Tuesday, 26 February, 2008

ऊंचे महलों में बैठा डर मेरा है, पत्‍थर तकिया, मिट्टी बिस्‍तर मेरा है, डेरा है दुनिया भर के आसेबों का, मैं बेचारा समझा था घर मेरा है

बहुत दिन हुए ग़ज़ल की कक्षा लगाए । मगर क्‍या करें ये जो ग़मे दौरा और ग़मे जानां है ये आदमी को बड़ा परेशान करता है । और कहा तो ये ही गया है कि  भूल गए राग रंग भूल गए छकड़ी, तीन चीज़ याद रहीं नोन, तेल, लकड़ी  । हालंकि बात ये भी नहीं है कि कोई इन के बिना नहीं ही रहा सकता हो पर फिर भी दुनिया में हम आए हैं तो जीना ही पड़ेगा जीवन है अगर जहर तो पीना ही पड़ेगा ।

चलिये मैं आज कुछ रिविज़न करवा दूं ताकि आपको पुराना याद हो जाए फिर हम आगे से तो शुरू कर ही सकते हैं । हां एक बात जो दुख की है वो ये कि वरिष्‍ठ कवि श्रद्धेय राकेश खंडेलवाल जी के अनुज का दुखद निधन हो गया है ग़ज़ल की पूरी कक्षा की और से हम श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और शोक संतप्‍त परिवार के प्रति अपनी संवेदनाएं प्रेषित करते हैं । राकेश जी 3 मार्च को दिल्‍ली आ रहे हैं अवसर हुआ तो उस समय व्‍यक्तिगत रूप से भी हम अपनी श्रद्धांजलि पहुंचाने का प्रयास करेंगें ।

आज जो ग़ज़ल शीर्षक में लगी है वो अज़ीम शायर जनाब मुज़फ्फर हनफी साहब की है और हनफी साहब का सीहोर से तआल्‍लुक रहा है वे कई वर्षों तक सीहोर में रहे हैं । खैर तो बात चल रही थी बहरों की जिनके बारे में मैंने कहा था कि बहरों में दो प्रकार की बहरे होती हैं पहली तो मुफरद बहरें  और दूसरी मुरक्‍कब बहरें । मैंने बताया था कि मुफरद  बहरें वे हाती है जो एक ही प्रकार के रुक्‍नों से बनती हैं और मुरक्‍कब  बहरें वे होती हैं जो कि एक से अधिक रुक्‍नों की तकरार से बनती हैं । इसमें भी हरेक बहर में फिर से दो प्रकार होते हैं एक तो सालिम  बहरें और दूसरी मुजाहिफ  बहरें । बहरें निकालना एक दुश्‍कर कार्य है और कभी कभी बड़ी मुश्किलें आ जाती हैं और ये मुश्किलें आती हैं उसीको लेकर जिसको लेकर कई सारे छात्र अभी भी परेशानी में पड़े हैं और परेशानी है कि दीर्घ का लघु कैसे और कब हो जाएगा । और इसीको लेकर मैंने कहा है कि किसी भी ग़ज़ल का एक शेर देख कर उसका वज्‍न नहीं निकाला जा सकता है हमें कम अ स कम दो या तीन शेरों की तकतीई तो करनी ही होगी ताकि हम सही वज्‍न तक पहुंच पाएं । ऐसा इसलिये क्‍योंकि जब हम वज्‍न निकालने बैठते हैं तो ये समझना मुश्किल हो जाता है कि यहां पर शेर में जो दीर्घ है वो दीर्घ ही है या फिर उसे लघु माना गया है । लेकिन हम आगे के किसी शेर में जाते हैं तो देख्‍ते हैं कि उस स्‍थान पर एक स्थिर दीर्घ आया है तो हम जान जाते हैं कि ऊपर भी दीर्घ ही था । इसको मैं उदाहरण देकर समझाना चाहता हूं

ये मकतल ख्‍वाब हो जाए तो अच्‍छा 1222-1222-122

 अब बात वही आई कि मैंने कैसे कह दिया कि  तो  एक लघु है जो आखिर के रुक्‍न में आया है । तो उसके लिये हमने आगे का शेर देखा

