शनिवार, 3 मार्च 2012

3 मार्च उफ़्फ़ यह तो शनिवार आ गया कल की अन्तिम तिथि निश्चित है, ये तरही भेजने से पहले एक बहाने रूपी कविता है श्री राकेश खंडेलवाल जी की ।

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होली आ गई है और बहानेबाज हैं कि धे तेरी  की धे तेरी की कर रहे हैं बहानों की । सुबू से लेकर शाम तलक एक बात ही पेले जा रय हैं कि मियां अपन से नी होने की ये तुमारी तरही फरही । चों मियां तुमको कौन से हकीम ने बोला था कि तुम गज्‍जल फज्‍जल लिखने लगो । और खां लिखने लगे तो लिखने लगे ये कौन ने के दिया था कि अपने आप को शाइर भी मान लो । देखो मियां अब जो तुमने के दी है तो अब तो अपने अंदर से शेर हेड़ हेड़ के एक पूरी गजल हेड़नी ही पड़ेगी । जब तक होली का त्‍यौंहार चल रिया है तब तक पूरी तरे से गजल हेड़ते रहो । हेड़ हेड़ के, हेड़ हेड़ के ढेर लगा दो शेरों के । चचा गालिब और बाबा मीर भी तो ये इ करते रेते थे । बस एक घूंट मारा और एक शेर हेड़ा । होली पे तो वैसे भी घूंट मारने की परमीशन होती है । तो मैं नू के रिया हूं कि भोत बहाने टसने कर लिये आप सब ने अब हेड़ो जल्‍दी से गजल, नी तो मैं झंई पे अनसन करना शिरू कर दूंगा । और आप सबको भी टोपी लगानी पड़ेगी मेरी कि ''मैं भी गन्‍ना हूं '' । तो जिस वास्‍ते ही के रिया हूं कि जिन्‍ने भी नइ भेजी है अपनी ग़जल तुरंत हेड़ कर चुपचाप भेज दें । और हां कल सुबू से जो चचा फुक्‍कन को कल्‍लू पान वाले ने पान खिलाया था उसमें चूना कम लगा था । जिस वास्‍ते चचा फुक्‍कन कल्‍लू पान वाले के पीछे जूती लिये घूम रहे हैं । भोपाली को पान खिलाओ तो चूना कभी कम मती लगाओ । और होली की गज़ल कहो तो मजा कभी भी कम मती करो ।

Rakesh 

भगवान आपको नेकी दे कल सुबू सुबू मैं उठा तो देख क्‍या रिया हूं कि राकेश जी की एक मेल मेरे दड़बे में पडी हेगी । मैंने उसको खोला तो देख क्‍या रिया हूं कि बहाने ही बहाने । मैंने जो देखा कि सबको ही लपेट दिया है उसमें । बहाने भी बना रहे हों और उसमें लपेट लपेट के मार भी रये हो । जे तो गलत बात हेगी । मेरे को इत्‍ता गुस्‍सा, इत्‍ता गुस्‍सा की क्‍या बताऊं । मिझे नूं लगा कि  गुस्‍से में कंइ मेरी टोपी में आग नइ लग जाये । तो मिझे तो लगा कि आपको भी राकेश जी की कविता सुना दूं । चोंकि जो राकेश जी के रय हेंगे वो तो और भी लोग केना चा रय है । तो मैं तो सुबू से चा पी के आया और बैठ गया धपाक से । सब लोग सुन लो कि जे कोई तरही की सुरूआत नई हो रयी है । जे तो बस बहानेबाजी हो रयी है । जे तो बस नू मानो की आप सब के मन की ह्वे रइ है ।


श्री राकेश खंडेलवाल जी का ख़त

wwwforangelsonlyorg-bollywood-holi-8

3  मार्च उफ़्फ़
यह तो शनिवार आ गया
कल की अन्तिम तिथि निश्चित है
त्रही पर लिख भेजा जाये
और पृष्ठ ये सारे कोरे पड़े हुये हैं
सुईयां बतलाती हैं आधी
बीत चुकी है रात आज की
अगर नहीं कुछ लिख पाया तो
नाहक बहुत फ़जीते होंगें
नीरज ठेंगा दिखलायेंगे
तिलकराज जी ताली देंगे
पंकज जी हँस कर कह देंगे
तरही हँसी ठिठोली वाली
नाकों तले चने चबवाये
भला आपकी क्या गिनती है
जब समीर भी लिख ना पाये
अंकित अपने कान खुजाये
दूरभाष पर गौतम,
कंचन को तरही का अर्थ बताये
और अर्शजी.........
तरही में क्यों कर के उलझें
उलझाने को और बहुत है

