शनिवार, 25 अगस्त 2012

सुबीर संवाद सेवा ने आज अपनी स्‍थापना के पांच वर्ष पूरे कर लिये, ये पांच वर्ष मित्रता के, स्‍नेह के, प्रेम के, आत्‍मीयता के और एक बड़ा परिवार बन जाने के ।

5th Anniversary Ribbon6

पांच साल पहले जब इस सफ़र की शुरूआत की थी तब पता नहीं था कि 'लोग साथ आते गये और कारवां बनता गया' इस मिसरे को हकीकत में बदलते देखने का मौका आने वाले पांच साल में मिलने वाला है । बहुत डरते डरते की थी वो शुरूआत । इच्‍छा बस ये थी कि जो कुछ भी मैंने सीखा है उस्‍तादों से उसे आगे दूसरों को सिखा सकूं । तब बस एक ही बात मन में थी कि हिंदी में ग़ज़ल कह रहे वे रचनाकार जो उर्दू लिपि से अनजान हैं उनके लिये कुछ किया जाये । मैं नहीं जानता कि मैं उस योग्‍य था कि नहीं । हां बस ये था कि ध्‍वनि के माध्‍यम से मात्राएं पकड़ना आ गया था । ग़ज़ल में ध्‍वनि का जो खेल है उस पर ही सब कुछ निर्भर होता है । तो बस ये ही सोच की कारवां शुरू किया था कि कहीं कुछ किया जाये । तब ये भी नहीं पता था कि इस का फार्मेट क्‍या होगा, किस प्रकार से ये किया जायेगा । बस जिसे कहते हैं कि एक उलझन सुलझन भरी शुरूआत की थी ।

5 Year Anniversary Cake in red

25 अगस्‍त 2007 से 25 अगस्‍त 2012 तक आते आते ये सफर एक परिवार में बदल गया । एक ऐसा परिवार जो एक दूसरे के साथ जुड़ा हुआ है । कई लोग बीच में जुड़े और बाद में हाथ छोड़ कर चले गये । कई जो शुरू से जुड़े हैं और अभी तक सक्रिय हैं । दरअसल इस ब्‍लाग से वही सक्रिय रूप से लम्‍बे समय तक जुड़ा रह सकता है जिसने संयुक्‍त परिवार में रहना सीखा हो । संयुक्‍त परिवार ही सिखाता है कि बड़ों का मान, छोटों पर नेह क्‍या होता है । संयुक्‍त परिवार में ईगो के लिये कोई स्‍थान नहीं होता । ईगो एकल परिवार की देन है । तो जो लोग संयुक्‍त परिवारों को जानते थे उन्‍होंने यहां आकर भी उस परंपरा को आत्‍मसात कर लिया । ये ब्‍लाग एक संयुक्‍त परिवार बन गया । इसकी सफलता और इसको सिद्ध करने के लिये एक वाक्‍य 'ये ब्‍लाग तो तुम्‍हारा मायका है' जो आदरणीया इस्‍मत जैदी जी से उनके परिजन कहते हैं । ये वाक्‍य सुबूत है इस बात का कि अब ये एक ब्‍लाग न होकर एक संयुक्‍त परिवार है । छोटों को समझाइश देने का काम बड़े लोग बखूबी करते हैं और छोटे बिना इगो के उसे स्‍वीकार करते हैं ।

blog-20110510

पहले वर्ष 78 पोस्‍ट लगीं फिर 2008 में 75, 2009 में 73, 2010 में 71, 2011 में 63 और इस वर्ष अभी तक 50 पोस्‍ट यहां लग चुकी हैं । कुल मिलाकर ये आंकड़ा होता है 410 पोस्‍ट का । इन 410 पोस्‍ट पर आज तक 7245 टिप्‍पणियां आईं । और इन पांच वर्षों में 63676 विजिटर्स यहां आये जिन्‍होंने 1 लाख 6 हजार 9 सौ 78 बार पेज देखे । ये सच है कि पोस्‍ट लगने की संख्‍या में हर वर्ष कमी आई है लेकिन आने वालों और जुड़ने वालों की संख्‍या हर वर्ष बढ़ती गई । इस ब्‍लाग परिवार में आज की तारीख तक 311 सदस्‍य हैं । ये आंकड़े सचमुच एक सुखद एहसास प्रदान करते हैं । इस बात का कि जिस उद्देश्‍य को लेकर काम शुरू किया गया था वो दिशा काम ने पकड़ ली ।

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आज के दिन कहने को बहुत कुछ है लेकिन बस मन भावुक है सो ज्‍यादा कुछ नहीं । बस ये कह सकता हूं कि बहुत प्रेम बहुत स्‍नेह और बहुत आत्‍मीयता की जो सौग़ात आप सब ने अपने इस ब्‍लाग को दी है वो क़ायम रहे । हम इसी प्रकार मिल जुल कर मौसमों को त्‍यौहारों को मनाते रहें । जो स्‍वरूप इस ब्‍लाग को मिला है वो बना रहे । ये उत्‍सव का दिन है । एक प्रयास अपने पांच सोपान पूरे कर चुका है । एक सफर मील के पांचवे पत्‍थर पर आ गया है । जहां से आगे और बहुत सी दूरियां तय करनी हैं । कई और पड़ावों पर हमें जाना है । ईश्‍वर, भगवान, ख़ुदा, रब, गॉड वो जो भी है उसकी रहमत हम सब पर बनी रहे । हम सब यूं ही लिखते रहें, सिरजते रहें, गीत, ग़ज़ल, कविताएं और कहानियां । साहित्‍य के उस विशाल महासागर में अपनी बूंदों के मोती हम भी आहुति की तरह छोड़ते रहें । ईश्‍वर से प्रार्थना है कि ये संयुक्‍त परिवार यूं ही जुड़ा रहे, प्‍यार से भरा रहे और साथ चलता रहे, आमीन ।

fiveyears

सोमवार, 20 अगस्त 2012

ईद मुबारक, ईद मुबारक, ईद मुबारक, पवित्र रमज़ान माह बीत चुका है और समापन पर आया है ईद का त्‍यौहार आइये ईद के इस त्‍यौहार को आनंद से मनाएं ।