लहु में जल तरंगें बज रहीं हैं 1222-1222-122

 अब क्‍या हुआ कि जिस स्‍थान पर ऊपर तो  आया था आखिर के रुक्‍न में उसी जगह पर दूसरे शेर में आया है  र  और जो कि लघु हैं । बस यहीं से हम तय कर लेते हैं कि जो ऊपर था वो भी लघु ही था । तो अच्‍छा 122  और  रहीं हैं 122 ।

 तो जान लीजिये कि आपको कम से कम एक से ज्‍यादा शेर तो चाहिये ही ताकि आप उसकी तकतीई कर सकें ।  केवल एक से तो काम अक्‍सर ठीक नहीं बन पाता है ।

ऊपर जो बहर है वो है  हजज़  पर ये सालिम या समग्र नहीं हो पा रही है क्‍योंकि इसमें आखिर का रुक्‍न अधूरा है उसमें से एक पूरी दीर्घ मात्रा की कमी हो गई है । अगर शेर यूं होता  ये मकतल ख्‍वाब हो जाए तो अच्‍छा हो  तो बात पूरी हो जाती है और फिर ये एक सालिम बहर हो जाती है जिसमें रुक्‍न है  मुफाईलुन  और तीनों में वही रुक्‍न है । तीन रुक्‍न हैं इसलिये मुसद्दस  बहर हो गई मुफाईलुन  है इसलिये हजज  और चूंकि तीनों की समग्र हैं इसलिये ये एक सालिम बहर हो जाती । पर ऐसा हो नहीं पाया क्‍योंकि आखिर का रुक्‍न जो है वो अधूरा रह गया उसमें एक दीर्घ की कमी हो गई । लेकिन वो भी अपने मेल के समान ही धवनि उत्‍पन्‍न कर रहा है अत: उसको भी हजज का रुक्‍न माना जाता है । ये है फऊलुन  रुक्‍न जिसके कारण ये मुजाहिफ  बहर हो गई है । तो ये फर्क है सालिम और मुजाहिफ बहरों के बीच का । अभी तो हम के वल मुफरद बहरों की ही बात कर रहे हैं अभी मुरक्‍कब बहरों पर तो आए ही नहीं हैं क्‍योंकि वहां जाकर तो मामला और भी उलझ जाएगा । आज का पाठ इतना ही कल आगे का जै राम जी की ।

Monday, 25 February, 2008

अब किस जन्‍म में मिलोगे मुझे और मिलोगे तो मैं किस प्रकार पहचान पाऊंगा तुमको कि तुम ही वो हो -


मैं नहीं जानता कि पिछले साल की 25 और 26 फरवरी के बीच की वो रात को क्‍या हुआ था जो कि एक जिन्‍दादिल इन्‍सान ने खुदकुशी जैसा काम कर लिया । रात 4 बजे जब उनके भतीजे का फोन आया कि चच्‍चा ने खुदकुशी कर ली हैं तो एकबारगी तो विश्‍वास ही नहीं हुआ कि ये खबर सच भी हो सकती है । सुकव‍ि मोहन राय और खुदकुशी, मगर सच वही था जो कहा जा रहा था । मेरी हर एक सफलता पर मन से प्रसन्‍न होने वाला वो इन्‍सान जाने किस असफलता पर इतना मायूस हुआ कि खुद को पंखे से लटका बैठा । अभी हाल में ही तो उनकी दूसरी पुस्‍तक झील का पानी का प्रकाशन किया था मैंने उससे पहले गुलमोहर के तले का प्रकाशन किया गया था । हर बाद एक नई उर्जा से सराबोर नज़र आते थे । अच्‍छी खासी नौकरी थी और एक माह बाद ही रिटायर होना था । टीस एक तो ये थी ही कि संतान नहीं थी दोनो पती पत्‍नी नदी किनारे के अपने मकान में अकेले रहते थे ।
हालंकि झील का पानी में उनकी कविता
कोई गीत नहीं है उपजता कुछ छूट रहा है
वो नेह का ताज महल तो अब टूट रहा है
जो ना कभी झुका था आगे कहीं किसी के
मोहन समय के हाथों वो टूट रहा है
पढ़कर मुझे लगा था कि वे निराश हैं और गलत दिशा में सोच रहे हैं । मगर ये किसे पता था कि इतना ग़लत सोच रहे हैं ।
हर शनिवार को हमारी बैठक होना तय सी बात थी। वे तीन बजे आ जाते थे और फिर हम रात आठ बजे तक बैठ कर चर्चा करते रहते थे । चर्चा साहित्‍य की फिलमों की और जाने किस किस की । और हां इस बीच उनके पसंद के गीत ठाड़े रहियो ओ बांके यार, पिया तोसे नेना लागे रे, चलते चलते बजाना अनिवार्य सी बात थी । हमारी उम्र में बीस साल का अंतर था पर मुझे कभी नहीं लगा कि ऐसा है । आज उनको गए हुए एक साल हो गया है । वे मौसम की कविताएं और गीत लिखते थे और झूम के गाते भी थ्‍ज्ञे उनको । अब कौन लिखेगा मौसम पर कविताएं, बसंत बागों में बगरा पड़ा है नहीं जानता कि मौसम का चितेरा कवि तो जा चुका है । जो चुका है जो गाता था सयानों सपनों को बहलाने लगी अंगना की बेरी गदराने लगी ।
चच्‍चा मैं नहीं जानता कि अब तुमको किस जन्‍म में मिलूंगा और मिलूंगा तो कैसे पहचान पाऊंगा कि तुम ही हो । सब तुमको याद करते हैं चच्‍चा तुमने ये अन्‍याय क्‍यों किया ।

