शुक्रवार, 13 नवंबर 2020

आज रूप चतुर्दशी है, आज का दिन सौंदर्य का दिन होता है आइए आज छोटी दीपावली का यह त्यौहार हम मनाते हैं अपने चार रचनाकारों के साथ। राकेश खण्डेलवाल जी, लावण्या शाह जी , वासुदेव अग्रवाल 'नमन' और गुरप्रीत सिंह की रचनाओं के साथ ।




दीपावली का यह त्यौहार आशाओं और उम्मीदों को साथ लेकर आता है। हम हर बार सोचते हैं कि इस बार दीपावली के त्यौहार पर क्या नया होने जा रहा है। और यह त्यौहार भी हमको निराश नहीं करता है। हर बार कुछ नवल होता है। इसका नाम दीपोत्सव इसीलिए तो रखा गया है क्योंकि यह दीपों का उत्सव है। दीप जो घर की और मन की दोनों देहरियों पर जगमग होते हैं। इस ब्लॉग पर दीपावली का त्यौहार मनाते हुए दस-बारह वर्ष हो गए हैं। हर बार वही आनंद वही उल्लास होता है। इस बार कोरोना काल में भी रचनाकारों ने जिस उत्साह के साथ अपनी रचनाएँ भेजी हैं उससे मन आनंदित है।


 दीवाली पर जगमग जगमग जब सारे घर होते हैं 

आज रूप चतुर्दशी है, आज का दिन सौंदर्य का दिन होता है आइए आज छोटी दीपावली का यह त्यौहार हम मनाते हैं अपने चार रचनाकारों के साथ। राकेश खण्डेलवाल जी, लावण्या शाह जी, वासुदेव अग्रवाल 'नमन' और गुरप्रीत सिंह की रचनाओं के साथ । 

 

राकेश खण्डेलवाल जी


सूरज की किरणें भी लगता असफल होकर रह जाती
संध्या दोपहरी से पढ़ने लगती रजनी की पाती
निशा, दिवस के उगते उगते अपनी चूनर को लहरा कर
विशद गगन के नीलेपन को आ कर धूमिल कर जाती
तब मन के विश्ववास जागकर इक दीपक में जलते हैं
फैले तम तब किसी  गुफा के अंदर जाकर सोते हैं
दीवाली पर जगमग जगमग तब सारे घर होते हैं

 
संस्कृति के अनुराग कातते हैं जब सांसों के धागे
मन की गहराई में आशा की नूतन किरणें जागे
हारा थका हुआ यायावर सजा रखे पाथेय नया
मंज़िल खुद आकर राहों से अपने लिए दिशा माँगे
सोई हुई आस्थाओं के पल फिर दीपित होते हैं
संशय के घिर रहे क़ुहासे सब छू मंतर होते हैं
दीवाली पर जगमग जगमग जब सारे घर होते हैं
 
दिन समेटने लगते हैं फैली किरनी की चादरिया
संध्या रख देती उतार कर सुरमे वाली काँवरिया
आगत के पृष्ठो पर अंकित करती हुई सही अपनी
निखराती हैं ज्योति जड़ी इक हीरकनी की झालरिया
घिरे अकेलापन के बादल चली हवा में बहते गफैं
उत्साहों के सहज प्रवाहित उस पल निर्झर होते हैं
दीवाली पर जगमग जगमग अब सारे घर होते हैं

वाह वाह वाह,  क्या सुंदर गीत है, यह गीत और कल का गीत मिलकर एक नई दुनिया की सृष्टि कर रहे हैं। आज के इस गीत में प्रकृति का पूरा चित्रण किया गया है। सूरज की किरणें संध्या, दोपहरी, निशा, दिवस ऐसा लगता है जैसे पूरा का पूरा कैनवास रंग गया है प्रकृति के रंगों से। ऐसे ही तो नहीं कहा जाता है राकेश जी को गीतों का राजकुमार। मंजिल ख़ुद आकर राहों से अपने लिए दिशा माँगे, वाह क्या कल्पना है और क्या सोच है। संध्या रख देती है उतार कर सुरमे वाली काँवरिया… क्या ग़ज़ब का बिंब है बहुत सुंदर। राकेश जी के गीत हमारी हर तरही के माथे पर सजी हुई सुंदर बिंदी होते हैँ। अभी तो उनका एक गीत हमें कल भी सुनना है। वाह वाह वाह क्या सुंदर गीत। 


लावण्या शाह जी

दीवाली पर जगमग जगमग जब सारे घर होते हैं
आँगन द्वार रंगोली सजने के जब  मंज़र, होते हैं।

