Wednesday, 20 February, 2008

एक दुखांत कहानी पढ़कर बताइये कि आपको कैसी लगी । कहानी का शीर्षक है क्‍या होता है प्रेम ।

 

ग़ज़ल की कक्षाएं भी बस फिर से प्रारंभ होने ही वाली हैं । अभी ग़ज़ल के दो होनहार छात्र समीर लाल जी और अभिनव शुक्‍ला भारत की यात्रा पर आए हुए हैं और भारत यात्रा का आनंद ले रहे हैं । पिछले कुछ दिनों से व्‍यस्‍तता बनी हुई थी और कल से ही वापसी हुई है वापसी पर केवल समीर लाल जी ने ही स्‍वागत किया बाकी के विद्यार्थी कहां हैं कुछ पता नहीं हैं । राकेश जी ने फोन कर के अनुपस्थिति का कारण पूछा अच्‍छा लगा । एक परिवार है जो बढ़ता जा रहा है । चांद शुक्‍ला जी का भी कई बार फोन आ जाता हैं । अभी एक कहानी मेंरी इन्‍दौर से प्रकाशित होने वाली नई दुनिया ने साहित्‍य जगत में लगाई है जो कि एक दुखंत कहानी है । मेरें कुछ मित्र कहते हैं कि मैं कहीं कहीं ओ हेनरी से प्रभावित होकर लिखता हूं । हालंकि ऐसा है तो नही  पर फिर भी अगर हो जात हो तो मैं भी नहीं जानता । खैर आप पहले  तों वो कहानी पढ़ें जो कि यहां http://www.naidunia.com/articles_m.asp?article_no=21008021702&yy=2008&mm=2&dd=17&title=Œub+¢gt+ntu;t+ni?&author=vkfUs+mwceh पर है और अगले रविवार तक शायद यहां पर बनी रहेगी । उसके लिये आपको शायद फोंट डालना हो जो कि आप http://www.naidunia.com यहां से या यहां http://www.megaupload.com/?d=ERAHQPWI    
से ले सकते हैं । मेरी इच्‍छा है कि आप एक बार इस कहानी को पढ़कर जवाब अवश्‍य दें कि आपको कहानी कैसी लगी । ये कहानी मैंने कुछ अलग ही मूड में लिखी थी । एक दो रोज में जब सारे छात्र उपस्थिति दर्ज करा देंगें तो हम कक्षाएं फिर से प्रारंभ करेंगें तब तक बातचीत करके माहौल तो बना ही सकते हैं । 

4 टिप्पणियाँ:

kanchan said...

guru ji hamara computer gyan kuchh kam hai..is liye font download nahi kar pae..aur kahani se bhi vanchait rah gaye....!
class ka intazar hai..ho sake to kahani fwd kar dijiyega
dhanyavad

रिपुदमन पचौरी said...

नमस्ते !

मैं बस इधर उधर भटक रह था। शहर बदला है, नौकरी बदली है; घर छूटा है और कुछ दोस्त छूटे हैं। आज कुछ समय निकाल पाया; पिछले २ हफ़ते से सरवाईवल की लड़ाई चल रही थी। अब भी चल रही है पर छुट पुट गोला बारी मात्र। बस इस ही कारण हाजरी न दे सका; पर अच्छा है, कुछ मिस नहीं किया।

आप लग रहा है विस्टा से बहुत खुश हैं; आपको एक सुझाव दूँ ... ? कुछ दिन तक विस्टा को स्माईली फ़ेस से न देखें .. बस परखें सीरीयसली.... २-३ हफ़ते बाद भी अच्छा लगे तो ज़रूर बताईयेगा :)
( रिव्यू अच्छे नहीं हैं सर जी )
:)

फोटो अच्छे लगे.... वो अम्वा की डाली; वो मेन गेट... मुझे अपने घर की याद दिलाता है...

और बतलाईये, अब स्वास्थ कैसा है? शहर के हालात कैसे हैं?

आपकी कहाने पढ़ी। फ़ौन्ट हैं मेरे पास पर..कुछ पंक्तियों के बाद.. कुछ शब्द टूट जाते हैं... सो पता ही नहीं चल पा रहा कि क्या लिखा है... अन्दाज़े से आधी कहानी पढ़ी, पर फिर मज़ा किर्किरा होने लगा तो रुक गया। यूनी कोड में भी हो तो अपने ब्लौग पर अवश्य डालें।

शेष मंगल है।

आपने मेल आई डी मांगा था। आप गुरूजी हैं और आपने कुछ मांगा तो देना ही पड़ेगा। सो नीचे लिख रहा हूँ।

ripudaman.pachauri@gmail.com


समय मिले तो उत्तर भी इस ही पते पर लिख सकते हैं।

शेष दिवस के लिए मेरी शुभकामनाएं।
जय हिन्द
रिपुदमन पचौरी

RAVI KANT said...

कहानी मार्मिक है और कहीं न कहीं हम सबकी जिन्दगी में शामिल भी। गुरुजी मैं आपका नया छात्र हुँ वैसे हिन्द युग्म पर भी आपकी कक्षा अटेंड कर रहा हुँ। आकर्षण्वश यहाँ तक खींचता चला आया हुँ और कक्षा में प्रवेश की अनुमति चाहता हुँ।
आपका-
रविकांत पाण्डेय-laconicravi@gmail.com

अभिनव said...

:)