Saturday, 23 February, 2008

विस्‍टा से मुक्ति पा ली और अब वापस अपने पुराने वाले एक्‍स पी पर आ गए ( एक दु:स्‍वप्‍न का अंत)

मैंने आपको बताया था कि मैंने अपने सिस्‍टम में विस्‍टा डाल लिया है और मैं बड़ा ही खुश भी था कि चलो अब तो मेरे पास भी सबसे लेटेस्‍ट आपरेटिंग सिस्‍टम है । समीर लाल जी ने सबसे पहले मुझे चेताया था कि विस्‍टा के रूप में मैंने एक ग़लत निर्णय लिया है और फिर उसके बाद अभिनव ने भी कहा कि विस्‍टा डाल कर मैंने गलती की है त्र पर अपने राम तो प्रसन्‍न थे क्‍यों क्‍योंकि अपन तो विस्‍टा चलाने वाले थे । फिर उसके बाद रिपुदमन पचौरी जी का मेल मिला उन्‍होंने भी विस्‍टा के डालने पर आश्‍चर्य व्‍यक्‍त किया था । यहां तक आते हुए मैं कुछ परेशान तो था क्‍योंकि ये सभी मेरे शुभचिंतक ही तो हैं । और यकीन मानिये तब तक तो मेरे विस्‍टा ने परेशान भी करना प्रारंभ कर दिया । मेरे ब्‍लाग खोलने बंद कर दिये ये कह कर कि ये तो सिक्‍योरड साइट नहीं हैं । मैं हैरान सा काम एक कम्‍प्‍यूटर पर करता और अपना ही ब्‍लाग देखने पड़ोस के नेट कैफे पर जाता कि देखें क्‍या आया है । फिर हुआ ये कि उसने मेरा सारे ई मेल भी बंद कर दिये । बताया तो नहीं कि क्‍यों करे पर कर दिये । अब मैं अपने मेल चैक करने भी पड़ोस के कैफे में जाने लगा । कोई पूछता तो कहात क्‍या करें भैया हमने विस्‍टा डाली है और वो ये सब करने ही नहीं दे रही है । फिर तीसरे ही दिन हुआ ये कि नेटवर्किंग में भी समस्‍या आने लगी पता चला कि हमारी नेटवर्किंग को सिक्‍योरड नहीं मान कर उसने बंद कर दिया है । अब गुस्‍सा चरम पर आ गया था । एक तो छ- सात हजार इस विस्‍टा नाम की भैंसिया का खूंटा गाड़ने में ( कोर टू, 2 जीबी रेम, 500 जीबी हार्ड डिस्‍क ) में लग गए और ससुरी दूध है कि दे ही नहीं रही और लात मार रही है सो अलग । दस दिनों से हम नेट से अलग पडें हैं और इनको नखरे सूझ रहे हैं । आखिरकार शुक्रवार को निर्णय लिया गया कि हटाओ इस नखरे वाली विस्‍टा को और ले आओ अपनी पुरानी एक्‍सपी को बस बात की बात में कर दिया फार्मेट और लौट कर आ गए अपने पुराने पर । एक दु:स्‍वप्‍न का अंत हो गया । लौट कर बुद्धू घर को आए ।

