शनिवार, 2 अगस्त 2008

अगर आप कवि हैं शायर हैं तो कहीं ये बातें आप में भी तो नहीं हैं अगर हैं तो समय रहते दूर कर लीजिये

पिछले दिनों एक मुशायरे में जाने का मौका मिला और वहां पर एक सज्‍जन से मिलने को अवसर भी मिला इनसे मिलने की इच्‍छा काफी दिनों से थी । ये सज्‍जन ग़ज़ल को लेकर काफी काम कर रहे हैं । मगर मिलने के बाद एक ही बात मन में आई कि इनसे फिर न ही मिलना हो तो अच्‍छा है । क्‍यों लगा ये तो हम आगे बात करेंगें पर  मुझे ऐसा लगा कि कहीं मैं ग़लत तो नहीं हूं पर जब मेरी दूसरे शायरों से बात हुई तो लगभग सभी का ये ही मत था जो मेरा था । मैंने सोचा कि आखिर क्‍या ग़लत था उस व्‍यक्ति में जो कि इतने अच्‍छे काम करने के बाद भी लोग उसे इस तरह से ले रहे हैं । दरससल में उसमें कुछ ऐसी कमियां थीं जो कि किसी को भी समस्‍या दे सकती हैं । आइये उनमें से कुछ के बारे में बात करते हैं

1) कहीं भी किसी भी स्‍थान पर कविता या शेर सुनाने से बचें

हर शायर अपना नया कलाम सबको सुनाना चाहता है और उस पर सबकी प्रतिक्रिया चाहता है परन्‍तु उसके लिये अवसर की प्रतिक्षा करनी चाहिये ये नहीं कि कहीं भी किसी भी स्‍थान पर सुनाने लग जाएं । अंग्रेजी का एक शब्‍द है इरीटेट करना । दरअसल में हम सामने वाले को ये ही कर देते हैं जब हम ऐसा कुछ करते हैं । हर आदमी हर समय कविता के मूड में नहीं होता है । मेरे एक और शायर मित्र हैं वे तो नई ग़ज़ल लिखने के बाद इतने उत्‍तेजित हो जाते हैं कि तुरंत निकल पड़ते हैं और जो भी पहला आदमी मिलता है पान की दुकान पे चाय के स्‍टाल पर उसे वहीं सुना देते हैं । इससे दो नुकसान होते हैं पहला व्‍यक्तिगत और दूसरा साहित्‍य का । व्‍यक्तिगत तो ये कि आपसे लोग कतराने लगते हैं । और दूसरा ये कि आप साहित्‍य को इतना हल्‍का कर रह हैं कि स्‍थान भी नहीं देख रहे हैं । कविता इतनी सस्‍ती चीज नहीं है कि कहीं भी हो जाए । कविता तो सबसे गरिमामय शै: है जिसे हर कहीं पढ़ कर आप अपना और कविता दोनों का ही नुकसान कर रहे हैं ।

2 अपनी तारीफ करने का मौका दूसरों को दें

 ये एक बड़ी बुराई है जो कवियों और शायरों में आ जाती है । ये उन सज्‍जन में तो कूट कूट कर भरी थ्‍ज्ञी जिनका जिक्र पहले पेरा में किया है । भोपाल में रहने वाले एक विश्‍व विख्‍यात शायर में तो ये इतनी है कि जब भी आप उनसे बात करेंगें तो विषय एक ही होगा वे स्‍वयं । वे कहते हैं कि ग़ालिब और मीर के तो कुछ ही शेर लोगों को याद हैं पर मेरे तो कई कई शेर लोगों की जुबान पर चढ़े हुए हैं । हांलकि से सच भी है पर बात वहीं है कि ये कहने का मौका दूसरों को दें । जब मैा उनसे बात करता हूं तो बस उन पर ही बात होती है । पहले ऊपर जिन शायर का जिक्र मैंने किया है उनमें भी ये ही ख्‍ब्‍त थी वे भी केवल अपनी ही बात करना पसंद करते थे । बात का विषय घूम कर वापस वे अपने पर ही ले आते थे । मैंने ऐसा किया मैंने वैसा किया वगैरह वगैरह । इतना मैं कि परेशानी ही हो जाए । वो ये नहीं जानते कि मैं मैं करने वाले बकरे को आखिरकार ईद पर काट ही दिया जाता है ।