EID UL FITAR (13)

ईद मुबारक

ईद आज है, कल रात भर जम कर खरीददारी का दौर चला है । भोपाल का चौक बाज़ार कल रात भर जागता रहा । चौक बाज़ार जिसकी अपनी ही रौनक है, रोनक जो मालों में, काम्‍प्‍लैक्‍सों में नहीं मिलती । ईद हो गई है । सबको मुबारक हो ये त्‍यौहार । पूरे एक माह की इबादत के बाद ये त्‍यौहार चांद की झलक के साथ अता होता है । चांद की झलक देखते ही मानो पूरी कायनात झूम उठती है । सबको बधाई, मुबारक हो । खूब आनंद से मनाएं । खूब उल्‍लास से मनाएं । त्‍यौहार का अर्थ ही होता है कि सब कुछ भूल जाओ । खूब आनंद करो । कल से जीवन के उसी संघर्ष में फिर से जुटना है तो आज जो ईश्‍वर ने ये पल अता किये हैं इनका आनंद लो । जिंदगी से लड़ने की शक्ति प्राप्‍त करो । अपने आप को रिचार्ज कर लो । कोई बात आज नहीं सोचो । सब कल तक के लिये स्‍थगित कर दो । आज पर्व है आज त्‍यौहार है, आज ईद है । मुबारक मुबारक मुबारक ।

अब तो ये बाक़ायदा मुशायरा हो चुका है । कृतज्ञ हूं सबका कि जिन्‍होंने बहुत कम समय में अपने इस ब्‍लाग के लिये रचनाएं दीं । ये आपका ही ब्‍लाग है । ये सार्वजनिक मंच हैं । तो आइये आनंद उत्‍सव को आगे बढ़ाते हैं और ईद को उत्‍सवपूर्ण तरीके से मनाते हैं । बस एक सूचना के लिये बताना चाहता हूं कि इस प्रकार की एक पोस्‍ट को लगाने में ढाई से तीन घंटे का समय लगता है,  क्‍यों बताया ये आप सब जानते हैं ।

आज की पोस्‍ट छुट़टी के दिन आफिस आकर लिखी है और जल्‍दी में लिखी है क्‍योंकि अब मिलने मिलाने भी जाना है दोस्‍तों के घर । तो आज की पोस्‍ट में ग़लतियां न देखें । बस आनंद लें ।

EID UL FITAR (14)

अल्‍लाह मेरे मुल्‍क में अम्‍नो अमां रहे

ashwini ramesh ji

अश्विनी रमेश जी

EID UL FITAR (2)

अल्लाह मेरे मुल्क में अम्नो अमां रहे
आबाद मेरे मुल्क में सबका जहां रहे

त्यौहार ईद हो के दिवाली ये रात हो
सब ओर चाँद दीप उजाला यहाँ रहे

जब भी मिले कहीं दिल से ही मिलें सभी
इस तरह बाग बाग वतन की फजां रहे

दौरान मुशकिलों के हिम्मते खुदा रहे
खिलते हुये चमन के लिये बागवां रहे

रंजिशे रहे न कहीं कोइ रंजो गम नहीं रहे
खिलता हुआ चमन ये हमारा जवां रहे

इस बार आफताब नयी रोशनी करे
घरबार सब खुशी रखे खुदा मेहरबां रहे

आबाद हुस्न अम्न यहाँ का मंज़र रहे
आज़ाद मस्त मुल्क मिरा दिल जवां रहे !!

trimohan taral

डॉ० त्रिमोहन तरल जी

EID UL FITAR          

जब तक कि आसमाँ में तेरा आशियाँ रहे
अल्लाह! मेरे मुल्क़ में अम्नो-अमाँ रहे

जब ईद हो अमीर के घर में तो ए! ख़ुदा
छप्पर पे मुफलिसों के भी उठता धुआँ रहे

मंज़िल भले ही देर से आया करे, मगर
चलता हमारी ज़िन्दगी का कारवाँ रहे

फ़िरदौस जैसे मुल्क़ की ग़र हो तलाश फिर
सारे जहाँ में आज भी हिन्दोस्ताँ रहे

उड़ते हुए परिन्द की इतनी है इल्तिजा
दाना रहे, रहे, न रहे आसमाँ रहे

चाहत नहीं ज़मीन पर दीदार हो तेरा
तू है जहाँ वहीँ रहे बस मेहरबाँ रहे

देती रहे ख़ुतूत जो महबूब के 'तरल'
महफूज़ हर हिसाब से वो ख़तरसाँ रहे  

ismat zaidi didi 2

इस्‍मत ज़ैदी जी

EID UL FITAR (3)