Wednesday, 20 February, 2008

एक दुखांत कहानी पढ़कर बताइये कि आपको कैसी लगी । कहानी का शीर्षक है क्‍या होता है प्रेम ।

 

ग़ज़ल की कक्षाएं भी बस फिर से प्रारंभ होने ही वाली हैं । अभी ग़ज़ल के दो होनहार छात्र समीर लाल जी और अभिनव शुक्‍ला भारत की यात्रा पर आए हुए हैं और भारत यात्रा का आनंद ले रहे हैं । पिछले कुछ दिनों से व्‍यस्‍तता बनी हुई थी और कल से ही वापसी हुई है वापसी पर केवल समीर लाल जी ने ही स्‍वागत किया बाकी के विद्यार्थी कहां हैं कुछ पता नहीं हैं । राकेश जी ने फोन कर के अनुपस्थिति का कारण पूछा अच्‍छा लगा । एक परिवार है जो बढ़ता जा रहा है । चांद शुक्‍ला जी का भी कई बार फोन आ जाता हैं । अभी एक कहानी मेंरी इन्‍दौर से प्रकाशित होने वाली नई दुनिया ने साहित्‍य जगत में लगाई है जो कि एक दुखंत कहानी है । मेरें कुछ मित्र कहते हैं कि मैं कहीं कहीं ओ हेनरी से प्रभावित होकर लिखता हूं । हालंकि ऐसा है तो नही  पर फिर भी अगर हो जात हो तो मैं भी नहीं जानता । खैर आप पहले  तों वो कहानी पढ़ें जो कि यहां http://www.naidunia.com/articles_m.asp?article_no=21008021702&yy=2008&mm=2&dd=17&title=Œub+¢gt+ntu;t+ni?&author=vkfUs+mwceh पर है और अगले रविवार तक शायद यहां पर बनी रहेगी । उसके लिये आपको शायद फोंट डालना हो जो कि आप http://www.naidunia.com यहां से या यहां http://www.megaupload.com/?d=ERAHQPWI    
से ले सकते हैं । मेरी इच्‍छा है कि आप एक बार इस कहानी को पढ़कर जवाब अवश्‍य दें कि आपको कहानी कैसी लगी । ये कहानी मैंने कुछ अलग ही मूड में लिखी थी । एक दो रोज में जब सारे छात्र उपस्थिति दर्ज करा देंगें तो हम कक्षाएं फिर से प्रारंभ करेंगें तब तक बातचीत करके माहौल तो बना ही सकते हैं । 

Tuesday, 19 February, 2008

बहुत दिनों के बाद माड़साब लौटे हैं ग़ज़ल की कक्षा में और इस बार तो हद ही हो गई है, पूरे सोलह दिनों के नागे के बाद लौट रहे हैं माड़साब