इसीलिये सोचा थोड़ी सी
चहलकदमियां घर के बाहर
करूँ चाँदनी भरी रात में
जरा गुनगुना मूड बना लूँ
और तुरत तरही लिख डालूँ
बाहर जाकर पांच मिनट तक
पूरा लान नाप कर आये
शब्द अचानक लब पर आये
पूनम की सीढ़ी पर चश्ढ़ता
अपने आकारों में बढ़ता
चन्दा जरा लजा जाता है
होली का मौसम है तब ही
मन पर रंग चढ़ा जाता है
पता नहीं था जाने कैसे
ये जो शब्द संवर कर आये
वे थे पंचम सुर के गाये
जो  कितनी खिड़की खुलवाये
जिनसे उछले कई स्वरों को
हम पूरा तो समझ ना पाये
लेकिन जितना पल्ले आया
उसका केवल अर्थ यही था
आधी रात गली में आकर
कौन गधा ये चिल्लाता है

समझ नहीं जो यह पाता है
सांझ ढले पर मुँह पर ताले
रखते रहे गिरस्थी वाले
पेश सफ़ाई हमने कर दी
वज़ह तरही की आगे रख दी
फिर जो हाल हुआ मत पूछो
हम जितना भी कोशिश कर लें
बिल्कुल समझ नहीं आयेगा
केवल इतना आये कहने
खबरदार पंकजजी
आगे
सोच समझ कर विषय बतायें
वरना हमसे तो अब कुछ भी
कविता में ना ढल पायेगा
अगली बार पड़ौसी सारे
तरही में आयेंगे आगे
जूता कोई ले आयेगा
कोई संग चप्पल लायेगा

ज्‍यादा के रये हैं कम समझना पर ऐसा भी क्‍या कि जो रपाटा मारा तो सब को ही लपेट डाला । होली हो रई कि होला हो रिया है । पर उनका क्‍या जाना है 'तेल जले सरकार का मिर्जा खेलें फाग'' । तो खबरदार कर के जा रये हैं कि जिन की भी ग़जल नइ मिली है उनको कल की चेतावनी है । कल संडे के दिन भर ग़जल लिखें और मंडे की सुबू सुबू एन भिनसारे हमारे डब्‍बे में पटक जाएं ।

अंत में होली का एक गीत, इस गीत को मैं, श्री हठीला जी, स्‍वर्गीय मोहन राय जी, श्री हरिओम शर्मा जी मिलकर कोरस में होली के दिन गाते थे । अब तो खैर हमारा कोरस ही अधूरा हो गया । किन्‍तु क्‍या आपने इसे मित्रों के साथ कोरस में गाया है कि नहीं नहीं गाया हो तो इस बार होली के दिन इसको कोरस में दोस्‍तों के साथ जरूर गाएं । आनंद आ जाता है । जब अंतरों में कोरस ऊपर चढ़ता है तो ऐसा लगता है कि होली की रंग रज बरस रही है । सुनिये और लिखिये ग़ज़ल ।

37 टिप्‍पणियां:

  1. अपुन ने तो रो धो के किसी तरह गज़ल हेड़ कर भेज दी है...

    राकेश जी कविता न लिख पायें? कौन मानेगा?

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    1. अमां ख़ां रज्‍जू तुम इत्‍ता से कमेंट करने अमरीका से भोपाल तक आये । अरे मियां जब आये थे तो थोड़ा लमबा ही कर जाते । कौन सा नवाबी टैक्‍स लगने वाला था उस पे । गजल तो तुमने हेड़ी और खूब हेड़ी मगर हेड़ हेड़ के जो हीटी वो भी ग़ज़ब की ही हीटी । ऊपर वाला आपको नेकी दे झूठ नइ बोल रिये हैं मगर हां आपसे घटिया लिखने वाला कोई हे इ नइ ।

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  2. waah waah maja aa gaya holi ka mahol banat jaa raha he...........holi hai :)

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  3. सभी सभ्‍य सम्‍माननीय संभ्रात सुशिक्षित सुकवियों से निवेदन है कि 'तरही' लिखनी है, होली की पिन्‍नक में 'तेरहीं' न लिख दें ह़ज़ल की (वो अपुन का पेटेन्‍ट है, और लगभग तैयार है, जिसे मापने, जॉंचने, का अधिकार तो सबको होगा लेकिन ग़ज़ल-शास्‍त्र के पैमाने पर नहीं; कदापि नहीं)।
    ओउम शान्ति, हज़ल देवताय नम:, शन्ति:, शान्ति:, शान्ति:।