हम पर अता ए मालिक ए कौन ओ मकाँ रहे
मौला तेरे करम का सदा साएबां रहे

भूका कोई किसान न रह पाए मुल्क में
और ख़ौफ़ ए ख़ुद्कुशी में न वो ख़ानदाँ रहे

बारिश किसी के वास्ते कैफ़ ओ सुरूर है
लेकिन किसी ग़रीब का ये इम्तेहाँ रहे

दह्शतगरी ओ ज़ुल्म ओ सितम का न हो गुज़र
"अल्लाह मेरे मुल्क में अम्न ओ अमाँ रहे"

बच्चे भी आस्माँ की बलंदी को पा सकें
और हौसलों की राह में इक कहकशाँ रहे

ये ख़ुदपरस्तियाँ तुझे तनहाइयाँ न दें
कोशिश ये कर कि साथ तेरे कारवाँ रहे

बहबूदिये वतन ही रहे ज़ह्न में ’शेफ़ा’
ऊँचा सदा ये परचम ए हिंदोस्ताँ रहे

कौन ओ मकाँ= दुनिया, साएबाँ= छाया देने के लिये बनाया गया टीन या फूस का छप्पर
कैफ़ ओ सुरूर= ख़ुशी का नशा, मौज-मस्ती, कहकशाँ= आकाशगंगा, ख़ुदपरस्ती= घमंड, अहंकार
बहबूदी= भलाई, परचम= झंडा

naveen chaturvedi

नवीन सी चतुर्वेदी जी

EID UL FITAR (5) 
माथे से जिसके सच का उजाला अयाँ रहे
दुनिया में उस की बातों का हरदम निशाँ रहे

अब के उठें जो हाथ लबों पे हो ये दुआ
'अल्लाह सारे ख़ल्क में अम्नो-अमाँ रहे'

कलियाँ चटख के फूल बनें, फूल ज़िन्दगी 
लबरेज़ ख़ुशबुओं से हरिक नौजवां रहे

दौलत की, शुहरतों की तलब  भी हो साथ-साथ 
हर आदमी ख़ुशी से रहे जब - जहाँ रहे

गर तय है इस चमन में रहेगी ख़जाँ तो फिर
बादे-बहार आख़िरी दम तक यहाँ रहे

Nirmla Kapila ji3

निर्मला कपिला जी

EID UL FITAR (1)

खुशियाँ मिलें सलामत मेरा जहाँ रहे
हर ओर हो मुहब्बत मीठी जुबां रहे

नफरत मिटे सभी दिलों मे प्यार ही देना
हर एक घर खिला खिला सा गुलिस्तां रहे
 

उसको खुदा रहें मुबारक  कोठियाँ जमीं
महफूज़ मेरे मालिका मेरा मकां रहे

हालात मेरे रब हैं रज़ा पे तेरी भले
अल्लाह मेरा इश्क हमेशा जवां रहे

इस  ज़िन्दगी मे मुश्किल जितनी मिले मुझे
सिर पर तिरी नयामत का आसमाँ रहे

Rakesh2

राकेश खंडेलवाल जी

EID UL FITAR (4)

अल्लाह मेरे मुल्क में अम्नो अमाँ रहे

उग पायें नहीं अब कहीं नफ़रत के बगीचे
हर कोई सुकूँमन्द रहे आँख को मींचे 
इन्सानियत की बेल पे खिलते रहें सुमन
हर गांव गली शह्र हो महका हुआ चमन
सरगम पे नाचता हुआ सरा जहाँ रहे

सत्ता की नींव कोई न मजहब पे रख सके
होली में और ईद में अन्तर न कर सके
चन्दा सितारे स्वस्ति से मिलकर चलें गले
लेकर बहार चार सू वादे सबा चले
संवाद सेवा वज़्म ये हरदम जवाँ रहे


Saurabh

सौरभ पाण्डेय  जी

EID UL FITAR (6)

रमजान  बाद ईद मनाता जहां रहे |
इज़्ज़त दुआ खुलूस का दिलकश समां रहे ||

कोई सहे न ज़ुल्म, न दहशत फ़ज़ां में हो
अल्लाह मेरे मुल्क में अम्नो अमां रहे  ||

क्या थे कभी अतीत है, अब हम गढ़ें नया
मन में जिजीविषा जियें, मेहनत बयां रहे  ||

जिसके लिये बहार लगे बेक़रार-सी 
मेरा हसीन मुल्क़ खिला गुलसितां रहे  ||

होली मने दिवालियाँ तो साथ ईद भी |
क्रिसमस-करोल गान हवा में रवां रहे  ||

जो शस्य श्यामला सदा उत्साह से भरा
उन्नत विशाल देश मेरा बाग़बां रहे  ||

तू कर्मभूमि, पूण्यमही, त्याग की धरा
भारत तेरा उछाह भरा आसमां रहे  ||

pp-4

शाहिद मिर्ज़ा शाहिद जी
EID UL FITAR (7)

ईद के लिये
खुशहाल हर बशर हो, सलामत जहां रहे
अल्लाह मेरे मुल्क में अम्नो अमां रहे
दिन-रात हो तरक्की सभी की दुकान में
महफूज़ हर बला से हर इक का मकां रहे

१५ अगस्त के लिए
कुरबानियों का कोई तो नामो-निशां रहे
ज़िन्दा हमारे ज़ेहनों में ये दास्तां रहे

शाखें रहें हरी-भरी बस इत्तेहाद की
हम एक रहें, एक ये हिन्दोस्तां रहे

गांधी भगत सुभाष, हमीद-ओ-कलाम का
कोई भी दौर आए, यही कारवां रहे

सूखें न भाईचारे के गंगो-जमन कभी
अल्लाह मेरे मुल्क में अम्नो-अमां रहे

आंचल की छांव देती रहे मादरे-वतन 
रहमत का साया बनके सदा आसमां रहे 

sulabh-jaiswal

सुलभ जायसवाल 

EID UL FITAR (10)

