गुरुवार, 18 दिसंबर 2008

बहुत दिनों से रुका हुआ था ये तरही मशायरा । ऐसा लग रहा है जैसे कि इसी के कारण बाकी का सब भी रुका है तो चलिये आज आयोजित करते हैं इसे ।

काफी पहले से हम एक तरही मुशायरे पर स्‍थगित से बैठे हैं । और दरअस्‍ल में कुछ कारण नहीं भी हो तो भी बस कभी कभी ऐसा ही कुछ होता है ना कि कुछ नहीं हो फिर भी कुछ नहीं होता । गौतम की उत्‍सुकता वाजिब है और होनी भी चाहिये क्‍योंकि ये तो वही बात होती है कि बच्‍चा हो तो गया है लेकिन पिता को उसका चेहरा नहीं देखने को मिल रहा है । बच्‍चे से याद आया हमारी कक्षा के होनहार छात्र अभिनव शुक्‍ला अब बच्‍चे नहीं रहे हैं । क्‍यों, क्‍योंकि वे अब पिता बन गये हैं । पिछले माह उनके यहां पर एक बेटे का आगमन हो गया है । पूरी ग़ज़ल की कक्षा की ओर से उनको बधाई, हम यही कामना करते है कि ये बच्‍चा अपने पिता से भी बड़ा कवि हो और अपने पिता की ही तरह से हिंदी की सेवा करे । बच्‍चे का नाम जैसा कि अभिनव ने बताया कि अथर्व रखा गया है । बहुत अच्‍छा नाम है इसी से पता लगता है कि किस प्रकार वे आज भी अपने देश की संस्‍कृति और सभ्‍यता से जुड़े हैं । पुन: बधाई और आज का ये तरही मुशायरा इसी खुशी में ।

चूंकि बात नये मेहमान की हो रही है इसलिये हम आज के मुशायरे का प्रारंभ भी एक नये मेहमान के साथ ही करेंगें । ये पहली बार हमारी कक्षा में आये हैं । और कक्षा में आने वाले दूसरे सेना के अधिकारी हैं । गौतम पहले से हैं और ये भी सेना में केप्‍टन हैं ।  कैप्‍टन संजय चतुर्वेदी जी भी सोच रहे होंगें कि कहां के तरही मुशायरे में फंसा जहां पर दो महा से अधिक हो गये हैं लेकिन अभी भी कुछ नहीं हो पा रहा है । खैर चलिये आज का प्रारंभ करते हैं कैप्‍टन के साथ

कैप्टन सँजय चतुर्वेदी पहली बार कक्षा में हाजिर हूँ इस आशा के साथ के देरी के बावज़ूद आप मुझे कक्षा में बैठने देँगे .शेष विस्तार से बातें करूंगा.प्रणाम .
छूती  रोज  बुलन्दी  जनता
फिर औन्धे मूँ गिरती जनता

गर्मी का मौसम है फिर भी
ताप रही  है बस्ती जनता

ना  मँडप ना  ही  बाराती
मल कर बैठी हल्दी जनता

खुश्बू  होने  की चाहत  में
रोज हवा में  घुलती जनता

अन्धी  नगरी  चौपट  राजा
चन्द टकों में बिकती जनता

कौन   बन्सरी  बजा रहा है
चूहों  जैसी  चल दी जनता

इक  दूजे  का  रस्ता  रोकें
चौडी  राहें   सँकरी  जनता

धन्वन्तरि  को  ढूँढ  रही  है
बहरी  गूँगी   अन्धी  जनता

खुद ही  बनती  खेल तमाशा
खुद पर ही फिर हँसती जनता

माड़साब : भई वाह इसको कहते हैं कि पहली ही पारी में शतक मार देना । बहुत अच्‍छा । संजय जी आपकी कहन में बात है आप गौतम से नेट पर हिंदी की ट्रेनिंग लें और नियमित रूप से जुड़ें । तालियां संजय जी के लिये । और अब संजय जी के बाद आ रहे हैं नये नये पिता बनने का सुख उठा रहे अभिनव । अभिनव ग़ज़ल की कक्षाओं के सबसे पुराने छात्र हैं । और तभी से नियमित कभी अनियमित रूप से आते रहे हैं । आज दूसरे नंबर  पर वे ही आ रहे हैं ।

अभिनव शुक्‍ला -

abhinav_shukla

लगती ठहरी ठहरी जनता
सागर जैसी गहरी जनता
जून, बर्फ का पानी, बच्चे
तपती एक दोपहरी जनता
गांधीजी के बन्दर जैसी
अंधी गूंगी बहरी जनता
ईंटा लेकर तवा मांजती
रामधुनी सी महरी जनता
दुनिया का खूं पीते साहब
साहब की मसहरी जनता
मज़हब, दौलत, भूख, गरीबी,
तेरी जनता मेरी जनता

माड़साब : अभिनव लगता है अथर्व का आगमन आपके लेखन में भी नया रंग भर गया है । भई खूब बहुत खूब । सारे शेर बात कर रहे हैं । ईंटा लेकर तवा मांजती रामधुनी सी महरी जनता में तो कमाल का काम किया है । हां एक बात यहां पर मैं स्‍पष्‍ट कर देना चाहता हूं कि उर्दू में एक काफिया का दोष होता है जिसमें काफिया से मात्रा को हटाने के बाद उसका स्‍वरूप देखा जाता है । उसे हिंदी में अमान्‍य किया जाता है । अत: वो दोष जो यहां पर भी काफी सारे शेरों में उर्दू के हिसाब से होरहा है उसे हम अभी नजरअंदाज कर रहे हैं हां मगर उस पर मुशायरे के सम अप में बात करेंगें । और अब आ रही हैं कंचन ।