होता है ऐसा कि कई बार सब कुछ ठीक होते हुए भी वैसा नहीं हो पात है जैसा आप सोच रहे होते हैं । पहले तो ये हुआ कि अपने सिस्‍टम को ठीक करने के लिये कुछ करने की इच्‍छा हुई । दिन भर में कई सारे सिस्‍टम ठीक करते हैं पर अपने को ही ठीक करने की कभी इच्‍छा नहीं हुई । खुद का ही कम्‍प्‍युटर इतना पंगा कर रहा था कि काम ही नहीं हो पात था । उस पर नया विंडोज विस्‍टा चलाने की भी इच्‍छा हो रही थी । मगर वही दिक्‍कत थी कि इतने सारे साफ्ट वेयर जो मैं यूज करता हूं उनको फिर से डालना और वही सब फिर से करना  । और फिर ये भी था कि विस्‍टा काम कैसा करता है अभी तो मैं जो करता था वो ये था कि रवि रतलामी जी की सलाह पर इन्‍स्‍टाल किये गए लाइव रायटर में ही सारे ब्‍लागों का एकाउंट खोल कर रखा है और  वहीं से ही सारे पौस्‍ट करता हूं । मेल चेक करने के लिये आउटलुक पर व्‍यवस्‍था जमा रखी है सो काफी आसानी से काम हो जाता था । उस पर चूंकी टाइपिंग करना भी आती है सो रेमिंगटन में चाणक्‍य में जो अभ्‍यास था वही यहां पर काम भी आ गया । मगर डर वही था कि विस्‍टा इन सब को सपोर्ट भी करेगा कि नहीं उस पर विस्‍टा का ट्रायल वर्सन । खैर जो भी हो सात दिन तो लग गए अपने सिस्‍टम को विस्‍टा के अनुरूप बनाने में जिस प्रकार बहू का स्‍वागत करने के लिये घर में एक कमरा और बनाया जाता है तो वही तैयारी कर रहा था । पहले तो पांच सौ जीबी की हार्ड डिस्‍क लगानी पड़ी फिर कोर 2 प्रोसेसर 2 जीबी रेम ये सब करने के बाद ही कहीं विस्‍टा महारानी का स्‍वागत हो पाया । अभी दो दिन ही हुए हैं इन्‍स्‍टाल किये हुए पर ऐसा लग रहा है कि ठीक है जो कुछ भी है वो सही चल रहा है । बस हां काम करने में कुछ दिक्‍कतें आ रहीं हैं क्‍योंकि वहां पर और यहां पर के माहौल में कुछ अंतर है । अचानक ही कभी कभी काम करते करते ही वेब साइट बंद हो जाती हैं । पर मुझे ज्ञात हुआ कि वो सिक्‍युरिटी के कारण है और उसके पीछे जो कारण है वो ये है कि सिक्‍यूरिटी को लेकर कोई समस्‍या होती है तो ऐसा हो जाता है । विस्‍टा के ग्राफिक्‍स तो मन को मोहने वाले हैं । काम करने का स्‍टाइल भी अच्‍छा है । तो आज तो बस यही कि माड़साब वापस आ रहे हैं शायाद कल से ही कक्षाएं फिर से प्रारंभ हो जाएंगीं । और फिर जो कुछ जैसा चल रहा था वैसा ही हम फिर से चलाने की कोशिश करेंगें ।

Saturday, 16 February, 2008

सखी फिर वसंत आया री सखी फिर वसंत आया

मैं फिर वापस आ रहा हूं कुछ दिनों की उलझन के बाद ऐसा अभी तो लग रहा है कि सुलझ गया हूं पर सोमवार को ही पता चलेगा कि सुलझा की नहीं । मेरे खयाल से जब से ब्‍लागिंग से जुड़ा हूं तब से इतनी लम्‍बी छुट्टी नहीं ली थी । आज तो केवल प्रयोग के तौर पर वसंत के दो फोटो जारी कर रहा हूं । देखिये और आनंद लीजिये ।

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Wednesday, 6 February, 2008

टूटा ये सिलसिला तो मुझे सोचना पड़ा, मिलकर जुदा हुए तो मुझे सोचना पड़ा, तय कर चुका था अब न पिऊंगा कभी मगर, जैसे ही दिन ढला तो मुझे सोचना पड़ा

पिछली कक्षा कुछ भारी हो गई थी और मुझे पता था कि कुछ ऊपर से निकल गई होगी मैंने वादा किया था कि फिर से दोहराऊंगा सो आज फिर से हम पिछली ही कक्षा के आस पास रहेंगें और वहीं पर बात करेंगें । एक बात ज़रूर कहना चाहता हूं वो ये कि आप लोग जब टिप्‍पणी देते हैं तो कृपया अपना मेल एड्रेस वहां पर ज़रूर दे दिया करें क्‍योंकि मैं टिप्‍पणियों को आउटलुक में पढ़ता हूं और वहां पर जो मेल मुझे बिना ईमेल पते के आते हैं मैं उनके जवाब नहीं दे पाता हूं ।

