गुरुवार, 5 मार्च 2015

होली है भइ होली है। बुरा न मानो होली है और अगर जो बुरा ही मानो तो हमको क्‍या बस होली है। सा रा रा रा रा । जोगिरा सारा रा रा रा । होली है ।

कल के दिना तो हमओ माथा का नाम कपाल दिन भर पिरातो रओ । जित्‍ती मस्‍ती सब लोग लुगाइन ने मिल के करी है तो ऐसो लगो की एकाध की मुंडी ही मसक दें। पर फिर सोचा कि जाबे दो भिचारे लोग लुगाइन सब होली के दिना ही तो हंसते हैं। बाकी तो साल भर मुंडी उठाए काम पे गए, मुंडी उठाए काम से वापस । अबारे तो हमाओ भोत टैम खोटी हो गओ है। अब इत्‍ती बेला तो हमाओ रोटी बनावे को टैम होतो है। पर चा करे चा मर जाएं। इत्‍तो काम पड़ो है और सांस लेबे को भी टैम नी है। अब कोई भी जे नी पूछे कि फिर हम सांस कैसे ले रय हैं। जिन्‍ने भी जे प्रस्‍न पूछा उनके हम एक गुम्‍मा मार के माथो को नाम कपाल कर दे हैं। हम सब छोड़ छाड़ के चले जे हें काहू के संगे। चले जे हैं काहू के संगे । चले जे हैं काहू के संगे। हे राम हमने तीन तीन बार कही पर कोई नी आयो कि काहू के संगे काहे हमाए संगे चलो। हमें नी जाना काहू के संगे। चलो अब चलें होली को मजमा में।

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आज जदी कोइ ने भी घझलों की बहर चैक करबे की कोसिस भी करी तो हमाइ सों हम से बुरा कोइ नइ होबे बारो है। बहर को तो नाम भी लेबे की कोसिस नइ की जाए। जिन जिन के पास भोत सारा ज्ञान हो रओ है बे अपनी रजाई में घुस के सो रहें। होली के दिन ज्ञान फ्यान की कोनो झरूरत नहीं है।

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जे परतोयोगिता कल सबेरे भइ थी जिसमें सबसे झियादा सुफेद बालन के लिए 'सनसिल्‍क सुंदरी' का चुनाव किया जाना थ। हमें भोत भोत गरब है कि जिन्‍होंने जो इनाम जीत लओ है।

सुमित्रा शर्मा

मैं याद गये बरसो,की आज दिला दूं तो
बस भंग चढी मस्ती के घूंट पिला दूं तो

ये उम्र कहेगी क्या ये खाएगी फिर धोखा 
यौवन की लुका छिप्‍पी की याद दिला दूँ तो 

फागुन के महीने में सावन ही उतर आए 
इन श्वेत - लटों पर मैं इक  फूल सजा दूँ तो

इक बार सुनो फिर तुम अभिसारिका बन जाओ
मैं आज मधुर बंसी कान्हा सी बजा दूँ  तो

ये गाल तेरे सूने खिल जाएंगे पल भर में  
मैं  रंग मुहब्बत  का थोड़ा  सा लगा दूँ  तो

है तीखी जबां तेरी इक  टेप लगा दूँ  तो
शीरे  की जगह गुँजिया  में ,मैं मिर्च भरा दूँ तो

इकलव्य ने कूकर का ,ज्यों भोंकना रोका था
बड़बोले तिरे मुख में ,कुछ  तीर फँसा दूँ तो

नाली में पड़ा बेउड़ा  करता है यही ख्वाहिश 
इस शहर की टंकी में दारू मैं मिला दूँ तो

मन करता है नेता की औकात  बताने  को
होली पे मैं उसको गर " शू "-हार  पिन्हा दूँ तो

काय बिन्‍नी कबे सीखो तुमने घझल केना। किनसे सीखो पेले तो जे बताओ। काय कि तुमाए लाने तो हम किछू नइ कहेंगे पर तुम्‍हाए उस्‍ताद को तो किछू न किछू केना ही परेगो। काय कि उनने ही तो जे अत्‍याचार की बीमारी पैदा कइ है। काय बिन्‍नी काय तुमने हमको उदर पुस्‍तक मेले में किछु खिलाओ थो तो का खिलाबे को बदलो लोगी। सच्‍ची का नाम झुठ कहें पर इत्‍ती बुरी घझल तो हमाए सात पुश्‍तों में से किसी ने भी नइ सुनी हेगी। सुफेद बालन के कारण हम कोनो थोड़ा लिहाज फिहाज कर रए हेंगे नइ तो हम तो गुस्‍सा के भोत तेज हेंगे। हां नइ तो, इत्‍ती बुरी घझल, हम का फालतू बैठे हैं कि जो चाहे आके हमारे प्राण पिरा दे ।

