गुरुवार, 29 जुलाई 2010

दुआ करो कहीं धरती पे भी बरस जाएँ फ़लक़ पे झूम रहीं साँवली घटाएँ हैं - आज का दिन मेरे एक पसंदीदा और बहुत पसंदीदा शायर के नाम, भाई द्विजेन्‍द्र द्विज की एक ख़ूबसूरत ग़ज़ल आज सुनिये तरही मुशायरे में ।

इस बार के तरही को लेकर एक जो बात बार बार उठ रही है वो ये कि ये जो क़ाफि़या है ये  कर्ता  के साथ तो लग रहा है लेकिन ये क्‍या क्रिया के साथ भी लग  सकता है अथवा नहीं । कर्ता का अर्थ जब किसी वस्‍तु विशेष की बात हो जैसे घटा, गुफा, हवा, दिशा, सदा, दुआ आद‍ि आदि आदि । तो इनके साथ तो ये लग ही रहा है बहुवचन बन कर । बहुवचन इस मायने में कि हम दिशाएं  लिख रहे हैं । एं  करने का अर्थ है कि बहुवचन कर दिया गया है । लेकिन अब बात आती है ये कि क्‍या ये क्रिया के साथ भी लग सकता है अथवा नहीं । क्रिया का मतलब उठा, दिखा, बता, आ, जा, ला, सुना आद‍ि आद‍ि आदि  । अर्थात ये कि क्‍या दिखाएं  किया जा रहा है तो क्‍या उसके साथ फिर रदीफ़  हैं का प्रयोग उचित रहेगा, अर्थात दिखाएं हैं, सुनाएं हैं, आएं हैं, जाएं हैं  आदि आदि आदि  ।  शर्त ये है किसी व्‍यक्ति को संबोधित करके बात कही जा रही हो और यहां पर ये भी कि यदि आपने लिखा है आएं हैं तो इसका मतलब है कि आने की ये प्रक्रिया कई बार हो रही है, प्रक्रिया का दोहराव हो रहा है या फिर होने वाली है ।    आपने लिखा कि वो आएं हैं  तो यहां पर दो बातें हो सकती हैं पहली ये कि वो रास्‍ते में हैं आ रहे हैं दूसरी ये कि वो यहां कई बार आते हैं । अब देखिये वो आए हैं और वो आएं हैं  के बीच का मामूली सा अंतर । वो आए हैं  कहने का मतलब क्रिया संपन्‍न हो चुकी है वे आ चुके हैं । वो आएं हैं कहने के दो अर्थ हो सकते हैं पहला आने की प्रक्रिया चल रही है या तो वे आने वाले हैं या वे रास्‍ते में हैं, दूसरा ये कि जिस स्‍थान की बात चल रही है वहां वे आते जाते रहते हैं । पहले का उदाहरण वो कह रहे हैं के ठहरो  जरा हम आएं हैं ( आने की प्रक्रिया चल रही है ) । दूसरे का उदाहरण घड़ी में जाएं हैं उठकर घड़ी में आएं हैं ( आने जाने की प्रक्रिया दोहराई जा रही है । ) लेकिन यहां पर ये जान लें कि आए है, आएं हैं ये दोनों ही देशज हैं, बोली के प्रयोग हैं, साफ भाषा इनके प्रयोग की इजाज़त नहीं देती, लेकिन देशज के प्रयोग करना भी गलत नहीं है ( बाबा-ए-ग़ज़ल मीर साहब ने तो जी भर के किये हैं)  । जैसे हमने कहा कि वो कह रहा है कि ठहरो अभी वो आए है  तो इसमें हिंदी का ठीक वाक्‍य यूं होता कि वो कह रहा है कि ठहरो वो अभी आ रहा है  लेकिन आपने उसमें देशज तरीके से कहा आ रहा  को आए कर दिया । उसी प्रकार घड़ी में जाएं हैं उठकर घड़ी में आएं हैं  देशज के हिसाब से सही है लेकिन उसका सही हिंदी वाक्‍य होगा घड़ी में जा रहे हैं उठकर घड़ी में आ रहे हैं । लेकिन यदि कहेंगें कि मुहब्‍बतों के ज़माने वो लौट आएं हैं  तो बात बिगड़ गई यहां पर आपको आएं करने की स्‍वतंत्रता केवल तब है जब आप   हैं  न लगा रहे हों । जैसे मुहब्‍बतों के ज़माने वो लौट आएं तो  यहां पर तो करने से बात ठीक हो गई तो  नहीं करना हो तो फिर मुहब्‍बतों के जमाने वो लौट आए हैं मतलब आएं नहीं चलेगा आए  होगा    हिंदी आपको ऐसा करने की इजाज़त नहीं देती । हिंदी का कहना है कि आपने यदि क्रिया में  एं  कर दिया तो अब हैं करने की आवश्‍यकता नहीं है । कुछ और तरीकों की चर्चा अगले अंक में विस्‍तार से की जाएगी  अब कुछ उदाहरण फिर से