सालिम और मुजाहिफ़

इसके बारे में मैं पहली कक्षा में भी कह चुका हूं कि ये थोड़ा कठिन काम है पर ये जान लें कि ये ही खास काम है और हम इसकों अगर समझ लें तो बहर समझना बहुत आसान हो जाएगा हमारे लिये ।

सालिम शब्‍द का अर्थ होता है समग्र । अब वो जो समग्र है वो कहलाएगा सालिम   लेकिन ये कौन तय करेगा कि सालिम कौन है और बेसालिम मुजाहिफ़  कौन है । मैंने पिछली कक्षा में बताया था कि कुल मिलाकर सात मुफ़रद बहरें हैं और ये जान लें कि मुफ़रद का अर्थ होता है जिनके सालिम में एक ही प्रकार का रुक्‍न हो और ये भी तय है कि वो रुक्‍न क्‍या होगा ।

क्रमांक नाम प्रकार रुक्‍न वज्‍़न
1 रजज़ मुफ़रद मुस्‍तफएलुन 2212
2 हज़ज मुफ़रद मुफाईलुन 1222
3 रमल मुफरद फाएलातुन 2122
4 मुतका़रिब मुफरद फऊलुन 122
5 मुतदारिक मुफरद फाएलुन 212
6 कामिल मुफरद मुतफाएलुन 2212
7 वाफ़र मुफरद मुफाएलुन 1212

अब ये तो हुई सूची मुफरद बहरों की । इस सूची को अगर देखें तो ये तो तय ही हो जाता  है कि ऐसी ग़ज़ल जिसके मिसरे में सभी रुक्‍न मुफाईलुन हैं तो उसकी बहर होगी बहरे हज़ज और अगर सभी रुक्‍न होंगे फाएलातुन तो उसकी बहर का नाम होगा रमल । ये तो आपको पता चल ही गया होगा ऊपर की सूची से । ठीक है अब ये तो सालिम या समग्र का ही वज्‍़न है पर कभी कभी ऐसा होता है कि किसी बहर में तीन रुक्‍न तो फाएलातुन  हुए पर चौथा जो फाएलातुन था उसमें से एक दीर्घ या लघु कम हो गया और वो हो गया फाएलुन  । अब क्‍या है कि रुक्‍न तो वही है पर मात्रा की कमी हो गई है अर्थात समग्रता में दोष आ गया है और ये जो दोष है इसमें जो रुक्‍न नया आया है वो अपने मूल रुक्‍न की कोख से ही जन्‍म लेता है । जैसे फाएलातुन  की कोख से जन्‍मा  फाएलुन ।  बाहर से नहीं आएगा वो रुक्‍न ।

रमल का ही उदाहरण देखें

 1 मुसमन सालिम : कह रहा हूं, फैंकिये मत, हाथ का पत्‍, थर अभी जी

अब इसमें क्‍या है कि चारों ही रुक्‍न फाएलातुन हैं । तो ये हो गई सालिम बहर । समग्र बहर । मुसमन  तो इसलिये की चार रुक्‍न हैं  । सलिम इसलिये क्‍योंकि चारों मूल रुक्‍न ही हैं और रमल इसलिये क्‍योंकि चारों ही फाएलातुन  हैं और रमल का स्थिर रुक्‍न वही है ।

2  मुसमन महजूफ़

अगर ऊपर के शेर में से आखीर का जी  निकाल कर अगर कहा जाए कि

कह रहा हूं, फैंकिये मत, हाथ का पत्‍, थर अभी

तो क्‍या हुआ कि आखीर का रुक्‍न जो है वो अब फाएलातनु न रह कर हो गया है फाएलुन  जो कि फाएलातुन की एक दीर्घ मात्रा के कम हो जाने से बना है । तो अब चूंकि समग्रता ख़त्‍म हो गई है सो अब ये सालिम बहर ना रह कर रमल की मुजाहिफ़ बहर हो गई है और इसका नाम होगा  बहरे रमल मुसमन महजूफ़  ये जो नाम महजूफ जुड़ा है ये बताएगा कि रुक्‍न  फाएलुन हो गया है । रमल तो फाएलातुन के कारण है और मुसमन चार रुक्‍न के कारण ।

