गुरुवार, 12 मार्च 2015

बासी होली हो रही है। आइये होली के त्‍यौहार को विधिवत समापन करते हुए आज दो शायरों विनोद पाण्‍डेय और तिलक राज कपूर से सुनते हैं उनकी ग़ज़लें।

मित्रो होली का त्‍योहार भी बीत गया। ऐसे ही हमारे जीवन में समय का चक्र चलता रहेगा। त्‍योहार आते रहेंगे बीतते रहेंगे। लेकिन उन सबके बीच में बचा कर रखनी होगी हमें थोड़ी सी संभावना। संभावना अपने लिए अपने होने के लिए। उन लोगों के लिए जो हमारे अपने हैं। मुझे कई बार लगता है कि आज से लगभग आठ साल पहले किसी मित्र के कहने पर यदि मैं ब्‍लॉगिंग से नहीं जुड़ता तो आज क्‍या होता। आज मेरे हिस्‍से में मित्रता का वो धन नहीं होता जो है। आप सब ने मिलकर मुझे वह बनाया जो मैं आज हूं। आज साहित्‍य में जो भी मेरा स्‍थान है उसमें इस ब्‍लॉग और इस ब्‍लॉग के परिवार द्वारा दिए गए स्‍नेह का बहुत बड़ा योगदान है। आप सब द्वारा दिए गए स्‍नेह के कारण ही वह आत्‍म विश्‍वास मेरे अंदर आया कि मैं वह सब कर पाया। इसलिए इस ब्‍लॉग पर गतिविधियों का चलाए रखना मेरे ऊपर क़र्ज भी है और मेरा फ़र्ज भी है। जल्‍द ही हम गर्मियों की ऋतु का स्‍वागत करेंगे। आज कुछ स्‍वास्‍थ्‍य की गड़बड़ी के कारण लम्‍बी पोस्‍ट नहीं लगा पा रहा हूं। आप संभालिएगा।

मैं रंग मोहब्‍बत का थोड़ा सा लगा दूं तो

Vinod Pandsey (1)

विनोद पाण्डेय 

मुस्कान तेरे लब पे, अपनी मैं सजा दूं तो
सब दर्द तेरे पी लूं, अश्‍कों को सुखा दूं तो 

इकरार किया तुमने, हंगामा हुआ बरपा
अब अपने भी मैं दिल का, गर हाल बता दूं तो

पिचकारी लिए रंगो की निकले हैं सब देवर
भाभी  का कहां है घर,  मैं राह दिखा दूं तो

ससुराल गया नन्दू बीवी को लगाने रंग
गवना है अभी बाकी मै शोर मचा दूं तो 

चुपके से रघु धनिया के हाते में कूदा है 
धनिया के पिताजी को ऐसे में जगा दूं तो 

भुक्खड़ की तरह खाते पंडित जी हैं गुझिया को 
गुझिया में अगर उनकी कुछ भांग मिला दूं तो

सम्बन्ध नही बनते, बुनियाद   पे  रुपयों की 
बस्ती में गरीबों की गर प्यार दिखा दूं तो

है रंग बहुत सारे तुम डूबी हो जिनमें, पर 
मैं रंग मुहब्बत का, थोड़ा सा लगा दूं तो

माना कि ग़ज़लकारों के बीच अनाड़ी हूँ
शे'रों से मगर अपने, रोते को हँसा दूं तो

हम्‍म्‍म, देर आयद दुरुस्‍त आयद। होली के माहौल में डूबी हुई है पूरी की पूरी ग़ज़ल। सारे शेर होली के माहौल और उसके आनंद को दोगुना कर रहे हैं। होली का त्‍योहार होता ही ऐसा है जिसमें हम सब अपने अंदर कुछ उल्‍लास कुछ उमंग को बटोर लेते हैं। विनोद जी ने भी इस होली में इसी कार्य को करने की कोशिश की है और उस कोशिश में उनको सफलता भी मिली है। बहुत ही सुंदर ग़ज़ल।