सूचना - अभी अभी सिमाचार मिला हेगा कि हमाए एक भरिष्‍ठ साथी के पुलिस उठा ले गइ हेगी। काय कि उनने मोगरे की डाली में सारे मोगरे भर दिए और साउथ में महिलाओं को वेणी के लिए शार्टिज पड़ गई। सूचना सिमापत भई।

parul ji

सबरे लोग लुगाइन को सूचित किया जाता है कि जे बच्‍ची भोत खतरनाक हेगी। जे अपने साथ चार चार, पांच पांच खाने के टिफिन लेकर घूमती हेगी। जो मिल जाए उसे खाना खिला खिला के बेहोश कर देती है। धयान से देखिये इस चेहरे को इस मासूम से चेहरे को और बचिये ये जहां भी मिले ।

पारुल सिंह

आँखों में तुझे भर कर, इस दिल में सजा दूँ तो
मैं रंग मुहब्बत का, थोड़ा सा लगा दूँ तो?

सब पूछ रहे मुझसे, क्यों इतनी चहकती हूँ
ये राज़ इसक वाला, मैं हाय बता दूँ तो?

कुछ और कहानी हो, कुछ और फसाने हों
किरदार बदल जीवन, को मोड़ नया दूँ तो?

दिल झूम रहा जब से,मैं साथ हुई अपने
बेनूर निगाहों को,इक ख्वाब जुदा दूं तो?

दिल हार चुकी तुम पर, ये राज जता दूं तो?
मैं लाज भरी पलकों, को आज उठा दूं तो?

मसरुफ बहुत हो तुम, इक बार इधर देखो 
ये नेट कनेक्शन घर, से हाय कटा दूं तो?

जब राह चुनी सच की "पारुल" नही सुनती
तहज़ीब ,रिवाजों का, कुछ ख़ौफ़ दिखा दूं तो

काय बिन्‍नी तुम इत्‍ती सीरियस घझल लेके होली पे काय के लाने आईं। सिच्‍ची बताना कोनो डाकटर ने पर्ची लिखी है कि एक घझल सुबे और एक शाम को लिखना ही लिखना है। अरे और कोनो काम कर लो । ढाबा खोल लो चावल के परांठों को। काय के हम तो जे पूरी नइ पढ़ पा रहे हैं। हमें डाकटर ने मना की है कि होली के दिना में कोनो भी सीरियस बात ना सुनी जाए। तो हम तो जे घझल सुनबे से रए। हां इते भोत सारे लोग लुगाइन फालतू बैठे हेंगे। उनको सुना लो अपनी घझल और निकल लो पतरी गली पकड़ के । जो हमें सीरियस करबे की कोसिस की तो हम सीरियल में गाली बकबे के लाने तैयार बैठे हेंगे। हमें कोउ गुस्‍सा न दिलाबे । हम ने बोले काहूं से हमसे नो बोले कोय।

सूचना : उते भटोली के पेड़ के पास रेबे बारे मूलचंद मास्‍टर जी की बकरी कल इमरतीलाल जी के तोते के साथ उड़ कर भाग गई हेगी। जिस किसी को भी आकास में तोते के साथ बकरी उड़ती दिखे वो पत्‍थर मार कर गिराबे की कोसिस करे। गिराने बारे को तोता इनाम में दिया जाएगा। सूचना समापत भई ।

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ईमान से के रिये हैं कि हमें नइ मालूम है कि हाथ में इत्‍ते सारे रिंग पेन के जे काय का तमासा करबे जा रइ हेंगीं । हमे तो जेई बताया गया था कि घझल केंगी।

नकुल गौतम

नानी की रसोई की कुछ याद दिला दूँ तो
मैं दाल मखानी में घी थोड़ा मिला दूँ तो

फ़ाल्गुन का महीना है, होली का बहाना है
तू भूल ग़िले सारे, शिकवे मैं भुला दूँ तो

यह भांग भी होली पर  झूमेंगी नशे में धुत,
ले  नाम तिरा इसमें , जल थोड़ा मिला दूँ तो

कैसे हैं ये रासायन, चमड़ी ही  जला डालें,
चल छोड़ गुलालों को, जल पान करा दूँ तो?