चलिये आज के लिये इतना ही अगली कक्षा में आगे की बात करेंगें ।

Sunday, 3 February, 2008

मान लूँ मैं ये करिश्मा प्यार का कैसे नहीं, वो सुनाई दे रहा सब जो कहा तुमने नहीं, अब्र लेकर घूमता है ढेर सा पानी मगर, फायदा कोई कहाँ गर प्‍यास पे बरसे नहीं

ग़ज़ल की कक्षाएं बहर पर आकर कुछ सुस्‍त हो गईं हैं और ये बात मुझे भी अच्‍छी नहीं लग रही है कि मैं इतना धीरे काम कर रहा हूं । परक्‍या करूं कुछ ग़मे दौरां कुछ ग़मे जानां ।  खैर जैसे भी चलना है अब हम चलते ही हैं हां ये बात भी है कि इन दिनों विद्यार्ज्ञियों की भी हाजिरी वैसेी नहीं लग रही है जैसी कि पहले लगा करती थी । एक बात जो अजीत वडनेरकर जी  ने बहुत अच्‍छी लिखी है वो यहां पर लिख रहा हूं

एक बात ज़रूर कहूंगा कि टिप्पणियों की परवाह ज़रूर करें। मुफ्त में न श्रम करें। आप सचमुच क्लास लगा रहे हैं और सीखने वालों की हाँ- हूँ तो आनी ही चाहिए। धमकाइये और हाँ -हूँ वसूल कीजिए । कोई मज़ाक समझ रखा है क्या।

तो बात ही है कि जब छात्र नहीं आते तो ऐसा लगता है कि फिजूल में ही मेहनत की जा रही है । एक बात ये भी है कि हम लोग धन्‍यवाद देने का चलन भूलते ही जा रहे हैं मैं ने अपने ब्‍लाग पर जो ट्रेकर लगाया है वो बता रहा है कि कुछ लोग निश्‍मित आ रहे हैं पर वे कोई बात किये बिना ही जा रहे हैं ।

खैर तो हम आज बात रकते हैं कि बहर क्‍या होती है और कितने प्राकर की होती है ।

बहर :-  एक किस्‍म के रुक्‍न की तकरार से या भिन्‍न भ्निन रुक्‍नों के मेल से जो वज्‍़न पैदा होता है उसे बहर कहा जाता है । बहरों की कुल संख्‍या उन्‍नीस है जिसमें से सात मुफरद बहरें हैं और 12 मुरक्‍कब बहरें हैं ।

मुफरद और मुरक्‍कब के अर्थ को जानने के पहले हम बात करते हैं सालिम और मुजाहिब  बहरों के बारे में । ये जो उन्‍नीस बहरों की बात मैंने की है इनकी फिर बहुत सारी उप बहरें हैं और जो उप बहरें हैं उनमें से दो प्राकर हैं एक तो सालिम बहर और दूसरी मुजाहिब बहर । इसको और ज्‍यादा खोलते हैं कि किस प्रकार से ये नाम सालिम और मुजाहिब जन्‍म लेते हैं । जैसे बहरे रमल  की बात की जाए तो उसका वज्‍़न है फाएलातुन अब फाएलातुन का मतलब है कि रमल में कायदे से तो फाएलातुन ही रुक्‍न होना चाहिये मगर होता है ये कि बहरे रमल में कुछ रुक्‍न और भी आ जाते हैं । फिर भी बहरे रमल की वो ग़ज़ल जिसमें क‍ि सारे रुक्‍न फाएलातुन हों उसको कहा जाएगा सालिम  बहर । जैसे अगर किसी बहर में हो फाएलातुन-फाएलातुन-फाएलातुन-फाएलातुन तो उस हालत में फाएलातुन का अर्थ तो हो गया रमल  फिर चार रुक्‍न हैं तो हो गया मुसमन  और चारों रुक्‍न हैं अपने मूल फाएलातुन  में तो ये हो गई सालिम  अर्थात बहर का नाम हो गया  बहरे रमल मुसमन सालिम । मगर ऐसा भी नहीं है कि बहरे रमल में फाएलातुन के अलावा और कुछ रुक्‍न आ ही नहीं सकता आ सकता है मगर उस हालत में वो सालिम बहर ना रह  कर हो जाएगी मुजाहिब बहर  अर्थात जिसके रुक्‍न में कुछ बदलाव आ रहा है और वो रुक्‍न अपने सालिम रुक्‍न में ही कुछ हेर फेर से बना होगा सालिम का अर्थ होता है समग्र  । थोड़ा समझनें में अभी भी परेशानी आ रही होगी पर फिर भी समझना तो होगा ही ताकि हम बहरों का गणित समझ पाऐं ।