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    1. सुनो खां तिल्‍लू भाई हमें तो कोई काम धाम नइ है, हम तो दिन भर पटिये पर बैठ के पान खाते हैं और शेर केते हैं । पर तुम तो अफसर हो तुम हम बेगैरतों के चक्‍कर में मत पड़ो । पर पड़ोगे क्‍यों नइ तुम तो खुद ही । बाकी तो खुदा ही मालिक है ।

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    2. ऐ लो जी, आपको कौन मरदूद ने बता दिया कि अफ़सर काम करते हैं। अफ़सर काम ही करते होते तो लोग ब्रिटिश को काहे को याद करते।
      आपकी भोपाली पढ़कर लग रहा है कि क्‍या खाक इक्‍कीस साल गुजारे भोपाल में, हफ़ता-दस दिन भी पटियेबाज़ी कर ली होती तो थोड़ा बहुत भोपाली भाषा में जवाब हम भी दे लेते।

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    3. अरे खां क्‍यों मजाक कर रिये हो, सारे भोपाल को पता है कि अफसर कित्‍ता काम करते हैं । और जिस पर भोपाल के अफसर, खुदा बचाये । मगर सुनो हमारी बात ये आपस की बात है इसको सबके सामने नइ करते । खाक डालो सब पे ।

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  4. चों रे टुच्‍चों अब टिप्‍पणी देने में भी शरमा रय हो ।

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  5. हमारे प्रभु राकेश जी एक तो तरही में कोई रचना नहीं भेजेंगे और दूसरे इस पर अगर हम ठेंगा दिखलायेंगे तो आपत्ति भी दर्ज करवाएंगे...याने चित भी मेरी पट भी खड़ा रुपया सुबीर जी का...वाह भाई वाह...हम नहीं मानने वाले...आप हुक्म करें गुरुदेव हम अभी हनुमान बन अमेरिका जाता हूँ और भ्राता से तरही लेकर आता हूँ..." क्या मजाक बना राखी है...शराफत से मांग रहे हैं वो भी पिछले कई दिनों से के भाई देदो देदो...लेकिन ये इसी पे अकाद रहे हैं...हमारी शराफत देखि है भ्राता श्री हमारी गुंडई नहीं देखी...चुप्पेचाप भेज दो वर्ना अभी दुबई फोन घुमाते हैं और तरही नहीं तो आपको उठवा लेते हैं...

    नीरज
    गुरुदेव भोपाली भाषा पर आपका गज़ब का अधिकार हमारे लिए इर्षा का विषय है...

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    1. अब मियां नीरज भाई, भोपाली की तो नूं सुनो हमसे कि हम तो रये हैं भोपाल में चार साल तक । सुबू से उठ के जो जाते थे बड़े तलाब पे तो बस । अब तो उमर हो रइ है नईं तो किसी की मजाल थी जो हमसे पंगा लेता । तो नूं मानो की बस अब तो भोपाल की बस याद ही रै गई है ।

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  6. आपने कही क्यूँ टुच्चों अब टिपण्णी देने में भी शरमा रहे हो तो लगा आप सीधे हमें ही धमका रहे हैं...इसलिए तुरंत भेज दी...

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  7. आपका ब्लॉग लगता है मेंटल है हमारी टुच्ची टिप्पणी को स्पैम में भेज दिया...इसकी तो...

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    1. को खां भोपाली से पंगा ले रये हो, इसकी तो के आगे क्‍या लगता है ये भोपाल का बच्‍चा बच्‍चा जानता है । हम भोपालियों का पेटैंट है दुनिया की इन सब पे । खुदा सुबू सुबू झूठ न बुलवाये ज़बान तो हमारे भी मूं में है पर नवाबी खून है ।

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  8. मुझे लगता है कि इस प्रकार आपकी टिप्‍पणियॉं सपैम में जाती रहीं तो आपको अगले वर्ष का सपैम्‍मान मिलेगा।

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    1. सइ कै रय हो खां । मिझे भी लग तो एसा ही रया है कि इनको स्‍पैम का सम्‍मान मिलेगा ही मिलेगा । चोंकि इनकी वजे से दिन में चार बार तो हमें अपना स्‍पैम का दड़बा देखना पड़ता हेगा कि कहीं गोस्‍वामी जी आके तो नइ पड़े हैं । तो खां ये तो बात सइ है ।

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  9. सही खै रिये हो ओखां मियां...अक्सर हम ही पड़े मिलते हैं आपके स्पैम में...ये चक्कर किया है?

