रविवार, 13 मार्च 2016

मिसरा दिये हुए काफी दिन हो गये और अब जाना जाए कि कुछ काम शुरू भी हुआ है या नहीं ।

मित्रों इस बार का मिसरा कुछ अलग तरह का है। और इस बार के मिसरे पर होली के मूड के अलावा और भी कुछ सोचा जा सकता है। इसलिये ही इस बार का मिसरा बनाया था। मगर अभी तक यह लगता है कि काम किसी ने भी शुरू नहीं किया है। यहां तक कि कुछ वरिष्‍ठ जनों ने तो यह कह कर पल्‍ला झाड़ने की कोशिश की है कि हम से न होगा। यदि वरिष्‍ठ ऐसा कह रहे हैं तो फिर बाकियों से तो उम्‍मीद ही क्‍या की जा सकती है। मित्रों सृजन एक ऐसा कार्य है जिसमें आपको बस अनवरत लगा रहना होता है। ऐसा नहीं हो सकता कि आप अपने हिसाब से ही सृजन करें। चूँकि लेखक और रचनाकार विशिष्‍ट होता है, उसे समाज में लेखक होने के कारण विशिष्‍ट स्‍थान भी मिलता है इसलिये उसका भी दायित्‍व होता है कि वह भी अपने कार्य के प्रति ईमानदार बना रहे। यह ईमानदारी ही उसको आगे रखती है।

हौले हौल बजती हो बांसुरी कोई जैसे

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इस बार के मिसरे पर कोई गीत मुझे याद नहीं आ रहा है । हां एक धुन ज़रूर याद आ रही है । जो बहुत पहले गैर फिल्‍मी गीत के रूप में सुनी थी । तुम तो ठहरे परदेसी, साथ क्‍या निभाओगे। इस धुन पर गुनगुना कर इस मिसरे पर लिखा जा सकता है। गुनगुनाने पर समझ में आ जाएगा कि यह धुन और हमारे मिसरे की धुन एक जैसी ही है। इस बहर पर बहुत पहले किसी सज्‍ज्‍न ने मेरी काफी बहस हुई थी। वो कहानी फिर कभी।

होली को लेकर एक बात तो तय है कि होली एक ऐसा त्‍योहार है जिसमें बहुत कुछ बाहर से करने की आवश्‍यकता नहीं होती है। इसमें जो कुछ भी करना होता है वह अपने अंदर ही करना होता है। जैसे दीपावली में ईद में बाहर बहुत तामझाम करना होता है तब जाकर आपको त्‍योहार जैसा लगता है लेकिन होली में कुछ नहीं है बस अपने अंदर एक उमंग पैदा करो और होली का माहौल बन जाता है। होली तो उमड़ने वाला त्‍योहार है। उमड़ गया तो घुमड़ भी जाएगा। अब आप सोचें कि बिना उमड़े ही घुमड़ जाए तो वह तो संभव नहीं है।

इस बार जान बूझ कर मिसरा केवल त्‍योहार केन्द्रित नहीं दिया है। इस बार प्रेम है। वह प्रेम जो हम सबके अंदर होता है। वह प्रेम जो सृजन की मूल अवश्‍यकता है। यदि आपने प्रेम नहीं किया तो आप सृजन कर ही नहीं सकते हैं। तो इस बार की होली प्रेम के नाम से। और होली पर तो बुरा न मानो होली है कह कर घर से खींच लेने का रिवाज़ है तो खींच लाइये उन लोगों को घर से बाहर जिनकी ग़ज़लों की किताब के तीन तीन संस्‍करण छप चुके हैं और जो फिर भी ग़ज़ल लिखने के नाम पर कह रहे हैं कि 'इस बार तो हमसे न होगा' ।

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तो मित्रों उन लोगों को आभार जिन्‍होंने ग़ज़लें भेज दी हैं। उन लोगों को प्रोत्‍साहन जो लिख रहे हैं। और जो हथियार डाल रहे हैं उनके लिये क्‍या आप जानते हैं। तो भेजिये जल्‍दी अपनी ग़ज़लें।

6 टिप्‍पणियां:

  1. गजल की किताब के तीन संस्करण छपने और तरही मुशायरे में शिरकत करना दो अलग बातें हैं, तीन क्या तीस संस्करण वाले भी गजल नहीं कह पाते । शायरी दरअसल जवानी की तरह होती है जिसपर किसी का ज़ोर नहीं चलता , अभी ऊँट खड़ा है बैठेगा भी ये नहीं पता और अगर बैठ गया तो किस करवट बैठेगा ये कहना असंभव है !
    बुंढापा बुरी चीज़ होती है बाबू , आप पे भी आयेगा तो पूछेंगे हाल ...
    बॉंसुरी छोड़ घड़ियालों भी नहीं बजते हैंगे :)

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    1. वो बातें तेरी वो फ़साने तेरे
      शगुफ़्ता शगुफ़्ता बहाने तेरे
      गुरूजी ऐसी ना नुकुर करेंगे तो हम शिष्यों का क्या होगा, आप समझ रहे हैं ना पंकज जी.....!

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  2. कनटाप पडने का अलग ही मज़ा है..
    :-))

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  3. ईलो कर लो बात. पहले तो पंकजजी सुसरी ब्लाग की सौत कौ पीछो ना छोडे थे. अब होली पे याद आइ तो भैअया जी बान्सुरी बजवा रहेण हेन्गे. अजी कछु सोच समझ के होरी कौ मिसरो दियो होतो. जैसे सौरभ भईया की खातिर--हौले से चढ़िवे है भांग की खुमारी जैसे या फिरर नीरज भाी बम्बईया को थमायो होतो हौले हौले जकड़े है ताड़ी तन बदन जैसे तो कछु बात भी बनती और होली का सुरूर भी आतो. जब जो आप बान्सुरी ही बजवा रहेन हैन तो भैयाजी ई तो भोपाल वाले के जिम्मे है. हां पारुल थोड़ी दूर जाके मथुरा वृन्दावन घूम आयें तो थोड़ी बहुत बांसुरी सोहबत में आके बजा सकिन्गी.

    अब हम भी हाथ खड़े कर ही दे कि हमरी बस की बात नांय कि गज़ल फ़ज़ल कहें . अबहीं तौ हमें गज़ल के हिज़्ज़े भी नाय समझ में आय रहे.

    बस इन्तज़ार में हमहुं पलक पांवडे बिछाये बैठ हैं कि
    हौले हौले आती है तरही पे जवानी कैसे

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  4. भाई जी मैं याद दिला दूं

    हुसैन भाइयों द्वारा गई हुई प्रसिद्ध ग़ज़ल

    दो जवां दिलों का गम दूरियां समझती हैं




    " बाम से उतरती है इक हसीन दोशीज़ा
    जिस्म की नज़ाकत को सीढियां समझती हैं


    यूं तो सैर-ए-गुलशन को कितने लोग आते हैं
    फूल कौन तोड़ेगा डालियां समझती हैं

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