सोमवार, 29 मई 2017

इस बार ईद के अवसर पर आयोजित होने वाले मुशायरे का तरही मिसरा

मित्रों आप सबको पवित्र रमज़ान के महीने के आगमन की शुभकामनाएँ। इन दिनों बहुत व्यस्तता में घिरा हुआ हूँ। असल में ऑफिस के नवीनीकरण तथा विस्तार के कार्य के चलने के कारण कम्प्यूटर से लगभगग रिश्ता टूटा हुआ-सा है। मगर फिर भी आज ज़रा कुछ देर का समय निकाल कर ईद के अवसर पर आयोजित होने वाले तरही मुशायरे का मिसरा दे रहा हूँ। दिमाग़ बहुत उलझनों में घिरा है इसलिए हो सकता है कि इस बार का मिसरा आपको कुछ कमज़ोर लगे। लेकिन अब जैसा भी है उसी पर काम करना है।

इस बार बहर का चुनाव “बहरे हज़ज मुसमन मकफ़ूफ महज़ूफ” किया है। यह गाए जाने वाली बहर है जिसके अरकान कुछ इस प्रकार से हैं 221-1221-1221-122 मतलब मफऊलु-मफाईलु-मफाईलु-फऊलुन। यह बहुत गाई जाने वाली बहर है और इस पर कई फिल्मी गीत भी हैं। कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं। ‘तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा, इन्सान की औलाद है इन्सान बनेगा’ या फिर ‘बीते हुए लम्हों की कसक साथ तो होगी’, आदि आदि। जैसा कि हम पहले ही कई बार बात कर चुके हैं कि यह वैसे तो बहुत लोकप्रिय बहर है लेकिन इसमें बहुत सावधानी के साथ कार्य करना होता है। ज़रा सी ग़लती से दूसरा या तीसरा रुक्न 1221 के स्थान पर 1212 या 2121 हो जाता है और अंतिम रुक्न भी 122 के स्थान पर 212 हो जाता है। चूँकि गाकर लिखी जाती है इसलिए इस अंतर का आपको पता भी नहीं चलता। इसकी एक हमशक्ल बहर है “बहरे मुजारे मुसमन अखरब मकफ़ूफ महज़ूफ” जिसके अरकान हैं 221-2121-1221-212 इसलिए होता अक्सर है कि दोनों बहरों के रुक्न एक दूसरे में मिल जाते हैं। गाते समय इसका पता ही नहीं चलता। जैसे हम दो गानों को देखते हैं पहला तो जो हमने ऊपर लिया “बीते हुए लम्हों की कसक साथ तो होगी” और दूसरा “मिलती है ज़िंदगी में मुहब्बत कभी कभी”। ये दोनों गाने आप अगर गुनगुना के देखेंगे तो दोनों एक ही धुन पर लगेंगे, लेकिन वास्तव में यह दोनों ही अलग अलग बहरों पर हैं। पहला बहरे हज़ज पर है तो दूसरा बहरे मुजारे पर है। बस यही सावधानी आपको रखनी होगी कि दोनो एक दूसरे में घुल मिल न जाएँ।

तो इस बार ईद के अवसर पर आयोजित होने वाले मुशायरे का तरही मिसरा है

कहती है ये ख़ुशियों की सहर, ईद मुबारक

कह-ती-है 221 (है को गिराया गया है)

ये-ख़ुशि-यों-की 1221 (ये और की को गिराया गया है)

स-हर-ई-द 1221

मु-बा-रक 122

इस बार रदीफ़ ईद मुबारक है और सहर शब्द में का​फिया की ध्वनि है मतलब जो अर की ध्वनि है वही हमारे का​फिया की ध्वनि है। कुछ कठिन ज़रूर है क्योंकि एक तो  का​फिया कुछ उलझन भरा है और उस पर ज़रा सी चूक से वह रदीफ के साथ अपने संबंध तोड़ भी सकता है। बहर तो मुश्किल भरी है ही।