नफरत न दुश्‍मनी न कोई दूरियां रहे
आज़ाद हिंद एक वतन हमज़बां रहे
सजदे में देख चांद को दिल ने यही कहा
अल्‍लाह सारे विश्‍व में अम्‍नो अमां रहे

Tilak Raj Kapoor

तिलक राज कपूर जी 

EID UL FITAR (9)

जब लब खुलें तो गुल खिलें, शीरीं ज़बॉं रहे
बस जाय जो दिलों में वो लब पर बयॉं रहे।

बचपन के दोस्तो यार मेरे जो वहॉं रहे
करते हैं ट्वीट दिन वो भला अब कहॉं रहे।

इतनी सी इल्तिज़ा है जो तुझको कुबूल हो
मेरे वतन का तू ही सदा पासबॉं रहे।

इंसानियत से दूर भटकता हुआ दिखा
तेरी दिशा में काश खुदा कारवॉं रहे।

चूल्हाि किसी गरीब का ठंडा पड़े नहीं
हो पैरहन सभी के लिये सायबॉं रहे।

तूने इधर से छोड़ उधर घर बसा लिया
दिल से दुआ है खुश ही रहे तू जहॉं रहे।

ईदी अगर मिले तो मुझे बस ये चाहिये
अल्लागह मेरे मुल्क  में अम्नो  अमॉं रहे।

venus

वीनस केसरी

EID UL FITAR (10)

कोई न लूट पाए किसी भी गरीब को
हर शख्स में ख़ुलूस कि रानाइयाँ रहे

हिन्दोस्तां का नाम हो ऊँचा जहान में
मेरा वतन मिसाल -ए- मुहब्बत जमाँ रहे

हम खुद को भूल जाएँ अगर मुल्क दे सदा
हर कौम आबरू -ए- वतन पासबाँ रहे

रमजान माह -ए- पाक में वीनस कि है दुआ
अल्लाह मेरे मुल्क में अम्न -ओ- अमाँ रहे  

बहुत बहुत ईद मुबारक हो । आज आनंद लीजिये इन ग़ज़लों का और मुबारक बाद दीजिये अपनों को अपने को और हर किसी को । ईद का ये दिन सबके लिये खुशियां लाये । सबके जीवन में रस हो, सुख हो, शांति हो । और सबको वो सब कुछ मिले जो जीवन के लिये आवश्‍यक है । अल्‍लाह की करम, बुज़ुर्गों की दुआएं और अपनो की मुहब्‍बतें ।

और हां छोटे भाइयों का उन बड़ी बहनों से ईदी मिल सके जो किसी न किसी बहाने से पिछले कई सालों से दबा कर रखी गई है । छोटे भाइयों को उनका हक मिले ।

आनंद आनंद आनंद आइये चलें ईद पर मिलने मिलाने ।

EID UL FITAR (8)

शनिवार, 18 अगस्त 2012

ईद का त्‍यौहार क़रीब है और ऐसे में अल्‍लाह से एक ही दुआ 'अल्‍लाह सारे विश्‍व में अम्‍नो अमां रहे' ।

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ईद मुबारक

ईद, कितनी यादें बसी हैं ईद को लेकर । यादें, बचपन के उस छोटे से घर में घर के दोनों तरफ रहने वाले पड़ोसियों की यादें । घर के इस तरफ दीवार से सटा हुआ नफ़ीसा सिस्‍टर का घर और घर की उस तरफ की दीवार से लगा ज़हीर हसन साहब का घर । हमारा बचपन अपने आंगन से ज्‍़यादा उन दोनों आंगनों में बीता । अस्‍पताल के उस कैम्‍पस ने ही शायद मुझे असली धर्म निरपेक्षता सिखाई । जहां हम बच्‍चों के लिये हिन्‍दू मुसलमान या ईसाई कोई नहीं होता था । दो घर छोड़ कर रहने वाली क्रिश्चियन सिस्‍टरों के घर हम क्रिसमस की रात भर हंगामा करते थे । ज़हीर हसन साहब गणेश उत्‍सव की झांकियों में कमाल की कारीगरी दिखाते थे । ऐसी कि देखने वाला दांतों तले उंगली दबा ले । सचमुच की आग में बैठी होलिका हो या उबलते कढ़ाव में बैठे विक्रमादित्‍य, ये झांकियां उनके ही हुनर का कमाल होती थीं। उनकी बेटियां गणेश उत्‍सव की झांकियों में राधा और सीता बनती थीं । ईद पर हम सब बच्‍चे नये कपड़े पहनते थे । सबको ईदी मिलती थी । तब त्‍यौहार किसी एक धर्म के नहीं होते थे । आपको लग रहा होगा कि मैं कुछ ज्‍़यादा ही कह रहा हूं । लेकिन यदि आपने अस्‍सी के दशक का भारत देखा हो तो वो ऐसा ही था । ज़हीर हसन साहब और नफ़ीसा सिस्‍टर दोनों ही अब तो दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी यादें मेरे दिल में हैं । हमेशा रहेंगीं । शहर छोड़ देने के बरसों बाद तक भी हर ईद पर सेवईं से भरा कटोरा जो नफ़ीसा सिस्‍टर के यहां से आता था वो अब कहां । इन्‍सान भोज्‍य पदार्थ नहीं खाता है बल्कि प्रेम का स्‍वाद लेता है, वरना मिलने को बाज़ारों में ऐसा क्‍या है जो नहीं मिलता, बस प्रेम को छोड़कर ।