बगिया की  महक  तुझको  फीकी  न  लगे  कहना ,
गर  बादे-सबा  तुझको , घर  उनका  दिखा दूँ तो

चांदी की मिरी ज़ुल्फ़ें चमकेंगी घटा बन कर,
गर ग्रीस ज़रा सी मैं बालों पे लगा दूँ तो

ग़ज़लें  ये मिरी  शायद , फूलों  सी  महक  जाएँ ,
इनको  मैं अगर  तेरी  यादों  से  सजा  दूँ  तो

आज तो आपके गलघोंटू की कसम सब हमाइ जान के पीछे ही नहा धोके पड़े हैं। कौन जाने कौन से ठेका ले लओ हेगो कि आज तो बुरी बुरी चीजें सुना सुना कर हमाइ जान ही लेनी हेगी। हमाए का पड़ी है कि तुम दाल मखानी में घी मिलाओ के डालडा। हमने कोइ जगत भर को ठेका ले रखो है कि तुमाए चूल्‍हा चौका में भी झांकते फिरेंगे। ठीक है हम होली के दिन में फालतू हो जाए हैं पर इत्‍ते भी नइ होते हैं कि जे काम भी करने लगें। तुमाए बालों पर तुम ग्रीस लगाओ चाए घासलेट का तेल छिड़को हमें का। हमें जदी गुस्‍सा आ गया तो हम कोस देंगे। कोस देंगे कि होली की रात को ठीक रात के साढ़े डेढ़ बजे तुमाइ प्रेमिका का कुत्‍ता तुमे सपने में आके काटे। तुमाइ पिंडली में पूरे दांत के निसान छोड़ दे। हां नइ तो ।

सूचना- लम्‍बरदार के हैंडपंप से पानी भरने वाले सगरे लोग लुगाइन को सूचित किया जाता है कि लम्‍बरदार का लड़का कवि हो गया है अब एक मटका भरने के लिए एक कविता सुननी पड़ेगी। सूचना समापत भई।

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जे कौन आइ रे बप्‍पा गंजी दीपिका पादूकोण। हमउ तो आज तक ना देखी रे ऐसी हीरोइनी। हमें तो लगे कि कोनो फिल्‍म ऐसी बन रइ हेगी जिसमें लेडी शाकाल को रोल हेगा जे के लाने जे पादुकोण आई हेगी।

तिलकराज कपूर

शतरंज की बाज़ी के शौकीन मिला दूँ तो
अब्बा  को तेरे अपने अब्बा का पता दूँ तो।

अम्मा  ही तेरी है जो,  हामी ही नहीं भरती 
होली में अगर उसको, कुछ भंग चढ़ा दूँ तो।

दूल्हा लिये जो घोड़ी, आनी हो तेरे दर पे
उसके लिये रस्ते में,  घोड़ा मैं पटा दूँ तो।

मैं सोच रहा हूँ ये, क्या दृश्य बनेगा जब
हथिनि सा बदन तेरा, हथिनि पे बिठा दूँ तो।

मॅंहगाई के आलम में, कलियॉं हैं बहुत मँहगी
जूड़े में तेरे गोभी का फूल लगा दूँ तो।
  

बत्तीस अभी पूरे बाकी हैं मेरे मुँह में
ऐ पोपली शहज़ादी, कुछ तुझको लगा दूँ तो।

महताब तेरा चेहरा, कुछ सुर्ख़ न हो जाये
मैं रंग मुहब्बत का थोड़ा सा लगा दूँ तो।

जे तो बो हेंगे जिनका काम एक घझल से तो चलता ही नहीं है। अभी तो इनकी एक और रखी हेगी। काय कि बासी होली भी तो मनानी है हम लोगन को । घोड़ा, हाथीकितने जिनावर भर रखे ह‍ैं अपनी घझल में । काय री पादुकोण का चिडि़याघरे से आ रह हेगी क्‍या। काय री कोन सी दुनिया में रेती हेगी। तेरे को पता नइ है कि इदर तो सोने चांदी से मंहगी सब्जियां हो रइ हैं। और तू जूड़े में गोभी का फूल लगाने की बात कर रइ हेगी। पता नहीं है कि गोभी़ का फूल खरीदने के लिए बैंक से लोन लेना पड़ता हेगा। हां नइ तो इत्‍ती झूठी घझल लिखी हेगी। मेरे से कोई बोले कि मेरे जूड़े में गोभी को फूल लगा दे तो मैं तो कहूं कि मैं तो प्रेमिका बदल लूं पर गोभी, न रे बप्‍पा जी कभी नइ।