कंचन -

kanchan singh1

बैसाखी पर दौड़ी जाती,
अंधी, गूँगी, बहरी जनता।
खिलते लब पर भारी छाती,
मुस्कानो में सिहरी जनता।
मरने वाले मेरे ना थे,
शुकर मनाए, ठहरी जनता।
आज खड़े भाषण देते हो,
कल तुम भी थे हम सी जनता।
तुम पहले कपड़े तो बदलो,
बाहर बिखरे बिखरी जनता।
लेकिन देखो यू ना होवे,
तुम्हे बदल दे, बिफरी जनता।

माड़साब : भई वाह कंचन आपने एक शेर तुम पहले कपड़े तो बदला बाहर बिखरे बिखरी जनता में जो बारीक सा इशारा देश के पूर्व गृहमंत्री पर किया है वो लाजवाब है । यही तो कवि या शायर की विशेषता होती है कि वो कभी भी कुछ सीधे नहीं कहता वो तो कविता की भाषा में ही बात करता है । आपने अच्‍छे प्रयोग किये हैं । बधाई । चलिये आज के लिये इतना है आज हमने तीन शायरों को लिया है कल हम कुछ और को लेंगें ।

10 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खुशी हुई आपके ब्लॉग पे हलचल देख कर। अब जब tarahi mushayara शुरू हो गया है to raunak भी बढ़ जाएगी।

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  2. वाह ...आज अचानक तहरी मुशायरा देख कर मन खुश हो गया....! अभिनव जी को बधाई अथर्वागमन की ...! और बधाई कैप्टन साहब के साथ साथ फिर से अभिनव जी को उनकी बेहतरीन गज़ल के लिये..! दोनो ही बेजोड़।

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  3. वाह ...आज अचानक तहरी मुशायरा देख कर मन खुश हो गया....! अभिनव जी को बधाई अथर्वागमन की ...! और बधाई कैप्टन साहब के साथ साथ फिर से अभिनव जी को उनकी बेहतरीन गज़ल के लिये..! दोनो ही बेजोड़।

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  4. अभिनव जी को दोहरी बधाई. कैप्टन साहब ने कमाल का लिखा है. अभिनव जी एवं कंचन जी की लेखनी भी दमदार है. तरही मुशायरे का इंतजार तो था ही.

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  5. गुरु जी प्रणाम
    आज तरही मुशायरा देख कर लगा जैसे कुछ खोया हुआ को फ़िर से पा लिया हो
    मै ख़ुद भी कई दिन से नदारद था क्लास से, इतेफाक की बात है आज ऑन लाइन हुआ और तरही मुशायरा पढने को मिला
    सबसे पहले अभिनव जी को हार्दिक बधाई फ़िर कैप्टन सँजय चतुर्वेदी जी का सहपाठी होने के नाते हार्दिक स्वागत

    अन्धी नगरी चौपट राजा
    सँजय चतुर्वेदी जी की इस लाइन ने तो मुझे चौका दिया

    आपका वीनस केसरी

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  6. इम्तहां हो गयी थी इंतजार की....

    संजय की गज़ल तो पहले ही सुन चुका था और उसे तो रोज थोक के हिसाब से दाद देता हूं

    अभिनव जी को करोड़ो बधाईयां

    और कंचन जी के शेरों ने कमप्यूटर के की-बोर्ड को छोड़ कर तालियां बजाने पे विवश कर दिया

    गुरू जी को चरण-स्पर्श

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  7. ऐसे मशायरे का मेरा तो यह पहला ही अनुभव है । अच लगा । केप्‍टन चतुर्वेदी की पंक्तियां -
    खुश्‍बू होने की चाहत में
    रोज हवा में घुलती जनता

    और अभिनव शुक्‍ला की पेक्तियां -
    दुनिया का खूं पीते साहब
    साहब की मसहरी जनता

    और अन्‍त में कंचन की पंक्तियां -
    लेकिन देखो यूं न होवे
    तुम्‍हें बदल दे बिफरी जनता

    अच्‍छी लगीं ।

    सम्‍भव हो तो अभिनवजी का अता-पता, सम्‍पर्क सूत्र दें । तनिक स्‍‍वार्थ की बातें करने की इच्‍छा है ।

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  8. वाह जी..अच्छा लगा कि शुरु हो गया तरही मुशायरा ..मास्साब आ गये.

    अभिनव को पुनः बधाई.

    सभी गज़लें एक से एक उम्दा!!मजा आ गया. अपना नम्बर आने का इन्तजार करते लाईन में खड़ा हूँ. :)

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  9. नमस्कार गुरु जी,
    देरी के लिए क्षमा, आजकल बहुत व्यस्त चल रहा हूँ, पोस्ट देखि तो रहा नही गया.
    इस तरही मुशायेरा का इंतज़ार तो काफी दिनों दे था मगर सोचा की आप भी व्यस्त रहे होंगे तभी नही हो प् रहा होगा.

    पहले अभिनव जी को बधाई......
    कैप्टेन संजय जी ने बहुत अच्छी ग़ज़ल लिखी है एक बात और गुरु जी, ये शतक पहले भी कही मरते रहे होंगे आज तो बस मैदान बदला है.
    अभिनव जी ने लाजवाब शेर लिखे हैं एक से बड़कर एक.
    कंचन जी ने सच को बेहद खूबसूरती से अपने जादू भरे लफ्जों में पिरो दिया है.
    वाह-वाह

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