सोमवार, 6 अगस्त 2012

तरही के समापन से ठीक पहले का ये अंक जिसमें श्री अश्विनी रमेश जी की एक ग़ज़ल और आदरणीया लावण्‍या शाह जी की मुक्‍त छंद कविता ।

हर चीज़ अपनी उम्र लेकर आई है । धीरे धीरे समापन की और बढ़ना सबकी नियति है । किन्‍तु इस नियति के बीच जीवन को जी लेना उसके आनंद को अपने अंदर संचित कर लेना यही रसिक होने की पहचान है । रसिक शब्‍द को बहुत ग़लत तरीके से लिया जाता है । रसिक शब्‍द का अर्थ होता है कला के हर रूप के रस का पान करने वाला । वो जो बांसुरी से लेकर ग़ज़ल तक हर कला का रसिया हो । रस जो हर कहीं बिखरा पड़ा है । और जिसके बिना जीवन नीरस हो जाता है । ये जो नई पीढ़ी आ रही है कम्‍प्‍यूटर और इंटरनेट की मुझे इनके लिये बस एक ही दुख है कि सब कुछ होते हुए भी इनके जीवन में रस नहीं है । मैं सोच कर ही कांप जाता हूं कि 40 साल की उम्र तक आते न आते इनका जीवन कैसा हो जायेगा । बाकी सब चीजें उबा देती हैं लेकिन कला और उसका रस कभी नहीं उबाता ।

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प्रीत की अल्‍पनाएं सजी हैं प्रिये

आज हम दो रचनाएं सुनने जा रहे हैं । इनमें से एक ग़ज़ल है तो दूसरी छंदमुक्‍त कविता है । श्री अश्विनी रमेश जी और आदरणीया लावण्‍या शाह जी तरही मुशायरों के सुपरिचित हस्‍ताक्षर हैं सो किसी परिचय की आपश्‍यकता नहीं है  ।

ashwini ramesh ji

अश्विनी रमेश

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प्रीत की अल्‍पना यूं सजी है प्रिये
वस्ल की आस फ़िर से बंधी है प्रिये

मैं पपीहा बना ही रहा उम्र भर
प्रेम की सिर्फ इक बूंद पी है प्रिये

मानता हूँ कि तुम हो बहत दूर पर
दिल में चाहत मिलन की बड़ी  है प्रिये

हीर रांझा अगर हम न  हों क्या हुआ
प्रीत किसको नहीं बांधती है प्रिये

वो बसन्ती महकते गुलों की खुशी
आशना की अजब सी खुशी है प्रिये

ये सुरीली मधुर धुन सुनो तो ज़रा
प्रेम की बज रही बांसुरी है प्रिये

प्रेम की डोर बांधे न हमको अगर
तो ये नीरस बड़ी जिन्दगी है प्रिये

सुंदर ग़ज़ल कही है अश्विनी जी ने । पपीहे द्वारा प्रेम की एक ही बूंद पीने का चित्र बहुत सुंदर बन पड़ा है । प्रेम की डोर यदि न बांधे तो जिंदगी के नीरस होने की बात खूब तरीके से कही गई है । अश्विनी जी को इस तरही के दौरान ही एक गहन दुख का सामना करना पड़ा । लेकिन उन्‍होने खेल भावना का प्रदर्शन करते हुए अपनी ग़ज़ल तरही के लिये भेजी उसके लिये हम उन्‍हें सैल्‍यूट करते हैं ।

lavnya di

आदरणीया लावण्‍या शाह जी

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प्रीत की अलपनाएं सजी हैं प्रिये
आ भी जाओ प्रिये आ भी जाओ
मौन हो तुम, कहूंगा तुम्हें बार बार
आ भी जाओ प्रिये आभी जाओ
थे मूंदें नयन में जो सपने पले
वे  सपने मैंने औ' तुमने बुने
सजा आरती साँसों की ओ प्रिये
वे पल छीन जो मैंने औ तुमने गिने
सुख हो या दुःख वे हमने पल जिए
अब ना दूरी रहे सफर पूरा ये कटे
आ भी जाओ प्रिये आ भी जाओ
नील नभ तारक सी  जगमगाती
हरी दूब सी सिहर लहराती
सिंदूरी संध्या सी हो लजाती
शुक्र चन्द्र  युति झिलमिलाती
धानी चुनरिया सरसराती हुई
आ भी जाओ प्रिये आ भी जाओ
नव रंग नव रस नव उमंग लिए 
प्रीत की अलपनाएं सजी हैं प्रिये
कल्पना सी सजी अलपनाएं हैं
प्रीत के हर रंग हैं तुम्हारे प्रिये
आ भी जाओ प्रिये आ भी जाओ

बिसरा दिये गये शब्‍दों का प्रयोग करके लावण्‍या जी अपनी रचनाएं कहती हैं । इस रचना में भी नील नभ तारक, शुक्र चन्‍द्र युति जैसे शब्‍द सुंदरता के साथ आये हैं । वे छांदिक और छंदमुक्‍त के बीच की विधा में रचनाएं कहती हैं । उनकी रचनाएं हिंदी गीतों के स्‍वर्णयुग की ध्‍वनियां लिये होती हैं । इस रचना में भी वही बात है । सुंदर बहुत  सुंदर ।

अगले अंक में तरही का समापन होगा ।

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