अब नहीं कोई सुखनवर सब यहां हैं बकरियां, देखिये तो कर रहा मैं मैं यहां पर हर कोई

3 शेर कहने से पहले ये भी ध्‍यान दें

 मेरे एक मित्र हैं जो शेर कहने से पहले ये जरूर कहते हैं कि ये शेर मैंने बहुत अच्‍छा लिखा है । अब ये कहने की क्‍या जरूरत है । शेर तो संसद के पटल पर आ रहा है अच्‍छा है या बुरा ये तो श्रोता खुद ही तय कर देंगें । आप खुद न कहें । कई बार क्‍या होता है कि हम कोई शेर कहने ये पहले ही इतनी भूमिका बांध देते हैं कि लोगों को उससे बहुत उम्‍मीद हो जाती है और अगर खोदा पहाड़ वाली कहावत जैसा कुछ हो जाता है तो आपको दिक्‍कत हो जाती है । कई बार आपके तारीफ करने के कारण आपके शेरों को वो दाद नहीं मिल पाती जो मिलना है । मरे एक बुजुर्ग शायर मित्र हैं जो काफी अच्‍छे शेर कहते हैं और लहजा भी अच्‍छा है उनकी एक विशेषता ये है कि वे बस शेर पढ़तें हैं बातचीत नहीं करते हैं ।  मेरे पूछने पर उन्‍होंने कहा कि मियां सामईन खुद ही तय करेगा ना कि आप कितने पानी में हैं । और फिर जब आप कोई बहुत अच्‍छा शेर बिना किसी भूमिका के पढ़ देते हैं तो श्रोता जो अचानक चौंक कर मजे लेता है वो आनंद ही अलग होता है ।

4 विनम्र रहें

 न बन पा रहे हों तो कुछ दिन के लिये  राकेश खण्‍डेलवाल जी, नीरज गोस्‍वामी जी, समीर लाल जी और अभिनव शुक्‍ला  से कक्षाएं ले और सीखें कि विनम्र कैसे बना जाता है । विनम्रता हमें हमेशा ही फायदा पहुचाती है । कई बार ये होता है कि हम अपने अंदर के साहित्‍यकार को मार देते हैं केवल इसलिये ही क्‍योंकि हम विनम्र नहीं होते हैं । एक पुरानी कहावत को हमेशा याद रखें कि फलों से लदा हुआ पेड़ हमेशा झुका रहता है ( उदाहरण : राकेश खण्‍डेलवाल जी )  ।  अपने को ऐसा बनाएं कि लोग एक बार मिलने के बाद आपसे फिर मिलने कि इच्‍छा रखें ( उदाहरण : समीर लाल जी ) ।

5 दूसरों को भी सुनें

 ये एक बड़ी समस्‍या है जो इन दिनों के कवियों और शायरों में आ रही है कि वे ये तो चाहते हैं कि उनको सब सुनें पर वे किसी को भी नहीं सुनें । जब दूसरा पढ़ रहा होता है तो या तो वे ध्‍यान नहीं देते हैं या बात चीत में लग जाते हैं । आप अपने लिये जो चाहते हैं वो ही दूसरों को भी दें हमारा व्‍यवहार एक रबर की गेंद होता जितनी ताकत से दीवार पर मारेंगें उतनी ही गति से वापस हमारे पास आएगा । दूसरों की हौसला अफजाई करें और इस तरह के भाव रखें कि उसे लगे कि आपका पूरा ध्‍यान उस पर ही केन्द्रित है आप पूरे गौर से उसको सुन रहे हैं । विशेष्कर नई प्रतिभाओं को प्रोत्‍साहन ज्‍रूर दें । मेरे एक बुजुर्ग शायर मित्र हैं वे एक दिन एक नए शायर की ग़ज़ल पर झूम झूम कर दाद दे रहे थे । बाद में मैंने कहा कि चचा मियां लड़का तो बेबहर था और इस कदर दाद तो वे बोले मियां लौंडा आज ग़ज़ल में आया है कल बहर में भी आ जाएगा अगर आज ही हमने उसका हौसला तोड़ दिया तो कहींका नहीं रहेगा वो ।

