शनिवार, 20 दिसंबर 2008

अंकित और वीनस की ही तरह से दो और प्रतिभावान युवा हैं और इन दोनों ने ही बहुत प्रभावित किया है गौतम और रविकांत ।

तरही मुशायरे के दो दौर हो चुके हैं और अजा तीसरे दौर में हम दो और युवाओं को लेने जा रहे हैं । ये दोनों हैं मेजर गौतम राजरिशी और रविकांत । दोनों ही ग़ज़ल को लेकर बहुत गंभीरता से काम  कर रहे हैं और अच्‍छे शेर कह रहे हैं । इन दिनों सीहोर में होने वाले कवि सम्‍मेलन की तैयारियों में भी व्‍यस्‍त हूं । आगामी 27 दिसंबर को होने वाले कवि सम्‍मेलन में श्री वेदव्रत वाजपेयी, श्री कुंवर जावेद, श्री रमेश शर्मा, श्री सांड नरसिंहपुरी, श्रीमती अनु शर्मा सपन, श्री अलबेला खत्री, श्री जलाल मयकश, श्री मदन मोहन चौधरी समर और श्री संदीप शर्मा पधार रहे हैं । आप सब भी आमंत्रित हैं आइये और कवि सम्‍मेलन का आनंद लीजिये । चलिये आज दो और युवा कवियों की बात करते हैं जो कि बहुत अच्‍छा काम कर रहे हैं । गौतम राजरिशी को एक बार फिर बधाई कि उनकी एक ग़ज़ल कादम्बिनी में प्रकाशित हुई है । आज तरही मुशायरे का तीसरा दिन है । और आज के दो कवियों के बाद अब हमारे पास तीन और कवि शेष हैं जिनमें एक कवियित्री भी हैं । साथ ही एक वरिष्‍ठ तमतमातम भी शेष हैं । तमतमातम इसलिये कि वे हैं ही ऐसे । उनके लिये केवल वरिष्‍ठ तम लिखने से काम चलने ही नहीं वाला है ।

माड़साब : आज के तरही मुशायरे के प्रारंभ में आ हरे हैं मेजर गौतम राजरिशी । मेजर सेना में हैं देहरादून में पदस्‍थ हैं । और सेना के रूखे माहौल में रह कर भी ग़ज़ल की खेती कर रहे हैं । बल्कि ये कहा जाये कि शानदार तरीके से कर रहे हैं । इनकी जिस बात ने मुझे प्रभावित किया वो ये है कि इन्‍होंने बहर के बारे में मेरे द्वारा बताई गई प्रारंभिक जानकारी के आधार पर कई फिल्‍मी गानों की बहर निकाल के मुझे भेजी हैं । जैसा मैंने पहले बतायो कि कादम्‍िबिनी में इनकी एक ग़ज़लनुमा ग़ज़ल प्रकाशित हुई है । एक बात जो मुझे अच्‍छी लगी है कि सारे ही शायरों ने तीखे तेवरों के साथ ग़ज़लें लिखीं हैं और जो आज के दौर की सबसे बड़ी ज़रूरत है

मेजर गौतम राजरिशी :

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सब कुछ चुप रह सहती जनता
आखिर कब बोलेगी जनता
करतूतें गद्‍दी की देखे
अंधी बहरी गूंगी जनता

सिंहासन हिल उठ्‍ठेगा जब
लावा बन फूटेगी जनता
खादी पहनें,आ चल लूटें
अपनी भोली-भाली जनता

बंदूकों संग ईदी खाये
बम से खेले होली जनता
मंहगाई जब पीसे आटा
कैसे बेले रोटी जनता
परवत ऊँचे सेंसक्सों पर
चिथडे़ में है लिपटी जनता
नारों से क्या हासिल होगा
अपना हाकिम अपनी जनता
रिश्ते-नाते सारी भूली
गाँवों से आ शहरी जनता
स्यासत की शतरंजों पर है
फर्जी,प्यादा,किश्ती जनता

माड़साब : तालियां तालियां तालियां । भई गौतम ने बहुत खूब काम किया है । विशेषकर सिंहासन हिल उट्ठेगा जब लावा बन फूटेगी जनता तो अद्भुत है । गौतम ये शेर आप जानते ही नहीं है कि सरस्‍वती ने आपसे क्‍या लिखवा दिया है । ये तो उस तरह का शेर है जो नारा बन जायेगा । आप जानते हैं कि आज जो नारे मजदूर संघ लगाते हैं उनमें से अधिकांश सुकवि स्‍व शैलेन्‍द्र ने लिखे थे । आपका ये शेर भी वैसा ही है । आपने एक शेर में जो कमाल कर दिया है वो कायम रहने वाला है । और अब आ रहे हैं कुछ शर्मीले से रविकांत  शर्मीले इसलिये की इनका चित्र वैसा ही है । तालियों से स्‍वागत करें रविकांत का जो कहते हैं अपने बारे में कि एक मुसाफ़िर जो खुद अपनी तलाश में है। व्यवसाय- शोध-छात्र, आई आई टी कानपुर
संपर्क- laconicravi@gmail.com । इन्‍होंने पिछले चार सप्‍ताह से अपने ब्‍लाग पर कोई पोस्‍ट नहीं लगाई है इसलिये माड़साब इनसे नाराज हैं ।