सूचना : कल्‍लू की सास को रात कल्‍लू की भेंस ने सींग मार दिया है। जिन जिन लोग लुगाइन के घर में सास और भेंस दोनों हैं वे अपनी सास के सींग संभाल के रखें। सूचना समापत भई ।

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हमाए हस्‍पताल में एक नइ सिस्‍टर जी की भर्ती हुई हेगी। जे सिस्‍टर जी इल्‍लाहाबाद से आईं हेंगी। जे बचत के लाने रखी गईं हैं। काय कि जे अपनी आंख में दवाई डाल कर नज़रों से इंजेक्‍शन लगा देती हैं। तो सरकार को सूई सिरिंज का खर्चा बच रहा है।

सौरभ पाण्‍डेय

चुपचाप अगर तुमसे अरमान जता दूँ तो !
कितना हूँ ज़रूरी मैं, अहसास करा दूँ तो !

संकेत न समझोगी अल्हड़ है उमर, फिर भी.. 
फागुन का सही मतलब चुपके से बता दूँ तो

ये होंठ बदन बाहें रुख़सार बसंती हैं..
मैं रंग मुहब्बत का थोड़ा सा लगा दूँ तो ..?

तुम आँख दिखाओ पर होली है हुलासों की
मेरा है असर तुम पर.. ये शोर मचा दूँ तो !

इक चोर नज़र उसकी उलझी है दुपट्टे में
उस मीन पियासी को कुछ बूँद पिला दूँ तो !

जब रात गयी उठ कर कुछ बोल दिखे बिखरे
बिस्तर से उठा उनके अनुवाद सुना दूँ तो

मौसम के इशारे, हाँ !.. मैं खूब समझता हूँ
हर ढंग निभाऊँगा, कुछ फ़र्ज़ निभा दूँ तो

काय कि उमर चाय कित्‍ती भी हो जाए लेकिन फिर भी आदमी का सुभाव तो बदलबे से रओ। होंठ बदन बाहें। बुढ़ापे में किछू भगवान की बात करो लल्‍ला जी, जे काम तो भोत कर लओ। हम तो बड़े हैं सो के रए हैंगे और कोउ तो केने बाला भी नहीं है। पर जे उमर में अब किछू माला वाला जपने की बात करो। और राम तुम्‍हारी भली करे इत्‍ती बुरी घझल केने से तो अच्‍छा है कि किछू भजन लिखो। इल्‍लाहाबाद के अमरूद भोत फेमस हेंगे तो एसा करो कि अमरूद को जेम बनाबे को काम सिरू कर दो। हम सीधे सीधे नइ के पा रए हैं कि घझल लिखबी तुमाए बस की बात नइ हेगी। हमाइ मानो तो मानो नइ तो जाओ नाली में ससुर हमे का है। हम कोइ सलाह देने का किसान सलाह केन्‍द्र खोले हैं का।

सूचना :  परतियोगिता है कि जो ऊपर से चौथे नंबर के कवि के सिर पर बरफ की डिल्‍ली टिका देगा उको एक ठो फ्रीज भेंटई में दिया जाएगा। फ्रिज उको फ्ल्पि कार्ट से कैश आन डिलेवरी में खुदई बुक करना होगा और पैसा देकर छुडा़ना होगा। सूचना सिमापत भई। 

 hashmi ji girish ji copy

गिरीश पंकज, मंसूर अली हाशमी

रे दद्दा जे का बात भई जे तो किछू लब झिहाद को मामलो लग रओ हेगो। काय के हमे तो भोत डर लगे है इन मामलो से । हम तो किछू भी नइ बोलेंगे।

गिरीश पंकज

रंगों की नदी फिर से , अपने में बसा  दूँ तो
जीवन है बड़ा रूखा, अब इसको सजा  दूँ तो

मनहूस बड़े चेहरे, हँसते ही नहीं लेकिन
क्या दोगे मुझे बोलो, पत्थर को हँसा  दूँ तो

टूटेंगे सितमगर भी, ये कांच के घर हैं ना
बढ़ कर के कोई पत्थर , मैं भी जो उठा  दूँ तो