6 सलाह और सुझाव सुनें जरूर

 कई बार ऐसा होता है कि हमारा कोई मित्र शायर हमें कुछ सुझाव देता है कि फलां शेर कमजोर है उसे फिर से करके देखों या बात पूरी नहीं हो रही है तो हम उसको ऐसे देखते हैं जैसे कि कोई दुश्‍मन हो । हम अपने लिखे को सर्वश्रेष्‍ठ मानते हैं और उस चक्‍कर में अपना ही नुकसान कर लेते हैं । पिछले दिनों कहीं पर मैंने ग़ज़ल सिखाने का काम शुरू किया था पर वही समस्‍या आई कि हर कोई अपने लिखे को ही श्रेष्‍ठ माने तो कैसे काम चलेगा । जो ये कह रहा है कि कुछ बात जमी नहीं उस पर ध्‍यान दें और ये सोचें के उसने ये क्‍यों कहा । सीखने की प्रक्रिया को जीवन भर जारी रखें ( उदाहरण : नीरज गोस्‍वामी जी )  और अपने लिखे को कभी भी अंतिम न माने । कई मशहूर शायरों की आप जीवनी पढ़ेंगें तो पता चलेगा कि वे लिखते थे फाड़ देते थे तब तक जब तक कुछ मुकम्‍मल सा  न बन जाए ।

चलिये आज के लिये इतना ही अगले अंक में और कुछ कमियों की चर्चा करेंगें ।

11 टिप्‍पणियां:

  1. पंकज जी
    एक दम सही बात लिखें है आप,
    हमारा नाम दो बार दिए ये ठीक नहीं...पहले हमें जानिए मिलिए देखिये फ़िर राय कायम कीजिये...आप की ये कमी बिना खोपोली आए दूर ना हो पायेगी. "हर जो चीज चमकती है उसको सोना नहीं कहते" पीतल और सोने की परख के लिए दूर से देखने से काम नहीं चलता...ऐसा बड़े बुजुर्गों ने कहा है....राकेशजी से तो मिला नहीं लेकिन उनकी रचनाएँ उनके बारे में बहुत कुछ कह जाती हैं और समीर जी से गले भी मिल चुका हूँ और पढ़ भी चुका हूँ इसलिए उन दोनों के बारे में आप के उदगार शत प्रतिशत सही हैं...
    बाकि जो कमियां आप ने बताई हैं उन्हें ढ़ूढ़ ढूंढ़ कर दूर किया जाएगा.
    नीरज

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  2. आपने बहुत ही सही लिखा है। हम सबको इन बातों का ध्यान रखना चाहिए। इतनी अच्छी बातें बताने के लिए आभार।

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  3. वाह जी ये गलत बात है, मतलब हम पहले दूसरो की कविता सुने विन्रम बने रहे, और जब हमारा नंबर आये सुनाने का , अगला चलदे . नही जी हम आपके कहे मे इस बारे मे नही आने वाले. अच्छा शायर वही है जो श्रोता मिलते ही अपनी शायरी उडेले और पतली गली से निकल ले :)

