शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2009

कल के सारे शायरों ने समां बांध दिया दीपावली को साकार कर दिया, आज कंचन चौहान, अभिनव शुक्‍ला, गौतम राजरिशी, रविकांत पांडेय, प्रकाश अर्श तथा अंकित सफर की ग़ज़लें ।

कल से ही तेज बुखार ने पकड़ लिया है । उसीके कारण रात भर का जागरण भी हो गया । किन्‍तु आज की पोस्‍ट लगाने आना ही था सो उठकर आफिस में आया हूं ताकि आज की पोस्‍ट लगा सकूं । कल के पांचों ही शायर धमाका करके गये हैं और आज तो छ: रचनाकार हैं । ये सारे रचनाकार ग़ज़ल की पाठशाला के नियमित विद्यार्थी हैं । पिछले दिनों अभिनव की भारत यात्रा के दौरान ये सब प्रकाश के दिल्‍ली स्थित निवास पर इकट्ठे हुए थे तब का ये फोटो देखिये और फिर सुनिये इन सबकी ग़ज़लें ।

all 5 copy

कंचन, अंकित, गौतम, रवि, अभिनव और प्रकाश

दीप जलते रहें झिलमिलाते रहें

diwali2

अंकित सफर

साथ बीते वो लम्हें सताते रहे.
दूर जब तुम गए याद आते रहे.
इक बनावट हँसी ओढ़ ली हमने भी
दर्द जो दिल में था वो छिपाते रहे.
आसमाँ छूने का ख्‍वाब दिल में सजा
हम पतेंगे ज़मीं से उडाते रहे.
दांव पेंचों से वाकिफ नहीं चुगने के
वो परिंदे नए चहचहाते रहे.
खौफ हासिल हुआ हादसों से मुझे
ख्वाब कुछ ख्वाब में आ डराते रहे.
एक शरारत दुकां ने करी उससे यूँ
कुछ खिलोने उसे ही बुलाते रहे.
आंधियां हौसलों को डिगा ना सकी
दीप जलते रहे झिलमिलाते रहे

277115835_005ee4a967a

प्रकाश अर्श

दीप जलते रहे झील मिलाते रहे
हम अजाबों से इनको बचाते रहे
वो हमें इस तरह आजमाते रहे
शर्त हमसे लगा, हार जाते रहे
उंगलियाँ इसलिये खुबसूरत हुई
प्यार का नाम लिखते मिटाते रहे
मिल गया है उन्‍हें पैर में घाव लो
फूल कदमों तले जो दबाते रहे
हम बहुत दूर तक लो कदम से कदम
फासले दुश्मनी के मिटाते रहे
मखमली बिस्तरें देख घबरा गए
रोड पर जो दरी को बिछाते रहे
खींच दूँ और चादर तो फट जायेगी
पेट पैरो में अब तक छुपाते रहे
अर्श चिठ्ठी नहीं देता है डाकिया
टकटकी द्वार पर हम लगाते रहे

diwali_1_800x600

रविकांत पांडेय

चोट पर चोट यूं दिल पे खाते रहे
आदतन हम मगर मुस्कुराते रहे
भूख लाई उसे गांव से शहर में
पर उसे नीम बरगद बुलाते रहे
जाने क्यूं देखकर आइना देर तक
आप ही आप से वो लजाते रहे
आइये आइये आइये आइये
करके सज़दे उन्हे हम बुलाते रहे
नींद आई नहीं रात भर याद के
दीप जलते रहे,
झिलमिलाते रहे
चांदनी रात में प्रीत की वो कथा
सिन्धु-तट पर हमें वो सुनाते रहे
दर्द से छटपटाते रहे मेमने
भेंड़िये नोचकर जिस्म खाते रहे
राम का नाम लेकर वो बगुला-भगत
मछलियों को निशाना बनाते रहे
जब भी बिजली,
सड़क की हुई बात तो
बीरबल की वो खिचड़ी पकाते रहे
हमने खोजा बहुत आदमी ना मिला
कुर्सियां सिर्फ़ शैतान पाते रहे

0701Fireworks

कंचन चौहान

आप आये हैं तो आप आते रहें,

जिससे जी भर के हम मुस्कुराते रहें।

आप बन कर के साधन मेरी साधना,

साध्य तक साध कर के सुनाते रहें।

मेरे, तेरे नही, सब के आँगन में ही,

दीप जलते रहें, झिलमिलाते रहें।

लक्षमी बन के धन, घर में बरसे तो मन,

गणपती ही हमारा चलाते रहें।

ऐसी कोई हवा, अब बहा दे खुदा,

प्रेम देते रहें, प्रेम पाते रहें।

आपके हाथ में है क़लम तो ज़रा,

वीर गाथा भी सबको सुनाते रहें।

लाइये, लाइये दिल हमारा हमें,

चीज़ ये वो नही जो लुटाते रहें।

दिल में सागर बहुत,आँख में घन बहुत,

उम्र भर रोयेंगे, वो रुलाते रहें।

diwali-festival

गौतम राजरिशी

रात भर चाँद को यूँ रिझाते रहे

उनके हाथों का कंगन घुमाते रहे

इक विरह की अगन में सुलगते बदन

करवटों में ही मल्हार गाते रहे

टीस, आवारगी, रतजगे, बेबसी

नाम कर मेरे, वो मुस्कुराते रहे

शेर जुड़ते गये, इक गज़ल बन गयी

काफ़िया, काफ़िया वो लुभाते रहे

टौफियाँ, कुल्फियाँ, कौफी के जायके

बारहा तुम हमें याद आते रहे

कोहरे से लिपट कर धुँआ जब उठा

कमरे में सिमटे दिन थरथराते रहे

मैं पिघलता रहा मोम-सा उम्र भर

इक सिरे से मुझे वो जलाते रहे

जब से यादें तेरी रौशनाई बनीं

शेर सारे मेरे जगमगाते रहे

बात तेरी, तेरा जिक्र, तेरा ही नाम

इक सदी से ये हम गुनगुनाते रहे

सुब्‍ह के स्टोव पर चाय जब खौल उठी

ऊँघते बिस्तरे कुनमुनाते रहे

उनके आने के वादे पे ही रात भर

दीप जलते रहे, झिलमिलाते रहे

Dev Deepavali

अभिनव शुक्‍ला

दोस्ती अपने दिल से निभाते रहे,
प्यार करते रहे चोट खाते रहे,
हादसा, हादसा, हादसा, हादसा,
लोग आते रहे, लोग जाते रहे,
क्या हुआ, क्यों हुआ, जो हुआ, सो हुआ,
बात सुनते रहे, कंपकंपाते रहे,
मैं नदी में खड़ा गुनगुनाता रहा,
दीप जलते रहे, झिलमिलाते रहे,
चांदनी घर की छत पर बिखर सी गयी,
जो अँधेरे थे वो मुंह छुपाते रहे.

आनंद आ गया सभी ने अद्भुत शेर निकाले हैं । आंधियां हौसलों को डिगा ना सकी, प्यार का नाम लिखते मिटाते रहे, आइये आइये आइये आइये, टीस, आवारगी, रतजगे, बेबसी, मैं नदी में खड़ा गुनगुनाता रहा ये शेर लम्‍बे चलने वाले शेर हैं । आनंद लीजिये इस नयी पीढ़ी का जो साहित्‍य की मशाल को इस इरादे से थामने आ गई है कि अब अंधेरा न होने देंगें । बुखार फिर से बढ़ रहा है सो मुझे आज्ञा दीजिये । कल मिलते हैं दो अलग अलग अंकों के साथ ।

परिवार