रमल का एक और उदाहरण देखें नीरज गोस्‍वामी जी की एक सुंदर ग़ज़ल का

मान लूँ मैं ये करिश्मा  प्यार का कैसे नहीं

वो सुनाई  दे रहा सबजो कहा तुमने नहीं

फाएलातुन फाएलातुन फाएलातुन फाएलुन
फाएलातुन फाएलातुन फाएलातुन फाएलुन

अब  ये बहरे रमल मुसमन महजूफ  हैं । रमल तो समझ में आया कि फाएलातुन होगा मुसमन भी समझ में आया कि चार रुक्‍न होंगें पर ये महजूफ क्‍या बला है  दरअस्‍ल में  एक रुक्‍न बदल गया है और बदल ये गया है कि फाएलातनु  में से एक दीर्घ की कमी हो गई है और वो कम होकर फाएलुन  रह गया हे । मतलब अब बहर  समग्र (सालिम ) नहीं रह गई है  उसके एक रुक्‍न में दीर्घ की कमी होने से अब वो मुजाहिब रुक्‍न हो गया है तो अब बहर भी समग्र न रहकर हो गई है मुजाहिब । हालंकि अब वो है रमल ही पर समग्र नहीं है उसके मूल रुक्‍न में एक में कुछ कमी हो गई है । अब ये जो फाएलुन हो गया है इस मुजाहिब रुकन का नाम है महजूफ और इसके ही कारण  अब बहर के नाम से सालिम शब्‍द हट गया है और वहां पर लग गया है महजूफ  जो कि एक मुजाहिब रुक्‍न है और इसी कारण अब ये रमल की एक मुजाहिब बहर कहलाएगी । ध्‍यान दें कि रुक्‍न का ये फेर मूल रुक्‍न में ही होना है अर्थात बहरे रमल है तो उसके फाएलातनु में ही कमी होने से कोई नया रुक्‍न बनेगा जैसे फएलातुन, फाएलान, फालान, फाएलातु  ये सारे रमल के मुजाहिब रुक्‍न हैं । और जब भी रमल में फाएलातुन के साथ ये आऐंगें तो बहर को सालिम से मुजाहिब कर देंगें । सालिम बहर के नाम के साथ तो सालिम लगा होता है पर मुजाहिब बहरों के नाम के साथ मुजाहिब न लग कर उन रुक्‍नों के नाम लगते हैं जो कि परिवर्तित हो गए हैं । जैसे ऊपर के मामले में फाएलुन  का नाम है महजूफ  तो बहर के नाम में लग गया महजूफ ।

अभी मैं मुफरद और मुरक्‍क्‍ब बहरों की तो बात कर ही नहीं रहा हूं क्‍योंकि वो तो और भी उलझन की बात है पर अभी तो हम केवल सालिम और मुजाहिब का ही फर्क देख रहे हैं । बहरे रमल में स्थिर रुक्‍न है फाएलातुन  अर्थात बहरे रमल की समग्र (सालिम)  बहरें हो सकती हैं फाएलातुन-फाएलातुन ( मुरब्‍बा सालिम - दो रुक्‍न ), फाएलातुन-फाएलातुन-फाएलातुन- ( मुसद्दस सालिम - तीन रुक्‍न), फाएलातुन-फाएलातुन-फाएलातुन-फाएलातुन- ( मुसमन सालिम - चार रुक्‍न ) । परंतु मुजाहिब बहरें तो काफी हो सकती हैं ।

आज के पाठ को मैं अगले बार पुन: दोहराऊंगा क्‍योंकि थोड़ा सा कठिन है । हां एक बात पुन: कहूंगा कि टिप्‍पणी देते रहें । आपके होने का एहसास मुझे काम करते रहने की प्रेरणा देता है ।