मंगलवार, 13 अक्टूबर 2009

दीप जलते रहें झिलमिलाते रहें- तरही मुशायरे की शुरुआत हो रही है आज, और प्रारंभ कर रही है एक बहुत छोटी शायरा हिमांशी, उसे अपना अ‍ाशिर्वाद प्रदान करें । (पंकज सुबीर )

सबसे पहले तो जन्‍मदिन की बहुत बहुत सारी शुभकामनाओं के लिये सबका आभार । मुझे लगता है कि इस बार तो 11 अक्‍टूअर को अमिताभ बच्‍चन को भी उतनी शुभकामनाएं नहीं मिली होंगीं जितनी मुझे मिलीं । कई परिचित तो कई अपरिचित सबकी शुभकामनाएं मिलती रहीं । कंचन ने 10 अक्‍टूबर को अचानक चौंका दिया । 9 अक्‍टूबर को मैंने उसे बताया था कि मुझे टाम एंड जेरी देखना सबसे पसंद है और चाकलेट खाना भी । 10 अक्‍टूबर को पहले आदरणीय नीरज जी का आशिर्वाद प्राप्‍त हुआ, और फिर अचानक कंचन की भेजी हुई चाकलेट मिलीं । बस आनंद ही आ गया । सबको आभार दे चुका हूं किन्‍तु शाम को जब मोबाइल कार में छूट गया था तब एक नंबर से चार काल आये थे, नंबर के स्‍थान पर प्राइवेट नंबर लिखा हुआ मिला सो जवाब नहीं दे पाया । उस अज्ञात को भी आभार । जो भी हों यदि वे ये पोस्‍ट पढ़ रहे हों तो मेरा आभार स्‍वीकार करें । आदरणीय राकेश जी, गौतम, कंचन, रवि और अर्श सभी ने विशेष पोस्‍ट लगा कर अभिभूत कर दिया । इस बीच कंचन के कई फोन सुने ( सुने इसलिये कि कंचन का फोन आने पर बोला नहीं जाता केवल सुना ही जाता है । ) जन्‍मदिन की शाम इतना पैदल चलना पड़ा कि रात को पैरों ने जवाब दे दिया । सभी का आभार ।

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दीप जलते रहें, झिलमिलाते रहें ।

इस बार का तरही और भी जोरदार होने की संभावना है इसलिये क्‍योंकि इस बार काफी ग़ज़लें मिल रही हैं । और कई सुंदर कविताएं भी मिली हैं । कई वरिष्‍ठों का आशिर्वाद मिला है और भी बहुत कुछ है । इस बार का मिसरा है  दीप जलते रहें, झिलमिलाते रहें ।  बहरे मुतदारिक मुसमन सालिम । जिसका वजन है 212-212-212-212 या फाएलुन-फाएलुन-फाएलुन-फाएलुन । इसी बहर पर मेरी पसंद का एक गीत है जो मेरे सबसे पसंदीदा गीतों में पहले नंबर पर है । हालांकि मेरे सबसे पसंदीदा गीतों में पहले नंबर के लिये इसमें और खामोशी के हमने देखी है में जंग चलती रहती है । सुनिये ये गीत लता जी का गीत जो फिल्‍म शंकर हुसैन से लिया है । नहीं सुन पायें तो यहां http://www.divshare.com/download/8879681-ca5  से डाउनलोड कर लें ।

अनन्‍या

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दीपावली का ये तरही मुशायरा प्रारंभ हो रहा है एक नन्‍हीं क़लम के साथ । विद्वानों की भीड़ में एक छोटी‍ सी शायरा अपनी रचना लेकर के आ रही है । ये ग़ज़ल कंचन की भतीजी अनन्या (हिमांशी) ने लिखी है। १३ वें वर्ष में अभी अभी प्रवेश लेने वाली हिमांशी जो अभी ९ वीं कक्षा में पढ़ रही है । हिमांशी के विषय में यहाँ पर जाकर जानकारी प्राप्‍त कर सकते हैं । हिमांशी ने अं  की बिंदी के साथ रदीफ अर्थात रहें लिया है । इस बार स्‍वतंत्रता रखी गई थी कि रहें या रहे कुछ भी ले सकते हैं । हिमांशी के चित्र के दोनो तरफ मैंने मां सरस्‍वती की प्रतिमा क्‍यों लगाई ये आप जानें उसकी ग़ज़ल पढ़ के पढ़ें और आप भी मेरी तरह चमत्‍कृत होकर आनंद लें ।

deepawali

बोल से आप अमृत छकाते रहें,

मग्न हो कर सभी गुनगुनाते रहें!

वक्त देखो कभी भी है रुकता नही

अपने जीवन का सपना सजाते रहें।

जिंदगी में है झगड़ों से क्या फायदा,

मिल के  शिकवे गिले सब भुलाते रहें।

अपने जीवन को करना है रोशन अगर

खुद जलें, जल के खुश्‍बू लुटाते  रहें।

दो ही लोगों से बनती नहीं जिंदगी

सारे जग से ही रिश्ते बनाते रहें।

प्रेम का घी पड़े अबके दीवाली में

दीप जलते रहें, झिलमिलाते रहें।

कंचन के अनुसार ये ग़ज़ल हिमांशी ने पन्‍द्रह मिनट में लिखी है । मुझे बिल्‍कुल विश्‍वास नहीं हो रहा है कि ऐसा हो सकता है यदि ये सच है तो हिमांशी एक अत्‍यंत प्रतिभाशाली कवियित्री है । पूरी ग़ज़ल बहर में और कहन में है । सारे शेर खुद बात कर रहे हैं । बुआ से कई क़दम आगे निकल गई है भतीजी, बुआ तो चटर पटर बातें करने में लगी हैं और ये ठोस काम कर रही हैं । सबसे अच्‍छी बात ये है कि पूरी ग़ज़ल सकारात्‍मक विचारों से भरी है । गिरह भी जबरदस्‍त बांधी है । बहुत अच्‍छी सोच है कि प्रेम का घी इस बार दीपों में भरा जाये । प्रेम का घी सारे विश्‍व के दीपकों में यद‍ि हो जाये तो फिर तो इतिहास की आठ हजार छोटी बड़ी लड़ाइयों का सारा कलुष ही घुल जाये । अनुरोध है कि इस नन्‍ही शायरा के लिये छोटी टिप्‍पणियों से काम नहीं चलाएं, ये नन्‍हा पौधा आपके नेह जल से ही पल्‍लवित होगा इसलिये अपना आशिर्वाद इसको खुल कर प्रदान करें । वरिष्‍ठ लोगों से अनुरोध है कि वे अपना आशीष ज़रूर दें क्‍योंकि वही तो इस पौधे के लिये असली खाद होगा । ये पौधा हमारे उस विश्‍वास का जिंदा रखे है कि साहित्‍य की ध्‍वजा थामने वाले हाथ नई पीढ़ी में भी आ रहे है, निराश होने की ज़रूरत नहीं हैं ।

अनुरोध - जिन लोगों ने तरही के लिये रचनाएं भेजी है उनसे अनुरोध है कि वे अपना एक चित्र भी भेजें क्‍योंकि मेरे पास वही पुराने चित्र हैं जो कई बार दोहराये जा चुके हैं । जैसे कंचन ने दीप जलाते हुए एक चित्र भेजा है । कुछ नये लोगों की भी रचनाएं मिली हैं वे भी अपने चित्र भेजें तथा परिचय भी ताकि उनका परिचय भी दिया जा सके ।  तो आनंद लें हिमांशी की ग़ज़ल का और कल मिलिये कुछ और शायरों से । चित्र तुरंत भेजें ।

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