लिपे पुते घर, चमचम चमचम, स्वागत करते हैं
कहीं पटाखे, तो आले पे, दियना बाती जलते हैं
जल री बाती तू धीरे से जलना रात तुझे  सारी 
गुम है चन्दा का झूमर, तिथि मावस है ये दीवाली

चाँदी की नथनी, में उजियारे के लश्कर होते हैं 

मैया लछमी स्वागत करते, आओ पधारो, हे माई
स्वागत करते राजा परजा, दीवाली जो है आई
सुख देना हे माँ दुःखहरिणी दुर्गा ललिता जगदम्बा   
हाथ जोड़ ये अरज लगाएँ द्वार तेरे हे माँ अम्बा      

गृहस्वामिनी के बुदबुद-बुदबुद मंत्रबद्ध स्वर होते हैं

है ये रात दीवाली की, कुछ कहना, कुछ गुनना साथी 
ये चराग़ आशा के घृत से ही ताकतवर होते हैं

वाह वाह वाह, बहुत ही सुंदर है यह गीत। पूरी गीत मानों दीवापली का चित्र सा खींच दे रहा है सामने। दीपावली और लक्षमी पूजा का पूरा साकार चित्र। लिपे पुते घर, पटाखे, आले पे दियना बाती का जलना, ऐसा लग रहा है जैसे हम पूरे मंज़र को सामने बैठ कर ही देख रहे हैँ। चाँदी की नथनी में उजियारे के लश्कर का बिंब बहुत अनूठा है। और अगले बंद में लक्षमी के दुर्गा रूप के सामने प्रार्थना में खड़ी हुई गृहस्वामिनी जिसके होंठों पर बस केवल अपने घर में सुख और शांति की कामना है। बहुत ही सुंदर गीत लिखा है आदरणीय लावण्या जी ने। पूरा गीत जैसे मंज़रकशी है दीपावली के त्यौहार की। वाह वाह वाह। 

 

वासुदेव अग्रवाल 'नमन'

 

दीवाली पर जगमग जगमग जब सारे घर होते हैं,
आतिशबाज़ी धूम धड़ाके हर नुक्कड़ पर होते हैं।

पकवानों की खुशबू छायी, आरतियों के स्वर गूँजे,
त्योहारों के ये ही क्षण खुशियों के अवसर होते हैं।
अनदेखी परिणामों की कर जंगल नष्ट करें मानव,
इससे नदियों का जल सूखे बेघर वनचर होते हैं।

क्या कहिये ऐसों को जो रहते तो शीशों के पीछे,
औरों की ख़ातिर उनके हाथों में पत्थर होते हैं।
कायर तो छुप वार करें या दूम दबा कर वे भागें,
रण में डट रिपु जो ललकारें वे ताकतवर होते हैं।

दुबके रहते घर के अंदर भारी सांसों को ले हम,
आपे से सरकार हमारे जब भी बाहर होते हैं।
कमज़ोरों पर ज़ोर दिखायें गेह उजाड़ें दीनों के,
बर्बर जो होते हैं वे अंदर से जर्जर होते हैं।

पर हित में विष पी कर ही देवों के देव बनें शंकर,
त्यज कर स्वार्थ करें जो सेवा पूजित वे नर होते हैं।
दीन दुखी के दर्द 'नमन' जो कहते अपनी ग़ज़लों में,
वैसे ही कुछ खास सुख़नवर सच्चे शायर होते हैं।

वाह वाह वाह,  बहुत ही सुंदर ग़ज़ल कही है। पकवानों की ख़शबू छाई आरतियों के स्वर गूँजे वाह क्या मिसरा बनाया है। और अगले ही शेर में पर्यावरण की चिंता कवि के मन में उमड़ पड़ी है। और अगले ही शेर में कहावत को क्या ख़ूब अंदाज़ में शेर में ढाला है, शीशे के घर में रहने वालों के हाथों में पत्थर का प्रयोग बहुत सुंदर है। कमज़ोरों पर ज़ोर दिखाएँ में मिसरा सानी बहुत सुंदर बना है बर्बर जो होते हैं वे अंदर से जर्जर होते हैं। वाह क्या काफिया लगाया है और उस पर बर्बर के साथ उसका प्रयोग बहुत सुंदर। शंकर द्वारा विषपान किए जाने का प्रयोग भी बहुत ही सुंदर है, सचमुच जो दूसरों का विष पी लेता है उसे ही शंकर की उपाधि मिलती है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल कही है आदरणीय नमन जी ने बहुत ख़ूब वाह वाह वाह। 

 

गुरप्रीत सिंह

 

इश्क़ में बनने वाले सारे उल्टे मंज़र होते हैं।
कुछ दिखते हैं होते नहीं, कुछ दिखते नहीं पर होते हैं।