मुहब्‍बतों के ज़माने वो लौट आएं हैं ( ग़लत वाक्‍य )

मुहब्‍बतों के ज़माने वो लौट आए हैं ( सही वाक्‍य )

घड़ी में जाएं हैं उठकर घड़ी में आएं हैं ( देशज में सही वाक्‍य है  )

तो आपने मतला यदि यूं बांधा

कुछ ऐसे सब्र हमारा वो आज़माएं हैं,

घडी़ में जाएं हैं उठकर घड़ी में आएं हैं

( तो इसे ठीक माना जायेगा )

कहा जो हमने के हम छत से कूद जाएंगे

वो बोले ठहरो तो धक्‍का अभी लगाएं हैं

( प्रक्रिया होने वाली है )

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वर्षा मंगल तरही मुशायरा

फ़लक पे झूम रहीं सांवली घटाएं हैं

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द्विजेन्द्र द्विज

द्विजेन्द्र "द्विज" एक सुपरिचित ग़ज़लकार हैं उनको ग़ज़ल लिखने की जो समझ हासिल है, उसी समझ के कारण उनकी गज़लें देश और विदेश में सराही जाने लगी है। उनका एक ग़ज़ल संग्रह संग्रह "जन-गण-मन" भी प्रकाशित हुआ है जिसे साहित्य प्रेमियों ने हाथों-हाथ लिया है। ये तो द्विज जी का एकेडेमिक टाइप का परिचय है लेकिन अब कुछ  परिचय अपनी तरफ से देना चाहता हूं । द्विज जी मेरे पसंदीदा शायरों में हैं । स्‍व. नईम जी (वैसे उनको नवगीत के कारण जाना जाता है ),  विज्ञान व्रत जी, द्विजेन्‍द्र द्विज जी ये वे नाम हैं जो मेरे सर्वकालिक पसंदीदा हैं । इनकी ग़ज़लों में एक अलग ही बात होती है । और वो ही बात इनको भीड़ से अलग करती है । भीड़ से अलग वही नज़र आता है जो भीड़ में नहीं चल रहा हो । भीड़ में कौन नहीं चलता, वो जो आम रास्‍तों पर नहीं चलकर अपना रास्‍ता अलग बनाते हुए चलता है । भले ही उसे संघर्ष करना होता है । भीड़ के उपहास का पात्र बनना होता है लेकिन अंतत: वो सफल होता है । द्विजेन्‍द्र भाई भी एक ऐसे ही शायर हैं जो शायरी के उन रास्‍तों पर नहीं चले जहां पहले से ही बहुत सी भीड़ थी और कई सारे लोग लीक पर भेड़ों की तरह चल रहे थे (शायरी में कई तयशुदा लीके हैं, पगडंडियां हैं, आप सुविधा के साथ उन पर चल सकते हैं बिना अपनी कोई अलग पहचान बनाए )। उन्‍होंने अपना अलग रास्‍ता बनाया और उसी पर चलने लगे  उसी के कारण उनकी आज अलग पहचान है । उनके और मेरे जन्‍मदिन में एक दिन का अंतर है, मैं अमिताभ बच्‍चन के साथ जन्‍मदिन शेयर करता हूं ( 11 अक्‍टूबर) तो वे रेखा के साथ जन्‍मदिन शेयर करते हैं ( 10 अक्‍टूबर)।