जैसा कि आपको पता है कि यह मुशायरा शिवना साहित्यिकी पत्रिका में प्रकाशित भी होगा। जुलाई अंक में इस को लिया जाएगा। ईद के कुछ दिनों पूर्व हम इस मुशायरे का आयोजन यहाँ ब्लॉग पर प्रारंभ कर देंगे। तो लग जाइए काम पर और तैयार कीजिए ईद के अवसर पर सुनाई जाने वाली ग़ज़ल। तब तक नमस्कार। 

9 टिप्‍पणियां:

  1. नमस्कार गुरु जी...बहुत मुश्किल गूगली फेंकी है इस बार आपने ..कोशिश रहेगी कि किसी तरह सिंगल/डबल निकाला जाए..

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (30-05-2017) को
    "मानहानि कि अपमान में इजाफा" (चर्चा अंक-2636)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  3. वाह ... कमाल का मिश्रा है ... कठिन तो है ही पर पढने का मजा आ रहा है ... बहुत बारीक अंतर है पता नहीं निभाना आसान होगा या नहीं ... पर जो भी हो गज़ल तो आएगी ... तमाम गुरुकुल के सदस्यों को रमजान की मुबारक बाद ...

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  4. गुरूजी यह बह्र तो दिमाग में घुस ही नहीं रही,,
    इसे मैंने अपने सहूलत के लिए तोड़ मरोड़ कर (22-1122-1122-1122) ,,,,,, ऐसे याद कर लिया है,,
    क्या ऐसा करना उचित होगा ???

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    1. गुरप्रीत ऐसा करने से रुक्न बदल जाएंगे और ग़ज़ल कहना जटिल न हो जाये।
      अभी सरल है
      221 1221 1221 122
      तू हिंदु/ बनेगा न/ मुसलमान/ बनेगा

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    2. बहुत शुक्रिया आदरणीय तिलक राज जी

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  5. हम लौट आये। कई एक शहर और जनपद की घुमक्कड़ी के बाद। होता है कि एक उद्येश्य के अंतर्गत संपन्न सुकार्य दूसरे उद्येश्य की मांग के सापेक्ष अन्यथा-से ही प्रतीत होते हैं। इसी कारण अपने दौरे को इस आशय के सापेक्ष हमने ’घुमक्कड़ी’ का नाम दिया।

    लेकिन इसी क्रम में सिहोर भी हो आना संभव हुआ ! और, सर्वोपरि, पंकज भाई से हुई प्रेरक भेंट भी संभव हुई ! फिर उनके हाथों सिहोर की प्रसिद्ध खास्ता कचौरियों और गर्मागर्म कॉफ़ी, जिसे मैंने बलात ’कोल्ड’ कर महँगी बना डाला, का भी आनन्द लिया ! तिसपर कई विषयों पर बेलौस बातचीत भी हमने घोंटीं ! ये सारा कुछ हुआ शिवना के उसी अस्त-व्यस्त-लस्त-पस्त माहौल में जिसका ज़िक्र पंकज भाई ने किया है। लेकिन जो कुछ इस ’बिग-बैंग’ के बाद निखरेगा उसकी आभासी झलक पंकज भाई ने महसूस करा दिया। जय हो...

    देखें, मेरी ग़ज़ल किस घाट बैठ पाती है। बैठती भी है या नहीं। व्यस्तता तो है लेकिन उससे अधिक अस्तता है .. :-))
    शुभातिशुभ
    सौरभ

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  6. आ0 मैं भी तरही मुशायरे में भाग लेना चाहता हूँ मुझे ग़ज़ल कब कैसे और कहाँ प्रेषित करनी है कृपया मार्ग दर्शन करें। मैं प्रथम बार इस ब्लॉग में आया हूँ।

    बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
    तिनसुकिया

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  7. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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