शनिवार, 17 मार्च 2018

आइए आज होली के तरही मुशायरे को अपने अंजाम तक पहुँचाते हैं दो शायरों शेख चिल्ली और नकुल गौतम के साथ

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मित्रो नहीं नहीं करके भी शायर जुट जाते हैं और मुशायरा हो जाता है। शुरूआत में तो ऐसा लगता है कि जैसे इस बार तो बहुत कम ही रहने वाले हैं शायर, लेकिन धीरे-धीरे उत्साह बढ़ता है और आमद शुरू हो जाती है। इस बार भी ऐसा ही हुआ, लोग पहले तो नहीं आए और फिर आए तो आते ही चले गए। आज हम होली के मुशायरे का समापन कर रहे हैं दो शायरों के साथ शेख चिल्ली और नकुल गौतम के साथ। नकुल गौतम तो पूर्व में भी अपनी एक ग़ज़ल प्रस्तुत कर चुके हैं। इस बार वो हज़ल लेकर आ रहे हैं और शेख चिल्ली वो जिनके बारे में हम कुछ भी नहीं जानते कि वो कौन हैं। वे अपना परिचय देने में संकोच करते हैं। यहाँ तक कि फोटो भी नहीं देते। कोई बात नहीं, कभी तो सामने आएँगे।

इसे देखेंगे तो अपनी जवानी याद आएगी

आइए आज होली के तरही मुशायरे को अपने अंजाम तक पहुँचाते हैं दो शायरों शेख चिल्ली और नकुल गौतम के साथ

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शेख चिल्ली
बुढ़ापे में हमें जब बेमकानी याद आयेगी
हमें अक्सर तुम्हारी मेज़बानी याद आयेगी

मुझे पहले खिला कर खुद वो खाली पेट सोती थी
सदा अम्मा की हमको बेईमानी याद आयेगी

"बहुत कमज़ोर हो" कह कर खिलाती थी मुझे मक्खन
मुझे मिक्सी की खड़ खड़ में मथानी याद आयेगी

सुनाई देंगी बेतरतीब सी जब धड़कनें दिल की
हमें दिल पर किसी की हुक्मरानी याद आयेगी

मैं  तुमको भूल जाऊँगा, ये वादा है मेरा तुमसे
मगर अक्सर तुम्हारी याद आनी याद आयेगी

पियाली चाय की तन्हा पड़ी मायूस है देखो,
इसे तेरे लबों की मेह्रबानी याद आयेगी

गिरह के शे'र में हम डायरी का ज़िक्र करते हैं
इसे देखेंगे तो अपनी जवानी याद आयेगी

बुढ़ापे में जब बेमकानी होती है तो जवानी की मेज़बानियाँ तो याद आती ही हैं। मगर मतले के बाद का जो शेर है उसमें दुनिया की जिस सबसे पवित्र बेईमानी का ज़िक्र है उसको पढ़कर किसकी आँख न भर आए। भगवान, ईश्वर, ख़ुदा, गॉड सब यही चाहेंगे कि यह दुनिया इस प्रकार की बेईमानियों से भर जाए। तकनीक के दौर में पुरानी याद आना कुछ ऐसा है जैसे अचानक कोई पुराना गाना याद आ जाए और मथानी की याद तो हर दौर में आएगी, हम वो लोग होंगे जिन्होंने मथानी को अंतिम बार देखा था। और बेतरतीब सी धड़कनों के बहाने उम्र के ढलते समय में जवानी का वो समय याद आना जब किसी की हुक्मरानी हुआ करती थी। अगले शेर में जो सौंदर्य है वो याद आनी याद आएगी का है। बहुत ही सुंदर प्रयोग है, कहते हैं कि कविता कब कैसे बन जाती है बनाने वाले को भी पता नहीं चलता। चाय की प्याली के बहाने किसी के लबों की मेह्रबानी को याद करना बहुत ही रूमानी अंदाज़ में कहा गया शेर है । और गिरह भी सबसे अलग तरीक़े से लगाई गई । बहुत ही सुंदर ग़ज़ब का प्रयोग। बहुत ही सुंदर वाह वाह वाह।

Nakul Gautam

नकुल गौतम
बुढ़ापे में हमें जब भी जवानी याद आयेगी
फिसल जाने की फितरत खानदानी याद आयेगी