 

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हज़ारों‍ सदियों-सी लम्बी यही कथाएँ हैं

हर एक मोड़ पे जीवन के यातनाएँ हैं

इसीलिए यहाँ ऊबी सब आस्थाएँ हैं

पलों की बातें हैं पहरों की भूमिकाएँ हैं

सवाल सामने लाती है यही आज़ादी

‘बिछीं जो राहों में लाखों ही वर्जनाएँ हैं?’

दिखें हैं ख़ून के छींटे बरसती बूंदों में

ख़याल ज़ख़्मी हैं घायल जो कल्पनाएँ हैं

जहाँ से लौट के आने का रास्ता ही नहीं

वफ़ा की राह में ऐसी कई गुफ़ाएँ हैं

बस आसमान सुने तो सुने इन्हें यारो

पहाड़ जैसी दिलों में कई व्यथाएँ हैं

हसीन ख़्वाब मरेंगे नहीं यक़ीं जानो

उकेरती अभी सावन को तूलिकाएँ हैं

दुआ करो कहीं धरती पे भी बरस जाएँ

फ़लक़ पे झूम रहीं साँवली घटाएँ हैं

किस शेर की तारीफ करूं ? कौन ऐसा है जो अपने आप में हासिले ग़ज़ल नहीं है ? गिरह भी क्‍या खूब बांधी है । और तिस पर ये कि हिंदी के शब्‍दों की क्‍या जबरदसत क़‍ाफि़याबंदी की गई है । तूलिका, कल्‍पना, वर्जना, व्‍यथा जैसे विशुद्ध हिंदी शब्‍दों को महारत के साथ जो बांधा गया है वो काम उस्‍ताद शायरों का ही होता है । लेकिन चूंकि मेरे सामने तो प्रश्‍न होता है कि संचालन में अपनी पसंद का एक शेर छांटूं । तो इन सारे मोतियों में सबसे चमकदार मोती मुझे लग रहा है हुस्‍ने मतला इसीलिए यहाँ ऊबी सब आस्थाएँ हैं, पलों की बातें हैं पहरों की भूमिकाएँ हैं । मिसरा सानी में क्‍या ग़ज़ब का व्‍यंग्‍य है । इतना धारदार की व्‍यवस्‍था के उजले शामियानों को चीरता हुआ गुज़र जा रहा है । और उस शेर की क्‍या कहें  हसीन ख़्वाब मरेंगे नहीं यक़ीं जानो, उकेरती अभी सावन को तूलिकाएँ हैं । द्विज भाई आज पहली बार हमारी तरही में आये हैं और मेरे विचार से मंच, तम्‍बू, टैंट समेत पूरा मुशायरा लूट कर जा रहे हैं । ये पहली बार हुआ है कि लुटने वाले को लुटना सुखद लग रहा है । आज सिर्फ और सिर्फ द्विज भाई को सुनिये और आनंद लीजिये ।

31 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी आज की भूमिका और आज की तरही की भूमिका और द्विज भाई की तूलिका या कहूँ कि भूमिकाऍं और तूलिकाऍं दोनों मिलकर छा गयीं।
    अच्‍छी ग़ज़ल कहने के लिये शब्‍द सामर्थ्‍य का क्‍या महत्‍व होता है यह स्‍वत: स्‍पष्‍ट है।
    आखिरी शेर में जिस तरह तरही मिसरे को बॉंधा है वह जन सामान्‍य का शेर बन गया है, सभी की आस निहित है इसमें।

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  2. जहां से लौट के आने का रास्ता ही नहीं
    वफा की राह में ऐसी कई गुफाएं हैं....