अल्‍लाह मेरे मुल्‍क में अम्‍नो अमां रहे

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अल्‍लाह सारे विश्‍व में अम्‍नो अमां रहे

आइये अब ईद को लेकर अपनी निशस्त शुरू करते हैं । पहले इसे एक ही दिन के लिये घोषित किया था किन्‍तु जिस प्रकार से कम समय में लोगों ने ग़ज़लें तैयार करके भेजीं उससे दिल गार्डन गार्डन हो गया (ये श्री रमेश हठीला का डॉयलाग है किसी फिल्‍म का गाना नहीं ) । और आज से ही हम निशस्त की शुरूआत कर रहे हैं ।  चूंकि कम समय में तैयार ग़ज़लें हैं  इसलिये भावनाओं को ही देखा जाये, यदि बहर आदि की कोई समस्‍या हो तो उसे त्‍यौहार की खुशी में भुला दिया जाये । आज यदि चांद दिख जाता है तो कल ईद होगी तथा यदि ऐसा नहीं होता है तो सोमवार को तो ईद तय है । तो चांद की खुशी में आज की निशस्त और ईद की खुशी में  अगली । ईद का चांद दिख जाना भी तो बड़ी खुशी है ।

एक बात पहले ही वो ये कि आज ब्‍लाग की साज सज्‍जा के चलते संचालक थक गये हैं तो आज दाद देने का काम श्रोताओं को ही करना है । तो शुरू करते हैं उस अल्‍लाह के नाम से ईद की ये निशस्त 'बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम'

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इस बार की ईद के साथ 15 अगस्‍त भी जुड़ा है । एक रोचक तथ्‍य ये है कि 15 अगस्‍त 1947 को भी रमज़ान ही चल रहे थे और 15 अगस्‍त 1947 को भी रमज़ान की 24 वीं तारीख़ थी तथा 15 अगस्‍त 2012 को भी रमज़ान की 24 वीं तारीख़ थी । तो इस बार स्‍वतंत्रता दिवस के साथ ईद की दोहरी खुशियां हैं जो ग़ज़लों में देखने को मिली हैं ।

स्‍वतंत्रता दिवस की मंगल कामनाएं

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आदरणीया देवी नागरानी जी

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रहमत तेरी हरेक पे रब बेकराँ रहे
अल्लाह मेरे मुल्क में अम्नो-अम्माँ रहे

महफ़ूज हर बला से मेरा आशियाँ रहे
फटके न पास दूर ही बर्के-तपाँ रहे

चाहे जबाँ पे लाख तेरी बन्दिशें लगें
खामोश लब यहाँ हों तो चर्चा वहाँ रहे

दिन में हो धूप छाँव तो तारों भरी हो रात
देवी यूं झिलमिलाता हुआ आसमाँ रहे

बहुत ही सुंदर ग़ज़ल कही है । बहुत सुंदर मतला है । हरेक शेर दुआओं से भरा हुआ है । बहुत खूब ।

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धर्मेन्द्र कुमार सिंह
EID (3)

धरती पे आग हो न गगन में धुआँ रहे
सबके दिलों में प्रेम का उजला मकाँ रहे
हम चार साल बाद ही मंगल पे जाएँ पर
अल्लाह मेरे मुल्क में अम्नो अमाँ रहे

बहुत सुंदर मुक्‍तक कहा है सच कहा चांद पर जाने से पहले यहां धरती को रहने लायक बनाना ज्‍यादा ज़ुरूरी है ।

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दिगंबार नासवा

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हम तुम रहें सदा ये ज़मीं आसमाँ रहे
महके बयार और महकती फिजाँ रहे

मैं कहकहों की खान लुटाता रहूँ सदा
गुज़रूँ जहाँ से रात सुहानी वहाँ रहे

फिर से चमक उठे न ये शमशीर खौफ़ की
महफूज़ हर बला से मेरा गुलसिताँ रहे

ज़ुल्मों सितम फरेब न महसूस हो कहीं
अल्लाह मेरे मुल्क में अमनों अमाँ रहे

इस ईद में मिटेंगे सभी बैर आपसी
इफ्तार में जो कृष्ण मुहम्मद यहाँ रहे

बहुत सुंदर ग़ज़ल । मतला से शुरू होकर हर शेर अपनी ज़बानी खुद ही कह रहा है । बहुत अच्‍छे शेर कहे हैं । खूब । बस एक छोटी सी बात की तरफ ध्‍यान खींचना चाहूंगा और वो ये कि असली शब्‍द 'फि़ज़ा' है 'फिज़ां' नहीं है । अर्थात चंद्रबिंदु नहीं है ।

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श्री गिरीश पंकज जी

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बाकी न दर्द का यहाँ कोई निशाँ रहे
ज़न्नत रहे कदमों के तले तू  जहाँ रहे

दुश्मन भी है तो क्या हुआ उससे गले मिलो
ये ईद है मोहब्बतों का ये मकां रहे

हर दिन हो ईद की तरह दिल से यही दुआ
महके ये कायनात खिला गुलसिताँ रहे

अपनी है आरजू यही करते हैं बस दुआ
'अल्लायह मेरे मुल्कु में अम्नोँ अमाँ रहे''