पहला सीन : मेरे सपने उड़ने को तत्पर होते हैं।
दूजा सीन : वहीं पर बिखरे कुछ टूटे पर होते हैं।
कहते हैं रब जब देता है छप्पर फाड़ के देता है,
हाँ, पर वो तो उनको ही ना! जिनके छप्पर होते हैं।

ज़ोर से चिल्ला लेते हैं जब हद से अधिक दबाव बने,
हम इंसानों से अच्छे तो प्रैशर कूकर होते हैं।
ये दोनों ही इक दूजे के इलाके में घुसपैठ करें,
ज़हन-ओ-दिल की सरहद पर रोज़ाना फ़ायर होते हैं।

मिलना तो मैं भी चाहूँ लेकिन मैं कैसे आऊँ माँ,
बंटी के पापा तो सन्डे को भी दफ़्तर होते हैं।
इक मुस्कान से पापा की दिनभर की थकावट दूर करें,
ये नन्हे-मुन्ने बच्चे कैसे जादूगर होते हैं।

दिल की बस्ती नाम तुम्हारे कर तो दूँ, पर फ़िर सोचूँ,
ऐसा करता हूँ तो बाकी अरमां बेघर होते हैं।
छत पर चढ़ कर देखो तो क्या ख़ूब नज़ारा दिखता है,
दीवाली पर जगमग जगमग जब सारे घर होते हैं।

 

वाह वाह वाह बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है गुरप्रीत ने पहले तो मतले में ही जो उलटबाँसी का सहारा लिया गया है उसने बहुत अच्छा प्रभाव छोड़ा है। फिर पहले ही शेर में पहला सीन और दूजा सीन को वज़न पर बिठा कर मिसरे में शामिल करना कमाल है। छप्पर वाले शेर में मिसरा सानी बहुत अच्छा बना है। इंसानों से प्रेशर कूकर की तुलना बहुत उम्दा है। सच है कि हम इंसान तो चाह कर भी अपना प्रेशर रिलीज़ नहीं कर पाते हैं। दिल और दिमाग के बीच चल रही जंग को बहुत अच्छे से शेर में ढाल दिया है गुरप्रीत ने। दिल की बस्ती नाम तुम्हारे कर तो दूँ पर फिर सोचूँ में मिसरा सानी एकदम छन्न से लग रहा है आकर। और अंत के शेर में गिरह को इस तरह बाँधा गया है कि ख़ूब मंज़रकशी हो गई है। बहुत ही अच्छी ग़ज़ल वाह वाह वाह।  


आज चारों ही रचनाकारों ने छोटी दीवाली में उल्लास भर दिया है। ऐसा लग रहा है जैसे चराग़ों की एक कतार सी जगमगा रही है शब्दों के रूप में । आप सब को छोटी दीवाली की मंगल कामनाएँ देते रहिए दाद और इंतज़ार कीजिए कल का। 
 



16 टिप्‍पणियां:

  1. आज रूप चतुर्दशी के दिन पटल पर आदरणीय राकेश खंडेलवाल जी के प्रकृति के सुंदर बिंबों से सजे गीत ने छटा बिखेरी है। इस सुंदर गीत की आपको बहुत बहुत बधाई।
    दूसरी रचना आदरणीया लावण्या साहजी के मधुर गीत के रूप में है। लिपे पुते घर में आस घृत की बाती जला माँ लक्ष्मी के स्वागत गीत की आपको असीम बधाई।
    फिर मेरी ग़ज़ल है जिस पर आदरणीय पंकज सुबीर जी की आत्मिक टिप्पणी और समीक्षा का हृदयतल से आभार व्यक्त करता हूँ।
    चौथी और अंतिम रचना आदरणीय गुरुप्रीत सिंह जी की सुंदर, मनभावन अशआर से सजी ग़ज़ल है। छप्पर फाड़ के भी छप्पर वालों को ही मिल सकता है। वाह क्या तगज्जुल है आपको इस सुंदर ग़ज़ल की बहुत बहुत बधाई।

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    1. सुंदर अंशआरों से सजी आपकी अदायगी
      वाह और वान

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  2. सभी रचनाएँ ज़बरदस्त हैं। शुभ दीपावली।

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  3. राकेश खंडेलवाल जी , लावण्या शाह जी के गीतों और वासुदेव अग्रवाल, गुरप्रीत की गज़लों को पढ़कर मज़ा आया । दीपावली पर्व सभी को मुबारिक।