Tilak Raj Kapoor

तिलक राज क‍पूर

ठहरे हुए दरिया में, इक मौज उठा दूँ तो
फितरत जो रही इसकी, फिर इसको दिला दूँ तो।

कुछ दिल को करार आये, उम्मीद जगा दूँ तो
अंधियार में राही को, इक राह दिखा दूँ तो।

कुछ रंगे-बहार आये तारीक फि़ज़ाओं में
मैं रंग मुहब्बहत का थोड़ा सा लगा दूँ तो।

इक शोख़ हसीना की, अंगड़ाई में गुम हो कर
अपने ही बदन को गर, इक बेल बना दूँ तो।

इस राख़ की ढेरी में, कोई तो शरर होगा
मुमकिन है भड़क उट्ठे, गर इसको हवा दूँ तो।

परवाज़ न ठहरेगी, जो हमने शुरू की है
तू मुझ को लगा दे पर, मैं तुझ को लगा दूँ तो।

इक जंग मुसल्सल है, थमती ही नहीं दिखती
थमने न इसे देना, मैं खुद को मिटा दूँ तो।

हासिल न हुआ कुछ भी, मजहब की दीवारों से
ये बात समझ ले वो मजहब ही बना दूँ तो।

इक याद मुसल्सल है, सोने ही नहीं देती
कुछ नींद मुझे आये, मैं इसको सुला दूँ तो।

तिलक जी का अपना ही अलग अंदाज़ है ग़ज़लें कहने का। और हां यह भी कि वे हमेशा अलग अलग मूड पर ग़ज़लें कहते हैं। इस बार होली के माहौल पर उन्‍होंने एक ग़ज़ल कही थी और आज एक अलग अंदाज़ में यह उनकी ग़ज़ल। बहुत ही प्रभावी बन पड़े हैं सारे शेर।

तो आनंद लीजिए सारे शेरों का । और देते रहिए दाद। और हां एक सूचना यह कि शिवना प्रकाशन अब www.amazon.in/s/ref=nb_sb_noss_1?url=search-alias%3Daps&field-keywords=shivna+prakashan अमेजन पर है और बहुत जल्‍द ही वह फिल्‍पकार्ट पर भी होगा। साथ ही कुछ अन्‍य स्‍थानों पर भी।

9 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन मतले से आदरणीय विनोद पाण्डेय जी ने अपनी ग़ज़ल प्रस्तुत की है, अशआर गुदगुदाते हुए लगते हैं, बातौर अंतिम शेर अनाड़ी तो नहीं लगते अलबत्ता हँसा जरुर रहे हैं. बहुत बहुत बधाई और दाद देता हूँ.
    देर से आने के लिए आदरणीय पंकज सुबीर जी और अन्य साथियों से से क्षमा चाहूँगा, भांग और व्यस्तता से होश में आने में देर हुई.

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  2. आदरणीय तिलक जी, हमेशा की तरह आपने इस बार भी अच्छी ग़ज़ल कही है, बेल, राख और पर वाले शेर बहुत ही खुबसूरत लगे, ढेरो दाद प्रेषित करता हूँ, कृपया स्वीकार करें.

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शुक्रवार (13-03-2015) को "नीड़ का निर्माण फिर-फिर..." (चर्चा अंक - 1916) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. आदरणीय पंकज जी , प्रणाम
    होली तरही मुशायरे में ग़ज़ल भेटते समय थोड़ी जल्दीबाजी में लिखा अतः मै बहुत संतुष्ट नहीं था पर आपका स्नेह और आशीर्वाद मिला तो बहुत प्रसन्नता हुई । आपके स्नेह का कायल हूँ । आप सभी का स्नेह मिलता रहे ईश्वर से यहीं प्रार्थना है ।

    गजल तो मैंने थोड़ी गुदगुदाने की दृष्टि से ही लिखी थी क्योंकि होली का माहौल रहा ।सबको पसंद आ रही है , यह मेरी खुदकिस्मती है । तिलकराज जी को मै लेखन के शुरुआत के दिनों से पढ़ते आ रहा हूँ । बहुत बेहतरीन शे'र आज भी आपने पेश किया है ।