है चार दिन की ज़िंदगी ये सोच कर चलें
अच्छे-बड़े  नवाब भी ज्यादा कहाँ रहे

क्यों लड़ रहे हैं लोग रहे प्यार से जहाँ
हर मुल्क रहे और ये हिन्दोस्ताँ रहे 

है दूर नहीं तू मेरा दिल है तेरा मकां
हो तू  कहीं भी चाहे मगर तू यहाँ रहें

बहुत खूब क्‍या ग़ज़ल कही है । उस दो जहान के मालिक से जो मांगना है वो सब अपनी ग़जल़ में अभिव्‍यक्‍त कर दिया है । बहुत सुंदर ।

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श्री निर्मल सिद्धू

EID (6)

अल्लाह मेरे मुल्क़ में अमनो अमां रहे,
माहौल ख़ुशगवार हो महकी फ़िज़ां रहे,

मेरे चमन में फूल खिले नौ बहार के,
ख़ुशियों में झूमता ये मेरा आशियां रहे,

मिल साथ य़ूं चले कि जुदा हों न हम कभी
दुनिया में काम वो करें अपना निशां रहे,

तहज़ीब हो सुलूक हो कुछ भी हो चाहे पर,
दुनिया में नाम बस एक हिन्दोस्तां रहे,

बदले निज़ाम दूर हो सब ख़ामियां वहाँ,
ख़ुशबू से प्यार की महकता गुलिस्तां रहे,

ग़ुरबत हो ख़त्म और सियासत हो साफ़ गर,
समझो गली गली फिर जन्नत वहां रहे,

त्योहार यूं मनायें कि कोई फ़र्क न हो,
निर्मल हो कि नईम मुहब्बत जवां रहे,

अहा क्‍या शेर कहें हैं । सचमुच यदि इस प्रकार से ही अमल हो जाये तो हमारा ये देश क्‍या पूरा विश्‍व ही जन्‍नत हो जाये । बहुत खूब ।

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श्री विनोद पांडेय

EID (7)

जब तक ज़मीं रहे ये खुला आसमाँ रहे
उससे कहीं जियादा ये हिंदोस्ताँ रहे

खुश्बू-ए-मोहब्बत से गुलजार है चमन
है चाहते खुदा भी कि आकर यहाँ रहे

आपस में रहे प्यार तरक्की करें सभी
अल्लाह मेरे मुल्क में अम्नो अमाँ रहे

बहुत सुंदर बात कही है । प्रेम और भाईचारा ही तो वो है जो दिलों में रौशनी भरता है । सब एक रहें सब नेक रहें ।

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रजनी नैय्यर मल्होत्रा जी

EID (8)

अल्लाह मेरे मुल्का में अम्नो   अमाँ  रहे
रंगों भरी ज़मीं हो खुला आसमां रहे

हर दिन  हो ईद, रात दिवाली की हों सभी 
हिंदोस्तां पे रब वो यूं ही   मेहरबाँ   रहे

झुक कर करे सलाम ये सारा जहां इसे  
दुनिया में सबसे ऊंचा ये हिन्दोस्तां रहे

दुनिया को  दिया अम्‍न का पैग़ाम हमीं ने  
उस रौशनी में चलता सदा कारवां रहे

हिन्दू,   मुसलमां   सिक्ख,  इसाई हों बोध हों
हर रंग से सजा ये मेरा  गुलिस्ताँ   रहे

बहुत सुंदर कहा है । भावनाएं सुंदर हैं । और आज तो हम वैसे भी भावनाओं को ही देख रहे हैं । बहुत अच्‍छी भावनाएं हैं । सुंदर ।

तो देते रहिये दाद और आनंद लीजिये ग़ज़लों का । और इंतज़ार कीजिये चांद का ।

बुधवार, 8 अगस्त 2012

इस बार के मिसरे पर जिनकी रचना की आपको सबसे ज्‍यादा प्रतीक्षा थी आज आदरणीय श्री राकेश खंडेलवाल जी से सुनते हैं तीन रचनाएं ।

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प्रीत की अल्‍पनाएं सजी हैं प्रिये

और तरही के समापन का समय आ ही गया है । आज हम प्रेम तरही का समापन करने जा रहे हैं । एक अलग प्रकार की तरही का आनंद हम सब ने खूब उठाया । खूब रस बरसा इस बार तरही में । प्रेम में सचमुच इतनी शक्ति है कि वो दुनिया के हर कोने में शांति कायम कर सकता है । हमने स्‍वयं ही तो अपने जीवन के संचालन सूत्र नफरतों को दे दिये हैं । जिन मसलों को प्रेम चुटकियों में सुलझा सकता है उनके लिये हम बरसों बरस तक युद्ध लड़ते हैं और परिणाम शून्‍य ही रहता है । कभी कभी मैं किसी ऐसे द्वीप की कल्‍पना करता हूं जहां हर तरफ प्रेम हो, किसी के मन में किसी के प्रति द्वेष नहीं हो । कैसी सुंदर होगी न वो जिंदगी भी । किन्‍तु शायद अब उस जिंदगी की कल्‍पना ही की जा सकती है । हकीकत में वैसा होना संभव ही नहीं है । लेकिन हम अपने अपने दायरे में तो प्रेम की खेती कर ही सकते हैं ताकि हमारा अपना दायरा प्रेम के फूलों से महकता रहे । यही दायरा हो सकता है बढते बढते पूरी पृथ्‍वी पर फैल जाये ।