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  10. भइया पटके, हमहूँ पटके.. . निकहा धायँ दे पटके, आपके बकसवे में.. . तीन दिन ले न हुआ ?
    बाकिर, आहियाहि !! कम्माऽऽल जे इचिकी छऊँकियों (छौंक) ले कतहीं (कहीं) सुङाँया (सुँघाया) हो कतहीं (कहीं) ? पंकज भइया ले गुड़िया मार के रहि गये. ..!!
    बुला ऊ हास्य ना ए भइया, बलुक निकहा हास्यास्पद पटका गया बकसवा में !! ..हा हा हा.. साँच कहियेगा, बतिया ईहे है न, पंकज भाई ??? हा हा हा हा.. :-))))))

    से साँची कहें हम, उप्पर लिखलका गीतवा राकेसे भइया के मन का गुबार नहीं है. भाईजी, ई त सगरे दील (दिल) का हुबाब है..
    राकेस भाई के कनवा (कान) के खींचाई निकहे भायी है.. बाकिर, कनवे खींच-खाँच के काहे ना होखे, का कुछऊ अइसहूँ लिखाता है ????? :-)))))

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  11. पैंट उतारू पोस्ट है

    हा हा हा ....

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  12. अबकि हम भी कुछ लिख कर कल की डाक से फ़ौरन रवाना करते हैं , फ़िर आपही झेलना ..........

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  13. लोकल सेटिंग लगाना हो तो बताने में शरमाना मत...पड़ोस के ही है...चमकायें क्या?

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  14. देखो भाई, होली है। अब होली में किसे कितना होश होगा पता नहीं।
    अच्‍छी रचना बन जाये तो अपने नाम से भेज दो नहीं तो दूसरे के नाम से। पंकज भाई तो पहले से ही होली से टुन्‍न हैं, अपुन लोगों की साजिश भी काम कर गयी है; टाईम ही नहीं बचा है उनके पास य‍ह देखने का कि रचना किसने भेजी है और किसके नाम की है। अब तो कट-पेस्‍ट भी ठीक-ठाक कर लें इतने टाईम में तो होलिका मैया का आशीर्वाद मानना।
    अपन तो यही किये हैं, आपकी आप जानो। अपना काम तो सलाह देना है, मानो तो मानो न मानो तो न मानो।

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  15. होली का आनंद अपने चरम पर पहुँचने को आतुर है
    सुबीर जी आप का भोपाली अंदाज़ बहुत मस्त-मस्त है

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  16. सुबीर जी भूल न जाना
    ebook वाली पोस्ट ज़रूर लगाना

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  17. मेरा तो कमेंट ही गुम हो गया....

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    1. लो जी अब आप भी स्पैम वाले दबड़े में जा बैठे ... खम्बा कुछ ज्यादा चढा लिए का ...

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    2. चलिए यह जानना रोचक लगा कि "खम्बा" सगरे फैमस है.
      हम तो समझ रहे थे कि खाली बिहारे-यु.पी. में. सही तो है आखिर देश एक है भावनाएं भी एक ही रहे

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  18. अब इतनी धाँसू कविता और लच्छेदार कमेन्ट आ रिये हैं तो हमारी क्या बिसात है ...
    मे तो बस मजे ले रिया ऊं ... हा हा ...

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  19. भई एक बात बताओ ... जब शुरुआत ही कीचड़ से खेलने की है तो होली खतम कहाँ होने जा रही है ... नाली, गोबर, पेंट या कहीं और ...

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  20. जब गीत-सम्राट और ग़ज़ल गुरु इत्ता घटिया रच सकते हैं तो हमारे भी घटिया लेखन का स्तर थोड़ा और गिर ही जाएगा। हम ने भी बैटरी की कालिख से कागज रंगकर भेज दिया है।

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  21. हमहू रेल के परिचय, ग़ज़ल सब पेल दिया है और ऐसा पेला है के बड़े बड़े पेलू पंडित मैदान छोड़ के भाग जैहें

    का समझेव ?
    समझ गयेव ना .. हां

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  22. शनिचर और इतवार को हम किसी छोरे के चक्कर में दिल्ली बदरपुर एक कर रहे थे. के टिपियाये और के कहें. कपड़ा सपड़ा भी धोना सुखाना था.
    जो होना था वो तो हो गया.
    नारा ढीला था उतर गया.

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  23. बाकी जो ग़ज़ल का "ग" और हज़ल का "ह" 29 को रवाना किये थे आपके बक्सा में. तेरहवी मनाने के लिए.
    लेकिन ससूरा "ज़" भागल है शर्मा रहा था.

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  24. मेरी टिपण्णी सहित 6 टिप्पणियाँ स्पैम में जा चुकी हैं !हम तो बस अब दुसरों को पढकर ही मज़ा ले रहे हैं !

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