जो दूर खड़े वे,  हैं लख्तेजिगर अपने
क्या दोगे अगर उनको, मैं अपना बना  दूँ तो

होली जो बने 'होली', क्यों भेद रहे कोई
अलगाव के ये परदे, अब बढ़ के  हटा  दूँ तो

हो जाएगा दिल सुन्दर,  कितना है सरल पंकज
मैं रंग मोहब्बत का, थोड़ा-सा लगा दूँ तो

उइ अम्‍मा, उइ अम्‍मा, उइ अम्‍मा उइ अम्‍मा, जै क्‍या घझल लिख दी। हमें तो किछू भी समझ ही नहीं पड़ रही है। आपमें से किसी को एक भी लाइन सिमझ में आ जाए तो हमें सिमझाने की किरपा करें किरपा करके। उते छत्‍तीसगढ़ में क्‍या इत्‍ते सारे फत्‍थर हेंगे कि दो दो सेरन में फत्‍थर आ गए हेंगे। अरे इत्‍ते फत्‍थर हैं तो गिट्टी क्रेशर लगा दो चार पैसे घर में आएंगे। उसके लिए घझलन में फत्‍थर लाके हम लोग लुगाइन पे फत्‍थर मारबे की क्‍या झरूरत हेगी। क्‍या फत्‍थर अकल पे पड़े हेंगे। चों हमने कुछ गलत बात बोली क्‍या। और जे परदे उरदे हटाबे की बात कोइ भी न करे। हमाए बाथरूम में दिरवाजा नइ है जे के लाने हमने परदे लगाए है कोनो अलगाव के परदे नइ है बाथरूम के परदे हैं।

सूचना : कीमती लाल भटियारे की चौथी घरवाली की पांचवी लड़की का बाजूबंद गली में खुल कर गिर गया था जिसको कल एक गाय ने खा लिया है । बाजूबंद को पुन: प्राप्‍त करने का तरीका बताएं। सूचना समापत भई ।

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काय के जे फोटो फिर से लगाओ जा रओ हेगो।

मंसूर अली हाशमी

अब लाज का घूँघट जब, हट ही गया चेहरे से
मैं रंग मुहब्बन का, थोड़ा सा लगा दूं तो.. ?

दिलक़श हो हसीं भी तुम, इक रंगे हया भरने
रुख़्सार पे अधरों को थोड़ा सा सटा दूं तो  . . ?

पॉडर है लिपस्टिक है, क्या-क्या नही चेहरे पर !
गोबर सने हाथों को, गालो पे लगा दूँ तो ..?

'साहब' तो तुम्ही हो जी, क्या फर्क पड़ेगा अब
इक चाल उलट चल कर, 'प्यादे' को बिठा दूं तो..?

बिन पैसों के खाते भी, अब बैंक में खुलते है
'काले' ही को 'धौला' कर अब उसमें सजा दूं तो..?

होली के बहाने से,  छू कर तेरे जाने से
जो आग लगी दिल में, मैं उसको हवा दूँ तो..?

काय के जे का हो रओ हेगो। कोइ इते ए सर्टिफिकेट को मुशायरो चल रओ है का। हां नइ तो । रुखसार पे अधरों को सटाओगे जा उमर में। चचा मियां सारे रुखसार छिल जाएंगे आपकी दाढ़ी से हां नइ तो। सइ बात है कि दाढ़ी सुफेद होने के बाद कुछ मुलायम हो जाती है और पावडर के पफ का काम करती है। तो अच्‍छा होगा कि इस उमर में पाडर लगाओ अपनी दाढ़ी से उनके गालों पर। गोबर थेपने के लिए दाढ़ी की क्‍या झरूरत हेगी। आप तो अपनी घझल में ही इत्‍ते अच्‍छे गोबर थेपते हो कि क्‍या बोलें। इत्‍ते अच्‍छे उपले बन जाते हैं कि साल भर का काम चल जाता हेगा। उमर का लिहाज कर रए हेंगे नइ तो गुस्‍सा तो इत्‍ती आ रइ हेगी कि बस।

सूचना : हमाए घर के नल में से कल एक नेता हीटो हेगो । जिस किसी पारटी को बो नेता है बो पेचान के अपनो नेता ले जाए। हमाए घर के बागड़ पे सूख रओ है । पैचान : रंग काला, आत्‍मा काली, काम काले, पैसे काले। सूचना समापत भई ।