    " सच कहा किस शेर की तारीफ करूं...एक से बढ़ कर एक काबिले तारीफ.."

    "कहा जो हमने के हम छत से कूद जायेंगे
    वो बोले ठहरो तो अभी धक्का लगाये हैं...."

    " इसमें " वो" कौन हैं??????? हा हा हा हा हा हा "

    Regards

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  3. "इसीलिए यहाँ ऊबी ...." बेहद, बेहद उम्दा... जाने कितनी तस्वीरें खींच गया मन में यह शेर .... इसके बाद कोई क्या पढ़े क्या कहे...!
    ऐसे नए तेवर के शेरों को हृदय और स्मृति में स्थान देने के लिए ही ऐसे तरही मुशायरे होते हैं सुबीर भैया !
    द्विज जी और आप , दोनों धन्य हैं...परम सौभाग्य हमारा कि जिस घड़ी मुशायरे में आए, माईक ऐसे कमाल के शायर के हाथ था :)
    सादर शार्दुला
    -------
    कंचन के जन्मदिन पे बात हो ही चुकी है... ये बस सनद के लिए :)
    प्यारेलाल की इतने दिनों बाद नई ग़ज़ल आई है, उसे पूरे मन के साथ पढ़ने के लिए १० अगस्त के बाद आउंगी. तभी सारी प्रविष्टियाँ पढूंगी....

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  4. आपने जो द्विज भाई के लिए कहा है उस से अधिक और कुछ कहना संभव ही नहीं है...इतना आनंद आया उनकी ये ग़ज़ल पढ़ कर के क्या कहूँ...वाह...मैं खुश नसीब हूँ के मेरा उनसे हल्का फुल्का ही सही, राबता है और कई बार हमारी आपस में बातचीत हुई है वो जिस अपने पन से मुझे भाई साहब कहते हैं उस से मन अन्दर तक भीग जाता है...एक सच्चा और अच्छा इंसान ही ऐसी ग़ज़ल कह सकता है...मैं उनका मुरीद ही नहीं शिष्य भी हूँ और समय समय पर उनसे भी सीखने की कोशिश में लगा रहता हूँ...आज तरही में उनकी ग़ज़ल पढवा कर आपने इस मुशायरे को नया आयाम दिया है...हम जैसे तालिबे इल्मों के लिए ये किसी तोहफे से कम नहीं...इस नायाब ग़ज़ल को हम तक पहुँचाने के लिए आपका बहुत बहुत बहुत शुक्रिया...

    नीरज

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  5. सच में आज तो मुशायरा जम गया..द्विज जी को सुनना बहुत सार्थक रहा..मैंने कई बार उनकी ग़ज़ल पढ़ी है..हर बार लाजवाब होते है...बेहतरीन ग़ज़ल के लिए शुक्रिया द्विज जी और पंकज जी आपको भी प्रस्तुती के लिए हार्दिक बधाई..बढ़िया मुशायरा आगे बढ़ता हुआ...

    धन्यवाद सुबीर जी!!

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  6. द्विज जी ने सचमुच मुशायरा लूट लिया.
    बहुत ही अच्छी गज़ल. गिरह तो बहुत ही अच्छी बाँधी है. और फिर जैसा की द्विज जी की गज़लों के साथ होता है की किसी एक शेर की तारीफ़ की ही नहीं जा सकती क्योंकि सभी शेर बहुत खूबसूरत होते हैं, वैसा ही इस गज़ल में भी है.