रविकांत : इसबार लिखने में काफ़ी मशक्क्त करनी पड़ी। जो हो पाया वो सामने रखता हूँ-

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मुश्किल में बेचारी जनता
सौ-सौ आँसू रोती जनता
जो आए इज्जत से खेले
कैसी किस्मतवाली जनता
दिल्ली दुल्हन सी सजती है
तरसे पाई पाई जनता
उनकी साजिश का ये आलम
आपस में लड़ मरती जनता
सौदा होता बिक जाती है
अंधी बहरी गूंगी जनता
झूठे वादों से क्या होगा
रोटी खोजे भूखी जनता
शोले बरसें सब जल जाए
रो-रो आहें भरती जनता
सहने की भी हद होती है
कब तक चुप बैठेगी जनता
क्यों नेताओं के हाथों की
केवल है कठपुतली जनता
तकदीरों के ठेकेदारों
अब भी चेतो कहती जनता
जुड़ता है कुछ इतिहासों में
अपने पर जब आती जनता
जिसका जूता उसका ही सर
बढ़िया खेल मदारी जनता

काँटे पर आटा रखते वो
मछली सी फंस जाती जनता

दो रूप्ये में किस्मत अपनी
तोतों से पढ़वाती जनता

माड़साब : वाह वाह वाह । क्‍या शेर निकाले हैं रविकांत ने विशेषकर जुड़ता है कुछ इतिहासों में अपने पर जब आती जनता में बहुत अच्‍छे तेवर हैं । आनंद आ गया इस शेर में । एक बात में प्रारंभ से ही कह रहा हूं कि शायर सीधे कुछ न कह कर जब गोपन रख कर कहता है तो अधिक आनंद आता है । जैसे रवि न किया जुड़ता है कुछ इतिहासों में । अब इसमें जो कुछ शब्‍द आया है वो ही आनंद दे रहा है । क्‍योंकि शायर ने केवल कुछ लिखा है । वाह भई वाह । हां एक बात और इस बार के तरही मुशायरे का हासिले मुशायरा शेर का चयन माड़साब नहीं कर रहे हैं बल्कि इस बार श्री नीरज गोस्‍वामी जी को ये जवाब दारी दी जा रही है कि वे ही हासिले मुशायरा शेर का चयन करें और अपनी विशेष टिप्‍पणी भी दें के क्‍यों चुना उन्‍होंने इस शेर को हासिले मुशायरा शेर । तो मिलते हैं अगले दौर में दो कवियों और एक कवियित्री के साथ । तब तक जै राम जी की ।

7 टिप्‍पणियां:

  1. गुरुदेव
    मेरे हर्ष का पारावार नहीं रहता जब ऐसे युवा शायरों की रचना पढता हूँ...मेरी मान्यता है की एक अच्छी रचना वो ही लिख सकता है जो ख़ुद एक अच्छा इंसान हो...(अपवाद छोड़ देते हैं)...किसी भी देश के लिए अगर उसके युवा अच्छे इंसान बने से बढ़ कर और कोई खुशी की बात नहीं हो सकती. अब देखिये उन चार युवाओं को जिनकी ग़ज़लें आप ने प्रकाशित की हैं...क्या लिखा है...शब्द और सोच दोनों अद्भुत....मेरी बहुत बहुत बधाई आपको की आप इन युवाओं को जो प्रोत्साहन मिलना चाहिए दे रहे हैं...किसी दूसरे की प्रशंशा करना बहुत मुश्किल काम होता है और अगर वो उम्र में आप से छोटा हो तो और भी मुश्किल...लेकिन मुझे ये काम कर के जो संतोष मिल रहा है उसे बयां नहीं कर सकता....
    आप से शिकायत है....मुझे आपने जो जिम्मेदारी सौंपी है वो मेरे लिए बहुत ही मुश्किल है...हासिल ग़ज़ल शेर के चयन का कठिन काम आपने मुझे दिया है जिसके मैं कतई लायक नहीं....ये तो अंधे से रंगों की पहचान कर चुनने जैसा काम है...मेरी कर बद्ध प्रार्थना है की मुझे इस दुविधा से उबारें...अगर आप नहीं उबारेंगे तो मुझे इश्वर की शरण में जाना पड़ेगा जो गजराज के पाँव को मगर के जबड़े से छुडा देते हैं...
    नीरज