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  4. सारी बातें सटीक पंकज भाई.
    और एक निवेदन....
    पहली बात कि अपनी ही रचनाएँ पढ़ें;
    और यदि किसी का कोई शेर,मुक्तक,दोहा या छंद पढ़ें तो बहुत सतर्कता से कवि/शायर के नाम का उल्लेख करें इस मामले में मैं डॉ.शिवमंगलसिंह सुमन का उल्लेख करना चाहूँगा कि वे इतने आदरणीय,समर्थ और विश्वसनीय थे कि चाहते तो कई रचनाएँ यूँ ही पढ़ देते लेकिन तुलसीदार,मजाज़,जिगर,दिनकर,महादेवी,पंत,ग़ालिब,मीर,इक़बाल,जोश,फ़िराक़ ...आदि आदि (कितने भी नाम लूंगा तो भी काफ़ी सारे छूट जाएंगे)के पदों/शेरों का ज़िक्र करते समय हमेशा डॉ.सुमन इन कवियों का पूरी श्रध्दा से नाम लेते थे.
    यदि अपनी अच्छी बात के लिये श्रेय की दरकार है तो किसी और का हक़ भी मत छीनिये.

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  5. गुरूजी एक और नये पाठ का शुक्रिया....कितनी सही बात है......आपको जानने के बाद से दुनिया ही बदल गयी है मेरी

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  6. पुनःश्च:-और भोपाल के जिस शायर का जिक्र आपने किया,यूं उनके हम सब प्रशंसक हैं...मगर उनकी इस खास आदत के बारे में और शायरों से भी सुन चुका हूं......और आप बहर की आगे की क्लास कब शुरू कर रहे है.....आपकी टिप्पणीयों का बेसब्री से इंतजार है

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  7. गुरु जी सतत नमन है आपको
    मै समझ गया की आखरी की लाइनें क्या कहना चाह रही है और मेरे कई सरे प्रश्नों का उत्तर भी दे रही है ये लाइनें
    खास कर
    (पिछले दिनों कहीं पर मैंने ग़ज़ल सिखाने का काम शुरू किया था पर वही समस्‍या आई कि हर कोई अपने लिखे को ही श्रेष्‍ठ माने तो कैसे काम चलेगा)

    अब केवल एक प्रश्न का उत्तर बचा है जो मै समझ गया हूँ की समय के कारागार में बंद है हो सके तो उसकी सज़ा कुछ कम कर दे महती कृपा होगी

    सतत नमन है आपको सतत नमन
    ....................वीनस केशरी

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  8. आपके द्वारे पहली बार आया। आनंद आया पढ़कर।
    मथुरा कलौनी

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  9. guru ji pranaam,
    kya aapko pata hai ki aapke dvara likhit hindi ugm ke lekho ko ek sajjan hobahoo
    copy karke apne blog par chaap rahe hai......

    kripya dekhen....

    http://sangeetmasoom.blogspot.com

    ..................venus kesari

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  10. सबसे पहले तो उन सज्जन को नमन जिनका जिक्र वीनस जी द्वारा किया गया...! इतना साहस रखना भी अपने आप में क़ाबिल-ए-तारीफ है। ब्लॉग जगत में गज़ल की विधा में रुचि रखने वाला व्यक्ति पंकज सुबीर के नाम से शायद ही अनभिज्ञ हो और उनकी कक्षाओं को बिना किसी reference बिना किसी सूचना के हू-ब-हू अपने ब्लॉग पर चस्पा कर देना है तो जज़्बे का काम। यहाँ तक कि तनाव इत्यादि का भी जिक्र उसी स्टाइल में जिस में गुरू जी ने किया, लेकिन भैये थोड़ी क्रिएटिविटी की कमी हैं आप में। ऐसे थोड़े ना करते हैं। कुछ अपना भी रैपर लगाया होता तब बनती बात..खैर आगे से याद रखना...!

    गुरू जी आप की दी हुई सीख के अनुसार आत्मविश्लेषण करके सर्वप्रथम खुद को ही सँवारने की कोशिश करूँगी...!

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  11. subir ji aapne behad achha likha hai .globlisation ke yug me kavion ka bhi personality development hona chaahiye.inhi kamion ki vajah se maine kavi-goshthion me jana chhord diya hai.apne office me sahitya ki baat karte hue bachati hoon

    sangeeta sethi

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