कभी शीला, कभी श्वेता, कभी सपना, कभी शीतल
मुहब्बत की अधूरी हर कहानी याद आयेगी

मेरा खत जब तेरे डैडी के हाथ आया था गलती से
बुढ़ापे में वो उनकी बदज़ुबानी याद आयेगी

तेरी तारीफ़ में हमने कहे थे शे'र जो इतने
कसम से डायरी से बेईमानी याद आएगी

सजा रक्खी है घर में मूछ वाली आखिरी फ़ोटो
"इसे देखेंगे तो अपनी जवानी याद आएगी"

तुम्हें रँगने के चक्कर में पिटे थे हम मोहल्ले में
बमुश्किल बच सकी वो शेरवानी याद आयेगी

हमारी आँख के नीचे अभी तक है निशां कट का
मेरे मुँह पर तेरी सैंडिल पुरानी याद आयेगी

तेरी शादी के दिन बेख़ौफ़ घुस जाना तेरे घर में
पुलिस थाने की शब भर मेज़बानी याद आयेगी

क्या कमाल है कि दोनों शायरों का मतले का मिसरा ऊला लगभग एक सा है, लेकिन यहाँ वह बात अपनी ही ठिठौली करने के लिए कही जा रही है। फिसल जाने की फितरत खानदानी का क्या कहना। और उसी फितरत को अगले शेर में एक लम्म्म्म्बी सी सूची से स्पष्ट किया गया है शीला, श्वेता, सपना और शीतल मतलब यह कि एस अक्षर को छोड़ा नहीं है शायर ने। और बुढ़ापे में बदज़बानी करते हुए ससुर जी से किसका पाला नहीं पड़ा है ? वाह क्या याद दिलाया एक मूँछ वाली फोटो तो मेरी भी रखी है, शेर को पढ़ने के बाद उसे देखा तो सचमुच अपनी जवानी याद आ गई। क्या ठाठ हैं बंदे के कि होली खेलने भी शेरवानी पहन कर ही जा रहे हैं। अब गए हो तो भुगतो भी। और यह जो आँख के नीचे सैंडल का निशान है यह तो आशिक़ी का वह तोहफा है जो क़िस्मत वालों को ही मिलता है, सबको कहाँ मिलता है ये। हाँ लेकिन यह ध्यान रखना चाहिए कि जब शादी तय ही हो गई तो अब वस्तुस्थिति को स्वीकार किया जाए नहीं तो थाने की मेहमानी करने के अलावा कोई चारा होता भी नहीं है। बहुत ही सुंदर हज़ल क्या बात है वाह वाह वाह।

7

मित्रो आज के दोनों शायरों ने बहुत सुंदर तरीके से मुशायरे का समापन किया है। आपका अब फ़र्ज़ बनता है कि ख़ूब दाद देकर मुशायरे को विध्वित समाप्त करें। और इंतज़ार करें अगले मुशायरे का। जो संभवतः अब गर्मियों में पवित्र रमज़ान के अवसर पर होगा और ईद पर हम जश्न मनाएँगे। तब तक जय हो।

5 टिप्‍पणियां:

  1. भाई वाह ...
    शेख जी ने तो सच में कमाल कर दिया ... मतले के शेर फिर लगातार दो शेर माँ दादी की याद ताज़ा कर जाते हैं ... बहुत ही कमाल के हैं सारे शेर ..
    और नकुल जी ने भी कमाल किया है ... कभी शीला कभी श्वेता ... गज़ब का शेर ... सब अपनी अपनी यादों में खो जायेंगे इस शेर को पढ़ कर ... भाई कमाल के शेर हैं सभी ... बहुत बहुत बधाई ...
    तरही को निरंतर जारी रखिये पंकज जी ... न नुकर करते करते सब आते हैं सब आयेंगे ... यही एक जुड़ाव है ... च्युंगम हाही इस गुरुकुल की .... बधाई इस सफल आयोजन पर ... और तालियाँ ... तालियाँ ... तालियाँ ...

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  2. नकुल गौतम और शेख चिल्ली जी दोनों ही की ग़ज़ल काबिले तारीफ हैं। बहुत बहुत दिली दाद दोनों को। एक खूबसूरत मुशायरे के मेजबानी के लिए पंकज जी को धन्यवाद।

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  3. शेख साहब ने इतनी आला ग़ज़ल कही है कि बस मन से दाद निकले जाती है ! वाह,वाह !

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