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जे कौन हेगा री मैया। जे किछू जाना पैचाना चेहरा तो दिख रहा है लेकिन जो जान पैचान वाले को हम जानते हैं उको तो पढ़बे लिखबे से कोनो दूर का रिश्‍ता नहीं है और इसके हाथ में तो पैन दिख रहा है। कौन है इ ससुर का नाती। माथा का नाम कपाल।

नीरज गोस्‍वामी

आँखों में तेरी अपने, कुछ ख़्वाब सजा दूँ तो
फिर ख़्वाब वही सारे, सच कर के दिखा दूँ तो

होली पे लगे हैं जो वो रंग भी निखरेंगे 
मैं रंग मुहब्बत का थोड़ा सा लगा दूँ तो

जिस राह से गुजरो तुम, सब फूल बिछाते हैं
उस राह प मैं अपनी, पलकें ही बिछा दूँ तो

कहते हैं वो बारिश में, बा-होश नहायेंगे
बादल में अगर मदिरा, चुपके से मिला दूँ तो ?

फागुन की बयारों में, कुचियाते हुए महुए
की छाँव तुझे दिल की, हर चाह बता दूँ तो

बस उसकी मुंडेरों तक, परवाज़ रही इनकी
चाहत के परिंदों को, मैं जब भी उड़ा दूँ तो

हो जाएगा टेसू के, फूलों सा तेरा चेहरा
उस पहली छुवन की मैं, गर याद दिला दूँ तो

उफ़! हाय हटो जाओ, कहते हुए लिपटेगी
मैं हाथ पकड़ उसका, हौले से दबा दूँ तो

इन उड़ते गुलालों के, सुन साथ धमक ढफ की
इल्ज़ाम नहीं देना , मैं होश गँवा  दूँ तो

मारूं घुटना फूटे आंख। इनकी एक डाली धतूरे की आई  है उसमें भी आपके गले की कसम इत्‍ती ही बुरी बुरी घझलें हैं। इमान से पुस्‍तक मेले में लोगों ने बुराइ को मिटाने की ऐसी कसम खाई कि डाली धतूरे की को खरीद खरीद के ही खतम कर दिया। हर कोई डाली धतूरे की खरीदता और गाता था। बुराई को मिटाना है जड़ से हमें मिटाना है। हमें पेले तो किछू सिमझ में नइ आओ कि कित्‍ती बुरी तो घझलें और उनको भी लोग बाग टूट टूट के खरीद रए हैं। बो तो जब हमने ध्‍यान से गाना सुना तो हमें सिमझ में आई कि ओ तेरी..... जो तो लोग पुण्‍य का काम करने के लिए खरीद रए हैं। अपन को क्‍या अपनी तो चज बिक रही थी। जे बात तो समझ में आई कि लोग आज भी बुराई को खतम करने के लिए कमर वमर सब कस के आते हैं।

सूचना : सिबना परकासन द्वारा परकासित 'डाली धतूरे की' को राष्‍ट्रीय आपदा घोसित कर दिया गया हेगा। इससे पेले की ये फैले इसकी रोकथाम के लिए काली गाय का सफेद गोबर लें उसे माइक्रोवेव में सुखाएं और फिर जला कर धूनी दें । सूचना समापत भई । 

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इनका भी एक घझल से काम नइ चलता है आप सबको पता ही हेगा कि कल भी सुरुआत में इनने एक पेली थी और आज अंत में एक और पेलने सज धज के आ गइ हेंगी। हमें का है कान तो आप लोग लुगाइन के खराब होने हैं।

राकेश खंडेलवाल

अभिनव की नई  शैली,अंदाजे बयाँ नीरज
माथे पे चमकता है, बन कर के तिलक सूरज
बिखराती सुधा बूँदें, हाथों की रची मेंहदी
ये सब मैं किताबों में शिवना से छपा दूँ तो
होली की चढ़ी मस्ती
ये रंग मोहब्बत का थोड़ा सा लगा दूँ तो

सिंगापुर में ब्रज है, सीहोर में बरसाना
राजर्षि बने गौतम, गाते हुए दोगाना
खोपोली में चंगों को, मस्ती में बजाता है
उसकी ये धुनें फ़िल्मी संगीत बना दूँ तो
मौसम का असर है अब
ये रंग मोहब्बत का चहरे पे लगा दूँ तो

बादामी चेहरों की, रंगत से गिरी ला के
तेवर की मिरच काली, फिर उसमें मिला कर के
दिल के सिलबट्टे पर, रख कर के उसे पीसूं
स्कॉच की गंगा की ठंडाई बना दूँ तो
फ़ागुन का तकाजा है
फिर रंग मुहब्बत का चहरे पे लगा दूँ तो

शाहिद का फटा कुरता, सौरभ है चढ़ा अंटा
द्विज छानें शिवबूटी, मंदिर में बजा घंटा
पूजा की सुलभ थाली, में छोले भठूरे रख 
पारुल की बनी गुझिया दस बीस उड़ा लूँ  तो
पिचकारी में भर खुनकें
फिर रंग लगा कर मैं खुद को ही छुपा लूँ तो ?