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  7. आज का विश्लेषण बहुत उपयोगी रहा.
    सचमुच द्विज जी ग़ज़ल को अपने एक ख़ास तरीके से कहते हैं. इनकी और भी गजले पढ़ी सुनी है सब तेज धार लिए हुए हैं.
    "बस आसमान सुने तो सुने........पहाड़ जैसी दिलों में कई व्यथाएँ हैं." ये पंक्तियाँ द्विज जी के करीबी भाव में से है.

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  8. द्विज ज की गज़ल पर कुछ भी कहने की स्थिती मे नही हूँ। उनकी पुस्तक जन गण मन पढ कर हैरान होती हूँ कि इतनी उमदा गज़लें कोई कैसे कह सकता है। हर एक गज़ल ही उसमे काबिले तारीफ है। और इस गज़ल के लिये आपने सब कुछ कह दिया है।
    दिखे हैं खून के छींटे----
    बस आस्मान सुने तो सुने----
    हसीन ख्वाब मरेंगे नही---
    लाजवाब शेर हैं। उनकी गज़लों मे बहुत कुछ सीखने को मिलता है। द्विज जी को बहुत बहुत बधाई।

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  9. गज़ब का लेखन है…………सबसे जुदा अन्दाज़ है…………हर शेर लाजवाब है किसी एक की कोई भी कैसे तारीफ़ कर सकता है।

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  10. बेहतरीन .....एक एक शे'र मार्के के है...हम जैसे नए लोगो के लिए ऐसी ग़ज़ल किसी हीरे के खजाने से कम नहीं है. बहुत खूब

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  11. सुबीर जी ने जो कहा वो बिल्कुल सही है। आज द्विज जी के साथ मैं भी पहली बार लिखित रूप में प्रकट हुआ हूँ वैसे तो पढ़ता ही रहता हूँ। कामयाब मुशायरे के लिए सुबीर जी बधाई के पात्र हैं।

    द्विज जी के किसी शे’र पर कुछ कहना सूरज को दीपक दिखाने जैसा है। आदरणीय श्री द्विज जी को प्रणाम और बधाई

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  12. आज द्विज जी की ग़ज़ल पढ़ कर जब रहा नहीं गया तो उन्हें बधाई देने को फोन किया...उन्होंने ने बताया के ये ग़ज़ल मात्र तीन मिनट में हो गयी थी...जबकि पिछले साल भर से उन्होंने कोई ग़ज़ल नहीं लिखी है...ये ग़ज़ल उन पर सीधे ऊपर से उतरी है , जैसे कोई हाथ पकड़ कर कह रहा हो के लिख...वर्ना ऐसे शेर और मात्र तीन मिनट में...असंभव...मैंने उन्हें कहा हम जैसे तो शायद तीस साल में भी ऐसा न लिख पायें...ये तब होता है जब माँ सरस्वती अपने लाडले बेटे पर आशीर्वाद बरसाती है...दुआ करता हूँ माँ सरस्वती की कृपा उनपर हमेशा यूँ ही बनी रहे...आमीन
    नीरज

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  13. द्विजेन्द्र जी की ग़ज़ल ने मानो मुशायरे को चार चाँद लगा दिए...बहुत खूबसूरत ग़ज़ल कही है...जुदा ही अंदाज़ है..बेहतरीन..

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  14. द्विज जी की गज़लों ने हमेशा ही मुझे प्रभावित किया है.बहुत कुछ सीखने को मिलता है. इस ग़ज़ल पर क्या कहूँ...हर शे'र ग़ज़ल की फुलकारी पर पुखराज, नीलम, पन्ना है. भावनाओं और भाषा का अप्रतिम सौन्दर्य है.

