे हुए कई सपने दिखते हैं।

    कंचन दीदी का पहला प्यार ....... बड़ी दीदी, जिन्होंने कंचन दी को हर वक़्त संबल दिया, उनकी प्रेरणा और बनकर हमेशा उनके साथ खड़ी रही और उनका वो विश्वास कंचन दी के व्यक्तित्व में झलकता है, उनकी लेखनी में वो उम्मीद जगमगाती है जिसे बड़ी दीदी ने देखा था। आज वो शरीर रूप में ज़रूर हम सब के बीच में नहीं है लेकिन वो आज कई रूपों में मौजूद हैं। इस ग़ज़ल का हर लफ्ज़ जब कंचन दी से फ़ोन पर सुन रहा था तो उसके पीछे छिपा दर्द खुदबखुद झलक पद रहा था। आँसुओं से लिखी ये ग़ज़ल अपने में कितना दर्द समेटे है ये कंचन दी को अगर कोई जानता है तो जान सकता है।

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  25. दीदी की स्मृतियों को नमन।किसी अपने से बिछड़ने का दुःख शब्दों में बयान नहीं हो सकता।ग़ज़ल ने भी आपके दग्ध ह्रदय के उदगार ही व्यक्त किये हैं।ईश्वर आपको इस अपार दुःख को सहने की शक्ति प्रदान करे।

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  26. @कंचन,

    किसी का यूँ चले जाना अचानक चले जाना और रह गए लोगों का उस बिछोह के दर्द को शब्दों द्वारा सी लेना और अवयक्त की गूँज को तरंगों की तरह विस्तार देना। ऐसा जज्बा है जिसमें न जाने कितनी पीढ़ियाँ खत्म होने के बावजूद नहीं सीख पायी हैं ।

    अपने श्रद्धा सुमनों के साथ आपकी वेदना में सहभागी

    मुकेश कुमार तिवारी

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  27. ये क़ैदे बामशक्कत जो तूने की अता है

    ह्रदय के भावों से ही किसी भी रचना का जन्म होता है , स्व वेदना में सम्पूर्ण लोक की व्यथा कह गयी कंचन जी की रचना.... हार्दिक आभार कंचन जी का |
    पंकज जी ,और वीनस केशरी जी को भी आभार |

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  28. अत्यंत कठिन है इस असीम पीड़ा के क्षण में खुद को संभालना। जब शब्द अर्थहीन हो जाएं और वक्त आपकी हर कोशिश में नाकामयाबी ढूंढ निकालने में लगा हो....मनुष्य अपने प्रयासों में कितना सीमित है....कुछ तथ्य ऐसे हैं जो बतलाए नहीं जाते,
    कुछ प्रश्न ऐसे हैं जो दुहराए नहीं जाते, बनाया था स्वर्ग तक हमने भी सोपान सपनों का, चादर से अधिक पांव फैलाए नहीं जाते....

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  29. कंचन इस ग़ज़ल को पढ़ने के बाद कम अज़ कम मैं कुछ भी कह पाने की स्थिति में नहीं हूं बस अल्लाह से दुआ है कि वो तुम्हें इस ग़म से उबार ले
    पंकज ने सही कहा है की ये ग़ज़ल सिर्फ़ मह्सूस करने के लिये है इसे पढ़ने के बाद कुछ कहना सुनना एख़्तियार से बाहर है

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