तरही का समापन हम करने जा रहे हैं उनकी रचनाओं के साथ जिनका इस बार की तरही में सबसे ज्‍यादा इंतजार हो रहा है । हालांकि वे बीच में एक हास्‍य ग़ज़ल सुनाने के लिये आये थे किन्‍तु उनसे तो हम सुंदर गीतों मुक्‍तकों की उम्‍मीद लगाये रहते हैं । तिस पर ये कि इस बार का मिसरा भी तो श्रंगार से रसाबोर है । तो आइये आज श्री राकेश खंडेलवाल जी की तीन तीन रचनाओं के साथ समापन करते हैं प्रेम की तरही का ।

आदरणीय श्री राकेश खंडेलवाल जी

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अत्यधिक व्यस्तता के कारण हुये विलम्ब के लिए क्षमा चाहते हुये
यह प्रयास भेज रहा हूँ. पता नहीं भावों का अवगुंठन आपकी कसौटी पर कैसा उतरेगा
पारिवारिक व्यस्तताएं तथा कार्य सम्बंधित कांफ्रेंसों में उलझा हुआ हूँ.

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नैन में स्वप्न अनगिन सजाये हुये
सांझ का दीप पथ में जलाये हुये
बाट जोहा करी आस की कोकिला
गीत लाये हवा, गुनगुनाये हुये

हों गज़ल की बहर में बंधे कुछ हुये
कुछ लिये सन्तुलन के नये काफ़िये
एक ही ध्येय हो, एक सन्देश हो
प्रीत की अल्पनायें सजी हैं प्रिये

पर उठे ही नहीं हैं हवा के कदम
दिन निरन्तर हुये हैं गरम पर गरम
पांव फ़ैलाये बस मौन पसरा रहा
प्यास मृग सी बढ़ाती रही है भरम

मेघ का दूत कोई निकल चल पड़े
और सन्देश पिघले, जलद से झड़े
कामना बस यही आँख में आंज कर
मन प्रतीक्षित हुये, जाल पर हैं खड़े

मेघ का दूत कोई निकल चल पड़े, अहा क्‍या बता है और सचमुच ही यहां सीहोर के आस पास के इलाकों में मेघ दूत आ गये हैं । नैन में स्‍वप्‍न अनगिन सजाये हुए के बाद सांझ का दीप जो पथ में जलाया गया है उसकी तो बात ही अजब बनी है । बहुत सुंदर छंद हैं चारों के चारों । चारों को अलग अलग करें तो चार सुंदर मुक्‍तक । लेकिन चूंकि एक ही भावभूमि पर हैं तो चारों एक दूसरे के साथ गूंथ कर एक समग्र रचना बना रहे हैं । बहुत सुंदर ।

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द्विपदी

क्या रदीफो बहर  क्या वज़न काफ़िये
ताक पर आज सब ही उठा रख दिए

रक्त पुष्पों ने मंडप सजाया नया
कदली स्तंभों  पे अंकित हुये सांतिये

सप्त नद नीर पूरित हुये हैं कलश
पूर्ण वातावरण है सुधायें पिए

चाँदनी ने भिगो गुलमुहर का बदन
पांखुरी पर लिखा जो उसे वांचिये

माल मन-पुष्प की यों प्रकाशित हुई
जगमगाने लगे अर्चना के दिये

होंठ ने प्रीत की स्याही से होंठ हैं
कितने हस्ताक्षरों से सजा रख दिये

गंध की बारिशें मौसमों से कहें
प्रीत की अल्पनायें सजी हैं प्रिये

द्विपदी यानि ग़ज़ल की मौसेरी बहन । होंठ वाला पद पढ़ कर पहले तो मैं भी उलझ गया कि ये दो बार होंठ क्‍यों आये फिर जब पुन: पढा तो मर्म तक पहुंचा । अहा । गंध की बारिशों का मौसम से कहना वाह क्‍या बात है । द्विपदी सचमुच ही प्रीत की द्विपदी बन गई है । हर पद में से अष्‍टगंध की महक आ रही है ।


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गीत

सुरपुरी की सुमन वाटिका से चली
चन्द पुरबाईयों को समेटे हुये
लालिमायें उषा के चिबुक से उठा
सांझ की ओढ़नी में लपेटे हुय्र
दूधिया रश्मियां केसरी रंग में
घोल कर चित्र में ला सजाते हुये
रक्तवर्णी गुलाबों से ले पांखुरी
शतदली बूटियों में लगाते हुये
उर्वशी के पगों से महावर लिए
प्रीत की अल्पनायें सजी हैं प्रिये

मन से मन की मिटाते हुये दूरियाँ
धड़कनें धड़कनों से मिलाने गले
भर के भुजपाश में मोगरे की महक
पगतली से चली हैं लिपटने गले
संकुचित शब्द सीमाओं को तोड़कर
दृष्टि से दृष्टि की जोड़ने साधना
ध्येय दो एक ही सूत्र में जोड़ने
पूर्ण करने अकल्पित सभी कामना
स्वप्न की हर गज़ल के बनी काफ़िये
प्रीत की अल्पनायें सजी हैं प्रिये

रातरानी रही मुस्कुरा बाँध कर
मोगरे की कली से चिकुर की लटें
बन रहीं जलतरंगों सी मादक धुनें
पाटलों पर गिरी ओस की आहटें
चाँदनी की कलम से लिखी चाँद ने
झील के पत्र पर नव प्रणय की कथा
शीश अपने झुका कर तॠ कह रहे
पल यही एक ठहरा रहे सर्वदा
सृष्टि सारी मुदित होंठ पर स्मित लिये
प्रीत की अल्पनायें सजी हैं प्रिये