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  15. dua karo kahi dharti pe bhi baras jaayen; falak pe jhoom rahi saanvli ghataayen hain. abhi tak ki sabse achchi girah

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  16. dua karo kahi dharti pe bhi baras jaayen; falak pe jhoom rahi saanvli ghataayen hain. abhi tak ki sabse achchi girah

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  17. अभी पता चला कि क्‍या सुखद संयोग है आज आपके इस ब्‍लाग का जन्‍म दिन भी है । 29 जुलाई को ही इस ब्‍लाग को बनाया गया था । हालांकि पहली काफी सारी पोस्‍टें कच्‍ची और विषय हीन होने के कारण बाद में मैंने हटा दी थीं तथा अब पहली पोस्‍ट 25 अगस्‍त से प्रारंभ होती है जब मैंने ग़ज़ल के व्‍याकरण को लेकर पहली पोस्‍ट लगाई थी । लेकिन ब्‍लाग 29 जुलाई को ही बनाया था अपने किसी मित्र के अनुरोध पर । आज पहली बार ही द्विज जी की अद्भुत ग़ज़ल यहां ब्‍लाग के जन्‍मदिन का उत्‍सव मनाने ही आई है । और आज ही नुसरत दीदी का ही पहला कमेंट यहां पहली बार मिला है ये सब सुखद संयोग यूं ही नहीं हो रहे थे ये तो ब्‍लाग का जन्‍मदिन मन रहा था ।

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  18. ब्लो्ग की वर्षगांठ की बधाई!
    गज़ल पर कुछ भी कहने के लिये शब्दहीन हूं!वाह!

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  19. हमें तो खैर यह पता नहीं था की आज हमारे सबसे चहेते ब्लॉग का जन्म दिवस है...परन्तु मास्स्साब ने सही कहा की कही ना कही से ऊपर वाला देख रहा था. और स्वतः ही जन्म दिवस मनाने की तैयारी कर दी. मास्साब, ब्लॉग को जन्म दिवस की ढेरों शुभकामनाएं.

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  20. गुरु जी प्रणाम,

    आज का तरही मुशायरा नायाब है

    आदरणीय द्विज जी की गजल पढ़ कर दिल बाग बाग हो गया

    शुद्ध हिंदी काफिए का प्रयोग करके द्विज जी ने अपनी गजल में जो रोमांच पैदा किया है वह अभूतपूर्व है

    मुशायरा अपने उत्कर्ष पर है और इस गजल के आभामंडल से निकल पाना मुश्किल लग रहा है

    बस आसमान सुने तो सुने इन्हें यारों
    पहाड़ जैसी दिलों में कई व्यथाएं हैं

    वाह वाह, वाह वाह मज़ा आ गया

    नायाब शेर, नायाब गज़ल ......और गिरह तो क्या ज़ोरदार बांधी गई है ...दिल झूम उठा



    मुझे पिछली पोस्टो से ही डर लग रहा था कि मेरी गजल जरूर दोष पूर्ण होगी, आज तो आपके द्वारा की गई काफिया चर्चा के बाद लग रहा, मुझे इस तरही में केवल दर्शक, पाठक और श्रोता की भूमिका मिलाती तो कितना बढ़िया होता,,,कहाँ मैं गजल भेज कर गुणीजनों के बीच फंस गया

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  21. २९ जुलाई को आपने किसी मित्र के अनुरोध पर आपने ब्लॉग बना दिया..... २४ को किसी मित्र के लिये वीर जी ने तरही की व्यवस्था बदलवा दी। जुलाई हमारे भ्राताओं के लिये विशेष हरी भरी होती है क्या ?

    गुरु जी से क्षमा.... ये चुहल बड़े भाई के लिये थी...!

    द्विज साहब के लिये टिप्पणी देना हम से लोगो के लिये दुष्कर है। जो अभी खुद ही सीख रहे हैं वो उस्तादों को क्या कहेंगे ?

    मगर ये सीखा कि मेहनत हर चीज में करनी पड़ती है। हम शेर में संजीदगी और मेहनत झलक रही है। डूब के पढ़ रही हूँ

    पलों की बाते हैं पहरो की भूमिकाएं है

    जहाँ से लौट के आने का रास्ता ही नही,
    वफा की राह में ऐसी कई गुफाएं हैं...