जे का है भैया, जे का है, हमें कोइ बताए कि जे का है । ठीक है कि हम कबाड़ का धंधा करते हैं । पर कबाड़ का धंधा करते हैं कचरे का नहीं। आपके गले की कसम इत्‍ता बुरा कचरा तो पूरे वाशिंगटन में भी वाश करो तो टन भर ना मिले। काय की भैया हम तो पक गए थक गए। सब लोग लुगाइन ने जे सोच ली है कि हमाए पास तो कोई ठेका है बुरी बुरी चीजों को सुनने का। हम अब नइ सुनेंगे। हमाए कान अब के रए हैं कि वो अन्‍ना हजारे के पास जा रए हैं आंदोलन करने के लाने। काय कि जो हमने कल बताई थी कि हमाए दोनों कानों से रात भर उल्‍टी होती रही। रात भर घझलें, शेर, मिसरे हमाए कानों में से निकलते रए, निकलते रए। हम तो जान भी नहीं पाए कि जे हो कां से रहा है। जे कल आए थे आज फिर आ गए एक लेके। हमाइ छोटी सी जान पे आफत पाड़ने।

सूचना:  कल्‍लन खां की जो लूंगी पिछली होली में गुम गई थी और जिसको लेकर भोत तनाव चल रिया था वो लूंगी मिल गई है। पता जे चला है कि कल्‍लन खां वो लूंगी पहने हुए थे। इस बार होली पर जब वो नहाए तो पता चला। सूचना समापत भई।

7

रंगों और उमंगों का यह पर्व होली आपके जीवन में सुख शांति समृद्धि और स्‍वास्‍थ्‍य के सभी रंग बिखेरे। आपका जीवन रंगों से सराबोर रहे, रसों से रसाबोर रहे। हर आपकी रचनाओं में सारे रस छलकते रहें, महकते रहें। आप यूं ही सिरजते रहें, लिखते रहें। सारे विश्‍व में शांति हो, सारे विश्‍व में हर दिन होली हो, ईद हो, हर रात दीवाली हो। सब हिलमिलकर रहें । यह दुनिया फिर से इन्‍सानों के रहने योग्‍य बने। हम सब फिर से इन्‍सान बनें। आमीन ।

होली है होली है बुरा न मानो होली है।

11 टिप्‍पणियां:

  1. ग़ज़ल फज़ल पर टिपानिया बाद में अभी ये बतावां की खातिर आये हैं की लोट पॉट तलक तो फिर भी ठीक था ससुरी आँखों से पानी रुकने का नाम नहीं ले रहा।।कोनों सफियों बाद हसत रहे इत्ता। गुझिया की कसम फोटुग्राफरवा के लिए रोम रोम से दुआएं फूटत रही ।।।।। धनबाद
    सादर
    पूजा

    उत्तर देंहटाएं
  2. सभी मित्रों को बुरा न मानो होली की शुभकामनाएँ। क्या ग़ज़लें हैं। क्या पोस्ट है। क्या भंग है। क्या तरंग है। हम तो भौंचक्के हैं। हा हा, हू हू, ही ही, हे हे, हं हं, हः हः। बस हर तरह से हँस रहे हैं।

    शाम को भंग चढ़ाते हैं खेल कर होली
    फिर तो हर रंग में हँसते हैं सहर होने तक

    हा हा, हू हू, ही ही, हे हे, हं हं, हः हः

    उत्तर देंहटाएं
  3. हा हा हा हा ही ही ही ही हू हू हू हू ........ भाई .....ग़ज़ब !!!!!!!