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  2. गौतम जी देश और साहित्य की सेवा जिस ऊर्जा से कर रहे हैं वह मुक्तकंठ से प्रसंशनीय है। बिल्कुल जीवंत गजल लिखी है गौतम जी ने। तालियाँ और वाह! वाह! मन से सहज ही निकलता है।

    मेरी वजह से गुरूजी को कष्ट/नराजगी हुई, यह बात कचोटती तो है पर क्या करूँ मैं सफर के ऐसे मोड़ से गुजर रहा था/हूँ जहाँ लिए गए फैसले जीवन की दिशा एवं दिशा को निर्धारित करते हैं। जल्दी ही नियमित होने के वादे के साथ गुरूदेव का स्नेहाकांक्षी-
    रविकांत

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  3. गुरु जी प्रणाम
    आपको मेरी गजल के तेवर अच्छे लगे इसके लिए हार्दिक शुक्रिया
    इच्छुक हूँ यह जानने को की मुझसे तरही गजल में बहर की गलती कहाँ कहाँ पर हुई है

    मेजर गौतम रजनीश जी के इन शेरों में गज़ब का सामंजस्य देखने को मिला

    करतूतें गद्‍दी की देखे
    अंधी बहरी गूंगी जनता

    मंहगाई जब पीसे आटा
    कैसे बेले रोटी जनता

    रविकांत जी ने भी बढ़िया शेर निकले है खास कर

    जिसका जूता उसका ही सर
    बढ़िया खेल मदारी जनता

    शेर पढ़ कर वाह वाह हो गई

    नीरज जी की टिप्पडी में उन्होंने जो लिखा है की

    ...मेरी मान्यता है की एक अच्छी रचना वो ही लिख सकता है जो ख़ुद एक अच्छा इंसान हो...(अपवाद छोड़ देते हैं)...

    इसमे जो आखिरी वाक्य है उसको पढ़ कर अनायास ही नज़रों के सामने कुछ बड़े शायरों के चित्र हवा में तैरने लगे
    नीरज जी आपने जिस अंदाज़ में अपवाद को नज़रंदाज़ किया है
    (अपवाद छोड़ देते हैं) सुभानाल्लाह
    बात तो बहुत ही रहस्यमय है मगर समझदार के लिए इशारा ही काफी होता है,
    ध्यान रहे यहाँ पर मै ख़ुद को समझ दार घोषित कर की कोशिश नही कर रहा हूँ :)

    वरन यह कहना चाहता हूँ की

    सफाई दिल में वो रक्खो की लोगों को नजर आए
    न सूरत की जरूरत हो जो सीरत याद रह जाए

    आपका वीनस केसरी

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  4. नमस्कार गुरु जी,
    पहले सीहोर में होने वाले कवि-समेलन के लिए शुभकामनयें.
    गौतम जी को उनकी कादम्बिनी में प्रकाशित रचना के लिए शत-शत बधाई.
    गौतम जी का "सिंन्हासन हिल उत्थ्ठेगा..........." का कोई तोड़ नही है वाह-वाह, बाकी तो गुरु जी कह ही दिया है मैं कुछ कहूँगा तो कम होगा.
    रविकांत जी क बारे में मैंने जो पिछली पोस्ट में कहा था वो सच होके सबके सामने है, इतनी बेहतरीन ग़ज़ल लिखी है, हर शेर अपने हिस्से की कहानी बयां करता है मगर आखिरी शेर "दो रुँपये में...." तो इतनी मासूमियत से लिखा हुआ शेर है की जो पड़े कायल हो जाए.

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  5. नीरज जी की बातें "जो गजराज के पाँव को मगर के जबड़े से छुडा देते हैं..."

    रवि जी आई-आई-टी के छात्र हैं ये जानकारी जो मिली है अभी तो उनके प्रती सम्मान का भाव और-और उभर जाता है..."दिल्ली दुल्हन सी सजती है
    तरसे पाई पाई जनता" , "जुड़ता है कुछ इतिहासों में अपने पर जब आती जनता" , "उनकी साजिश का ये आलम आपस में लड़ मरती जनता"...इन आग उगलते शेरों का रचियता एक शोध-छात्र है और मैं नतमस्तक हो जात हूं...

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  6. राजरिशी जी और रविकांत जी दोनो ही हमेशा से अच्छा लिखते हैं, इनके विषय में क्या कहूँ भला...!

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