    बस आसमान सुने तो सुने इन्हे यारो...

    सब बस बार बार पढ़ रही हूँ...!

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  22. द्विज जी की ग़ज़लों पे कुछ भी लिखना तो...उफ़्फ़्फ़!
    "बस आसमान सुने तो सुने इन्हें यारों/पहाड़ जैसी दिलों में कई व्यथाएं हैं" इस शेर पे पहले तो करोड़ों दाद उनको...उनके अद्‍भुत काफ़ियें और लाजवाब मिस्रे...द्विज जी को नमन, हमसब को इतने खूबसूरत तरही से नवाजने के लिये। और नुसरत दी सच कह रही हैं कि सबसे बेमिसाल गिरह लगाया है है द्विज जी ने।

    ब्लौग की सालगिरह पे मुबारक हो गुरूदेव....हमसब का प्यारा दुलारा ये ब्लौग यूं ही अनवरत चलता रहे।

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  23. आदरणीय अग्रज द्विजेंद् जी की इस ग़ज़ल के होने का मैं भी साक्षी रहा हूं। वाकई बेजोड़ ग़ज़ल। ज्‍यादा इसलिए नहीं कह सकता क्‍योंकि मैं तो स्‍वयं उनसे ही सीखता हूं...लेकिन आदरणीय अग्रज पंकज सुबीर जी ने जो माहौल बनाया और शायर एवं ग़ज़ल के साथ न्‍याय किया उसके लिए बड़ा दिल चाहिए। भाई पंकज जी से कभी मिला नहीं लेकिन पूरे भीगे हुए शब्‍दों और विश्‍वास के साथ कह सकता हूं कि यकीनन वह बहुत ही अच्‍छे होंगे। यह ज़हीन और अपना लगता ब्‍लॉग यूं ही चमकता रहे, ऐसी सदिच्‍छा है। यहां कितने भावपूर्ण लोग आते हैं...। बधाई।
    सादर
    नवनीत

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  24. प्रणाम गुरु जी,
    इस तरही मिसरे में कर्ता और क्रिया के भंवर से आपने अब बहुत अच्छी तरेह से निकाल दिया है. सब कुछ एकदम स्पष्ट हो गया है.

    द्विज जी की उपस्तिथि इस तरही के लिए एक बड़ी उपलब्धि है, वाकई ये तरही हर तरही की तरह अपनी एक अलग मिसाल बना रहा है.
    ग़ज़ल तो किसी खजाने से कम नहीं बेहद अनमोल है, हर शेर में कशिश है जो दीवाना बना रही है,
    "पलों की बातें......", वाह वाह क्या खूब कहा है आपने.
    "बस आसमान सुने............." तो गज़ब है
    "हसीं ख्वाब मरेंगे नहीं............", शब्दों की जादूगरी से ख्याल को इतना अच्छे से पिरोना बहुत कुछ सिखा रहा है.
    और गिरह तो बेमिसाल है, लाजवाब है.
    द्विज जी आपका बहुत बहुत आभार जो आप तरही में आये और इतनी बेहतरीन ग़ज़ल से हम सभी को नवाज़ा.

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  25. ये संयोग कितना अच्छा रहा कि ब्लॉग का जन्मदिवस इतनी धूमधाम से मना और द्विज जी की ग़ज़ल ने तो गज़ब कर दिया.
    आपने इस ब्लॉग के जरिये ग़ज़ल सीखने वालों के लिए एक ऐसा मंच दिया है जो पहले इतनी आसानी से उपलब्ध नहीं था और अगर कहीं होगा भी तो समझाने में इतना प्रभावशाली नहीं होगा. इस ब्लॉग ने मुझे सही मायनों में ग़ज़ल से रूबरू करवाया, वैसे तो मिठाई तो आपको खिलानी चाहिए मगर मैं अभी यहाँ ख़ुद से खा ले रहा हूँ मगर आप यहाँ आयेंगे तो वो वसूली जाएगी.