    आप के साथ मेरी ग़ज़ल आई ,यह मेरे लिए बड़ी बात है । एक शानदार मतले से ही इस लाजवाब ग़ज़ल की शुरुआत की है आपने जो काबिलेतारीफ है । एक-एक शेर कमाल के हैं । बहुत अच्छा लगा । कपूर जी ,को ढेर सारी बधाई ।

    कम एवं व्यस्त समय में भी इतनी शानदार आयोजन के लिए पंकज जी का बहुत बहुत धन्यवाद । प्रणाम

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  5. आदरणीय तिलक राज जी अपनी गजलों में अनेक विषयों को छूते हैं और बड़ी ही सादगी से अपनी बात रखते हैं ... मतले का शेर ही धमाकेदार है और पूरी ग़ज़ल तो सुभान अल्ला ...
    विनोद जी ने तो पूरी ग़ज़ल होली के अनेक रंगों से सजाई है ... हर शेर अलग रंग लिए है ... मस्ती, उलास का माहोल बन रहा है ... बहुत बधाई विनोद जी को इस शानदार गजल पर ...
    इस बार तो होली और इस तरही का मज़ा आ गया ... नयी ऊंचाइयों को छूता हुआ मुशायरा आज सफलता पूर्वक संपन्न हुआ ... इस बात की आपको ढेरों बधाई और शुक्रिया ....

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  7. बहुत ही अच्छी जानकारी मेरे ब्लॉग पर भी आपको निमंत्रण है www.guide2india.org

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  8. बासी होली का एक अलग ही रोमांच हुआ करता है. आदरणीय तिलकराजजी तथा भाई विनोदजी की ग़ज़लों से समाप्त हुआ यह आयोजन कई मायनों में विशिष्ट रहा. एक तो इस बार ’तरह’ फागुनी झुरझुरी से ओतप्रोत था जो उन शायरों से भी हठपूर्वक बसंती-बसंती मिसरे निकलवा लाया जो बाहरी तौर पर ’हेवी’ दिखा करते हैं. दूसरे, इस बार कई ऐसे चेहरे सामने आये जिनकी आमद मंच के कलेवर के लिए सकारात्मक परिवर्तन का संकेत है.

    विनोदभाई की ग़ज़ल में फागुन सुलभ चटख है. अलबत्ता आदरणीय तिलकराजजी की ग़ज़ल के शेर उनकी पहचान के अनुरूप गहराई लिए हुए हैं. "हासिल न हुआ कुछ भी मजहब की दीवारों से.." आपका ऐसा ही शेर है जो मन में देर तक गूँजता रहता है. तिलकराजजी के कहने के अंदाज़ से बहुत कुछ सीखते रहते हैं हम. यह अनवरत चलने वाली प्रक्रिया है.
    होली का दिन नये साल का पहला दिन होता है. नया साल सुख और साहचर्य की नयी कड़ी ले कर आये और सभी के मन हुलासों से भर दे..

    आदरणीय पंकज भाईजी के स्वास्थ्य के प्रति हो रही चिन्ता वाज़िब है. शीघ्र स्वास्थ्य लाभ कर नयी तैयारी पर लग जायें.
    शुभ-शुभ

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  9. ससुराल गया नंदू जैसे बेमिसाल शेरों के साथ विनोद जी ने बासी होली की कढ़ी में उबाल पैदा कर दिया है - लाजवाब ग़ज़ल कही है विनोद भाई -जियो।
    परम आदरणीय प्रात: स्मरणीय श्री श्री 1008 श्री तिलक राज कपूर जी महाराज ( आदर के ये भाव उनकी चिकनी खोपड़ी को देख स्वतः उपजते हैं -क्या करें ?) ने इस बार सिर्फ दो ही ग़ज़लों से इस तरही को नवाज़ा है जब की पिछली तरही गवाह हैं के वो तीन से अधिक वो भी हरेक में 12 शेर से ज्यादा वाली ग़ज़लें पेलते हैं आये हैं. वो थोक के व्यापारी हैं इस बार परचूनी में कैसे उतरे ये शोध का विषय है।
    कुल मिला के होली की तरही ने कामयाबी की नयी ऊचाइंयां छुयीं।

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