    उत्तर देंहटाएं
  4. हा हा हा हा. रचनो से ज़्यादा आनंद रचनाओ की अद्भुत और रंजक प्रस्तुति में आया . कमाल कर देते हो भाई, सुबीर, इस प्रतिभा के लिए अंतहीन शुभकामनाए . सारी रचनाएँ लाज़वाब है (मेरी तो बस यूं ही थी) , कल की भी, आज की भी. सभी रचनाकारों को होली की बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  5. रंगों के महापर्व होली की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शुक्रवार (06-03-2015) को "होली है भइ होली है" { चर्चा अंक-1909 } पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  6. पुनः पुनः अद्भुत !
    इस शान से होलिका फुआ फुँकीं .. इस मान से बबुआ प्रह्लाद आया.. भाया.. !
    भाया भइया भाया.. दिलखुश बोलों से दिल खोल कर रख दिया.. हम हँस-हँस के दुहरे हुए जा रहे हैं..

    अबके नये साल के आगमन से प्रत्याशा बनी थी, सबके जीवन में प्रसन्नता समृद्धि और सुख-शांति आवे.

    शुभ-शुभ-शुभम्

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  7. अब हंसी रुकने का नाम ले तो कुछ टिपियायें भी ... गजलें इतनी लाजवाब और बे-इन्तहा हंसाने वाली भी हो सकती हैं पता नहीं था ...
    लग रहा है जैसे डूब गया हूँ रंगों के समुन्दर में और ऊपर से बारिश भी हो रही है गुलाल की ... नीरज जी, मंसूर अली जी, सौरभ जी, गिरीश जी तिलक राज जी ... नकुल, पारुल और सुमित्रा जी ... और ... श्री श्री राकेश जी ने तो ऐसी रस बहाई है आज की बार बार गीला हो रहा हूँ ....
    होली का मज़ा सर चढ़ के बोल रहा है ... अब कल, परसों तो हमारी छुट्टी है ... होली का मज़ा भी लेना है ... तो सबको बहुत बहुत होली की शुभकामनायें ...

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  8. हा हा हस हा हा हस हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हाहा हा हा हस हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हस हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हाहा हा हस हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हाहा हा हस हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हाहा हा हा हा हस हा हा हा हा हस हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हाहा हा हस हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा
    हा हा हस हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हाहा हा हस हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हाहा हा हस हा हा हा हस हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हाहा हा हस हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा
    हा वाह वाह क्या ग़ज़ले हैं (बच्ची की छोड के) और क्या कमेन्टरी,,,,,ऐसा कंही देखा ना सुना।
    सभी को होली की बहुत. बहुत शुभकामनाएं। राकेश जी गुझिया तो बनी पर दही बडे? भूल गए आप।

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  9. ये दाढ़ी हमें बचाय लिये है , नय तो अच्छे भले मर्दुए यहॉ ,सुबीरन चौपाल मा ज़नानियों में परिवर्तित होइ गवा है..

    और हॉ , मुद्दइ सुस्त , गवाह चुस्त यानि........ ग़ज़लकारों पर तो कॉमेंटरी हावी है, बहुत ख़ूब, मज़ेदाऱ, लज़्ज़तदार, होलीदार !

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  10. मोसम या कहिये कि 'होली'  का ख़ुमार उतरते ही सोच में भी अजीब सा बदलाव आ रहा है...... जो इस तरह व्यक्त हो रहा है.....

    सोई हुई उम्मत को मैं  फिर से जगा दूं तो ..?
    हथियार के बदले फिर क़ुरआन थमा दूं तो..?

    उजड़ी हुई बस्ती को मैं फिर से बसा दूं तो
    भूखों को फकीरों को दो लुक़्मे खिला दूं तो

    तलवार से लफ्ज़ों की जो चाक़ हुए हैं अब
    टूटे हुए रिश्तों को मैं  फिर से जुड़ा दूं तो

    मायूस बुढ़ापो को जीने की अदा दूं तो
    रोते हुए बच्चों को मैं फिर से हंसा दूं तो

    पहला वो मिलन तुझसे, भूलेगा नही फिर भी
    गुज़रे हुए लम्हों की फिर याद दिला दूं तो

    ज़हनो पे पड़े जाले,  विद्या से हटा दूं तो
    अक़्लों पे पड़े ताले 'सिम'  कह के खुला दूं तो.
    ........ अरे!   ये क्या ?...... फिर से 'पंचमी'   की आहट सुनाई दे रही  है..... और  विचारों  मे भटकाव आ रहा है.....

    "बयमानो को संसद से, अपनी जो भगा दूं तो?
    भ्रष्टों को अगर सारे,  दौड़ा के हगा दूं तो! "

    ख़ुदा ख़ैर करे !

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