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  26. गुरु देव को सदर प्रणाम,
    तबियत इतनी खराब होने के बावजूद ब्लॉग पर पोस्ट रुक नहीं रहे बल्कि करिश्माई शीरों से ये तरही और अपने उफान पर है.... इस कर्मनिष्ठा को सलाम करता हूँ पहले तो ... आदरणीय द्विज जी से लगातार बातचीत होती रहती है खुच एक विषयों पर इसके लिए अपने मैं खुद भी भाग्यशाल समझता हूँ ... उनकी गज़ल्गोई के बारे में मुझ जैसा अदना क्या कहे बस नतमस्तक हूँ जिस तरह के हिंदी के काफियों का इस्तेमाल कर उन्होंने सभी को चौंका दिया ये सिर्फ इनके जैसा उस्ताद शाईर ही कर सकता था ... उनकी ग़ज़ल का हरेक शे'र काबिले गौर है जिसमे कहन की बारीकियां सिखने को मिल रही हैं .... सच में जब एक अंग्रेजी के हेड ऑफ़ डिपार्टमेंट हिंदी में ऐसी उच्च कोटि की ग़ज़ल करता है तो ख़ुशी होती है ! बस मजा आजाता है ! इस स्तर का साहित्य उफ्फ्फ वाली बात है .. आप अपने सेहत का ध्यान रखें गुरु देव...
    ब्लॉग के जन्म दिवस पर तमाम ब्लॉग के लोगों को बधाई , और हम अपनी कुश्किस्मती पर फक्र करते हैं !
    आपका
    अर्श

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  27. सचमुच इस जुलाई के महीने में कुछ ख़ास बात तो है.

    आचार्य जी, ब्लॉग वर्ष्गांठ की एक जोरदार बधाई मेरी तरफ से भी!!

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  28. प्रिय भाई पंकज सुबीर जी

    आज बहुत दिनों के बाद कम्प्यूटर पर बैठ पाया हूँ.

    आपके द्वारा अप्रतिम ढंग से प्रस्तुत मेरी ग़ज़ल पर
    इतने सारे प्रबुद्ध पाठकों की टिप्पणियों ने मेरे लेखन को सार्थक कर दिया. आपकी इस प्रस्तुति के बारे मुझे जब नीरज भाई साहब ने फ़ोन किया तो मैं बस एक दिन पहले ही अपना डेरा कांगड़ा से समेट कर ट्रक में लादकर सुन्दरनगर पहुंचा ही था और अपने नए सरकारी आवास में व्यवस्थित होने की तैयारी कर रहा था.

    नीरज भाई साहब और भाई राजीव भरोल के फ़ोन ने स्थानांतरण और सफ़र की मेरी सारी थकावट और हताशा दूर कर दी.

    मैं सब श्रोताओं का भी आभारी हूँ.

    ... और आपके प्रस्तुतिकरण को तो मैं ज़र्रानवाज़ी
    ही कहूंगा. महब्बत और हौसला अफ़ज़ाई के लिए शुक्रिया.

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  29. द्विज जी को प्रणाम !
    इससे ज्यादा कुछ कहना उनकी शान में गुस्ताखी होगी.

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  30. भाईजान को बधाई हो...
    आपको भी साल हुआ ग़ज़ल कहे...अब तीन मिनट में कही ये ग़ज़ल पढ़ी...
    तो लगा कि ये झूमती सांवली घटायें आप पर तो मेहरबान हो गयीं है..


    हसीं खाब मरेंगे नहीं यकीन जानों....

    दमदार वापसी के लिए जोरदार सलाम...

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  31. अगला तबादला थोड़ा और आगे का लीजिएगा...

    दिल्ली ज्यादा दूर नहीं है अब...

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