बादलों से टपकती हुई यह सुधा
कह रही आओ पल मिल के हमतुम जियें
दृष्टि से दृष्टि के मध्य बहती हुई
प्रीत की यह सुरा आज छक कर पियें
मिल रहे हैं धरा औ’ गगन जिस जगह
आओ छू लें चलो हम वही देहरी
दे रही है निमंत्रण सुमन पथ बिछा
पर्क से सिक्त हो रात यह स्नेह की
नैन अपने झुका कह रहे हैं दिये
प्रीत की अल्पनायें सजी हैं प्रिये

आप क्‍या कहते हैं मैं कुछ लिख पाऊंगा इस गीत के लिये । क्‍या मेरे जैसे अदने से साहित्‍यकार की कोई हस्‍ती है जो वो इस गीत पर कुछ लिख सके । इस गीत पर कुछ भी लिखने के लिये चंदन की कलम और चांदनी का पृष्‍ठ चाहिये । तीसरा छंद तो जैसे कोई टोना सा मार कर स्‍तंभित कर रहा है । मिल रहे हैं धरा औ गगन में किस सुंदरता के साथ देहरी को छूने की बात कही है । और वैसा ही कुछ जादू है भुजपाश में भरी हुई मोगरे की महक का । अहा । और उर्वशी के पैरों से महावर लेकर प्रीत की अल्‍पनाएं सजाने की बात, अहा क्‍या कहूं । ये ही तो वो स्‍वर्ण युग है गीतों का जो बीत गया। लेकिन राकेश जी मानो उस स्‍वर्ण युग की ध्‍वनियों को बीत जाने से रोके हुए हैं । उसे अतीत नहीं होने दे रहे हैं । आनंदम परमानंदम । तरही का इससे अच्‍छा समापन और क्‍या हो सकता था ।

ईद पर एक तरही नशिश्‍त

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''अल्‍लाह मेरे मुल्‍क में अम्‍नो अमाँ रहे''

'अल्‍लाह 221'- 'मेरे मुल्‍क़ 2121' -'में अम्‍नो अ 1221'-' माँ रहे 212'

( दूसरे रुक्‍न में 'मेरे' का 'रे' गिरा कर लघु किया गया है और तीसरे रुक्‍न में 'में' को गिरा कर लघु किया गया है बाकी मात्राएं अपने यथारूप वज्‍़न पर हैं )

रदीफ होगा 'रहे' तथा क़ाफि़या 'आँ' ( आसमाँ, हिन्दोस्ताँ, गुलसिताँ, यहाँ, जहाँ, कहाँ )

एक या दो दिवसीय दिवसीय नशिश्‍त करने की इच्‍छा है,  उसके लिये हालांकि समय बहुत कम है फिर भी इच्‍छा है कि कम से कम एक एक मुक्‍तक यदि सब दे सकें तो हम एक दिवसीय नशिश्‍त 'ईद'  के पर्व पर करें। यदि पूरी ग़ज़ल दे पायें तो बहुत अच्‍छा है, सोने पर सुहागा । किन्‍तु यदि समयाभाव के कारण उतना नहीं कर पाएं तो कम से एक मुक्‍तक (मतला और शेर) जु़रूर भेजें । मतला और मकते का काम्बिनेशन दे पाएं तो और अच्‍छा ।  ईद के लिये जो मिसरा बनाया गया है वो बहरे मुजारे मुसमन अख़रब मक़फ़ूफ महज़ूफ़ जिसका वज्‍़न है  221-2121-1221-212 ( मफऊल फाएलात मफाईल फाएलुन)  कोई गीत याद आया ? नहीं आया तो चलिये मैं याद दिला देता हूं फिल्‍म हम दोनों में रफी साहब का सदाबहार गीत 'मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया, हर फिक्र को धुंए में उड़ाता चला गया'

ईद का मिसरा एक दुआ है उस दोनों जहान के मालिक से दुआ, तो ईद पर इस दुआ के स्‍वर में अपना स्‍वर अवश्‍य मिलाएं । जल्‍द से जल्‍द क़लम उठाएं और लिख भेजें अपनी रचना । ईद की नशिश्‍त आपकी रचनाओं के लिये मुन्‍तजि़र है । लिखते समय इस बात का ख़ास ध्‍यान रखें कि किसी मिसरे का वज्‍़न बहरे मुजारे मुसमन अख़रब मक़फ़ूफ महज़ूफ़ 221-2121-1221-212 से भटक कर जुड़वां बहर बहरे हज़ज मुसमन अख़रब मक़फ़ूफ महज़ूफ़ के वज्‍़न 221-1221-1221-122 पर नहीं चला जाये । मतलब ये कि 'मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया' के वज्‍़न पर ही रहे कहीं 'तू हिन्‍दू बनेगा न मुसलमान बनेगा' के वज्‍़न पर न हो जाये । आप इन दोनों गीतों को गाकर देखेंगे तो लगेगा कि अरे दोनों तो एक ही वज्‍न में हैं फिर अंतर क्‍या है । अंत दूसरे और चौथे रुक्‍न में है । और समझ में इसलिये नहीं आ रहा है कि मात्राओं का योग भी समान है दूसरे और चौ‍थे रुक्‍न में, केवल उनकी जगह बदली हुई है, वो भी केवल पहली दो मात्राओं की । ठीक है । ईद के एक दिन पहले तक अपनी रचना अवश्‍य भेज दें ।