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  4. वाह आदरणीय खंडेलवाल जी का आज का गीत तो कल के गीत से भी उत्तम,लावण्या जी का गीत पारम्परिक परिवेश लिए गीत, हार्दिक बधाई। वासुदेव जी, गुरप्रीत जी की ग़ज़लें अति सुन्दर।

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  5. बहुत सुन्दर।
    रूप-चतुर्दशी और धन्वन्तरि जयन्ती की हार्दिक शुभकामनाएँ।

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  6. संध्या रख देती उतार कर सुरमे वाली काँवरिया

    चाँदी की नथनी, में उजियारे के लश्कर होते हैं

    बर्बर जो होते हैं वे अंदर से जर्जर होते हैं।

    हम इंसानों से अच्छे तो प्रैशर कूकर होते हैं।

    जिस किसी मुशायरे में ऐसी पंक्तियां हों उसे अत्यधिक अनूठा और सफल कहा जाएगा।

    सभी रचनाकारों की लेखनी को नमन






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  7. राकेश जी और आदरणीय लावण्या जी के गीत ने तो अलग माहोल बना दिया है इस मुशायरे का ...
    चांदी की नथनी में ... अनूठे बिम्ब खड़े किये हैं आदरणीय लावण्या जी ने .... बहुत बधाई उन्हें ..
    वासुदेव जी और गुरप्रीत जी ने भी कमाल के शेर बुने हैं ... नए अंदाज़ के जाविये ... अनूठे शब्द बिम्ब ... कमाल की गजलें ...

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  8. सभी गुणी रचना कार साथियों को दीपावली की मंगलकामनाएं
    श्री पंकज भाई सौ.रेखा भाभी जी व चि.परी, चि.पाँखुरी बिटिया
    एवं' शिवना' टीम के समस्त परिजनों को स्नेह सहित नमस्ते 🙏
    प्रार्थना यही है कि, सभी महफ़ूज़ रहें, स्वस्थ रहें, सानंद रहें 🙏
    सं. २०२० स्वागत है दीपावली का जो अब आ पहुँची है

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  9. राकेश जी का यह गीत भी पहले गीत की तरह मोहक है। ।
    फैले तम तब किसी गुफा के अंदर जाकर सोते हैं
    दीवाली पर जगमग जगमग तब सारे घर होते हैं

    संशय के घिर रहे क़ुहासे सब छू मंतर होते हैं
    दीवाली पर जगमग जगमग जब सारे घर होते हैं

    उत्साहों के सहज प्रवाहित उस पल निर्झर होते हैं
    दीवाली पर जगमग जगमग अब सारे घर होते हैं
    तीनों बन्‍दों में तरही मिसरे को बहुत ही खूबसूरती से बॉधा गया है।

    लावण्या शाह जी की गीतात्‍मक प्रस्‍तुति हमेशा की तरह मामोहक है।
    चाँदी की नथनी, में उजियारे के लश्कर होते हैं
    गृहस्वामिनी के बुदबुद-बुदबुद मंत्रबद्ध स्वर होते हैं
    है ये रात दीवाली की, कुछ कहना, कुछ गुनना साथी
    ये चराग़ आशा के घृत से ही ताकतवर होते हैं।
    क्‍या खूबसूरती से बंद प्रस्‍तुत किये गये हैं।

    वासुदेव अग्रवाल 'नमन' जी ने दीवाली के अवसर पर हर ओर दिखने वाले दृश्‍यों को सजीव कर दिया है।

    गुरप्रीत सिंह जी ने भी दीवाली के अवसर पर हर ओर दिखने वाले दृश्‍यों को सजीव कर दिया है।
    पहला सीन : मेरे सपने उड़ने को तत्पर होते हैं।
    दूजा सीन : वहीं पर बिखरे कुछ टूटे पर होते हैं।
    तो हर दृष्टि से नायाब शेर हुआ।
    सभी को इन प्रस्‍तुतियों के लिये बहुत बहुत बधाई।

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    1. आपकी जादुई कलम से झरी दीवाली की रोशनी के इंतज़ार में शुभ अवसर की मंगल कामनाएँ

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  10. वाह वाह बहुत ही खूबसूरत रचनाएँ आदरणीय राकेश खंडेलवाल जी, आदरणीयालावण्या शाह जी और आदरणीय वासुदेव अग्रवाल जी द्वारा पढ़ने को मिलीं हैं आज के दिन । ऐसी पंक्तियाँ पढ़ कर मज़ा आ गया ।

    तब मन के विश्वास जाग कर इक दीपक में जलते हैं

    संध्या रख देती उतार कर सुर्मे वाली काँवरिया

    चांदी की नथनी में उजियारे के लश्कर होते हैं ।

    पकवानों की खुशबू छायी आरतिओं के स्वर गूंजे

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